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पौँ
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. लंबी नाल या भोंपे को फूँकने से निकला हुआ शब्द। २. लंबी नाल के आकार का एक बाजा जिसमें फूँकने से 'पों' शब्द निकलता है। भोंपा। ३. अधोवायु निकलने का शब्द। मुहा०—पों बोलना = (१) हार मानना। थककर बैठ रहना। (२) दीवाला निकलना। खुक्ख हो जाना।

पोँकना (१)
क्रि० अ० [पों से अनु०] १. पतला पाखाना करना। २. अत्यंत भयभीत होना। बहुत डरना।

पोँकना (२)
संज्ञा पुं० चौपायों को पतला दस्त होने का रोग।

पोँकना (३)
वि० १. पोंकनेवाला। पतला मल करनेवाला। बार बार पतला मल करनेवाला। २. भयालु। डरपोक।

पोँका
संज्ञा पुं० [देश०] बडा़ फतिंगा जो पौधों पर उड़ता फिरता है। बोंका।

पोँगरा पु
संज्ञा पुं० [सं० पृथुक] बालक। शिशु। बच्चा।

पोँगली
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोंगा] १. दे० 'पोंगी'। २. वह नरिया जो दोबारा चाक पर से बनाकर उतारी गई हो (कुम्हार)।

पोँगा (१)
संज्ञा पुं० [सं० पुटक (= खोखला बरतन)][स्त्री० अल्पा० पोंगी] १. बाँस की नली। बाँस का खोखला पोर। २. टीन आदि की बनी हुई लंबी खोखली नली जिसमें कागज पत्र रखते हैं। चोंगा। ३. पाँव की नली।

पोँगा (२)
वि० १. पोला। २. मूर्ख। बुद्धिहीन। अहमक। उ०— विमला ने कहा 'हँसी नहीं' मैं उस ब्राह्मण को पतियाती हूँ। वह तो पोंगा ही है—किंतु वह जाय या न जाय।—गदाधर सिंह (शब्द०)।

पोँगापंथी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोंगा + सं० पंथी] मूर्खों का कार्य। मूर्खतापूर्ण कार्य।

पोँगापंथी (२)
वि० मूर्खतापूर्ण कार्य करनेवाला।

पोँगी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोंगा + ई (प्रत्य०)] छोटी पोली नली। २. नरकुल की एक नली जिसपर जुलाहें तागा लपेटकर ताना या भरनी करते हैं। ३. चार या पाँच अंगुल की बाँस की पोली नली जो बाँस के बीजने की डाँडी़ में लगी होती है। हाँकनेवाले इसे पकड़कर बीजने को घुमाते हैं। ४. तुमंडी़ बजाने की तुमडी़। ५. ऊँख या बाँस आदि में दो गाँठों के बीच का प्रदेश या भाग।

पोँचना पु
क्रि० अ० [प्रा० अप० पहुच्च] दे० 'पहुँचना'। उ०— अर्जी लिखी फौजदार ले पोंचे जिलिबदार, जाके देव दरबार चोपदार के कहिने।—दक्खिनी०' पृ० ४६।

पोँछ †
संज्ञा स्त्री० [सं० पुच्छ] दे० 'पूँछ'।

पोँछन
संज्ञा पुं० [हिं० पोंछना] किसी लगी हुई वस्तु का वह बचा अंश जो पोंछने से निकले।

पोँछना (१)
क्रि० स० [सं० प्रोच्छन, प्रा० पोंछन] लगी हुई गीली वस्तु को जोर से हाथ या कपडा़ आदि से फेरकर उठाना या हटाना। काछना। जैसे, आँख से आँसू पोँछना, कागज पर पडी स्याही पोंछना, कटोरे में लगा हुआ घी पोंछकर खा जाना, नहाने के बाद गीला बदन पोंछना। उ०—(क) सुनि के उतर आँसु पुनि पोंछे। कौन पंख बाँधा बुधि ओछे।—जायसी (शब्द०)। (ख) पोंछि डारे अंजन अँगोछि डारे अंगराग, दूर कीने भूषण, उतारि अँग अंग ते।—रघुनाथ (शब्द०)। २. पडी हुई गर्द, मैल आदि को हाथ या कपडा़ जोर से फेरकर दूर करना। रगड़कर साफ करना। जैसे,—कुर्सी पर गर्द पडी़ है पोंछ दो। पैर पोंछकर तब फर्श फर आओ। उ०—मानहु बिधि तन अच्छ छबि स्वच्छ राखिबे काज। दृग पग पोंछन को किए भूखन पायंदाज।—बिहारी (शब्द०)। संयो० क्रि०—डालना।—देना।—लेना। यौ०—झाडू़ पोंछ। विशेष—जो वस्तु लगी या पडी़ हो तथा जिसपर कोई वस्तु लगी या पडी़ हो, अर्थात् आधार और आधेय दोनों इस क्रिया के कर्म होते हैं। जैसे, कटोरा पोंछना, पैर में लगी हुई गर्द पोंछना कटोरे में लगा घी पोंछना, पैर पोंछना। झटके से साफ करने को झाड़ना और रगड़कर साफ करने को पोंछना कहते हैं।

पोँछना (२)
संज्ञा पुं० [स्त्री० पोंछना] पोंछने का कपडा़। वह कपडा़ जो पोंछने के लिये हो।

पोँट
संज्ञा पुं० [अं० प्वाइंट] अंतरीप। (लश०)।

पोँटा †
संज्ञा पुं० [देश०] नाक का मल।

पोँटा
संज्ञा पुं० [अं० प्वाइंट] रस्से का सिरा या छोर। (लश०)।

पोँटी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की छोटी मछली।

पोँढना †
क्रि० अ० [हिं० पौंढ़ना] दे० 'पौढ़ना'। उ०—रूप चंद नंदा के घर पोंढे़ हैं।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १९३।

पोँन पु
संज्ञा पुं० [सं० पवन, हिं० पौन] दे० 'पवन'। उ०—नृप दीन हल्यौ बहु चित्त चितं। सुहल्या जनु पोंनय पीप पतं।— पृ० रा० १।११४। (ख) सोई उपमा कविचंद कथे। सजे मनों पोंन पवंग रथे।—पृ० रा०, २७।३२।

पोँहचना †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'पहुँचना'। उ०—पोंहचे मारण, प्राँणियाँ, जल थल अंबर जाय।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ४४।

पोँहचाना †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पहुँचाना'। उ०—जानकी रहौला अठैं मो जनक रै। जनक रै कनाँ पोंहचाय जावाँ।—रघु० रू०, पृ० १०५।

पो
वि० [सं०] शुद्ध। पवित्र। स्वच्छ [को०]।

पोआ
संज्ञा पुं० [सं० पुत्रक] १. साँप का बच्चा। सँपोला। २. कीडा़। उ०—अबुझ ना बुझ भाल के कहे मंद, पोआ पियइ काँहा कुसुम मकरंद।—विद्यापति, पृ० ६३।

पोआना
क्रि० स० [हिं० 'पोना' का प्रे० रूप] १. पोने का काम कराना। २. गीले आटे की लोई को गोले रोटी के रूप में बना बनाकर पकानेवाले को सेंकने के लिये देना। जैसे, रोटी पोआना। संयो० क्रि०—देना।—लेना।

पोआर †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुआल'।

पोइट्री
संज्ञा स्त्री० [अं०] काव्य। कविता। उ०—पोइट्रि में बोलती थी, प्रोज में बिलकुल अडी़।—कुकुर०, पृ० १६।

पोइणी, पोइन
संज्ञा स्त्री० [सं० पदि्मनी, प्रा०, पउमिणी, अप०, राज० पोयण, पोइण] कमलिनी। पदमिनी। उ०—(क) जल पोइणिए छाइयउ, कहउ त पूगल जाँही।—ढोला०, दू० २४५। (ख) रंभ अंभ तहै भरै फुल्लि पोइन सुमुष्ष नर।—पृ० रा०, १३।९६।

पोइया (१)
संज्ञा स्त्री० [फा़० पोयपह्] घोडे़ की दो दो पैर फेंकते हुए दौड़। सरपट चाल। मुहा०—पोइयाँ जाना = दोनों पैर फेंकते हुए दौड़ना।

पोइया† (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पोदिकी, हिं० पोय, पोई] एक लता। दे० 'पोई'।

पोइस (१)
संज्ञा स्त्री० [फा़० पोयह्, हिं० पोइया] सरपट चाल। दौड़। उ०—रे मन जनम अकारथ खोइस।...कालयमन सो आनि बनैहैं देखि देखि मुख रोइस। सूर श्याम बिनु कौन छुडा़वै चले जाहु भाई पोइस।—सूर (शब्द०)।

पोइस (२)
अव्य० [फा़० पोश] देखो। हटो। बचो।विशेष—गधे, खच्चर आदि लेकर चलनेवाले लोगों को छू जाने से बचने के लिये 'पोश' 'पोस' या 'पोइस पोइस' पुकारते चलते हैं।

पोई (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पूतिका या पोदिक] एक लता जिसकी पत्तियों का लोग साग खाते हैं। विशेष—इसकी पत्तियाँ पान की सी गोल पर दल की मोटी होती हैं। इसमें छोटे छोटे फलों के गुच्छे लगते हैं जिन्हें पकने पर चिड़ियाँ खाती हैं। पोई दो प्रकार की होती हैं— एक काले डंठल की, दूसरी हरे डंठल की। बरसात में यह बहुत उपजाती है। पत्तियों का लोग साग खाते हैं। एक जंगली पोई भी होती है जिसकी पत्तियाँ लंबोतरी होती हैं। इसका साग अच्छा नहीं होता। पोई की लता में रेशे होते हैं जो रस्सी बटने के काम में आते हैं। वैद्यक में पोई गरम, रुचिकारक, कफवर्धक और निद्राजनक मानी गई है। पर्या०—उपोदकी। कलंबी। पिच्छिला। मोहिनी। विशाला। मदशाका। पूतिका।

पोई (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पोत] १. नरम कल्ला। अंकुर। २. ईख का कल्ला। ईख की आँख। मुहा०—पोई फूटना = ईख में अंकुर निकलना। ३. गेहूँ, ज्वार, बाजरे आदि का नरम और छोटा पौधा। जई। ४. गन्ने का पोर।

पोई (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० प्लुत या फा़० पोयह्] घोडे़ की एक प्रकार की चाल। दे० 'पोइया (१)'।

पोका †
संज्ञा पुं० [सं० पोष > पोख] दे० 'पोख', 'पोष'। उ०— अंडा पालै काछुई, बिन थन राखै पोक। यौं करता सबकी करै, पालै तीनिउ लोक।—कबीर सा० सं०, पृ० ८१।

पोकना (१)
संज्ञा पुं० [देश०] महुए का पका हुआ फल।

पोकना (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पोंकना'।

पोकना (३)
क्रि० अ० दे० 'पोंकना'।

पोकल †
वि० [देश०] १. पुलपुला। नाजुक। कमजोर। २. पोला। खोखला। ३. निःसार। तत्वहीन। तत्वशून्य।

पोकारना †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पुकारना'। उ०—सहस्र वर्ष ग्रहण निर्धारा। आगम सत्य कबीर पोकारा।—कबीर सा०, पृ० ९३५।

पोख
संज्ञा पुं० [सं० पोष] पालने पोसने का संबंध या लगाव। पोस। उ०—कबिरा पाँच पखेरुआ राखा पोख लगाय। एक जो आया पारधी ले गया सबै उडा़य।—कबीर (शब्द०)।

पोखनरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोखरा + नरी] ढरकी के बीच का गड्ढा जिसमें नरी लगाकर जुलाहे कपडा़ बुनते हैं।

पोखना (१)
क्रि० स० [सं० पोषण] पालना। पोसना। उ०—अरे कलानिधि निरदई कहा नधी यह आय। पोखत अमिरित कलन जग बिरहिन हेत जराय।—रसनिधि (शब्द०)।

पोखना (२)
क्रि० अ० गाय भैंस आदि का बच्चा देने का समय समीप आने पर, हाथ पैर आदि का ढीला पड़ जाना और थन का सज आना। थलकना।

पोखर
संज्ञा पुं० [सं० पुष्कर, प्रा० पुक्खर, पोक्खर] १. तालाब। पोखरा। २. पटेबाजी में एक बार जो प्रतिपक्षी की कमर पर दाहिनी ओर होता है।

पोखरा
संज्ञा पुं० [सं० पुष्कर, प्रा० पुक्खर, पोक्खर] [स्त्री० अल्पा पोखरी] वह जलाशय जो खोदकर बनाया गया हो। तालाब। सागर। उ०—पाँच भीट कै पोखरा हो, जा में दस द्वार।— कबीर श०, भा० २, पृ० ५२।

पोखराज
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पराज] दे० 'पुखराज'।

पोखरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोखरा] छोटा पोखरा। तलैया।

पोखार पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पोखरा'।—उ०—अजर अबीर कुमकुमा केसरि उमगो प्रेम पोखार।—भीखा श०, पृ० ४९।

पोगंड
संज्ञा पुं० [सं० पोंगण्ड] १. पाँच से दस वर्ष तक की अवस्था की बालक। विशेष—कुछ लोग ५ से १५ तक पोगंड मानते हैं। २. वह जिसका कोई अंग छोटा, बडा़ या अधिक हो। जैसे, छह उँगलियाँ होना, बायाँ हाथ दाहने से छोटा होना।

पोगर
संज्ञा पुं० [सं० पुष्कर, प्रा० पुक्कर, पोक्कर] हाथी का मुख। हाथी की सूँड़ का अग्र भाग। उ०—तिहि ठाम आइ उहिं हस्तिनी। बोर लियों पोगर सुनिम।—पृ० रा० २७।९।

पोच (१)
वि० [फा़० पूच] १. तुच्छ। क्षुद्र। बुरा। निष्कृष्ट। नीच। उ०—(क) मिट्यौ महा मोह जी को छूट्यो पोच सोच सी को जान्यो अवतार भयो पुरुष पुरान को।—तुलसी (शब्द०)। (ख) भलो पोच कह राम को मोको नरनारी। बिगरे सेवक स्वान सो साहेब सिर गारी।—तुलसी (शब्द०)। (ग) भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए।—तुलसी (शब्द०)। (ध) कहिहै जग पोच न सोच कछू फल लोचन आपनो तो लहिहै।—तुलसी (शब्द०)। (च) कौन सुनै काके श्रवण काकी सुरति संकोच। कौन निडर कर आपको को उत्तम को पोच।—सूर (शब्द०)। (छ) प्रीति भार लै हिए न सोचू। वही पंथ भल होय कि पोचू।—जायसी (शब्द०)। २. अशक्त। क्षीण। हीन।

पोच (२)
संज्ञा स्त्री० दे० 'पोची'।

पोचारा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुचारा'।

पोची पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोच] निचाई। हेठापन। बुराई। उ०—यद्यपि मों ते कै कुमातु ते होइ आई अति पोची। सन्मुख गए सरन राखहिंगे रघुपति परम सँकोची।—तुलसी (शब्द०)।

पोछना
क्रि० स० [सं० प्रोच्छन] दे० 'पोंछना'। उ०—कुमकुम केर चोरि भलि फाउलि काँधन मेलि ए पोछी।—विद्यापति, पृ० १०५।

पोजीशन
संज्ञा स्त्री० [अं० पोजीशन] पद। ओहदा। स्थान।उ०—आखिर आदमी को कुछ तो अपने पोजीशन का ख्याल करना चाहिए।—मान०, भा० १, पृ० ८५।

पोट (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पोट] १. गठरी। पोटली। बकुचा। मोटरी। उ०—(क) पहले बुरा कमाय के बाँधी विषय की पोट। कोटि कर्म फिरे पलक में जब आयो हरि ओट।— कबीर (शब्द०)। (ख) खुलि खेलौ संसार में बाँधि सकै नहिं कोय। घाट जगाती क्या करै सिर पै पोट न होय।— (शब्द०)। २. ढेर। अटाला। जैसे, दुःख की पोट, पानी की पोट।

पोट (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पृष्ठ, हिं० पुट्ठ] पुस्तक के पन्नों की वह जगह जहाँ से जुजबदी या सिलाई होती है।

