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विथक
संज्ञा पुं० [हिं० विथकना ?] पवन।

विथकना †
क्रि० अ० [हिं० थकना] १. थकना। शिथिल होना। उ०—सुनि किन्नर गंधर्व सराहत विथके हैं विबुध विमान।— तुलसी (शब्द०)। २. मोहित या चकित होकर चुप हो जाना। उ०—तुलसी सुनि ग्रामवधू विथकीं पुलकीं तन औ चले लोचन च्वै।—तुलसी (शब्द०)।

विथकित पु
वि० [हिं० विथकना] १. थका हुआ। शिथिल। उ०— तुलसी भइ मति विथकित करि अनुमान। राम लषन के रूप न देषेउ आन।—तुलसी (शब्द०)। २. जो आश्चर्य या मोह आदि के कारण कुछ न बोल सकता हो। उ०—गोपीजन विथ- कित ह्वै चितवत सब ठाढ़ी।—सूर (शब्द०)।

विथराना पु
क्रि० स० [सं० विस्तरण, प्रा० विथ्थरण] १. फैलाना। २. इधर उधर करना।

विथा पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यथा] १. व्यथा। पीड़ा। तकलीफ। उ०—(क) तनकहु विथा नहीं मन मान्यो। पर उपकार न तनु प्रिय जान्यो।—रघुराज (शब्द०)। (ख) भँवर जानि पै कमल पिरीती। जेहिं मँह विथा प्रेम गै बीती।—जायसी (शब्द०)। (ग) बूटी जड़ी मनी बहुबिधि की। लीनी विथा निवारन सिधि की।—गोपाल (शब्द०)। २. रोग। बीमारी। उ०—फेन तजै मुख तै, पटकै कर, जौ न कियौ जू विथा निरवारन।—रस कुसुमाकर (शब्द०)।

विथारना पु
क्रि० स० [सं० विस्तारण, प्रा० वित्थारण] फैलाना। छितराना। उ०—श्री रघुवीर के वाक विलास तें धर्म रच्यो त्रैलोक्य विथारयो।—हृदयराम (शब्द०)।

विथित पु
वि० [सं० व्यथित] जिसे किसी प्रकार की व्यथा हो। व्यथायुक्त। दुखी।

विथुर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. चोर। २. राक्षस। ३. क्षय। नाश।

विथुर (२)
वि० १. अल्प। थोड़ा। कम। २. व्यथित। दुःखित। ३. घनत्वरहित। जो ठोस न हो (को०)। ४. विचलित। स्खलित (को०)।

विथुरना
क्रि० स० [सं० विस्तरण प्रा० वित्थरण] फैलना। छित- राना। इधर उधर होना। फटना। उ०—पर अंत को अकाल ही के मेघ तो थे छण में प्रवात से विथुर गए आकाश खुल गया।—श्यामा०, पृ० ७।

विथुरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह स्त्री जिसका स्वामी से वियोग हो। विरहिणी। २. विधवा (को०)।

विथ्था पु
वि० [सं० वृथा या मिथ्या] दे० 'वृथा'। उ०—विथ्था जीवन मनुष्य कौ, जो धन नाहीं पास।—पृ० रा०, २३।८।

विथ्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] गोभी।

विदंड
संज्ञा पुं० [सं० विदंण्ड] अंकुड़ा। अर्गला [को०]।

विदंत (१)
वि० [सं० विदंत] (हाथी) बिना दाँत का। दतहीन [को०]।

विदंत (२)
संज्ञा पुं० [सं० विदू (= जानना)] विद्वान्। ज्ञाता।

विदंत ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० विदन्ता] एक प्रकार की कौड़ी।

विदंश
संज्ञा पुं० [सं०] १. ऐसा चरपरा खाद्य जिसके खाने से प्यास जगती है। २. दंशन [को०]।

विद
संज्ञा पुं० [सं०] १. तिलपुष्पी। तिलक। २. जानकार। जाननेवाला। ३. पंडित। विद्वान्।

विदत्त
वि० [सं०] जो दिया गया हो। वितरित।

विदकना
क्रि० अ० [सं० विदरण या देश०] भड़कना। चौंकना। बिदकना। उ०—एक बूँद विष सात बूंद मधु को दूषित कर देता, अपनी परछाईं से भी तो मानव आज विदकता।—वंदन०, पृ० ८१।

विदग्ध (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. रसिक पुरुष। रसज्ञ। नागर। २. पंडित विद्वान्। ३. चतुर। चालाक। होशियार। कलाभिज्ञ। ४. रूसा नामक घास।

विदग्ध (२)
वि० १. जला हुआ। दग्ध। २. जिसका पाक हुआ हो। पका या पचा हुआ (को०)। ३. नष्ट। सड़ा गला (को०)। ४. जो जला या पचा न हो (को०)। ५. सुंदर (को०)। ६. भद्रतापूर्ण। जैसे, पोशाक। ७. परिपक्व। जैसे, गुल्म (को०)। ८. पिंग। पीला (को०)। यौ०—विदग्ध अजीर्ण = दे० 'विदग्धाजीर्ण'। विदग्ध वरिवृद्धता = पेट में अम्ल का घुमड़ना और पेट का फूलना। विदग्ध परिषद् = रसिकों या विदग्ध व्यक्तियों की सभा। विदग्धवचन = वाक्चतुर।