पोट (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० पोत (= वस्त्र)] गुर्दे के ऊपर की चादर। कफन के ऊपर का कपडा़।

पोट (४)
संज्ञा पुं० [सं०] १. घर की नीवँ। २. मेल। मिलान।

पोटक
संज्ञा पुं० [सं०] नौकर। भृत्य। सेवक [को०]।

पोटगल
संज्ञा पुं० [सं०] १. नरसल। नरकट। २. काश। काँस। ३. मछली। ४. एक प्रकार का साँप।

पोटना पु
क्रि० स० [हिं० पुट] १. समेटना। बटोरना। उ०— (क) ऐसो पोटि ओंठ रस लेत। हठ सों परसि भरहि नख देत।—गुमान (शब्द०)। (ख) पोटि भटू तट ओट कटी के लपेटि पटी सो कटी पटु छोरत।—देव (शब्द०)। २. हथियाना। पँजे में करना। फुसलाना। बात में लाना। उ०—ललिता के लोचन मिचाइ चंद्रभागा सों, दुराइबे कों ल्याई वै तहाई 'दास' पोटि पोटि।—भिखारी० ग्रं०, भा० १, पृ० १४२।

पोटरी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० पोट्टली] दे० 'पोटली'।

पोटल
संज्ञा पुं० [सं०] पोटली। पोटरी [को०]।

पोटलक
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पोटलिका] पोटली। पोटरी [को०]।

पोटला
संज्ञा पुं० [सं० पोटलक] बडी़ गठरी।

पोटली
संज्ञा स्त्री० [सं० पोट्टली] १. छोटी गठरी। छोटा बकुचा। २. भीतर किसी वस्तु को रखकर बटोरकर बाँधा हुआ कपडा़ आदि। जैसे,—(क) अनाज को पोटली में बाँधकर ले चला। (ख) सूजन पर नीम की पोटली बनाकर सेंको।

पोटा †
वि० [सं० प्लुतः] तराबोर। उ०—मेह सुजल पोटाँ महीं, सावण करता सैल।—बाँकी० ग्रं०, भा० २ पृ० ७।

पोटा (२)
संज्ञा पुं० [सं० पुट (= थैली) अथवा देशी, पोट्ट, भरा०, पोट (= पेट)] [स्त्री० अल्पा० पोटी] १. पेट की थैली। उदराशय। मुहा०—पोटा तर होना = पास में धन होने से प्रसन्नता और निश्चिंतता होना। पास में माल रहने से बेफिक्री होना। २. कलेजा। साहस। सामर्थ्य। पित्ता। जैसे,—किसका पोटा है जो उनके विरुद्ध कुछ कर सके। ३. समाई। औकात। बिसात। ४. आँख की पलक। ५. उँगली का छोर।

पोटा (३)
संज्ञा पुं० [सं० पोत] १. चिड़िया का बच्चा जिसे पर न निकले हों। गेदा। २. अंकुर। उ०—नाभी माहिं भया कुछ दीरघ पोटा सा दरसाया।—दरिया० बानी, पृ० ५६। यौ०—चेंगी पोटे।

पोटा (४)
संज्ञा पुं० [?] नाक का मल या श्लेष्मा। क्रि० प्र०—बहना।

पोटा (५)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह स्त्री जिसमें पुरुष के से लक्षण हों। नृलक्षणा स्त्री। पुरुषलक्षणों से युक्त। जैसे, दाढी़ या मूँछ के स्थान पर बाल उगना। २. दासी। ३. घड़ियाल।

पोटाश, पोटास-संज्ञा पुं० [अं० पोटाश]
वह क्षार जो पहले जलाए हुए पौधों की राख से निकाला जाता था, पर अब कुछ खनिज पदार्थों से प्राप्त होता है। विशेष—पौधों की राख को पानी में घोलकर निथारते हैं फिर उस निथरे हुए पानी को औटाते हैं जिसमें क्षार गाढा़ होकर नीचे जम जाता है। चुकंदर की सीठी (चीनी निकालने पर बची हुई) और भेड़ों के ऊन से भी पोटास निकलता है। शोरा, जवाखार आदि पोटास ही हैं। पोटास औषध और शिल्प में काम आता है।

पोटिक
संज्ञा पुं० [सं०] पिटिका। फोडा़ [को०]।

पोटी (१)
संज्ञा स्त्री० [ हिं० पोटा ] दे० 'पोटा'।

पोटी (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बडा़ नक्र। बडा़ घड़ियाल। २. गुह्य। गुदा [को०]।

पोटेशियम साइनाइड
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार का अत्यंत जहरीला श्वेत और स्वच्छ पदार्थ जो कच्ची धातु से सोने को अलग करने और कीडे़ मारने आदि के काम में आता है।

पोट्टल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पोटल'।

पोट्टलिका, पोट्टला
संज्ञा स्त्री० [सं०] पोटली। गठरी [को०]।

पोठी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की छोटी मछली। उ०— पोठी नाले के बाहर आकर उछल रही थी।—रति० पृ० ११४।

पोडु
संज्ञा स्त्री० [सं०] कपाल का अस्थितल। खोपडी़ के ऊपरी भाग की हड्डी [को०]।

पोढ पु †
वि० [सं० प्रौढ, प्रा० पोढ]दे० 'पोढा़'। उ०—(क) मान न करसि, पोढ़ करु लाडू़। मान करत रिस मानै चाडू।— जायसी ग्रं०, पृ० १३३। (ख) मोडी़ सुरति पोढ़ पद लारी। तेज भास लखि सुरति निहारी।—घट०, पृ० २७१।

पोढा़
वि० [सं० प्रौढ, प्रा० पोढ] [स्त्री० पोढी़] १. पुष्ट। दृढ़ मजबूत। उ०—कहीं छटना छाज पिटारी है कहीं बिकती खाट खटोला है। जब देख खूब तो आखिर को ना पोढी़ खाट न चरखा है।—नजीर (शब्द०)। २. दृढ़। कडा़। कठिन। कठोर। उ०—तीखी हेर चीर गहि ओढा़। कंतन हेर कीन्ह जिय पोढा़।—जायसी (शब्द०)।मुहा०—जी पोढा़ करना—जी कडा़ करना। चित्त को दृढ़ करना जिससे भय, पीडा़ दुःख आदि से विचलीत न हो।

पोढा़ना † (१)
क्रि० अ० [हिं० पोढ़] १. दृढ़ होना। मजबूत होना। २. पक्का पड़ना।

पोढा़ना (२)
क्रि० स० दृढ़ करना। पक्का करना। दृढा़ना।

पोढा़ना (३)
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पौढा़ना'। उ०—पाछे श्री ठाकुर जी को पोढा़इ बाहिर की टहल सो पहौचि प्रसाद लै मुरारीदास सोवते।—दो सौ बावन०, भाग १, पृ० १०२।

पोत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पशु पक्षी आदि का छोटा बच्चा। २. छोटा पौधा। ३. वह गर्भस्थ पिंड जिसपर झिल्ली न चढी़ हो। यौ०—पोतज = जो जरायुज न हो। ४. दस वर्ष का हाथी का बच्चा। ५. घर की नींव। ६. कपडा़। पट। ७. कपडे़ की बुनावट। जैसे, जैसे—इस कपडे़ का पोत अच्छा नहीं है। ८. नौका। नाव। ९. जहाज। यौ०—पोतधारी। पोतप्लव = मल्लाह। माझी। = पोतभंग = पोत का टूटना। पोतरक्ष = पतवार। पोतवाणिक। पोतवाह।

पोत (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रोता, प्रा० पोता] १. माला या गुरिया का दाना। २. काँच की गुरिया का दाना। यह अनेक रंगों का होता है और कोदों के दाने के बराबर होता है। निम्न वर्ग की स्त्रियाँ इसे तागे में गूँथकर गले में पहनती हैं। इसे लोग छडी़ और नैच आदि पर भी लपेटते हैं। उससे सोनार गहनों को भी साफ करते हैं। उ०—(क) पतिव्रता मैली भली गले काँच की पोत। सब सखियन में देखिए ज्यों सूरज की जोत।—कबीर (शब्द०)। (ख) झीना कामरि काज कान्ह ऐसी नहिं कीजै। काँच पोत गिर जाइ नंद घर गयौ न पूजै।—सूर (शब्द०)। (ग) फिरि फिरि कहा सिखावत मौन।...यह मत जाइ तिन्हैं तुम सिखवो जिनहीं यह मत सोहत। सूर आज लौं सुनी न देखी पोत पूतरी पोहत।—सूर (शब्द०)।

पोत (३)
संज्ञा पुं० [सं० प्रवृत्ति, प्रा० पउत्ति] १ ढंग। ढब। प्रवृत्ति। उ०—नीच हिए हुलसे रहैं गहे गेंद के पोत। ज्यों ज्यों माथे मारिए त्यों त्यों ऊँचे होत।—बिहारी (शब्द०)। २. बारी। दाँव। पारी। अवसर। ओसरी। मुहा०—पोत पूरा करना = कमी पूरी करना। ज्यों त्यों करके किसी काम को पूरा करना। पोत पूरा होना = कमी पूरी होना। ज्यों त्यों करके किसी काम का पूरा होना।

पोत (४)
संज्ञा पुं० [फा़० फोत] जमीन का लगान। मुकर।

पोतक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'पोत'। २. बच्चा। शिशु। उ०— जो सब पातक डाकिनि।—मानस २। १३२। ३. महाभारत के अनुसार एक नाग का नाम।

पोतकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुतिका। पोई नाम की लता।

पोतडा़
संज्ञा पुं० [सं० पोत = (कपडा़)] वह कपडा़ जो बच्चों के चूतड़ों के नीचे रखा जाता है। गंतरा। उ०—रेसम हंदा पोतडा़ पालणिए पोढाय।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० २७।

यौ०—पोतड़ों के रईस = खानदानी अमीर।

पोतदार
संज्ञा पुं० [हिं० पोत + दार] १. वह पुरुष जिसके पास लगान कर का रुपया रखा जाय। खजानची। २. पारखी। वह पुरुष जो खजाने में रुपया परखने का काम करता हो।

पोतधारी
संज्ञा पुं० [सं० पोतधारिन्] जहाज का मालिक [को०]।

पोतन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] पवित्र। स्वच्छ। शुद्ध।

पोतन (२)
वि० पवित्र करनेवाला।

पोतनहर † (१)
संज्ञा स्त्री० [पोतन + हर (प्रत्य०)] १. वह बरतन जिसमें घर पोतने के लिये मिट्टी घोलकर रखी हो। २. वह स्त्री जो घर पोते या घर पोतने का काम करती हो।

पोतनहर (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पोत + नाल] आँत। अँतडी़।

पोतना (१)
क्रि० स० [सं० प्लुत, प्रा० पुत्त + हिं० ना (प्रत्य०) अथवा सं० पोतन (= पवित्र)] १. किसी गीले पदार्थ को दूसरे पदार्थ पर फैलाकर लगाना। गीली तह चढा़ना। चुपड़ना। जैसे, रोगन पोतना, तेल पोतना, चूना पोतना। संयो० क्रि०—देना।—लेना। २. किसी गीले या सूखे पदार्थ को किसी वस्तु पर ऐसा लगाना कि वह उसपर जम जाय। जैसे, कालिख पोतना, अबीर पोतना, मिट्टी पोतना, धूल पोतना, रंग पोतना। संयो० क्रि०—देना।—लेना। ३. किसी स्थान को मिट्टी, गोबर चूने आदि से लीपना। चूने मिट्टी, गोबर आदि का गीला लेप चढा़कर किसी स्थान को स्वच्छ करना। जैसे, घर पोतना, आँगन पोतना। उ०— (क) सोमरूप भल भयो पसारा। घवलसिरी पोतहिं घर बारा।—जायसी (शब्द०)। (ख) पोता मँडप अगर औ चंदन। देव भरा अरगज औ बंदन।—जायसी (शब्द०)। संयो० क्रि०—डालना।—देना।—लेना।

पोतना (३)
संज्ञा पुं० वह कपडा़ जिससे कोई चीज पोती जाय। पोतने का कपडा़। पोता।

पोतरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०]दे० 'पोत्री'। उ०—परबस मेरी पोतरी, औ सिरजोर निदान।—रा० रू०, पृ० ३३२।

पोतला
संज्ञा पुं० [हिं० पोतना] पराँठा। तवे पर घी पोतकर सेंकी हुई चपाती।

पोतवाणिक
संज्ञा पुं० [सं० पोतवाणिज्] वह व्यापारी जो समुद्र से व्यापार करता हो [को०]।

पोतवाह
संज्ञा पुं० [सं०] नाविक। नाव चलानेवाला [को०]।

पोतवाहिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० पोत + वाहिनी] जहाजों का बेडा़। उ०—चलोगी चंपा, पोतवाहिनी पर असंख्य धनराशि लादकर राजरानी सी जन्मभूमि के अंक में ?—आकाश०, पृ० १४।

पोता (१)
संज्ञा पुं० [सं० पौत्र, + प्रा० पोत्त] बेटे का बेटा। पुत्र का पुत्र। उ०—तुम्हारे पोते से हमारी पोती का ब्याह होय तो बडा़ आनंद है।—लल्लू (शब्द०)।

पोता (२)
संज्ञा पुं० [सं०पोतृ > पोता] १. यज्ञ में सोलह प्रधान ऋत्वजों में से एक। २. पवित्र वायु। वायु। ३. विष्णु।

पोता (३)
संज्ञा पुं० [फा़० फोतह्] १. पोत। लगान। भूमिकर। २. अंडकोश।

पोता (४)
संज्ञा पुं० [हिं०] कलेजा। साहस। पित्ता। दे० 'पोटा' (२)। उ०—क्यों धरते धर धीर सबे भट होत कछू बल काहू के पोते।—हनुमान (शब्द०)।

पोता (५)
संज्ञा पुं० [हिं० पोतना] १. पोतने का कपडा़। कूची जिससे घरों में चूना फेरा जाता है। २. धुली हुई मिट्टी जिसका लेप दीवार आदि पर करते हैं। मुहा०—पोता फेरना =(१) दीवार आदि पर चूने मिट्टी आदि का लेप करके सफाई करना। (२) चौका लगाना। चौपट करना। (३) सफाई कर देना। सब कूछ लूट ले जाना। ३. मिट्टी के लेप पर गीले कपडे़ का पुचारा जो भबके से अर्क उतारने में बरतन के ऊपर दिया जाता है। उ०—नैन नीर सों पोता किया। तस मद चुवा बरा जस दिया।—जायसी ग्रं०, पृ० ६५।

पोता (६)
संज्ञा पुं० [सं० पोत] १५ या १६ अंगुल लंबी एक प्रकार की मछली जो हिंदुस्तान की प्रायः सब नदियों में मिलती है।

पोताई
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोतना] दे० 'पुताई'।

पोताच्छादन
संज्ञा पुं० [सं०] तंबू। छोलदारी। डेरा।

पोताधान
संज्ञा पुं० [सं०] छाँवर। मछलियों के बच्चों का समूह।

पोताध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं० पोत + अध्यक्ष] जहाज का स्वामी। उ०—किसके लिये ? पोताध्यक्ष मणिभद्र अतल जल में होगा नायक। अब इस नौका का स्वामी मैं हूँ।—आकाश०, पृ० ३।

पोतारना पु †
क्रि० स० [सं० प्रोत्साहन] उत्साहित करना। प्रोत्साहन देना। उ०—उण बेला उदाहरै, तोले चंद्र प्रहास। रजपूताँ पोतारियाँ, भुज धारियाँ अकास।—रा० रू०, पृ० २४३।

पोतारा
संज्ञा पुं० [हिं० पोतना] दे० 'पुतारा'।

पोतारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पुतारा] पोतने का कपडा़।

पोतास
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का कपूर। बरास। भीमसेनी कपूर। विशेष—दे० 'कपूर'।

पोती पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पोत'। उ०—गर पोती जोति विचारि, ससि चरन फंदय डारि।—पृ० रा०, १४।१५०।

पोतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पोई की बेल। २. वस्त्र। कपडा़।

पोतिया (१)
संज्ञा पुं० [सं० पोत] १. वह कपडे़ का टुकडा़ जिसे साधु पहनते हैं या जिसे पहनकर लोग नहाते हैं। २. वह छोटी थैली जिसे लोग पास में लिए रहते और जिसमें चूना, तंबाकू, सुपारी आदि रखते हैं। छोटा बटुआ।

पोतिया
संज्ञा पुं० [?] एक प्रकार का खिलौना।

पोती (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोता] पुत्र की पुत्री। बेटे की बेटी।

पोती (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोतना] १. मिट्टी का लेप जो हाँड़िया की पेंदी पर इसलिये चढा़या जाता है जिसमें अधिक आँच न लगे। २. पानी का वह पुतारा जो मद्य चुवाते समय बरतन पर फेरा जाता है। इससे भभके से उठी हुई भाप उस बरतन में जाकर ठंढी हो जाती है और मद्य के रूप में टपकती है। ३. पुतारा देने की क्रिया।

पोत्ती †
संज्ञा स्त्री० [देशी] शीशा [को०]।

पोत्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] नावों का समूह [को०]।

पोत्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूअर का खाँग। २. वज्र। ३. एक यज्ञपात्र जो पोता नामक याजक के पास रहता है। ४. नाव। पोत। ५. नाँव का डाँड़। ६. हल की नोक या फाल (को०)। ७. वस्ञखंड। कपडा़। वस्ञ (को०)।

पोत्र (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] [स्त्री० पोत्री, पोती] दे० 'पौत्र'। उ०—पुत्र घने पौत्रे बहुत अरु दिसै सपरवार।—प्राण०, २४७।

पोत्रायुध
संज्ञा पुं० [सं०] सूअर।

पोत्री
संज्ञा पुं० [सं० पोत्रिन्] सूअर।

पोथ
संज्ञा पुं० [सं०] आघात। प्रहार [को०]।

पोथकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक नेत्ररोग जिसमें आँख में खुजली और पीडा़ होती है, पानी बहता है और सरसों के बराबर छोटी छोटी लाल लाल फुंसियाँ निकल आती हैं।

पोथा
संज्ञा पुं० [सं० पुस्तक, प्रा० पुत्थय, पोत्थय हिं० पोथी] १. कागजों की गड्डी। २. बडी़ पोथी। बडी़ पुस्तक (व्यंग या विनोद)। जैसे,—तुम इतना बडा़ पोथा लिए क्या फिरते हो ?।

पोथिया (१)
संज्ञा पुं० [सं० पोतिया] दे० 'पोतिया'।

पोथिया †
संज्ञा स्त्री० [सं० पुस्तिका, प्रा० पोत्थिआ, पोत्थिया] दे० 'पोथी'।

पोथी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पुस्तिका, प्रा० पोत्थिया] पुस्तकः। उ०— पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोइ। एकै अक्षर प्रेम का पढै़ सो पंडित होइ।—कबीर (शब्द०)। यौ०—पोथीखाना = ग्रंथागार। पुस्तकालय। जिस स्थान पर सिर्फ किताबें रखी जायँ। उ०—बड़ी कठिनाइयों के बाद राज्य पुस्तकालय के पोथीखाना में सूरसागर की एक प्रति दो खंडों में मिली—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० १२०। पोथी पंडित = ऐसा पठित व्यक्ति जिसे केवल पुस्तकीय ज्ञान हो, व्यावहारिक ज्ञान न हो। उ०—पुराने आचार्यों से इस प्रकार का विनोद कोई बडा़ उस्ताद ही कर सकता था, निरा पोथीपंडित कभी ऐसा करने की हिम्मत न करता।—भा० इ० रू०, पृ० ६८८।

पोथी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोट (= गट्ठा)] लहसुन की गाँठ।

पोद †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पौद (१)'। उ०—इसकी पोद थोडे़ दिन पहले एक मनोहक बाग से उखाड़कर सूरत में लगाई गई थी। —श्रीनिवास ग्रं०, पृ० १२।

पोदना
संज्ञा पुं० [अनु० फुदकना] १. छोटी चिड़िया। उ०— कुछ लाल चिडे़ पोदने पिछे ही न खुश थे। पिदडी भी सम- झती थी उसे आँख का तारा।—नजीर (शब्द०)। २. छोटे डील डौल का पुरुष। नाटा आदमी। ठिगना आदमी।मुहा०— पोदमा सा = बहुत छोटा सा। जरा सा।

पोदीना
संज्ञा पुं० [फा० पोदीनह्] दे० 'पुदीना'।

पोद्दार (१)
संज्ञा पुं० [सं० पोत, हिं० पोद+दार] १. वह मनुष्य जो गाँजे की जातियाँ उसके स्त्री० और पुं० भेद तथा खेती के ढंग जानता हो।

पोद्दार (२)
स्त्री० पुं० [फा० फोतहदार, हिं० पोतदार] १. दे० 'पोतदार।' २. मारवाडी वैश्यों का एक वर्ग।

पोना (१)
क्रि० स० [सं० पूप, हिं० पूवा+ना (प्रत्य०)] गीले आटे की लोई को हाथ से दबा दबाकर घुमाते हुए रोटी के आकार में बढाना। गीले आटे की चपाती गढना। जैसे, आटा पोना, रोटी पोना। २. रोटी पकाना। उ०— (क) तुमहिं अबै जैइँय घर पौई। कमल न भेंटहिं, भेंटहिं कोईं। — जायसी (शब्द०)। (ख) सूर आँखि मजीठ कीनी निपट काँची पोय।—सूर (शब्द०)।

पोना (२)
क्रि० स० [सं० पोत, प्रा० पोइअ, हिं० पोय+ ना (प्रत्य०)] पिरोना। गुथना। पोहना। उ०— (क) हरि मोतियन की माल है पोई काँचे धाग। जतन करो झटका घना टूटे की कहुँ लाग।—कबीर (शब्द०)। (ल) कंचन को कँठुला मनि मोतिनि बिच बधनहँ रह्यौ पोइ (री)। देखत बनै, कहत नहिं आवै उपमा कौं नहिं कोइ (री)। —सूर०, १०।१४८। (ग) दिनकर कुज मनि निहारि प्रेम मगन ग्राम नारि परसपर कहैं सखि अनुराग ताग पोऊ। तुलसी यह ध्यान सुधन जा दिन मानि लाभ सधन कृपन ज्यों सनेह सोहिए सुगेह जोऊ।— तुलसी (शब्द०)।

पोना (३)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पौना'।

पोप
संज्ञा पुं० [अं०] ईसाइयों के कैथलिक संप्रदाय का प्रधान धर्मगुरु। विशेष— इसका प्रधान स्थान यटूरोप में इटली राज्य का रोम नगर है। चौदहवीं शताब्दी तक संसार के सभी ईसाई धर्मावलंबी राज्यों पर पोप का बडा प्रभाव था। पद्रहवीं शताब्दी में लूथर नामक एक नए संप्रदायस्थापक की शिक्षा से पोप का अधिकार घटने लगा, पर पुराने कैथलिक संप्रदाय के माननेवालों में पोप का अभी वैसा ही आदर है। उनका अभिषेक आदि उसी प्रकार किया जाता है जैसे महाराजाओं का होता है। यौ०—पोपलीला — धार्मक?आडंबर। झूठा प्रदर्शन। ढोंग।

पौपला
वि० [हिं० पुलपुला] [वि० स्त्री० पोपली] १. जो भीतर के भराव के कम होने या न रहने के कारण पचक गया हो। पचका और सुकडा हुआ। २.बिना दाँत का। जिसमें दाँत न हों। जैसे, वुड्ढी का पोपला मुँह। ३. जिसके मुँह से दाँत न हों। जैसे पोपला वुड्ढा।

पोपलाना
क्रि० अ०[हिं० पोपला+ ना(प्रत्य०)] पोपला होना। उ०— डाढी नाक याग मा मिलगै बिना दाँत मुँह अस पोपलान। डाढिहि पर बहि बहि आवति है कबौं तमाकू जो फाँकन।—प्रताप (शब्द०)।

पोपली
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोपला] आम की गुठली घिसकर बनाया हुआ बाजा जिसे लड़के बजाते हैं।

पोपो †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] मलत्याग करने की इंद्रिय। गुदा।

पोम †
संज्ञा पुं० [सं० पद्म, प्रा० पउम, पोम] [स्त्री० पोमिन, पोमिनि, पोमिनी] दे० 'पदम'।

पोमाना पु †
क्रि० अ० [सं० प्रफुल्ल या सं० पद्म, प्रा० पउम, पोम] फूलना। गर्व करना। पुंसत्व का अभिमान करना। उ०— पापड़ फोड़ पोमावहीं मन में मावड़ियाँह।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० १६।

पोमिन पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पद्मिनी, प्रा० पोमिणी] दे० 'पदि्मनी'। उ०—पोमिन बन नहिं चरहि नहिन संचरहि कुमुद बन। ईष षेत परहरहि जीर पर हुअ विरत्त मन।—पृ० रा०, ६। १०१।

पोय †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पोई'।

पोयण पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पुरइन या प्रा० पोमिण] कमल। पुरइन। उ०—मेवाणों तिण माँह पोयण फूल प्रताप सी।— अकबरी०, पृ० ४४।

पोया
संज्ञा पुं० [सं० पोत] १. वृक्ष का नरम पौधा। २. बच्चा। ३. साँप का छोटा बच्चा। सँपोला।

पोर (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पर्व] १. उँगली की गाँठ या जोड़ जहाँ से वह भुक सकती है। २. उँगली में दो गाँठों या जोड़ों के बीच की जगह। उँगली का वर भाग जो दो गाँठों के बीच हो। ३. ईख, बाँस, नरसल, सरकंडे आदि का वर भाग जो दो गाँठों के बीच हो। उ०—(क) प्रीति सीखिए ईख सो पोर पोर रस होय। (शब्द०) (ख) पोर पोर तन आपनौ अनत बिधायो जाय। तब मुरली नंदलाल पै भई सुहागिन आय।—स० सप्तक पृ० २१०। यौ०—पोर पोर = पोर पोर में। ४. रीढ़। पीठ। उ०—मनमोहन खेलत चौगान। द्वारावती कोट कंचन में रच्यो रुचिर मैदान। यादव वीर बराए इक इक, इक हलधर, इक अपनी ओर। निकसे सबै कुँवर असवारी उच्चश्रवा के पोर।—सूर (शब्द०)।

पोर (२)
संज्ञा पुं० [?] जहाज की रखवाली या चौकसी करनेवाले कर्मचारी या मल्लाह। (लश०)।

पोरसा पु
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषत्व] पुरुष। स्वामी। उ०—(क) सतगुरु पारस पोरसा आखै अभय भँडार।—रज्जब०, पृ० १०। (ख) पारस नह नह पोरसो, पातर राखे पास।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ३।

पोरा
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोर] १. लकडी़ का मंडलाकार टुकडा़। लकडी़ का गोल कुंदा। २. कुंदे की तरह मोटा आदमी।

पोरिया (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोर + इया (प्रत्य०)] चाँदी का एक गहना जो हाथ पर की उँगलियों की पोरों में पहना जाता है। यह छल्ले का सा होता है पर इसमें घुँघरू के गुच्छे या झब्बे लगे रहते हैं।

पोरिया † (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पौरिया'। उ०—सो पोरिया ने प्रभुन कों खबरि करी।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १९६।

पोरी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की कडी़ मिट्टी।

पोरी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पर्व, हिं० पोर] दे० 'पोर'। उ०—हिला सहज विश्वास हृदय का अंगुलियों की कँपी पोरियाँ।— हंस० पृ० २५।

पोरी † (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पौर'। उ०—अब सिंघ द्वार की पोरी पर बैठिबे को कौन कों आज्ञा करत हो।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २१८।

पोरुआ
संज्ञा पुं० [हिं० पोर + उवा (प्रत्य०)] पोरिया। पौरिया।

पोर्च
संज्ञा पुं० [अं०] बरामदा। दालान।

पोर्चुगीज
वि० [अं०] दे० 'पुर्तगीज'।

पोर्ट
संज्ञा पुं० [पुर्त० पोर्टो] १. अंगूर से बनी हुई एक प्रकार की शराब। विशेष—यह भभके से नहीं चुआई जाती, अंगूर के रस को धूप में सडा़कर बनाई जाती है। इसमें मादकता नाम मात्र की होती है, इससे इसका सेवन पुष्टई के रूप में लोग करते हैं। इसे द्राक्षासव कह सकते हैं। २. समुद्र या नदी के किनारे वह स्थान जहाँ जहाज माल उता- रने या लादने या मुसाफिर उतारने या चढा़ने के लिये बराबर आकर ठहरते हैं। बंदर। बंदरगाह। जैसे, कलकत्ता पौर्ठ। ३. समुद्र के किनारे, खाडी़ या नदी के मुहाने पर बना हुआ या प्राकृतिक स्थान जहाँ जहाज तूफान से अपनी रक्षा कर सकते हैं।

पोर्टर
संज्ञा पुं० [अं०] वह जो बोझ ढोता हो। विशेषकर रेलवे स्टेशन और जहाज के डक पर मुसाफिरों का माल असबाब ढोनेवाला। रेलवे कुली। डक कुली। जैसे,—उस दिन बंबई के विक्टोरिया ठरमिनस स्टेशन के पोर्टरों में गहरी मार पीठ हो गई।

पोल (१)
संज्ञा पुं० [हिं० पोला] १. शून्य स्थान। अवकाश। खाली जगह। जैसे, ढोल के भीतर पोल। २. खोखलापन। भराव का अभाव। सारहीनता। अँतःसारशून्यता। यौ०—पोलदार = जिसमें पोल या खोखलापन हो। पोला। खोखला। पोलपाल = खोखलापन। जो भीतर से एकदम खाली हो। उ०—ये सब पोलपाल कर लेखा। मिथ्या पढै़ कहै बिन देखा ।—घट०, पृ० ५६२। मुहा०—(किसी की) पोल खुलना = भीतरी दुरवस्था प्रगट हो जाना। छिपा हुआ दोष या बुराई प्रगट हो जाना। भंडा फूटना। (किसी की) पोल खोलना = भीतरी दुरवस्था प्रगट करना। छेपे हुए दोष या बुराई को प्रगट करना। भंडा फोड़ना।

पोल (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का फुलका। २. राशि। पुंज (को०)। ३. मान। परिमाण (को०)।

पोल (३)
संज्ञा पुं० [सं० प्रतोली, प्रा० पओली] १. कहीं जाने का फाटक। प्रवेशद्वार। दरवाजा। उ०—(क) पोल जडे़ रवि पेखताँ धोखै चढ़िया दीह। मिटै न कंदल जोधपुर बीबाँ घटे न बीह।—रा० रू०, पृ० २५७। (ख) रावली पोले आविया—बी० रासो, पृ० ९१। २. आँगन। सहन।

पोल (४)
संज्ञा पुं० [अं०] १. लकडी़ या लोहे आदि का बडा़ लट्ठा या खंभा। २. जमीन की एक नाप जो ५ गज की होती है। ३. वह ५।। गज की जरीब जिससे जमीन नापते हैं। ४. ध्रुव।

पोल † (५)
संज्ञा स्त्री० [सं० पर्व] दे० 'पोरे'। उ०—पोल पोल अगरा जग लूटी।—प्राण०, पृ० ३३०।

पोलक
संज्ञा पुं० [हिं० पूला] लंबे बाँस के छोरे पर चरखी में बँधा हुआ पयाल किसे लुक की तरह जलाकर बिगडे़ हाथी को डराते हैं।

पोलच
संज्ञा पुं० [हिं० पोल] १. वह परती भूमि जो पिछले वर्ष रबी बोने के पहले जोती गई हो। जौनाल। २. वह ऊसर या बंजर भूमि जिसे जुते या टूटे तीन वर्ष हो गए हों।

पोलचा
संज्ञा पुं० [हिं० पोल] दे० 'पोलच'।

पोला (१)
वि० [हिं० फूलना या सं० पोल (= फुलका)] [स्त्री० पोली] १. जो भीतर से भरा न हो। जिसके भीतर खाली जगह हो। जो ठोस न हो। खोखला। जैसे, पोला बाँस, पोली नली। २. अंतःसारशून्य। निःसार। तत्वहीन। सुक्ख। उ०—है प्रभु मेरो ही सब दोस।...वेष वचन विराग, मन अध औगुनन को कोस। राम प्रीति प्रतीति पोलो कपट करतब ठोस।—तुलसी (शब्द०)। ३. जो भीतर से कडा़ न हो। जो दाब पड़ने से नीचे धँस जाय। पुलपुला। उ०— पर हाथी बुदि्धमान होते हैं, बहुधा पोला स्थान देखकर चलते हैं।—शिवप्रसाद (शब्द०)।

पोला (२)
संज्ञा पुं० [हिं० पूला] १. सूत का लच्छा जो परेती पर लपेटने से बन जाता है। २. गट्ठर। पूला। उ०—तब राजा और रानी दोनों नंगे पाँव होकर घास का पोला अपने सिर पर धरकर एक अँगौछी अपने अपने गले में डाले आकर सत्य गुरु के चरणों पर गिरे।—कबीर मं०, पृ० ५०९।

पोला (३)
संज्ञा पुं० [देश०] एक छोटा पेड़ जो मध्यप्रदेश में बहुत होता है। विशेष—इसकी लकडी़ भीतर से बहुत सफेद और नरम निकलती है जिससे उसपर खुदाई का काम बहुत अच्छा होता है। वजन में भी यह भारी होती है। हल आदि खेती के सामान भी उससे बनाए जाते हैं। इसकी भीतरी छाल में रेशे होते हैं जो रस्सी बनाने के काम आते हैं। पेड़ बरसात में बीजों से उगता है।

पोलाद
संज्ञा पुं० [फा़० फौलाद] दे० 'फौलाद'।

पोलारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोल] छेनी के आकार का एक छोटा औजार जिससे सोनार खोरिया, कंगन, घुँघरू आदि के दानों को फिरफिरे में रखकर खलते हैं। यह तीन चार अंगुल का होता है और इसकी नोक पर छोटा सा गोल दाना बना रहता है।

पोलाव
संज्ञा पुं० [हिं० पुलाव] दे० 'पुलाव'। उ०—कलिया नान पोलाव पेट भरि खाय कै।—पलटू०, पृ० ९७।

पोलिंद
संज्ञा पुं० [सं० पोलिन्द] जहाज का मस्तूल [को०]।

पोलिंग बूथ
संज्ञा पुं० [अं०] वह स्थान जहाँ कौंसिल आदि के निर्वाचन या चुनाव के अवसर पर वोट लिए जाते हैं। मतदानकक्ष।

पोलिंग स्टेशन
संज्ञा पुं० [अ०] वह स्थान जहाँ कौंसिल या म्युनिसिपल निर्वाचन के अवसर पर लोगों के वोट लिए और दर्ज किए जाते हैं। मतदानकेंद्र।

पोलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] फुलका। रोट। पूरी [को०]।

पोलिटिकल
वि० [अं०] राज्यप्रबंध संबंधी। शासन संबंधी। राजनीतिक। जैसे, पोलिटिकल काम, पोलिटिकल चाल।

पोलिटिकल एजेंट
संज्ञा पुं० [अं०] वह राजपुरुष जो दूसरे राज्य में अपने राज्य की ओर से उसके स्वत्व और व्यापारादि की रक्षा के लिये रहता है। राजप्रतिनिधि।

पोलिया (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोला] एक पोला गहना जिसे स्त्रियाँ पैरों में पहनती हैं।

पोलिया (२)
संज्ञा पुं० [हिं० पौर, राज० पोल] दे० 'पौरिया'।

पोलिश
वि० [अं] पोलैंड से संबंधित। पोलैंड का।

पोली (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] जंगली कुसुम या बरें जिसका तेल अफरीदी मोमजामा बनाने के काम में आता है।

पोली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की पूरी। पूआ। फुलका [को०]।

पोलो
संज्ञा पुं० [अं०] चौगान की तरह का एक अँगरेजी खेल जो घोडे़ पर चढ़कर खेला जाता है।

पोवना †
क्रि० स० [हिं० पोहना] दे० 'पोना'। उ०— अरुने दृग कोरनि डोरनि में मन को मनुका मनु पोवतु है।— अनुराग बाग (शब्द०)।

पोश
प्रत्य० [फा़०] ढकनेवाला। छिपानेवाला जैसे, ऐबपोश।

पोशाक
संज्ञा स्त्री० [फा़०] पहनने के कपडे़। वस्त्र। परिधान। पहनावा। उ०—कीन्हे हैं पोशाक कारी, अंग राग कज्जल को, लोहे के विभूषण, त्यों दूषण हथ्यार हैं।—रघुराज (शब्द०)। मुहा०—पोशाक बढा़ना = कपडे़ उतारना। विशेष—यह शब्द फारस से नहीं आया है, यहीं हिंदुस्तान में बना है।

पोशाकी
संज्ञा पुं० [फा़०] १. एक कपडा़ जो गाढे़ से बारीक और तनजेब से मोटा होता है। २. अच्छा कपडा़। पोशाक।

पोशिश
संज्ञा स्त्री० [फा़०] लिबास। कपडा़। पहनावा। उ०— जिसे तूंने अजर जामा पिन्हाना। हवस उसको न पोशिश परनियाँ पर।—कबीर मं०, पृ० ४४४।

पोशीदगी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] गुप्ति। छिपाव।

पोशीदा
वि० [फा़० पोशीदह्] गुप्त। छिपा हुआ।

पोष
संज्ञा पुं० [सं०] १. पोषण। पुष्टि। उ०—पादप ये इहि सींचते, पावै अँग अँग पोष। पूरबजा ज्यों वरणते सब मानियों सँतोष।—प्रियादास (शब्द०)। २. अभ्युदय। उन्नति। ३. आधिक्य। वृद्धि। बढ़ती। ४. धन। ५. तुष्टि। संतोष। उ०—तेहि को होइ नाद पै पोषा। तब परि हूँकै होइ सँतोषा।—जायसी (शब्द०)। (ख) कोऊ आवे भाव लैं कोउ लै आवै अभाव। साधु दोऊ को पोष दै, भाव न गिनै अभाव।—कबीर (शब्द०)।

पोषक
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] १. पालक। पालनेवाला। २. वर्धक। बढा़नेवाला। ३. सहायक।

पोषण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० पोषित, पुष्ट, पोषणीय, पोष्य] १. पालन। २. वर्धन। बढ़ती। ३. पुष्टि। ४. सहायता। जैसे, पृष्ठपोषण।

पोषध
संज्ञा पुं० [सं० उपवसथ>उपोषध>पोषध] उपवासव्रत (बौद्ध)।

पोषन पु
वि० [सं० पोषण] पोषण करनेवाला। उ०—पुस्टि म्रजाद भजन, रस, सेवा, निज जन पोषन भरन।—नंद० ग्रं०, पृ० ३२६।

पोषना
क्रि० स० [सं० पोषण] पालना। पोषण करना। उ०— (क) का मैं कीन जो काया पोषी। दोष माँहि आपुनि निर्दोषी।—जायसी (शब्द०)। (ख) माधव जू जो जन ते बिगरै। तउ कृपालु करुनामय केशव प्रभु नहि जीय धरै। जैसे जननि जठर अंतरगत सुत अपराध करै। तौऊ जतन करै अरु पोसै निकसै अंक भरै।—सूर०, १।११७। (ग) राम सुप्रेमहिं पोषत पानी। हरत सकल कलिकलुष गलानी।—तुलसी (शब्द०)। (घ) अजमेर चित्तौड़ जु बोलि विप्र पोष्या जाचक सतोख्या।—ह० रासो, पृ० ३३।

पोषयिता
वि० [सं० पोषयितृ] दे० 'पोषिता'।

पोषयित्नु
संज्ञा पुं० [सं०] कोकिल। कोयल [को०]।

पोषर पु
संज्ञा पुं० [सं० पुष्कर] दे० 'पोखर'। उ०—डोलत बिपुल बिहंग बन, पियत पोषरनि बारि।—तुलसी ग्रं०, पृ० १०६।

पोषित
वि० [सं०] पाला हुआ।

पोषिता
वि०, संज्ञा पुं० [सं० पोषितृ] पोषक। पोषण प्रदान करनेवाला। भरणपोषण करनेवाला [को०]।

पोषी
वि० [सं० पोषिन्] पोषक। पालक। भरणपोषण करनेवाला [को०]।

पोष्टा (१)
वि० [सं० पोष्ट्ट] पालनेवाला।

पोष्टा (२)
संज्ञा पुं० कंजा। करंज।

पोष्य (१)
वि० [सं०] पालने योग्य। पालनीय। जिसका पालन पोषण कर्तव्य हो। विशेष—माता, पिता, गुरु, पत्नी, संतान, अभ्यागत, शरणागत इत्यादि पोष्य वर्ग में हैं।

पोष्य (२)
संज्ञा पुं० भृत्य। नौकर। दास।

पोष्यपुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. बालक। पुत्र के समान पाला हुआ लड़का। २. दत्तक पुत्र।

पोष्यवर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] माता, पिता, गुरु आदि जिनका पालन करना कर्तव्य है। दे० 'पोष्य (१)'।

पोष्यसुत
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पोष्यपुत्र' [को०]।

पोस (१)
संज्ञा पुं० [सं० पोष] पालने की कृतज्ञता। पालनेवाले के साथ प्रेम या हेलमेल। जैसे,—कुत्ते बहुत पोस मानते हैं; तोते पोस नहीं मानते। २. तृष्टि। संतोष। उ०—कोऊ आवै भाव लै, कोउ लै आवै अभाव। साधु दोऊ को पोस दै, भाव न गिनै अभाव।—कबीर (शब्द०)।

पोस † (२)
संज्ञा पुं० [सं० पौष] पौष महीना। पूस का मास। उ०— देखी सखी हिव लागै छइ पोस।—बी० रासो, पृ० ६७।

पोस पु (३)
वि० [सं० पुष्ट] पुष्ट। श्रेष्ठ। उ०—बरनत हैं उल्लास सो, सकल सुकवि मति पोस।—भूषण ग्रं०, पृ० ६१।

पोस पु (४)
संज्ञा पुं० [फा़० पोश] चादर। बिछावन। उ०— लगी मिठाई रासि दुहूँ दिसि दीपक धरे कतारी। बिछी पलँग पयफेनु मैनु सम पोस परयो रुचिकारी।—भारतेंदु० ग्रं०, भा० २, पृ० ८५।

पोसत पु
संज्ञा० पुं० [फा़० पोस्त] अफोम का ढोढ़ या डोडा। पोस्त। उ०—पोसत माँहिं अफोम है वृक्षन मैं मधु जानि। देह माँहिं यों आतमा सुंदर कहत बखानि।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ७८१।

पोसती पु
वि० [फा़० पोस्ती] अफीमची। दे० 'पोस्ती'। उ०— जैसे काहू पोसती की पाग परी भूमि पर, हाथ लै कै कहै एक पाग मैं तौ पाई हौ।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ५८३।

पोसन
संज्ञा पुं० [सं० पोषण] पालन। रक्षा। उ०— मथुरा हूँ तें गए, सखी री ! अब हरि काले कोसन। यह अचरज हूँ अति मेरे जिय, यह छाँड़न वह पोसन। सूर (शब्द)।

पोसना
क्रि० स० [सं० पोषण] १. पालना। रक्षा करना। उ०— राम सुस्वामि कुसेवक मों सो। निज दिसि देखि दया- निधि पोसो।—तुलसी (शब्द०)। २. (पशु को) आहार आदि देकर अपनी रक्षा में रखना। दाना पानी देकर रखना। जैसे, कुत्ता पोसना। ३. आवृत करना। आच्छादित करना। ४. पोछना।

पोसपोन
वि० [अं० पोस्टपोन] दे० 'पोस्टपोन'।

पोसाख पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पोशाक'। उ०—मावडिया दीठाँ फुरै, मत हिय माँहि पयट्ठ। पुरुष तणी पोसाख कर, बाई आँण बयठ्ठ।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० २०।

पोस्ट
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. जगह। स्थान। २. पद। ३. नौकरी ४. डाकखाना। ५. स्तंभ।

नोस्टआफिस
संज्ञा पुं० [अ०] डाकघर। डाकखाना।

पोस्टकार्ड
संज्ञा पुं० [अं०] एक मोटे कागज का टुकडा़ जिसपर पत्र लिखकर खुला भेजते हैं।

पोस्टपोन
वि० [अं० पोस्टपोन] जो कुछ समय के लिये रोक दिया जाय। जिसका समय बढा़ दिया जाय। मुलतवी स्थगित। जैसे,—मामला पोस्टपोन हो गया।

पोस्टबाक्स
संज्ञा पुं० [अं०] डाक रखने की पेटी। डाक रखने का थैला।

पोस्टबैग
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'पोस्ट बाक्स'।

पोस्टमार्टम
संज्ञा पुं० [अं० पोस्टमारटम] १. मृत्य का कारण आदि निश्चित करने के लिये मरने के बाद किसी प्राणी के शरीर की चीरफाड़। २. वह परीक्षा जो किसी प्राणी की लाश को चीर फाड़कर की जाय।

पोस्टमास्टर
संज्ञा पुं० [अं०] डाकघर का सबसे बडा़ कर्मचारी। डाकघर का अधिकारी।

पोस्टमैन
संज्ञा पुं० [अं०] डाकिया। इधर उधर चिट्ठी बाँटनेवाला। चिठ्टीरसाँ।

पोस्टर
संज्ञा पुं० [अं०] छपी हुई बडी़ नोटिस या विज्ञापन जो दीवारों पर चिपकाया जाता है। प्लैकडँ। जैसे,—सेवा- समिति ने शरह भर में पोस्टर लगवा दिए थि जिसमें यात्रियों को धूर्तों से सावधान रहने को कहा गया था। क्रि० प्र०—चिपकना।—चिपकाना।—निकालना।—लगना।—लगाना।

पोस्टरइंक
संज्ञा स्त्री० [अं०] एक प्रकार की छापे की स्याही जो लकडी़ के अक्षर छापने में काम आती है।

पोस्टल
वि० [अं०] पोस्ट संबंधी। डाक संबंधी।

पोस्टल आर्डर
संज्ञा पुं० [अं०] डाकघर से मिलनेवाला निश्चित मूल्य का छपा हुआ प्रमाणपत्र या कागज जिसके किसी भी डाकखाने से भुनाया जा सकता है।

पोस्टल गाइड
संज्ञा पुं० [अं०] वह पुस्तक जिसमें डाक द्वारा चिट्ठी, पारसल आदि भेजने के नियम और डाकघरों के नाम आदि रहते हैं।

पोस्टेज
संज्ञा स्त्री० [अं०] डाक द्वारा चिट्ठी, पारसल आदि भेजने का महसूल।

पोस्त
संज्ञा पुं० [फा़०] १. छिलका। बक्कल। बकला। २. खाल। चमडा़। ३. अफीम के पौधे का ढोंढ़। ४. अफीम का पौधा। पोस्ता।