विदग्धक
संज्ञा पुं० [सं०] जलता हुआ शव [को०]।

विदग्धता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विदग्ध होन का भाव। पांडित्य। विद्वत्ता। २. चातुर्य। चातुरी (को०)। ३. रसिकता (को०)।

विदग्धत्व
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'विदग्धता'।

विदग्धा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह परकीया नायिका जो होशियारी के साथ परपुरुष को अपनी ओर अनुरक्त करे। विशेष—यह दो प्रकार की मानी गई है—वचनविदग्धा और क्रियाविदग्धा। जो स्त्री अपनी बातचीत के कौशल से पर- पुरुष पर अपनी कामवासना प्रकट करती है, वह वचनविदग्धा कहलाती है; और जो किसी प्रकार की क्रियाकलाप से अपना भाव प्रकट करती है, उसे क्रियाविदग्धा कहते हैं।

विदग्धाजीर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का अजीर्ण रोग जो पित्त के प्रकोप से उत्पन्न होता है और जिसमें रोगी को भ्रम, तृष्णा, मूर्छा, दाह और पेट में दर्द होता है।

विदग्धाम्लद्दष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] आँखों का एक प्रकार का रोग जो बहुत अधिक खटाई खाने से होता है और जिसमें आँखें पीली पड़ जाती हैं।

विदग्धालाप
वि० [सं०] बात करने में कुशल। वाक्पटु [को०]।

विदत्
वि० [सं०] १. जानकार। ज्ञाता। २. बुद्धिमान् [को०]।

विदथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. योगी। २. यज्ञ। ३. वैदिक काल के एक राजा का नाम। ४. विद्वान्। जानकार (को०)। ५. धार्मिक, सामरिक अथवा सामाजिक संघटन। ६. मकान। ७. ज्ञान। प्रज्ञा। बुद्धि। उ०—ऋग्वेद में एक तीसरा शब्द विदथ भी अनेक बार आया है जिसका अर्थ कहीं तो धार्मिक, कहीं मकान, कहीं यज्ञ और कहीं बुद्धि इत्यादि है।—हिंदु० सभ्यता, पृ० ७२।

विदथी
संज्ञा पुं० [सं० विदथिन्] एक वैकिक ऋषि का नाम।

विददंक्षु
वि० [सं० विददङ्क्षु] डँसने के लिये तेयार या तत्पर [को०]।

विदमान पु (१)
वि० [सं० विद्यमान] जो विद्यमान हो। उ०—(क) फोरय़ो नयन काग नहि छाँड़यो सुरपति के विदमान।—सूर (शब्द०)। (ख) ताको बंधन कियो इहि रघुपति को दिखत विदमान।—सूर (शब्द०)।

विदमान † (२)
संज्ञा पुं० [सं० विद्वान्] पंडित। ज्ञाता। विद्वान्।

विदर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कंकारी। विश्वसारक। २. विदारण करना। फाड़ना। ३. रंध्र। विवर। दरार। उ०—मुगति मग्ग खुल्ले बिदर।—पृ० रा०, ५८।२३५।

विदर (२)
वि० [सं० विदल, प्रा० विदर] दे० 'विदल'।

विदर † (३)
संज्ञा पुं० [देश०] दासीपुत्र। उ०—विदर पिदर जाणैं नहीं, मादर विदराँ मूल।—बाकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ८५।

विदरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. विदारण करना। फाड़ना। २. विद्रधि नामक रोग।

विदरना पु (१)
क्रि० अ० [सं० विदरण] विदीर्ण होना। फटना। उ—(क) विदरत नाहिं बज्र की छाती हरि वियोग क्यों सहिए।—सूर (शब्द०)।

विदरना (२)
क्रि० स० विदीर्ण करना। फाड़ना। उ०—महेश यही तुमको निदरयोजू। अरा सम पत्रनि ह्वै विदरयोजू।—गुमान (शब्द०)।

विदर्भ
संज्ञा पुं० [सं०] १. आधुनिक बरार प्रदेश का प्राचीन नाम। २. भागवत के अनुसार एक राजा का नाम। कहते हैं, इसी राजा के नाम पर विदर्भ देश का नाम पड़ा था। ३. पुराणानुसार एक प्राचीन ऋषि का नाम। ४. दाँतों में चोट लगने के कारण मसूड़ा फूलना या दाँतों का हिलना। ५. सूखी भूमि या मरुभूमि (को०)। ६. विदर्भ देश के निवासी (को०)।

विदर्भजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अगस्त्य ऋषि की स्त्री लोपामुद्रा का एक नाम। २. दमयंती का एक नाम जो विदर्भ के राजा भीष्मक की कन्या थी। ३. रुक्मिणी का एक नाम।

विदर्भतनया
संज्ञा स्त्री० [सं०] दमयंती [को०]।

विदर्भराज
संज्ञा पुं० [सं०] दमयंती के पिता राजा भीष्म या भीष्मक जो विदर्भ के राजा थे।

विदर्भसुभ्र
संज्ञा स्त्री० [सं०] दमयंती [को०]।

विदर्भा
संज्ञा पुं० [सं०] १. विदर्भ की राजधानी। कुंडिनपुर। २. एक नदी। ३. चाक्षुष मनु की पत्नी [को०]।

विदर्भाधिपति
संज्ञा पुं० [सं०] विदर्भ नरेश। राजा भीष्मक [को०]।

विदर्भि
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन ऋषि का नाम।

विदर्व्य
संज्ञा पुं० [सं०] बिना फनवाला साँप।

विदर्शना
संज्ञा स्त्री० [सं०] विवेक। ज्ञान [को०]।

विदल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. लाल रंग का सोना। २. सोना। स्वर्ण। ३. अनार का दाना वा कल्क। ४. बाँस का बना हुआ दौरा या और कोई पात्र। ५. चना। ६. पीठी। ७. पहाड़ी आबनूस (को०)। ८. विभाग। पार्थक्य (को०)। ९. टुकड़ा (को०)। १०. वेतस (को०)। ११. टहनी (को०)। १२. दाल (को०)।

विदल (२)
वि० विकसित। खिला हुआ। ३. जिसमें दल न हों। बिना दल का।

विदलन
संज्ञा पुं० [सं०] १. मलने, दलने या दबाने आदि की क्रिया। २. टुकड़े टुकड़े या इधर उधर करना। फाड़ना।

विदलना पु
क्रि० स० [सं० विदलन] दलित करना। नष्ट करना। उ०—तैं रन केहरि केहरि के विदले अरि कुजर छैल छवा से।—तुलसी (शब्द०)।

विदला
संज्ञा स्त्री० [सं०] त्रिपृत या निसोथ नाम की एक प्रकार की लता। विशेष दे० 'निसोथ' [को०]।

विदलान्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. पकाई हुई दाल। २. वह अन्न जिसमें दो दल हों। जैसे—चना, उड़द, मूँग, अरहर, मसूर आदि।

विदलित
वि० [सं०] १. जिसका अच्छी तरह दलन किया गया हो। २. रौंदा हुआ। मला हुआ। ३. टुकड़े टुकड़े किया हुआ। ४. फाड़ा हुआ।

विदलिनी
वि० स्त्री० [सं० विदल + इनि ?] विदीर्ण करनेवाली। फाड़नेवाली। उ०—किंतु तर्जनी तेरी ही, उनके मस्तक तैयार, पथ दर्शक अमरत्व और हो नभ विदलिनी पुकार।—हिम०, पृ० ५२।

विदश
वि० [सं०] (वस्त्र) जिसमें किनारी या पाढ़ न हो। जो बिना किनारी के हो [को०]।

विदस्त
वि० [सं०] कृश। दुर्बल। क्षीण [को०]।

विदा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुद्धि। अक्ल। समझ। २. ज्ञान।

विदा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० विदाय, मि० अ० विदाअ] १. प्रस्थान। रवाना होना। बिदाई। जैसे, मैके से बहू। २. कहीं से चलने की आज्ञा या अनुमति। क्रि० प्र०—करना।—माँगना।—होना।

विदाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० विदा + ई (प्रत्य०)] १. विदा होने की क्रिया या भाव। रुखसती। प्रस्थान। २. विदा होने की आज्ञा या अनुमति। ३. वह धन आदि जो विदा होने के समय किसी को दिया जाय।

क्रि० प्र०—देना।—पाना।—मिलना।

विदान
संज्ञा पुं० [सं०] खंड खंड करने की क्रिया [को०]।

विदाम ‡
संज्ञा पुं० [सं० बादाम से लक्ष्यार्थ] कौड़ी। छदाम। उ०— लेता नाम विदाम न लागै, विगत जिका दह व्यापै।—रघु० रू०, पृ० २७।

विदाय
संज्ञा पुं० [सं०] १. विसर्जन। २. प्रस्थान। ३. जाने की आज्ञा या अनुमति। विदा। उ०—ता पाछे श्री गुसाई जी विजय करिबे को विदाय भए सो चले।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ८१। कि० प्र०—माँगना।—लेना। ४. दान। वितरण। ५. विभाग। विभाजन (को०)।

विदायी (१)
संज्ञा पुं० [सं० विदायिन्] १. वह जो ठीक तरह से चलाता या रखता हो। नियामक। २. दान करनेवाला।

विदायी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० विदा + यी (ई) प्रत्य०]दे० 'विदाई'।

विदार
संज्ञा पुं० [सं०] १. युद्ध। समर। २. दे० 'विदारण'। ३. प्लावन। पानी का ऊपर से बहना। जलोच्छ्बास (को०)।