पोस्ता
संज्ञा पुं० [फा़० पोस्त] एक पौधा जिसमें से अफीम निकलती है। विशेष—यह पौधा दो ढाई हाथ ऊँचा होता है। पत्तियाँ भाँग या गाँजे की पत्तियों की तरह कटावदार पर बहुत बडी़ और सुंदर होती हैं। डंठलों में रोइयाँ सी होती हैं। फागुन चैत में पौधा फूलने लगता है। पौधे के बीचोबीच से एक लंबी पतली नाल (डंठी) ऊपर की ओर जाती है जिसके सिरे पर चार पाँच पँखड़ियों का कटोरे के आकार का बहुत सुंदर गोल फूल लगता है। फारस और हिंदुस्तान में जो पोस्ता बोया जाता है उसका फूल भी सफेद और बीज के दाने भी सफेद होते हैं। पर रूम के राज्य में जो पोस्ता होता है उसके फूल प्याजी रंग के और दाने काले होते हैं। बहुत चटकीले लाल फूलवाले पौधे को ही 'गुलेलाला' कहते हैं जिसकी सुंदरता का फारसी के कवियों ने इतना वर्णन कियाहै और जो शोभा के लिये बगीचों में लगाया जाता है। फूल के बीच में एक घुंडी सी होती है जिसमें इधर उधर की किरनों के सिरों पर पुं० पराग होता है। पंखड़ियों के झड़ जाने पर घुंडी बढ़कर डोडे (ढेंढ) के रूप में हो जाती है। इसी को पोस्ते का डोडा या ढेढ़ कहते है। डोडा तीन चार अंगुल का होता है। डोडे के कुछ बढ़ जाने पर उसमें लोहे की नहरती से खडा़ चीरा या पाँछ लगा देते हैं। पाँछ लगने से उसमें से हलके गुलाबी रंग का दूध निकलता है जो दूसरे दिन लाल रंग का होकर जम जाता है। यही जमा हुआ दूध अफीम है। एक डोडे से तीन चार बार दूध पोंछकर निकाला जा सकता है। फूल की पखड़ियों को भी लोग मिट्टी के गरम तवे पर इकट्ठा करके गोल रोटी के रूप में जमाते हैं जिसे पत्तर कहते हैं। सूखे डोडों से राई के से सफेद सफेद बीज निकलते हैं जो पोस्ते के दाने कहलाते हैं और खाए जाते हैं। पोस्ते की जाति के २५ या २६ पौधे होते हैं। पर उनमें से अफीम नहीं निकलती। वे शोभा के लिये बगीचों में लगाए जाते हैं।

पोस्ती
संज्ञा पुं० [फा़०] १. वह जो नशे के लिये पोस्ते के डोढे को पीसकर पीता हो। उ०—पोस्ती पडे़ कुएँ में तो नहीं चैन है। २. आलसी आदमी। ३. गुड़िया के आकार का कागज का एक खिलौना जिसके पेदे में मिट्टी का ठोस गोल दिया सा भरा रहता है। पेंदे से ऊपर की ओर यह गावदुम होता जाता है। यह सदा खडा़ ही रहता है, लेटाने से या ऊपर सै गिरने से तुरंत खडा़ हो जाता है। इसे मतवाला या खडे़ खाँ भी कहते हैं।

पोस्तीन
संज्ञा पुं० [फा़०] १. गरम और मुलायम रोएँवाले समूर आदि कुछ जानवरों की खाल का बना हुआ पहरावा जिसे पामीर, तुर्किस्तान, मध्य एशिया के लोग पहनते हैं। २. खाल का बना हुआ कोट जिसमें नीचे की ओर बाल होते हैं। उ०—सर्द मुल्कवाले सदा ऊनी कपडे़ और पोस्तीनों में लिपटे रहते हैं।—शिवप्रसाद (शब्द०)।

पोहना (१) †
क्रि० स० [सं० प्रीत, प्रा० पोइअ हिं० पोय + ना (प्रत्य०)] १. पिरौना। गूँथना। उ०—(क) लटकन लटकि रहे मुख ऊपर पँचरंग मणिगण पोहे री। मानहुँ गुरु शनि शुक्र एक ह्वै लाल भाल पर तोहे री।—सुर (शब्द०)। (ख) जुगुति बेधि पुनि पोहियहि रामचरित बर नाग। पहिरहिं सज्जन विमल उर सोभा अति अनुराग।—तुलसी (शब्द०)। २. छेदना। उ०—इक एक सिर सरनिकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं। जनु कोवि दिनकर करनिकर जहँ तहँ विधुंतुद पोहहीं।—तुलसी (शब्द०)। ३. लगाना। पोतना। उ०—भरोसो कान्ह को है मोहिं। सुनहि जशोदा कस तपति भय तू जनि ब्याकुल होढि। पहिलैं पूतना कपट रूप करि आइ स्तनवि विष पोहि। वैसी प्रबल सुद्वै दिन बालक मारि दिखायौ तोहि।—सूर०, १०।२९७६। ४. जड़ना। घुसाना। धँसाना। जमाना। उ०—अब जानी पिय बात तुम्हारी। मों सों तुम मुख ही की मिलवत भावति है वह प्यारी।......भली करी यह बात जनाई प्रगट दिखाई मोहिं। सूर श्याम यह प्रान पियारी उर मैं राखी पोहि।—सूर०, १०। २४१३। (ख) कै मधुपावलि मंजु लसै अरविंद लगी मकरंदहि पाहे।—बेनी (शब्द०)। ५. पीसना। घिसना। ६. दे० 'पोना'।

पोहना (२)
वि० [स्त्री० पोहनी] घुसनेवाला। भेदनेवाला। उ०— यह चार अंग सी सोहनी, चार सैन्य मधि पोहनी। जुग चार चार श्रुति में विदित मृत्युपास मनमोहनी।—गोपाल (शब्द०)।

पोहमी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पुहमी'। उ०—जहाँ पोहमी पवन नहिं जल अकाश।—तुरसी श०, पृ० १४५।

पोहर † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० पोहा] दे० १. वह स्थान जहाँ पशु चराए जाते हैं या चरते हैं। चरहा। २. चरहा। घास या पशुओं के चरने का चारा। चरी।

पोहर पु
संज्ञा पुं० [सं०प्रहार] दे० 'प्रहर'। उ०—कारण बिण जग सूँ करे, आठ पोहर उपगार।—बाँकी ग्रं०, भा० २, पृ० ४७।

पोहरा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पहरा'। उ०—न को पिंड पोहरा न को चोर लागै। न को रैण सूता न को दिन्न जागै।—राम० धर्म०, पृ० १३३।

पोहा †
संज्ञा पुं० [सं० पशु] पशु। चौपाया।

पोहिया †
संज्ञा पुं० [हिं० पोहा + इया] चरवाहा।

पोहोप पु
संज्ञा पुं० [सं० पुष्प] पुहुप। फूल। पुष्प। उ०— इछया पोहोप चढ़ाऊँ पूजा मनसा सेवा कीजै।—रामानंद०, पृ० २७।

पौंड
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'पाउंड'।

पौंडरीक (१)
संज्ञा पुं० [सं० पौण्डरीक] १. स्थलपदम। पुंडरी। २. एक प्रकार का कुष्ट जिसमें कमल के पत्ते के रंग का सा वर्ण हो जाता है। ३. एक यज्ञ का नाम।

पौंडरीक (२)
वि० [वि० स्त्री० पौण्डरीकी] पुंडरीक संबंधी। पुंडरीक निर्मित [को०]।

पौंडरीय, पौडरीयक
संज्ञा पुं० [सं० पौण्डरीय, पौण्डरीयक] दे० 'पुंडर्य' [को०]।

पौंडर्य
संज्ञा पुं० [सं० पौंडर्य्य] स्थलपदम।

पौंड्र (१)
वि० [सं० पौण्ड्र] १. पुंड्र देश का। २. पुंड्र देश का निवासी या राजा।

पौंड्र (२)
संज्ञा पुं० १. भीमसेन के शंख का नाम। ३. मोटा गन्ना। पौंड़ा। पौंढ़ा। ३. पुंड्र देश (बिहार का एक भाग)। ३. पुंड्र देश के वसुदेव का पुत्र जो 'मिथ्या वासुदेव' कहलाया। दे० 'पौंड्रक'। ५. मनु के अनुसार एक जाति जो पहले क्षत्रिय थी पर पीछे संस्कारभ्रष्ट होकर वृषलत्व को प्राप्त हो गई थी। दे० 'पुंड्र—९'।

पौंड्रक
संज्ञा पुं० [सं० पौण्ड्रक] १. एक प्रकार का मोटा गन्ना। पौंड़ा। २. एक पतित जाति। दे० 'पुंड्र—९'। विशेष—ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसी जाति को शौंडिका(कलवारिन) और वैश्य से उत्पन्न एक संकर जाति लिखा है। ३. पुंड्र देश का एक राजा। विशेष—यह जरासंध का संबंधी था। इसके पिता का नाम भी वसुदेव था, इससे यह अपने को वासुदेव कहता था। राजसूय यज्ञ के समय भीम ने इसे हराया था। श्रीकृष्ण के समान यह भी अपना रूप बनाया रहता था। नारद के द्वारा श्रीकृष्ण की महिमा सुनकर यह बहुत क्रुद्ध हुआ और कहने लगा, मेरे अतिरिक्त और दूसरा वासुदेव है कौन। इसने एकलव्य आदि वीरों को लेकर द्वारका पर चढ़ाई की पर कृष्ण के हाथ से मारा गया।

पौंड्रवत्स
संज्ञा पुं० [सं० पौण्ड्रवत्स] वेद की एक शाखा का नाम।

पौंड्रवर्धन
संज्ञा पुं० [पौण्ड्रवर्द्धन] पुंड्रवर्धन नगर।

पौंड्रिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. पोंडा नाम का गन्ना। २. एक गोत्रप्रवर्तक ऋषि। ३. लवा नाम की पक्षी। ४. पौंड्रिक नामक देश।

पौंश्चलीय
वि० [सं०] पुंश्चली संबंधी। कुलटा संबंधी। कुलटा का [को०]।

पौंश्चलेय
संज्ञा पुं० [सं०] पुंश्चली या कुलटा का पुत्र [को०]।

पौँश्चल्य
संज्ञा पुं० [सं०] कुलटापन। व्यभिचार [को०]।

पौँसवन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पुंसवन' [को०]।

पौँस्न (१)
वि० [सं०] मानवीय। मानव के उपयुक्त [को०]।

पौँस्न (२)
संज्ञा पुं० मनुष्यता। पुरुषता। मानवता [को०]।

पौँचा
संज्ञा पुं० [हिं० पाँच] साढे़ पाँच का पहाड़ा।

पौँछना पु †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पोंछना'। उ०—बंधन छोरि छती लपटाए। पौंछत सुंदर अंग सुहाए।—नंद ग्रं०, पृ० २५५।

पौँडई (१)
वि० [हिं० पौंड़ा] पौंडे़ के रंग का। गन्नई।

पौँडई
संज्ञा पुं० एक रंग जो पौंडे़ के रंग से मिलता जुलता होता है। विशेष—इसमें २० सेर टेसु का रंग और २ १/२ छटाँक हलदी पड़ती है। रंग पीलापन लिए हरा होता है। इसे गन्नई भी कहते हैं।

पौँड़ना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'पौंरना'। उ०—पौँड़त पौँड़त भव जले काहू पार न पावा।—धरम० श०, पृ० ७१।

पौँड़ा
संज्ञा पुं० [सं० पौण्ड्रक] एक प्रकार की बड़ी और मोटी जाति की ईख या गन्ना। विशेष—इसका छिलका कुछ कड़ा होता है पर इसमें रस बहुत अधिक होता है। यह ईख अधिकतर चूसने के काम में आती है। लोग इसके रस से गुड़, चीनी आदि नहीं बनाते। पौंड़ा दो प्रकार का होता है—सफेद और काला। सुश्रुत ने पौंडे़ को शीतल और पुष्ट कहा है। कहते हैं कि पौंड़ा पहले पहल इस देश में चीन से आया। पर्या०—भोरुक। वंशक। शतपोरक। कांतार। काष्ठेतु। सूचिपत्रक। नैपाल। नीलपोर (काला गन्ना)।

पौँड़ो
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पौरी'।

पौँढ़ना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पौढ़ना'।

पौँरना †
क्रि० अ० [सं० प्लवन] तैरना। पैरना।

पौँराको पु †
संज्ञा पुं० [हिं० पौँरना] तैरनेवाला। तैराक। उ०— निर्गुन त्रिविध धार अति बाँकी। बूड़ि मुए भव सम पौंराकी।—सं० दरिया, पृ० २०।

पौँरि
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पौरी'।

पौँरिया पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पौरिया'।

पौँहन पु †
संज्ञा पुं० [?] स्तुतिपाठ करनेवाला। उ०—पौंहन बखाने धनवान मुख आने सुतो, साहिब के साहिबो के पगोरो म पाइगै।—सुंदर ग्रं०, (जीवनी), भा० १, पृ० ६४।

पौ (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रपा, प्रा० पवा] पौसाला। पौसला। प्याऊ।

पौ (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पाद, प्रा० पाय, पवा (=किरन)या सं० प्रभा] किरन। प्रकाश की रेखा। ज्योति। मुहा०—पो फटना = सबेरे का उजाला दिखाई पड़ना। सबेरा होना। तड़का होना। उ०—पौ फाटी, पागर हुआ, जागे जीया जून। सब काहू को देत है चोंच समाना चून।— कबीर (शब्द०)।

पौ (३)
संज्ञा पुं० [सं० पाद, प्रा० पाय, पाव] १. पैर। उ०—पौ परि बारहि बार मनाएउ। सिर सौं खेलि पैंत जिउ लाएउ।—जायसी ग्रं०, पृ० १३७। २. जड़। मूल। उ०—पौ बिनु पत्र, करह बिनु तूबा, बिनु जिब्भा गुन गावै।—कबीर (शब्द०)।

पौ (४)
संज्ञा स्त्री० [सं० पद, प्रा० पव (=कदम, डंग)] पाँसे की एक चाल या दावँ। विशेष—फेंकने पर जब ताक आता है दस, पचीस, तीस आते हैं तब पौ होती है। मुहा०—पौ बारह पड़ना = जीत का दाँव पड़ना। पौ बारह होना =(१) जीत का दाँव पड़ना। (२) जीत होना। जश्न आना। भाग्य खुलना। लाभ का खुब अवसर मिलना। जैसे,—यहाँ तो सदा पो बारह हैं।

पौआ
संज्ञा पुं० [सं० पाद] दे० 'पौवा'।

पौगंड (१)
संज्ञा पुं० [सं० पौगण्ड] पाँच वर्ष से दस वर्ष तक की अवस्था।

पौगंड (२)
वि० बालोचित। बालकों के अनुरूप [को०]।

पौगंडक
संज्ञा पुं० [सं० पौगण्डक] दे० 'पौगंड'।

पौठ
संज्ञा स्त्री० [सं० पर्वत, प्रा० पवट्ट] जोत की एक रीति जिसके अनुसार प्रति वर्ष जोतने का अधिकार नियमानुसार बदलता रहता है। बारी बारी गाँव के सब किसानों की जोत में खेत जाता रहता है। भेजवारी।

पौड़ना † (१)
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'पौढ़ना'।

पौड़ना (२)
क्रि० अ० [सं० प्लवन] दे० 'पौंरना'। उ०—आड़ अटक मानै नहीं, पोडै़ जल धारा।—कबीर श०, भा० ३, पृ० १४।

पौडर
संज्ञा पुं० [अ०पाउडर] १. चूर्ण। बुकनी। २. एक चूर्ण जिसे लोग मुँह पर मलते हैं। उ०—सुभग रूज, पौडर से कर मुख रंजित।—ग्राम्या०, पृ० ८३।

पौड़ी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पाँव + ड़ी(प्रत्य०)] १. लकड़ी का मोढ़ा जिसपर मदारी बंदर को नचाते समय बिठाता है। मुहा०—पौड़ी पर टिकना = पौड़ी पर बैठना। मोढे़ पर बैठना। (मदारी)। †२. अध्याय। परिच्छेद।

पौड़ी (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की कड़ी मिट्टी।

पौढ़ना
क्रि० अ० [सं० प्रलोठन? प्रा० पलुट्ट, देशी पवढ्ढ] १. सोना। शयन करना। उ०—(क) महलन माहीं पौढ़ते परिमल अंग लगाय। छत्रपती की छाक में गदहा लोटै जाय।—कबीर (शब्द०)। (ख) पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढे़ धरि पर उद जलजाता।—तुलसी (शब्द०)। २. लेटना। शयन की मुद्रा में होना। उ०—(क) लै सर ऊपर खाट बिछाई। पौढ़ी दोऊ कंत गर लाई।—जायसी (शब्द०)। (ख) दूरहि ते देखे बलवीर। अपने बालसखा जु सुदामा मलिन वसन अरु छीन शरीर। पौढे़ हुते प्रयंक परम रुचि रुक्मिणि चमर डुलावति तीर। उठि अकुलाय अगमने लीने मिलत नैन भरि आए नीर।—सूर (शब्द०)।

पौढ़ाना
क्रि० स० [हिं० पौढ़ना] १. डुलाना। झुलाना। इधर से उधर हिलाना। २. लेटाना। उ०—एक बार जननी अन्हवाए। करिं सिंगार पालन पौढ़ाए। —तुलसी (शब्द०)। ३. सुलाना। शयन कराना। उ०—(क) सेज रुचिर रचि राम उठाए। प्रेम समेत पलँग पोढ़ाए।—तुलसी (शब्द०)। (ख) चारों भ्रातन श्रमित जनि कै जननी तब पौढ़ाए। चापत चरण जननि अब अपनी कछुक मधुर स्वर गाए।—सूर (शब्द०)।

पौढारना पु
क्रि० स० [हिं० पौढाना] दे० 'पौढ़ाना'। उ०— तापर नृप पौढारियो, दब्बि चरण चितु लाय।—प० रासो, पृ० ११०।

पौण पु †
संज्ञा पुं० [सं० पवन, प्रा० पवण] दे० 'पौन'।

पौण्य
वि० [सं०] १. पुण्यकर्मकारक। धार्मिक। २. पवित्र। शुद्ध। सच्चा।

पौतन
संज्ञा पुं० [सं०] एक जनपद।

पौतव
संज्ञा पुं० [सं०] १. कौटिल्य के अनुसार बिक्री का माल तौलनेवाला। बया। डंडीदार। २. एक परिमाण। मान। तौल (को०)।

पौतवाध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिलीय अर्थशास्त्रनुसार माल की तौल की निगरानी रखनेवाला अधिकारी।

पौतवापचार
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार उचित से कम तौलना। डंडी मारना।

पौताना ‡
संज्ञा पुं० [सं० पाद, पाव + संस्थान, प्रा० थाण हिं० पैताना] १. दे० 'पैताना'। २. जुलाहों के करघे में लकड़ी का एक औजार। विशेष—यह चार अंगुल लंबा और चौकोर होता है। इसके बीच में छेद होता है जिसमें रस्सी लगाकर इसे पोसर में बाँध देते हैं। कपड़ा बुनते समय यह करघे के गड्ढे में लटकता रहता है। इसे पैर के अँगूठे में फँसाकर ऊपर नीचे उठाते और दबाते हैं जिससे राछ पौसर आदि दबते और उठते हैं।

पौतिक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का मधु।

पौतिनासिक्य
संज्ञा पुं० [सं०] पीनस रोग।

पौत्तलिक
वि० [सं०] १. पुतली का। पुतली संबंधी। २. प्रतिमा- पूजक। मूर्तिपूजक।

पौत्तलिकता
संज्ञा स्त्री० [सं० पौत्तलिका + हिं० ता(प्रत्य०)] पुतलियों का पूजा। मूर्तिपूजा। (अं० आइडोलेटरी)। उ०—इधर अंग्रजों के आने पर ईसाइयों के आंदोलन के बीच जो ब्रह्मोसमाज बंगाल में स्थापित हुआ उसमें भी 'पौत्तलिकता' का भय कुछ कम न रहा।—चिंतामणि, भा० २, पृ० १२५।

पौत्तिक
संज्ञा पुं० [सं०] पुत्तिका नाम की मधुमक्खी का मधु। यह मधु घी के समान होता है और प्रायः नैपाल से आता है।

पौत्र
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पौत्री] लड़के का लड़का। पोता।

पौत्रिकेय
संज्ञा पुं० [सं०] पुत्रिका का पुत्र। लड़की का लड़का जो अपने नाना की संपत्ति का उत्तराधिकारी हो।

पौत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पुत्र की पुत्री। पोती। २. दुर्गा [को०]।

पौद (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पोत] १. छोटा पौधा। नया निकलता हुआ पेड़। २. वह कोमल छोटा पौधा जो एक स्थान से उखाड़कर दूसरे स्थान पर लगाया जा सके। क्रि० प्र०—जमाना।—लगाना ३. संतान। वंश।

पौद (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पाँव + पट] वह वस्त्र जो बडे़ लोगों के मार्ग में इसलिये बिछाया जाता है कि वे उसपर से होकर चलें। पावड़ी। पाँवड़ा। उ०—(क) सबै बड़भागी अनुरागी प्रभु पाहन के, चाहन सों बात कहैं सबके बिलास की। चले उपरौध मनो पौद लगी आनँद की, औध आय गई औध गई बनवास की।—हनुमान (शब्द०)। (ख) गोपुर ते अंतः पुर द्वारा। लगी पौद विस्तार अपारा।—रघुराज (शब्द०)।

पौदन्य
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक नगर का नाम जहाँ अश्मक राजा की राजधानी थी।

पौदर
संज्ञा स्त्री० [हिं० पाँव + डालना या धरना] १. पैर का चिन्ह। २. वह राह जो पैर की रगड़ से बन गई हो। पगडंडी। ३. कूएँ के पास की वह ढालवीं और कुछ चौड़ी जमीन जिसपर मोट या पुरवट खींचने के समय बैल आते जाते हैं। ४. वह राज जिसपर होकर कोल्हू खींचनेवाला बैल घूमता या आता जाता है।

पौदा
संज्ञा पुं० [सं० पोत] १. नया निकला हुआ पेड़। वह पेड़ जो अभी बढ़ रहा हो। २. छोटा पेड़। क्षुप। गुल्म आदि। क्रि० प्र०—लगाना। ३. रेशम या सूत का फुँदना जिसे बुलबुल की पेटी में बाँध देते हैं।

पौदगलिक
वि० [सं०] १. पुदगलसंबंधी। द्रव्य या भूत। २. जीव संबंधी। ३. विषयानुरक्त। स्वार्थी।

पौध †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पौद'।

पौधन
संज्ञा स्त्री० [सं० पयस् + आधान] मिट्टी का वह बरतन जिसमें खाना रकखर परोसा जाता है।

पौधा
संज्ञा पुं० [सं० पोत] १. नया निकलता हुआ पेड़। वह पेड़ जो अभी बढ़ रहा हो। उगता हुआ नरम पेड़। २. छोटा पेड़, क्षुप, गुल्म आदि। जैसे, आम का पौधा, नील का पौधा। क्रि० प्र०—लगाना।

पौधि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०पौध] दे० 'पौद'। उ०—प्रेम की सी पौधि प्यारी सूखत अनौधि दुख औधि दिन बीते कहो कैसे धीर धरिहौं।—देव (शब्द०)।

पौन पुनिक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पौनःपुनिकी] जो बार बार हो। फिर फिर होनेवाला।

पौनःपुन्य
संज्ञा पुं० [सं०] बार बार होने का भाव। किसी चीज का लगातार होना [को०]।

पौन (१)
संज्ञा पुं०, स्त्री० [सं० पवन] १. वायु। हवा। उ०—तुव जस सीतल पौन परसि चटकी गुलाब की कलियाँ।—भार- तेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २७२। यौ०—पौन का पूत = (१) हनुमान। (२) नाग। सर्प (वेग के कारण)। २. जीव। प्राण। जीवात्मा। उ०—नौ द्वारे का पींजरा तामें पंछी पौन। रहने को आचरज है गए अचंभा कौन।—कबीर (शब्द०)। २. प्रेतात्मा। प्रेत। भूत। मुहा०—पौन चलाना या मरना = जादू करना। टोना चलाना। मूठ चलाना। प्रयोग करना। पौन बिठाना = (किसी पर) भूत करना। किसी के पीछे लगाना।

पौन (२)
वि० [सं० पाद + ऊन=पादोन, प्रा० पाओन] एक में से चौथाई कम। तीन चौथाई। जैसे,—पौन घंटे में आएँगे।

पौन (३)
संज्ञा पुं० [सं० पवन] ठगण का एक भेद जिसमें पहले गुरु पीछे लघु होते हैं।

पौनरुक्त, पौनरुक्त्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. आवृत्ति। बार बार उक्त होना। २. व्यर्थता। अनुपयुक्तता [को०]।

पौनर्णव
संज्ञा पुं० [सं०] भल्लूकी तंत्र के अनुसार एक प्रकार का सन्निपात ज्वर जिसमें रोगी लंबी साँसे लेता है और पीड़ा से बहुत तलफता है।

पौनर्नव
वि० [सं०] पुनर्नवा संबंधी। पुनर्नवा का [को०]।

पौनर्भव (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पौनर्भवा] १. पुनर्भू (पुनः विवाह करनेवाली स्त्री) संबंधी। पूनर्भू का। २. पुनर्भू से उत्पन्न।

पौनर्भव (२)
संज्ञा पुं० १. पुनर्भू से उत्पन्न पुत्र। विशेष—यह धर्मशास्त्र में सात प्रकार (जटाधर के मत से १२ प्रकार) के पुत्रों में अंतिम माना गया है। २. वह पति जिसके साथ विधवा का या पति से परित्यक्ता स्त्री का पुनिर्विवाह हो।

पौनर्भवा
संज्ञा पुं० [सं०] वह कन्या जिसका किसी के साथ एक बार विवाह संस्कार हो गया हो और फिर दूसरी बार दूसरे के साथ विवाह किया जाय। विशेष—कश्यप ने सात प्रकार की पौनर्भवा कन्याएँ मानी हैं, (१) वाचादत्ता, (२) मनोदत्ता, (३) कृत कौतुकमंगला (जिसे कंकण आदि बँधे हों), (४) उदकस्पर्शिता (संकल्प- पूर्वक दी हुई) (५) पाणिगृहीतिका, (६) अग्निपरिगता, और (७) पुनर्भूप्रभवा।

पौना (१)
संज्ञा पुं० [सं० पाद + ऊन, प्रा० पाव + ऊन = पाऊन] पौन का पहाड़ा।

पौना (२)
संज्ञा पुं० [हिं० पौना] [स्त्री० अल्पा० पौनी] काठ या लोहे की बड़ी करछी जिसका सिरा गोल और चिपटा होता है। इसके द्वारा आग पर चढे़ कड़ाह में से पूरियाँ, कचौरियाँ आदि निकालते हैं।

पौनार
संज्ञा स्त्री० [सं० पदम + नाल, प्रा० पउमनाल] कमल के फूल की नील या डंठल। विशेष—कमल की नाल बहुत नरम और कोमल होती है, उसके ऊपर महीन महीन रोइयाँ या काँटे से होते हैं।

पौनारि, पौनारी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पोनार'। उ०— (क) पहुँचहिं छपी कमल पौनारी। जंघ छिपा कदली होइ बारी।—जायसी (शब्द०)। (ख) चंदन गाभ की भुजा सँवारी। जनु सो बेल कमल पौनारी।—जायसी (शब्द०)।

पौनिया (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पावना] दे० 'पौनी (१)'।

पौनिया (२)
संज्ञा [हिं० पौन] कपड़ा जिसका थान पौन थान के बराबर होता है और अर्ज भी कुछ कम होता है।

पौनी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पावना] १. गाँव में वे काम करनेवाले जिन्हें अनाज की राशि में से कुछ अंश मिलता है। २. नाई बारी, धोबी आदि काम करनेवाले जो विवाह आदि उत्सवों पर इनाम पाते हैं। उ०—काढ़ौ कोरा कापर हो अरु काढ़ौ घी को मौन। जाति पाँति पहिरइ कै सब समदि छतीसौ पौनि।—सूर (शब्द०)। (ख) चली पौनि सब गोहने फऊल डार लै हाथ। विश्वनाथ कइ पूजा पदमावति के साथ।—जायसी (शब्द०)।

पौनी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पौना] छोटा पौना।

पौनी (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पूनी'। उ०—आप लोग जो हमको पुराना इतिहास सुनाते हैं उसमें युद्ध क्या रेशम की डोरों और कपास की पौनियों से हुआ करते थे ?—झाँसी०, पृ० २७।

पौने
वि० [हिं० पौना] किसी संख्या में से चौथाई भाग कम। किसी संख्या का तीन चौथाई। जैसे, पौने दो, पौने आठ इत्यादि। विशेष—इसका प्रयोग संख्यावाचक शब्दों के साथ होता है। मुहा०—पौने चार सेर = बनियों की बोलचाल में एक रुपए में पंद्रह सेर की बिक्री। पौने सोलह आना = बहुत अधिक अंश। अधिकांश। बहुत सा। उ०—परंतु ध्यान से देखने से उन लोगों की बातों में पौने सोलाह आना झूठ निकलता है।—दुर्गाप्रसाद (शब्द०)। पौने सोलह आने = अधिक अंश में। प्रायः। जैसे,—तुम्हारी बात पौने सोलह आने ठीक निकली।

पौमान पु
संज्ञा पुं० [सं० पवमान] १. दे० 'पवमान'। २. जलाशय। उ०—दासी दास अप्सरा नाना। बाग तड़ाग विविध पौमाना।—रघुनाथ (शब्द०)।

पौरंदर (१)
संज्ञा पुं० [सं० पौरन्दर] ज्येष्ठा नक्षत्र का नाम।

पौरंदर (२)
वि० [वि० स्त्री० पौरन्दरी] पुरंदर संबंधी। इंद्र संबंधी [को०]।

पौरंध्र
वि० [सं०पौरन्ध्र] स्त्रियों से संबंधित। स्त्रियों का [को०]।

पौर (१)
वि० [सं०] १. पुर संबंधी। नगर का। २. नगर में उत्पन्न। ३. पेटू। उदरभरि। ४. पूर्व दशा या काल में उत्पन्न। यौ०—पौरकन्या = नागरिक कन्याएँ। पौरकार्य = नगर संबंधी काम काज। नागरिकों का काम। पौरजन। पौरजानपद = नगर और जनपद के निवासी। पौरमुख्य = पौरवृद्ध। पौर- योषित = दे० पौरस्त्री। पौरलोक। पौरवृद्ध। पौरसख्य। पौरस्त्री।

पौर (२)
संज्ञा पुं० १. रोहिष या रूसा नाम की घास। २. पुरु राजा का पुत्र। ३. नखी नामक गंध द्रव्य। नख। ४. पुरवासी व्यक्ति। नागरिक (को०)।

पौर (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पौरि', 'पौरी'।

पौरक
संज्ञा पुं० [सं०] १. घर के बाहर का उपवन। पाई बाग। २. नगर के पास का उपवन (को०)।

पौरकुत्स
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक तीर्थ का नाम।

पौरगीय
वि० [सं०] पूर्वजन्म संबंधी।

पौरजन
संज्ञा पुं० [सं०] नागरिक। नगर निवासी [को०]।

पौरना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'पैरना'। यौ०—पौरनहार = पैरनेवाला। तैराक। उ०—अस्तुति बारिघि अगम अपारा। कोउ न जगत महँ पौरन हारा।—चित्रा० पृ० ३।

पौरलोक
संज्ञा पुं० [सं०] नागरिक। पुरजन [को०]।

पौरव (१)
वि० [सं०] [स्त्री० पौरवी] पुरु के वेश का। पुरु से उत्पन्न।

पौरव (२)
संज्ञा पुं० १. पुरु का वंशज। पुरु की संतति। २. महाभारत में वर्णित उत्तरपूर्व का एक देश। ३. उक्त देश का निवासी। ४. उक्त देश का राजा।

पौरवी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. युधिष्ठिर की एक स्त्री का नाम। २. वसुदेव की एक स्त्री का नाम। ३. संगीत में एक मूर्छना। इसका सरगम इस प्रकार है—ध, नि, स, रे, ग, म, प,। प, ध, नि, स, रे, ग, म, प, ध, नि, स, रे।

पौरवृद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रमुख नागरिक। २. वयोवृद्ध [को०]।

पौरस पु
संज्ञा पुं० [सं० पौरुष] पुरुषार्थ। पौरुष। उ०—जिण रवि सूँ रक्षा जग जांणै। पौरस अंस वंश प्रगटाँणै।—रा० रू०, पृ० ८।

पौरसख्य
संज्ञा पुं० [सं०] वह मित्रता जो एक ही नगर या ग्राम में रहने से परस्पर होती है।