विदारक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह वृक्ष या पर्वत आदि जो जल के बीच में हो। २. छोटी नदियों के तल में बनाया हुआ गड्ढा, जिसमें नदी के सूखने पर भी पानी बचा रहता है। ३. नौसादर।

विदारक (२)
वि० विदारण करनेवाला। फाड़ डालनेवाला।

विदारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. बीच में से अलग करके दो या अधिक टुकड़े करना। फाड़ना। २. मार डालना। हत्या करना। ३. युद्ध। समर। लड़ाई। ४. कनेर। ५. खपरिया। ६. नौसादर। ७. जैनों के अनुसार दूसरों के पापों या दोषों की घोषणा करना। ८. पेड़ पौधे आदि काटकर साफ करना (को०)। ९. खोलना। जैसे, मुख विदारण (को०)। १०. निवारण। छोड़ देना। रद्द करना (को०)। ११. रौंदना (को०)। १२. कष्ट देना। तकलीफ पहुँचाना। १३. दे० 'विदारक'—१।

विदारणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] लड़ाई। संग्राम [को०]।

विदारना पु
क्रि० स० [हिं० विदरना] फाड़ना। उ०—(क) जनु उड़गन विधु मिलन कौ चले तम विदारि करि वाट।—तुलसी (शब्द०)। (ख) निज जाँघन पर ताहि पछारयो। नखन साथ तब उदर विदारयो।—केशव (शब्द०)।

विदारि
संज्ञा स्त्री० [सं०] शालपर्णी। विदारी [को०]।

विदारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बहत्संहिता के अनुसार एक प्रकार की डाकिनी जो घर के बाहर अग्निकोण में रहती है। २. गंभारी वृक्ष। ३. विदारी कंद। ४. शालपर्णी। ५. कड़वी तूँबी। ६. बिदारीकंद के समान गोल और कड़ी जंघा- मूल की सूजन या पिटिका।—माधव०, पृ० १८७।

विदारिगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० विदारिगन्धा] शालपर्णी।

विदारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] काश्मीरी। गंभारी।

विदारित
वि० [सं०] विर्दीण किया हुआ। फाड़ा हुआ।

विदारी (१)
वि० [सं० विदारिन्] फाड़नेवाला। विदारण करनेवाला।

विदारी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शालपर्णी। २. भुइँ कुम्हड़ा। ३. भावप्रकाश के अनुसार अठारह प्रकार के कंठरोगों में से एक प्रकार का कंठरोग। विशेष—यह रोग पित्त के प्रकुपित होने से होता है। इसमें गले और मुँह पर लाली आ जाती है, जलन होती है और बदबूदार मांस के टुकड़े कट कटकर गिरने लगते हैं। कहते हैं, जिस करवट कोई अधिक सोता है—उसी ओर यह रोग होता है। ४. एक प्रकार का क्षुद्र रोग जिसमें बगल में फुंसी निकलती है। ५. काम का एक रोग। ६. वाराहीकंद। ७. क्षीर काकोली। ८. वाग्भट्ट के अनुसार मेढ़ासींगी, सफेद पुनर्नवा, देवदार, अनंतमूल, बृहती आदि ओषाधियों का एक गण।

विदारीकंद
संज्ञा पुं० [सं० विदारीकन्द] भुइँकुम्हड़ा।

विदारीगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० विदारीगन्धा] १. शालपर्णी। २. सुश्रुत के अनुसार शालपर्णी, भुईकुम्हड़ा, गोखरू, शतमूली, अनंत- मूल, जीवंती, मुगवन, कटियारी, पुनर्नवा आदि औषाधियों का एक गण। विशेष—इस गण की सब ओषधियाँ वायु तथा पित्त की नाशक, और शोथ, गुल्म, ऊर्ध्वश्वास तथा खाँसी आदि रोगों में हितकर मानी जाती हैं।

विदारीगंधिका
संज्ञा स्त्री० [सं० विदारीगन्धिका]दे० 'विदारीगंधा' [को०]।

विदारु
संज्ञा पुं० [सं०] कृकलास। क्रकचपाद। गिरगिट। गृहगोधा।

विदाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. पित्त के प्रकोप के कारण होनेवाली जलन। २. हाथ पैर में किसी कारण से होनेवाली जलन। ३. आँतों में अम्ल बनने की क्रिया (को०)।

विदाहक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो विदाह उत्पन्न करता हो। २. दे० 'विदाह'।

विदाही
संज्ञा पुं० [सं० विदाहिन्] वह पदार्थ जिससे जलन पैदा हो। दाह उत्पन्न करनेवाला। तीक्ष्ण। चरपरा। उ०—विदाही, अर्थात् जो चीज खाने से छाती में जलन होती है, और जितने प्रकार के रूखे अन्न हैं, जैसे बाजरा आदि, इनको न खाय।

विदिक् (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० विदिश्] दिक्कोण। विदिश् [को०]।

विदिक (२)
वि० भिन्न दिशा में जानेवाला [को०]।

विदिक्चंग
संज्ञा पुं० [सं० विदिक्वङ्ग] एक प्रकार का पक्षी जो पीला होता है [को०]।

विदित (१)
वि० [सं०] १. जाना हुआ। अवगत। ज्ञात। सूचित। २. विश्रुत। विख्यात (को०)। ३. प्रतिज्ञात। जिसकी प्रतिज्ञा की गई हो। इकरार किया हुआ (को०)।

विदित (२)
संज्ञा पुं० १. कवि। विद्वान्। विद्याव्यसनी। २. सूचना। परिज्ञान (को०)। ३. प्रसिद्धि। ख्याति (को०)। ५. अवाप्ति। लाभ (को०)।

विदिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] जैनों की एक देवी।

विदितात्मा
संज्ञा पुं० [सं० विदितात्मन्] १. प्रसिद्ध या ख्यात व्यक्ति। २. आत्मज्ञानी पुरुष [को०]।

विदिथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. पंडित। विद्वान्। २. योगमार्मी। योगी। दे० 'विदथ'।

विदिश्
संज्ञा स्त्री० [सं० विदिश्]दे० 'विदिक्'। उ०—धायो धर शर शैल विदिश दिशि चक्रहूँ चाहि लयो।—सूर (शब्द०)।

विदिशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वर्तमान भेलमा नामक नगर का प्राचीन नाम। २. पुराणानुसार पारियात्र पर्वत से निकली हुई एक नदी का नाम। ३. दे० 'विदिश्'।

विदिश
संज्ञा स्त्री० [सं०] दो दिशाओं के बीच का कोना। जैसे,— अग्नि या ईशान आदि।

विदीधिति
वि० [सं०] किरणहीन। निष्प्रभ [को०]।

विदीपक
संज्ञा पुं० [सं०] दीपक। दीआ।

विदीपित
वि० [सं०] १. प्रज्वलित। २. प्रकाशित। दीपित। ३. धूपित। (को०)।

विदीप्त
वि० [सं०] प्रदीप्त। प्रभावान्। चमकीला [को०]।

विदीर्ण
वि० [सं०] १. बीच से फाड़ा या विदारण किया हुआ। उ०—हुआ विदीर्ण जहाँ तहाँ श्वेत आवरण जीर्ण। व्योम शीर्ण कंचुक धरे विषधर सा विस्तीर्ण।—साकेत, पृ० २७८। २. टूटा हुआ। भग्न। ३. मार डाला हुआ। निहत। ४. फैला या खोला हुआ (को०)। यौ०—विदीर्णमुख = जिसका मुँह खुला हो। विदीर्णहृदय = छिन्नहृदय। भग्नहृदय।

विदु
संज्ञा पुं० [सं०] १. हाथी के मस्तक के बीच का भाग। २. घोड़े के कान के नीचे का भाग। ३. दरियाई घोड़ा। जल- हस्ती (को०)।

विदुत्तम
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो सब बातें जानता हो। २. विष्णु का एक नाम।

विदुर
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो जानता हो। जानकर। वेत्ता। ज्ञाता। २. पंडित। ज्ञानी। ३. कौरवों के सुप्रसिद्ध मंत्री। विशेष—यह राजनीति, धर्मनीति और अर्थनीति में बहुत निपुण थे और धर्म के अवतार माने जाते हैं। महाभारत में कथा है कि जब सत्यवती ने अपनी पु्त्रवधू अंबिका को दूसरी बार कृष्णद्वैपायन के साथ नियोग करने की आज्ञा दी, तब उसने कृष्णद्वैपायन की आकृति आदि से भयभीत होकर एक सुंदरी दासी को अपने कपड़े आदि पहनाकर उनके पास भेज दिया, जिससे विदुर का जन्म हुआ। ये बहुत बड़े पंडित, बुद्धिमान्, शांत और दूरदर्शी थे; और पांडवों के बहुत बड़े पक्षपाती थे। पहले ये राजा पांडु के मंत्री थे; और इसी लिये पीछे से अनेक अवसरों पर इन्होंने पांडवों की भारी भारी विपत्तियों में रक्षा की थी। जतुगृह के जलने के समय भी इन्हीं के परामर्श से पांडवों की जान बची थी। ये धृतराष्ट्र केछोटे भाई और मंत्री भी थे। जिस समय दुर्योधन के बहुत कहने पर धृतराष्ट्र ने इनसे जूए के संबंध में संमति माँगी थी उस समय इन्होंने उन्हें बहुत रोका और समझाया था। पांडवों के वन जाने पर ये दुर्योधन के पास रहते थे। महाभारत का युद्ध आरभ होने से पहले इन्होंने धृतराष्ट्र को रात भर अनेक प्रकार के अच्छे अच्छे उपदेश देकर युद्ध रुकवाना चाहा था; पर इसमें भी इन्हें सफलता नहीं हुई। युद्ध में इन्होंने पांडवों का पक्ष ग्रहण किया था। महाभारत के युद्ध के उपरांत जब पांडवों का राज्य हुआ, तब भी ये बहुत दिनों तक मंत्री के पद पर थे। पर पीछे से वन में चले गए। वहाँ राजा युधिष्टिर से एक बार इनकी भेंट हुई थी। वहीं बहुत दिनों तक घोर तपस्या करने के उपरांत इनका परलोकवास हुआ था। नीति की प्रसिद्ध पुस्तक 'विदुरनीति' या 'विदुर प्रजागर' इन्हीं की रचित मानी जाती है (जो महाभारत के पाँचवें पर्व में ३३ वें अध्याय से ४० वें तक है)।