पौरसो पु
वि० [हिं० पौरस + ई (प्रत्य०)] पौरुषयुक्त। जिसमें पौरुष हो। उ०—बोल पठायो खान तहब्बर। उठे पौरसी पूत अकब्बर।—रा० रू०, पृ० ६४।

पौरस्त्य
वि० [सं०] १. पूर्वी। पूरब का। २. सबसे आगे का। ३. प्रथम। आगे होनेवाला [को०]।

पौरस्त्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अंतःपुर में रहनेवाली स्त्री। २. पुर या नगर की स्त्री।

पौरांगना
संज्ञा स्त्री० [सं० पौराङ्गना] पौरस्त्री [को०]।

पौरा †
संज्ञा पुं० [हिं० पैर] आया हुआ कदम। पडे़ हुए चरण। पैरा। जैसे,—बहू का पौरा न जाने कैसा है, जब से आई है घर में कोई सुखी नहीं है। मुहा०—पौरा उठना = समाप्त होना। अस्तित्व न रहना। उ०—अब यहाँ से भी मजूरिनों का पोरा उठा ही समझो।— शराबी, पृ० ७९।

पौराण
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पौराणी] १. पुराणों में कहा या लिखा हुआ। २. पुराण संबंधी। ३. पुरा काल का। प्राचीन (को०)।

पौराणिक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पौराणिकी] १. पुराणवेत्ता। २. पुराणपाठी। ३. पुराण संबंधी, पुराण का। जैसे, पौराणिक कथा। ४. पूर्वकालीन। प्राचिन काल का।

पौराणिक
संज्ञा पुं० अठारह मात्रा के छंदों की संज्ञा।

पौरान पु
संज्ञा पुं० [सं० पुराण] दे० 'पुराण'। उ०—इक ब्रह्म पोष सम करत घोष। पौरान प्रगट इक बचत मोष।—पृ० रा० ६। ४४।

पौरि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतोंली, प्रा० पओली] दे० 'पौरी'। उ०— (क) आतुर जाय पौरि भयो ठाढ़ो कह्यो पौरिया जाई।—सूर (शब्द०)। (ख) पौरिनु परे पहरुवा ऐसे। अति मादक मद पीए, जैसे।—नंद ग्रं०, पृ० २३०।

पौरिदार पु
संज्ञा पुं० [हिं० पौरि + फा० दार(प्रत्य०)] दे० 'पोरिया'। उ०—कामकंदला के घर आवा। पोरिदार सों बात जनावा।—हिं० क० का०, पृ० २१८।

पौरिया
संज्ञा पुं० [हिं० पौरी] द्वारपाल। डयोढ़ीदार। दरवान। उ०—(क) अति आतुर नृप मोहिं बुलायो। कौन काज ऐसी अँटक्यो हैं मन मन सोच बढ़ायो। आतुर जाय पोरिभयो ठाढ़ो कह्यो पोरिया जाई। सुनत बुलाय महल महँ लीनो सुफलक सुत गयो धाई।—सूर (शब्द०)। (ख) साई इन न विरोधिए गुरु, पंडित, कवि, यार। बेटा, बनिता, पौरिया, यज्ञ करावनहार।—गिरधर (शब्द०)।

पौरिष पु
संज्ञा पुं० [सं० पौरुष] दे० 'पौरुष'। उ०—जीतैं कौंण बुधिवल पौरिष, रुचि अपनी तै सरनि लीये।—दादू०, पृ० ६२७।

पौरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतोली, प्रा० पओली] घर के भीतर का वह भाग जो द्वार में प्रवेश करते ही पडे़ और थोड़ी दूर तक लंबी कोठरी या गली के रूप में चला गया हो। डयौढ़ी। उ०—(क) सेए सीताराम नहिं भजे न शंकर गौरि। जनम गँवायो बादि ही परत पराई पौरि।—तुलसी (शब्द०) (ख) राजा ! इक पंडित पौरि तुम्हारी।—सूर (शब्द०)। (ग) चाह भरी अति रिस भरी बिरह भरी सब बात। कोरि सँदेसे दुहुन के चल पौरि लौं जात।—बिहारी (शब्द०)। (घ) पौरि लौं खेलन जाती न तो इन आलिन के मत में परती क्यों ?—देव (शब्द०)।

पौरी † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पैर] सीढ़ी। पैड़ी। उ०—का बरनौं अस ऊँच तुखारा। दुइ पोरी पहुँचे असवारा।—जायसी (शब्द०)।

पौरी † (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पाँव + री] खड़ाऊँ। उ०—पाँयन पहिरि लेहु सभ पौरी। काँट धँसे न गडै़ अँकरौरी।—जायसी (शब्द०)।

पौरुकुत्स
संज्ञा पुं० [सं०] पुरुकुत्स के गोत्र में उत्पन्न पुरुष।

पौरुकुत्सि
संज्ञा पुं० [सं०] पुरुकुत्स का पुत्र।

पौरुक्ति
संज्ञा पुं० [सं०] पुनर्वचन। पुनःकथन। दोहराना।

पौरुख †
संज्ञा पुं० [सं० पौरुष] पौरुष। पुरुषार्थ। बल। शक्ति। उ०—भाग्य पर वह भरोसा करता है जिसमें पौरुख नहीं होता।—काया० पृ० २४९।

पौरुमह्न
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सामगान।

पौरुमद्ग
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सामगान।

पौरुमीढ
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सामगान।

पौरुष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुरुष का भाव। पुरुषत्व। पुंसत्व। २. पुरुष का कर्म। पुरुषार्थ। ३. बलवीर्य। पराक्रम। साहस। मरदानगी। ४. उद्योग। उद्यम। कर्मण्यता। जैसे,—अपने पौरुष का भरोसा रखो, दूसरे की कमाई पर न रहो। ५. गहराई या ऊँचाई की एक माप। पुरसा। ६. उतना बोझ जितना एक आदमी उठा सके। ७. पुरुष की लिंगेंद्रिय (को०)। ८. शुक्र। वीर्य (को०)। ९. सूर्य घड़ी (को०)।

पौरुष (२)
वि० पुरुष संबंधी। पुरुष का पूजा करनेवाला [को०]।

पौरुषिक
संज्ञा पुं० [सं०] पुरुषपूजक। पुरुष की पूजा करनेवाला [को०]।

पौरुषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्त्री [को०]।

पौरुषेय (१)
वि० [सं०] १. पुरुष संबंधी। पुरुष का। २. पुरुषकृत। आदमी का किया हुआ। ३. आध्यात्मिक।

पौरुषेय (२)
संज्ञा पुं० १. पुरुष का विकार। २. पुरुष का समूह। जन- समुदाय। ३. पुरुष का कर्म। मनुष्य का काम। ४. रोज की मजदूरी या काम करनेवाला मजदूर। ५. पुरुषहत्या। पुरुषवध (को०)।

पौरुष्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. साहस। २. पुरुषत्व।

पौरुहूत
संज्ञा पुं० [सं०] पुरूहूत या इंद्र का अस्त्र। वज्र।

पौरू
संज्ञा स्त्री० [देश०] भूमि का एक भेद। एक प्रकार की मिट्टी या जमीन जिसके कई भेद होते हैं। यौ०—पौरू केहरा = एक प्रकार की मिट्टी। यह मिट्टी सफेद रंग की होती है और इसके ऊपर पतली पपड़ी सी जम जाती है जिससे रेह और सज्जी बन सकती है। इस भूमि में रबी और खरीफ दोनों फसलें होती है। पौरू केहरा अमीर = एक मिट्टी। इसका रंग सफेदी लिए पीला होता है और इसमें फसल अधिक वर्षा में उपजती है। पौरू कौड़िया = मिट्टी की एक किस्म। यह मिट्टी ललाई लिए होती है। यह न गीली होने से लसीली होती है और न सूखने पर फटती है। इसमें खरीफ की फसल अच्छी होती है। और पानी देने से इसमें रबी की फसल भी होती है। पौरू तूसी = भूरे रंग की मिट्टी। यह भूरे रंग की होती है। इसमें रबी नहीं उपज सकती। पौरू दुरसन = इसकी मिट्टी कहीं ललाई और कहीं कालापन लिए होती है। इसमें रबी की फसल अच्छी होती है पर खरीफ के लिए पानी की अधिक आवश्यकता पड़ती है।

पौरेय
संज्ञा पुं० [सं०] १. नगर के समीप का स्थान, देश, ग्राम, आदि। २. नागर। नागरिक [को०]।

पौरोगव
संज्ञा पुं० [सं०] पाकशालाध्यक्ष।

पौरोडाश
संज्ञा पुं० [स्त्री०] १. पुरोडाश से संबंधित वस्तु, व्यक्ति, मंत्र आदि। २. मंत्र जिसका उच्चारण पुरोडश के निर्माण के समय किया जाता है [को०]।

पौरोडाशिक
संज्ञा पुं० [सं०] पौरोडाश मंत्र का उच्चारण करनेवाला पुरोहित [को०]।

पौरोधस
संज्ञा पुं० [सं०] पुरौधा या पुरोहित का पद [को०]।

पौरोभाग्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. दोष देखना। दोषदर्शन। २. ईर्ष्या। द्वेष। डाह। ३. दुष्कृष्य। शरारत भरा कार्य [को०]।

पौरोहित्य
संज्ञा पुं० [सं०] पुरोहिताई। पुरोहित का कर्म।

पौर्णपर्क
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वैदिक कृत्य।

पौर्णमास
संज्ञा पुं० [सं०] एक याग या इष्टिका जो पूर्णिमा के दिन होती थी।

पौर्णमासिक
वि० [सं०] १. पूर्णमासी से संबंधित। पूर्णमासी के दिन होनेवाला [को०]।

पौर्णमासी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूर्णमासी।विशेष—यज्ञों में प्रतिपदुत्तरा पूर्णमासी का ही ग्रहण गोता है। दो प्रकार की पूर्णमासी मानी गई है—एक पूर्वी जिसे पंचदशी भी कहते हैं, दूसरी उत्तरा जिसे प्रतिपदुत्तरा कहते हैं।

पौर्णमास्य
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्णिमा को होनेवाला यज्ञ आदि।

पौर्णमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूर्णिमा।

पौर्णिम
संज्ञा पुं० [सं०] संन्यासी। वैरागी [को०]।

पौर्णिमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूर्णिमा [को०]।

पौर्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्त कार्य। पूर्त।

पौर्तिक
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्त का साधक कर्म।

पौर्व
वि० [सं०] १. अतीत से संबंधित। अतीत का। २. पूर्व से संबंधीत। पूर्व का। ३. परंपरागत। परंपराप्राप्त [को०]।

पौर्वदेहिक, पौर्वदैहिक
वि० [सं०] पूर्वजन्म से संबंधित। पूर्वजन्म में किया हुआ [को०]।

पौर्वात्य
वि० [सं०] पूर्वी। पूर्व से संबंधित। पूर्व का। उ०— हिंदी के आधुनिक समीक्षकों में पौर्वात्य पद्धति के आधार पर शास्त्रीय पद्धति के करनेवाला हैं।—आलोचना०, पृ० 'क'।

पौर्वापर्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. पूर्व और पर अर्थात् आगे और पीछे का भाव। २. अनुक्रम। सिलसिला

पौर्वापौरुषिक
वि० [सं०] वंशपरंपरागत। पुश्तैनी।

पौर्वाह्णिक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पौर्वाह्णिकी] पूर्वाह्णिसंबंधी।

पौर्विक
वि० [सं०] पूर्व में होनेवाला।

पौल
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पौर'। उ०—सिंध पौल के पार झार नित उठ उठ आवै।—तुलसी० श०, पृ० १०४।

पौलस्ती
संज्ञा स्त्री० [सं०] शूर्पणखा।

पौलस्त्य
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पौलस्त्यी] १. पुलस्त्य का पुत्र था उनके वंश का पुरुष। २. कुबेर। ३. रावण, कुंभकर्ण और विभीषण। ४. चद्र।

पौलस्त्यो
संज्ञा स्त्री० [सं०] शूर्पणखा।

पौला †
संज्ञा पुं० [हिं० पाव, पाउ + ला(प्रत्य०)] एक प्रकार का खड़ाऊँ जिसमें खूँटी नहीं होती, छेद में बँधी हुई रस्सी में अगूँठा फँसा रहता है। उ०—पोला पहिरि के हर जोतै और सुथना पहिरि निरावै। कहैं घाघ ये तीनों भकुआ सिर बोझा औ गाडै।—घाघे (शब्द०)।

पौलि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. थोड़ा सुना हुआ जो सरसों आदि। २. फुलका। रोटी।

पौलि (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पौली'। उ०—करि असुवारी कुमर दोउ, उतरे करैलि सुछाण।—ह० रासो, पृ० ९३।

पौलिया
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पौरिया'।

पौलिश
वि० [यू० पालस ऐलेग्जैंड्रिनस] पुलिश कृत (ज्योतिष का एक सिद्धांत)। पुलिश संबंधी।

पौली
संज्ञा स्त्री० [हिं० पाव, पाउ + ली (प्रत्य०)] १. पैर का वह भाग जो खडे़ होने पर जमीन से आड़ा लगा रहता है एड़ी से लेकर उँगलीयों तक का भाग। उतना पैर जितने में जूता, खड़ाऊँ आदि पहनते हैं। २. पैर का निशान जो धूल, गीली मिट्टी आदि पर पड़ जाता है। पदचिह्न।

पौलूषि
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुलु वंश मे उत्पन्न पुरुष। २. सत्ययज्ञ नामक एक ऋषि जो पुलु ऋषि के वंश में उत्पन्न हुए थे। इनका नाम शतपथ ब्राह्मण में आया है।

पौलोम
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पौलोमी] १. पुलोमा ऋषि का अपत्य या पुत्र। २. कौशीतक उपनिषद् के अनुसार दैत्यों की एक जाति का नाम। ३. इंद्र (को०)।

पौलोमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. इंद्राणी। २. भृगु महर्षि की पत्नी का नाम।

पौल्कस (१)
वि० [सं०] पुल्कस (एक संकर जाति) जाति संबंधी।

पौल्कस (२)
संज्ञा पुं० पुल्कस जाति का मनुष्य।

पौल्या पु
संज्ञा पुं० [हिं० पौल] दे० 'पौरिया'। उ०—रावली पौले आवीया, पौल्या वेगी बधावउँ जाह।—बी० रासो०, पृ० ९१।

पौषा † (१)
संज्ञा पुं० [सं० पाद्, पादक हिं० पाव] १. एक सेर का चौथाई भाग। सेर का चतुर्थांश। उ०—औढ़न मेरा राम नाम, मैं रामहिं को बनजारा हो। सहस नाम को करों बनिज मैं हरि मोरा बढ़वारा हो। सहस नाम को करों पसारा दिन दिन होत सवाई हो। कान तराजू सेर तिनपौवा उह किन ढोल बजाई हो।—कबीर (शब्द०)। २. मिट्टी या काठ आदि का एक बरतन जिसमें पाव भर पानी, दूध आदि आ जाय। ३. पान जो २६ १/२ ढोली हो। २६ १/२ ढोली पान। (तंबोली)। †४. एक तरह का खड़ाऊँ। उ०— पौवा अधर अधार को चलत सो पाँव पिराय।—भीखा श०, पृ० ९९।

पौष
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह महीना जिसमें पूर्णमासी पुष्य नक्षत्र में हो। पूस। २. एक उत्सव या पर्व (को०)। ३. संघर्ष। लड़ाई (को०)।

पौषना †पु
क्रि० स० [सं० पोषण] दे० 'पोसना'। उ०—षेचर भचर जे जल के चर देत अहार चराचर पौषे।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ४३२।

पौषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पूस महीने का पूर्णिमा। पूष की पूर्णिमा २. पुष्य नक्षत्रयुक्त रात्रि [को०]।

पौष्कर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुष्कर मूल। २. पदम की जड़। भीसा। भसीड़। ३. एरंड का मूल। ४. स्थलपदम।

पौष्कर (२)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पौष्करी] पुष्कर संबंधी। नील वर्ण कमल से संबंधित [को०]।