विदुर (२)
वि० चतुर। जानकार। कुशल।

विदुल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बेंत। २. जलबेंत। ३. बोल या गंधरस नामक गंधद्रव्य। ४. अमलबेत।

विदुल पु (२)
वि० [प्रा० विदुर] धीर। उ०—झर करत विदुल भर लोह भार।—पृ० रा० ५६।८७।

विदुला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक प्रकार का थूहर जिसे सातला कहते हैं। २. विट् खदिर। ३. महाभारत में वर्णित एक स्त्री जिसके पुत्र का नाम संजय था। युद्ध में परजित होकर घर में युद्धविरत पड़े हुए पु्त्र का उद्बोधन कर इसने उसे युद्ध में भेजा था (को०)।

विदुष
संज्ञा पुं० [सं० विद्वस्] [स्त्री० विदुषी] विद्वान्। पंडित। उ०— (क) निज निज देह को सप्रेम जोग छेम मई मुदित असीस विप्र विदुषनि दई है।—तुलसी (शब्द०)। (ख) विदुष जनन विराट प्रभु दीखे अति मन में सुख पायो।—सूर (शब्द०)।

विदुषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] विद्या पढ़ी हुई स्त्री। विद्वान् स्त्री। उ०— (क) जैसे लड़के ब्रह्मचर्य सेवन से पूर्ण विद्या और सुशिक्षा को प्राप्त होके युवति, विदुषी, अपने अनुकूल प्रिय, सद्दश स्त्रियों के साथ विवाह करते है।—दयानंद (शब्द०)। (ख) जहाँ पूर्ण विद्वान् और पूर्ण विदुषी स्त्री शिक्षा और विद्यादान करनेवाली हों, वहाँ भेज दें।—दयानंद (शब्द०)।

विदुष्कृत
वि० [सं०] निष्पाप [को०]।

विदू
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'विदु' [को०]।

विदून
वि० [सं०] पीड़ित [को०]।

विदूर (१)
वि० [सं०] जो बहुत दूर हो।

विदूर (२)
संज्ञा पुं० १. बहुत दूर का प्रदेश। २. एक देश का नाम। २. एक पर्वत का नाम। कहते हैं, वैदूर्यमणि इसी पर्वत में मिलती है। ४. दे० 'वैद्युर्य'। (मणि)। उ०—वेदी लसत विदूर फटिकमय सलिल तीर लस पाँती।—श्यामा०, पृ० ११८। ५. कुरु का एक पुत्र (को०)।

विदूरग
वि० [सं०] दूर तक फैला हुआ। विस्तृत। जो दूर तक फैला हुआ हो। [को०]।

विदूरज
संज्ञा पुं० [सं०] विदूर पर्वत से उत्पन्न, वैदूर्यमणि।

विदूरजात
संज्ञा पुं० [सं०] वैदूर्यमणि। विदूरज [को०]।

विदूरत्व
संज्ञा पुं० [सं०] विदूर होने का भाव। बहुत अधिक दूर होना।

विदूरथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुरुक्षेत्र का एक नाम। २. एक ऋषि का नाम (को०)। ३. एक वृष्णिवंशीय राजा जिनके पुत्र का नाम शूर था (को०)। ४. पुराणानुसार एकरा जा का नाम। ५. कुरु का एक पुत्र; इसकी माता का नाम सुभांगी था (को०)।

विदूरभूधर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विदूराद्रि' [को०]।

विदूरभूमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] विदूर नामक देश। कहते हैं, वैदूर्य- मणि इसी देश में होती है।

विदूररत्न
संज्ञा पुं० [सं०] वैदूर्यमणि जो अनुश्रुति के अनुसार विदूर पर्वत पर प्राप्त होती है [को०]।

विदूरविगत
संज्ञा पुं० [सं०] अंत्यज।

विदूरित
वि० [सं०] [वि० स्त्री० विदूरिता] हटाया हुआ या दूर किया हुआ। उ०—करुण वरुणालया अवैध विदूरिता।—बी० श० महा०, पृ० २१६।

विदूराद्रि
संज्ञा पुं० [सं०] विदूर पर्वत [को०]।

धिदूरोद् भावित
संज्ञा पुं० [सं०] विदूर पर्वत पर उत्पन्न होनेवाली, वैदूर्यमणि [को०]।

विदूष पु
संज्ञा पुं० [सं० विदूषक] भाँड़। विदूषक। उ०—नाचहिं कहुँ विदूष करि जाला। कूजहिं काँख बजावहिं ताला।—सबल (शब्द०)।

विदूषक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो अधिक विषयी हो। कामुक। २. वह जो तरह तरह की नकलें आदि करके, वेश भूषा बनाकर अथवा बातचीत करके दूसरों को हँसाता हो। मसखरा। विशेष—प्राचीन काल में राजाओं और बड़े आदमियों के मनो- विनोद के लिये उनके दरबार में इस प्रकार के मसखरे रहा करते थे जो अनेक प्रकार के कौतुक करके, बेवकुफ बनकर अथवा बातें बनाकर लोगों को हँसाया करते थे। प्राचीन नाटकों आदि में भी इन्हें यथेष्ट स्थान मिला है; क्योंकि इनसे सामाजिकों का मनोरंजन होता है। साहित्यदर्पण के अनुसार विदूषक प्रायः अपने कौशल से दो आदमियों में झगड़ा भी कराता है; और अपना पेट भरना या स्वार्थ सिद्ध करना खुब जानता है। यह शृंगार रस में सहायक होता है और मानिनी नायिका को मनाने में बहुत कुशल होता है। ३. चार प्रकार के नायकों में से एक प्रकार का नायक जो अपने कौतुक और परिहास आदि के कारण कामकेलि में सहायक होता है। ४. वह जो दूसरों की निंदा करता हो। खल। ५. भाँड़।

विदूषक (२)
वि० १. भ्रष्ट, दूषित या गंदा करनेवाला। २. परनिंदक। बदनाम करनेवाला। ३. हंसी करनेवाला। मसखरा [को०]।

विदूषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी पर विशेष रूप से दोष लगाने की क्रिया। ऐब लगाना। परिवाद। २. मलिन या दूषित करना। दुर्वचन। झिड़की (को०)।

विदूषना (१)
क्रि० स० [सं० विदूषण या हिं० वि० + दुखाना] १. सताना। दुःख देना। उ०—सुनु सठ काल ग्रसित यह देही। जनि तेहि लागि विदूषहि केही।—तुलसी (शब्द०)। २. दोष लगाना। दोषी ठहराना।

विदूषना (२)
क्रि० अ० दुखी होना। पीड़ा का अनुभव करना। उ०— तापन सों तपती बिर में बिन काल बृथा वन माहि विदूषती।—मन्नालाल (शब्द०)।

विदूषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पाप। अनाचार [को०]।

विदूषित
वि० [सं०] १. अपमानित। तिरस्कृत। लंछिल। २. दोषपूर्ण बनाया हुआ (को०)।

विदृक
वि० [सं०] दे० 'विदृश'।

विदृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संधि। सीवन। २. खोपड़ी का जोड़। उ०—यह शरीर ही द्वारकापुरी है। नौ इंद्रिय द्वार और दसवाँ विदृति द्वार ये दस फाटक हैं।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ६४०।

विदृश
वि० [सं०] जिसे दिखाई न पड़े। अंधा।

विदेव
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्राचीन ऋषि का नाम। २. दे० 'विदेह'।

विदेय
वि० [सं०] जो दिया गया हो। देय। देने लायक [को०]।

विदेव (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. राक्षस। २. यक्ष। ३. अक्षक्रीड़ा। पासे का खेल।

विदेव (२)
वि० १. देवरहित। देवताविहीन। देवताओं से विरहित। जैसे, विदेव मंदिर, विदेव यज्ञ। २. देवद्रोही। देवों का विद्वेषी [को०]।

विदेवन
संज्ञा पुं० [सं०] अक्षक्रीड़ा। पासा खेलना [को०]।

विदेश
संज्ञा पुं० [सं०] अपने देश को छोड़कर दूसरा देश। परदेश। परराष्ट्र।

विदेशग
वि० [सं०] परदेश जानेवाला। विदेश जानेवाला [को०]। यौ०—विदेशग।विदेशगमन=परदेश की यात्रा।विदेशगामी= विदेश जानेवाला।विदेशज=जो विदेश में उत्पन्न हो। विदेशवास=विदेश में रहना।विदेशवासी=प्रवासी। विदेश में रहनेवाला।विदेशस्थ=(१) परदेश में रहनेवाला। (२) परदेश में होनेवाला।

विदेशप्रवृत्तिज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार परराष्ट्र प्रवृत्तियों का ज्ञान और अनुमान। विदेशी मुआमलों की जानकारी।

विदेशी
वि० [सं० विदेशिन्] १. विदेश संबंधी। बाहरी। २. पर- देशी। दूसरे देश का निवासी।

विदेशीय
वि० [सं०] दे० 'विदेशी'।

विदेस †
संज्ञा पुं० [सं० विदेश]दे० 'विदेश'। उ०—अब तू विदेस का मनमाना मजा लूट।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १७।