पौष्कर मूल
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुष्कर मूल।

पौष्कर सादि
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक वैयाकरण ऋषि का नाम जिनके मत का उल्लेख महाभाष्य में है। २. पुष्परसद् नाम के ऋषि के गोत्र में उत्पन्न पुरुष।

पौष्करिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटा पोखर। छोटा तालाब। पुष्करिणी।

पौष्कल
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक साम का नाम। २. एक प्रकार का अन्न (को०)।

पौष्कल्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. संपूर्णता। भरा पूरापन। पूर्ण विकसित स्थिति। २. अधिक्य। बहुलता (को०)।

पौष्टिक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पौष्टिकी] पुष्टिकारक। बलवीर्य- दायक। जैसे, पौष्टिक औषध।

पौष्टिक (२)
संज्ञा पुं० १. वह कर्म जिससे धन जन आदि की वृद्धि हो। २. वह कपड़ा जो मुंडन के समय सिर पर डाल दिया जाता है।

पौष्टी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुर नाम के राजा की एक स्त्री।

पौष्ण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] रेवती नक्षत्र।

पौष्ण (२)
वि० पुषा देवता संबंधी। सूर्य संबंधी। पुषा देवता का (चरु आदि)।

पौष्प (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पौष्पी] पुष्प संबंधी। फूल का। पुष्पनिर्मित।

पौष्प (२)
संज्ञा पुं० १. फूलों का निकाला हुआ मद्य। २. पुष्परेणु। फूल की धूल। पराग।

पौष्पक
संज्ञा पुं० [सं०] कुसुमांजन।

पौष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पुष्पपुर या पाटलिपुत्र। २. फूलों से बननेवाली एक शराब (को०)।

पौसरा
पुं० [हिं०] दे० 'पौसला'।

पौसला
संज्ञा स्त्री० [सं० पयःशाला] १. वह स्थान जहाँपर पानी पिलाया जाता है। वह स्थान जहाँ सर्वसाधारण को धर्मार्थ जल पिलाया जाता है। प्याऊ। सबील। २. प्यासों को पानी पिलाने का प्रबंध। क्रि० प्र०—बैठाना।—चलाना।

पौसाक पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पोशाक'। उ०—कबहुँ गौर दुति बाल बपु रजत अभूषन अंग। पंच नदी पौसाक तन धरे किए सोइ ढंग।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० २१४।

पौसार
संज्ञा स्त्री० [हिं० पाँव + साल] लकड़ी का एक डंडा जो ताने और राछ के नीचे लगा रहता है। यह करघे के भीतर रहता है। इसी को पैर से दबाकर राछ को ऊँचा नीचा करते हैं।

पौसेरा
संज्ञा पुं० [हिं० पाव + सेर] पाव सेर की तोल।

पौहकर पु †
संज्ञा पुं० [सं० पुष्कर] पुष्कर तीर्थ। उ०—आया पौहकर नेम ले मधकर हर कुल मौड़।—रा० रू०, पृ० ४५।

पौहर पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'प्रहर'। उ०—बीसल दे तीणी रंजीयो। चार पौहर नीतु बिलसइ भोग।—बी० रासो, पृ० ३०।

पौहरा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पहरा'। उ०—माढू ज्याँरा मारजै, पोहरा जिकाँ पड़ंत। बिन पौहरे थाहर बसै सादूलौ बलवंत।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० २३।

पौहा ‡
संज्ञा पुं० [सं० पशु] पशु। जानवर। उ०— पक रही फसल लद रहे चना से बूँट पड़ी है हरी मटर। तीमन को साग और पौहों को हरा, भरी पूरी धरती।—मिट्टी०, पृ० ४४।

पौहारी
संज्ञा पुं० [सं० पयस (=दूध) + आहारी] वह जो केवल दूध ही पीकर रहे (अन्न आदि न खाय)। जैसे, पौहारी बाबा।

प्यंड पु
संज्ञा पुं० [सं० पिण्ड] दे० 'पिंड'। उ०—प्यंड ब्रह्मंड कथै सब कोई। वाकै आदि अरु अंत न होई।—कबीर ग्रं०, पृ० १४९।

प्यंडर पु
वि० [सं० पाण्डुर] दे० 'पांडुर—२'। उ०—प्यंडर केस कुसुम भये धौला पलटि गइ बानी।—कबीर ग्रं०, पृ० २२१।

प्याँर पु
संज्ञा पुं० [हिं०] धान, कोदो के डंठल जिनसे दाना अलग कर दिया गया हो। पयाल। पयार। पुआर। उ०— जाडे़ के बिनों में किसी गरम कौडे़ के चारों ओर प्याँर बिछा बिछा के अपने परिजनों के साथ.....सब बैठ कथा कह कह दिन बिताते हैं—श्यामा०, पृ० ४४।

प्याऊ
संज्ञा पुं० [सं० प्रपा, हिं० प्याना (=पिलाना) + ऊ (प्रत्य०)] वह स्थान जहाँ सर्वसाधारण को पानी पिलाया जाता है। पोसरा। सबील।

प्याज
संज्ञा पुं० [फा० प्याज़ या पियाज] एक प्रसिद्ध कंद जो बिलकुल गोल गाँठ के आकार का होता है और जिसके पत्ते पतले लंबे और सुंगधराज के पत्तों के आकार के होते हैं। विशेष—इसकी गाँठ में ऊपर से नीचे तकत केवल छिलके ही छिलके होते हैं। यह कंद प्रायः सारे भारत में होता है और तरकारी या माँस के मसाले के काम में आता है। कहीं कहीं इसका उपयोग औषधों आदि में भी होता है। यह बहुत अधिक पुष्ट माना जाता है। इसकी गंध बहुत उग्र और अप्रिय होती है जिसके कारण इसका अधिक व्यवहार करनेवालों के मुँह और कभी कभी शरीर या पसीने से भी बिकट दुर्गंध निकलती है। इसी लिये हिंदुओं में इसके खाने का बहुत अधिक निषेध है। यह बहुत दिनो तक रखा जा सकता है और कम सड़ता है। वैद्यक के अनुसार इसके गुण प्रायः लहुसन के समान ही है। वैद्यक में इसे माँस और वीर्यवर्धक, पाचक, सारक, तीक्ष्ण, कंठशोधक, भारी, पित्त और रक्तवर्धक, बलकारक, मेधा जनक, आँखों के लिये हितकारी रसायन, तथा जीर्णज्वर, गुल्म, अरुचि, खाँएसी, शोथ, आमदोष, कुष्ठ, अग्निमांद्य, कृमि, वायु और श्वास आदि का नाशक माना जाता है। इसमें से एक प्रकार का तेल भी निकलता है जो उत्तेजक और चेतनाजनक माना जाता है। प्याज को कुचलने से जो रस निकलता है वह बिच्छु आदि के काटे हुए स्थान पर लगाया भी जाता है और मूर्छा के समय उसे सुँघाने से चेतना आती है। पर्या०—सुकंदक। लोहिककंद। तीक्ष्णकंद। उष्ण। मुखदूषण।शूद्रप्रिय। कृमिघ्न। मुखगंधक। बहुपत्र। विश्व- गंध। रोचन। पलांडु।

प्याजी (१)
वि० [फा०] प्याज के रंग का। हलका गुलाबी।

प्याजो (२)
संज्ञा पुं० [देश०] काले रंग का एक प्रकार का दाना जो प्रायः गेहूँ के साथ उत्पन्न होता है और उसी के दानों के साथ मिल जाता है। मुनमुना। विशेष दे० 'मुनमुना'।

प्यादा
संज्ञा पुं० [फा० पयादह्] १. पदाति। पैदल। सेना का पैदल सिपाही। २. दूत। हरकारा। ३. शतरंज के खेल में एक गोटी। यौ०—प्यादापा = पैदल चलनेवाला।प्यादापाई = पैदल या बिना सवारी के चलना।

प्यान (१)
वि० [सं०] मोटा। स्थूल। पीन [को०]।

प्यान पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० प्रयान, हिं० पयान] दे० 'प्रयाण'। उ०—दिया खता न प्यान किया, मंदर भया उजार। मर गए ते मर गए बाँचे बाँचनिहार।—कबीर बी० (शिशु०), पृ० २३६।

प्याना †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पिलाना'।

प्यायन (१)
वि० [सं०] शक्तिवर्धक। शक्ति या वृदि्धवाला [को०]।

प्यायन (२)
संज्ञा पुं० वृदि्ध। वर्धन। बढ़ना [को०]।

प्यायित
वि० [सं०] १. जो बढ़ गया हो। वृदि्धप्राप्त। २. जो मोटा हो गया हो। ३. शक्ति या पुष्टि प्राप्त [को०]।

प्यार (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रीति, प्रिय अथवा प्रियक] १. मुहब्बत। प्रेम। चाह। स्नेह। २. वह स्पर्श, चुंबन, संबोधन आदि जिससे प्रेम सूचित हो। प्यार जनाने की क्रिया। जैसे, बच्चों को प्यार करना। मुहा०—प्यार का खेलौना = बालक शिशु। बच्चा। उ०— प्यार कर प्यार के खेलौने को, कौन दिल में पुलक नहीं छाई।—चोखे०, पृ० १३।

प्यार (२)
संज्ञा पुं० [सं० पियाल] अचार या पियार नाम का वृक्ष जिसका बीज चिरौंजी है। यौ०—प्यार मेवा = पियाल मेवा। चिरौंजी।

प्यारा
वि० [सं० प्रिय] [वि० स्त्री० प्यारी] १. जिसे प्यार करें। जो प्रिय हो। प्रेमपात्र। प्रीतिपात्र। प्रिय। २. जो अच्छा लगे। जो भला मालूम हो। ३. जो छोड़ा न जाय। जिसे कोई अलग करना न चाहे। जैसे,—प्राण सबको प्यारा होता है। ४. महँगा। अधिक मुल्यवान।

प्यारि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० प्यारी] प्यारी। प्रिया। उ०—मोसी सखि तुम कोटिक पठवौ प्यारि न मानै आप।—नंद ग्रं०, पृ० ३६८।

प्याला
संज्ञा पुं० [फा० प्यालह्, पियालह्] [स्त्री० अल्पा० प्याली] १. एक विशेष प्रकार का छोटा कटोरा जिसका ऊपरी भाग या मूँह नीचेवाला भाग या पेंदे की अपेक्षा कुछ अधिक चौड़ा होता है और जिसका व्यवहार साधारणतः जल, दूध या शराब आदि पीने में होता है। छोटा कटोरा। बेला। जाम। मुहा०—प्याला पीना या लेना = मद्य पीना। शराब पीना। प्याला देना = मद्य पिलाना। शराब पिलाना। प्याला भरना या लबरेज होना = आयु का पूर्ण होना। दिन पूरा होना। २. जुलाहों का मिट्टी का वह बरतन जिसमें वे नरी भिगोते हैं। ३. गर्भाशय। मुहा०—प्याला बहना = गर्भपात होना। गर्भ गिराना। ४. भीख माँगने का पात्र। कासा। खप्पर। ५. तोप या बंदूक में वह गढ्ढा या स्थान जिसमें रंजक रखते हैं।

प्यावना †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पिलाना', 'प्याना'। उ०—कमल नैन कौं अति भावत है, मथ मथ प्यावत घैया।—पौद्दार अभि ग्रं०, पृ० २३४।

प्यावनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० प्यावना] पिलाने का कार्य। पिलाना। उ०—मैयन की वह गर लपटावनि। चूमनि मधुर पयोधर प्यावनि।—नंद० ग्रं०, पृ० २४५।

प्यास
संज्ञा स्त्री० [सं० पिपासा] मुँह और गले के सूखने से होनेवाली वह अनुभूति जो शरीर के जलीय पदार्थ के कम हो जाने पर होती है। जल पीने की इच्छा। तृषा। तृष्णा। पिपासा। विशेष—शरीर के सभी अंगों में कुछ न कुछ जल का अंश होता है जिससे सब अंगों की पुष्टि होती रहती है। जब यह जल शरीर के काम में आने के कारण घट जाता है तब सारे शरीर में एक प्रकार की सुस्ती मालूम होने लगती है और गला तथा मुँह सूखने लगता है। उस समय जल पीने की जो इच्छा होती है उसी का नाम प्यास है। जीवों के लिये भूख की अपेक्षा प्यास अधिक कष्टदायक होती है क्योंकी जल की आवश्यकता शरीर के प्रत्येक स्नायु को होती है। भोजन के बिना मनुष्य कुछ अधिक दिनों तक जी सकता है पर जल के बिना बहुत ही थोडे़ समय में उसका जीवन समाप्त हो जाता है। जो लोग प्यास के मारे मरते हैं वे प्रायः मरने से पहले पागल हो जाते हैं। मुहा०—प्यास बुझाना = जल पीकर तृष्णा का शांत करना। प्यास लगना = प्यास मालूम होना। पानी पीने की इच्छा होना। २. किसी पदार्थ आदि की प्राप्ति की प्रबल इच्छा। प्रबल कामना।

प्यासा
वि० [सं० पिपासित या पिपासु] जिसे प्यास लगी हो। जो पानी पीना चाहता हो। तृषित। पिपासायुक्त।

प्युनिटिव पुलिस
संज्ञा स्त्री० [अं०] वह अतिरिक्त पुलिस दल जो किसी नगर या गाँव में, वहाँ वालों के दुष्ट आचरण अर्थात् नित्य उपद्रव आदि करने के कारण, निर्दिष्ट अवधि के लिये तैनात किया जाता है और जिसका खर्च गाँववालों से ही दंड स्वरूप लिया जाता है।

प्यून
संज्ञा पुं० [अं०] प्यादा। सिपाही। चपरासी। हलकारा।

प्यूनबुक
संज्ञा स्त्री० [अं०] वह डायरी या रजिस्टर जिसमें पत्रादि चढ़ाए जाते हैं और उसे चपरासी लेकर जिसका पत्र होता है उसे देता है और पानेवाले का हस्ताक्षर उस डायरी या रजिस्टर पर ले लेता है।

प्यूनी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पूनी'।

प्यूस
संज्ञा पुं० [सं० पीयूष] दे० 'पेवस'।

प्यूसी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० प्यूस] दे० 'पेवसी'।

प्यो पु †
संज्ञा पुं० [हिं० पिय, पिंड] पति। स्वामी। खाविंद। उ०—एकही दर्पन देखि कहै तिय नीके लगौ पिय प्यौ कहै प्यारी। देव सु बालम बाल को बाद बिलोकि भई बलि हौं बलिहारी।—देव (शब्द०)।

प्योरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. रूई की मोटी बत्ती। २. एक प्रकार का पीला रंग।

प्योसर
संज्ञा पुं० [सं० पीयूष] हाल की ब्याई हुई गौ का दूध। उ०—सब हेरि धरी है साठी। लै उपर उपर ते काढ़ी। अति प्योसर सरिस बनाई। तेहिं सोंठ मिरच रुचिताई।— सूर (शब्द०)।

प्योसार †
संज्ञा पुं० [सं० पितृशाला] स्त्री के लिये पिता का गृह। पीहर। मायका। उ०— परत फिराय पयोनिधि भीतर सरिता उलट बहाई। मनु रघुपति भयभीत सिंधु पत्नी प्योसार पठाई।—सूर (शब्द०)।

प्यौंदा †
संज्ञा पुं० [हिं० पैवंद] दे० 'पैवंद'।

प्यौ पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पिय'। उ०—जा तिय को परदेसु तैं आयो प्यौ मतिराम।—मति ग्रं०, पृ० ३१८।

प्यौर पु
संज्ञा पुं० [हिं० प्रिय] १. पति। स्वामी। २. प्रियतम। उ०—हम हारों कै कै हहा पाइनु पारच्यो प्यौरु। लेहु कहा अजहूँ किए तेह तरेरयो त्योरु।—बिहारी (शब्द०)।

प्यौसरी
संज्ञा पुं० [हिं० प्योसर] दे० 'पेवसी'।

प्यौसार †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'प्योसार'। उ०—तू भँवर बन्यौ बैठयौ रहिओ, चल बस मेरे प्यौसार।—पोद्दार अभि ग्रं०, पृ० ८७७।