विदेह (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो शरीर से रहित हो। २. वह जिसकी उत्पत्ति माता पिता से न हो। जैसे,—देवता आदि। ३. ज्ञानी एवं देहवाद को अधिक महत्व न देनेवाले राजा जनक का एक नाम। विशेष दे० 'जनक'। ४. राजा निमि का एक नाम। विशेष दे० 'निमि'। ५. प्राचीन मिथिला का एक नाम। ६. इस देश के निवासी।

विदेह (२)
वि० [सं०] ज्ञानशून्य। संज्ञारहित। बेसुध। अचेत। उ०— (क) मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ विदेह विदेहु बिसेखी।—तुलसी (शब्द०)। (ख) देखि भरत कर सोच सनेहु। भा निषाद तेहि समध बिदेहू।—तुलसी (शब्द०)। (ग) कौन ले आई कौने चरन चलाई, कौने बहियाँ गही सो धौ केही री। सूरदास प्रभु देखे सुधि रही नहिं, अति विदेह भई अब मैं बूझनि तोही री।—सूर (शब्द०)। २. मृत (को०)। ३. विरागी। उदासीन (को०)। ४. शरीररहित। कामशून्य।

विदेहक
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुराणनुसार एक पर्वत का नाम। २. एक वर्ष का नाम (को०)।

विदेहकुमारी
संज्ञा स्त्री० [सं०] (राजा जनक की पुत्री) जानकी। सीता। उ०—कहौ धौं तात क्यों जीति सकल नृप वरी है विदेहकुमारी।—तुलसी (शब्द०)।

विदेहकूट
संज्ञा पुं० [सं०] जैन पुराणानुसार एक पर्वत का नाम।

विदेहकैवल्य
संज्ञा पुं० [सं०] वह निर्वाण या मोक्ष जो जीवन्मुक्त को मरने पर प्राप्त होता है।

विदेहजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सीता [को०]।

विदेहत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. विदेह होने का भाव। २. शरीर का नाश। मृत्यु। मौत। यौ०—विदेहत्वगत, विदेहत्वप्राप्त=(१) मृत। (२) मुक्त।

विदेहपुर
संज्ञा पुं० [सं०] राजा जनक की राजधानी, जनकपुर। उ०—विदित विदेहपुर नाथ भृगुनाथ गति समय सयानी कीन्हीं जैसी आइ गौं परी।—तुलसी (शब्द०)।

विदेहमुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विदेहकैवल्य'। उ०—जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति का भेद प्रगट है, परंतु तुझको मालूम नहीं हो सकता है।—कबीर मं०, पृ० १७६।

विदेहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मिथिला नगरी और प्रदेश का एक नाम।

विदेही
संज्ञा पुं० [सं० विदेहिन्] ब्रह्म। उ०—कुल मर्यादा खोइ कै खोजिनि पदनिर्वान। अंकुर बोज नसाइ की भए विदेही थान।—कबीर (शब्द०)।

विदोष
वि० [सं०] जिसमें किसी प्रकार का दोष न हो। दोषरहित। बेऐब।

विदोह, विदोहन
संज्ञा पुं० [सं०] किसी से अत्यधिक लाभ उठाना या अधिक दूहना। शोषण [को०]।

विद्
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो जानता हो। जानकार। २. पंडित। विद्वान्। ३. बुध ग्रह। ४. तिल का पौधा।

विद् (१)
वि० ज्ञाता। जानकार। विद्वान्। समासांत में प्रयुक्त। जैसे,— वेदविद्, तदविद।

विद् (३)
संज्ञा स्त्री० ज्ञान। समझ। जानकारी [को०]।

विद्ध
वि० [सं०] १. बीच में से छेद किया हुआ। छिद्रित। विदीर्ण। २. फेंका हुआ। क्षिप्त। ३. जिसमें बाधा पड़ी हो। बाधित। ४. समान। तुल्य। बराबर। ५. जिसको चोट लगी हो। ताड़ित। ६. टेढ़ा। ७. मिला हुआ। आबद्ध। यौ०—विद्धकर्ण १. जिसके कान छिदे हों। २. विद्धकर्णी। विद्धकर्णा, विद्धकर्णिका=पाठा। विद्धकर्णी।

विद्ध (२)
संज्ञा पुं० (१) घाव। जख्म। (२) पहाड़मूल। पाठा [को०]।

विद्ध पु (३)
संज्ञा पुं० [सं० विधि] ब्रहमा। विधि। उ०—संषेपक जंपी सुकथ, माधव माननि मझ्झ। जो चित हित्त बिलंबियौ। (सो). हरिहर विद्ध न सूझ्झ।—पृ० रा०, २।४२२।

विद्धक
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल का एक प्रकार का यंत्र जिससे मिट्टी खोदी जाती थी।

विद्धकर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] अंवष्ठा। पाठा [को०]।

विद्धव्रण
संज्ञा पुं० [पुं०] वह सूजन जो शरीर के किसी अंग में काँटे की नोक के चुभने या टूटकर रह जाने से होती है।

विद्धा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का क्षुद्र रोग जिससे शरीर में बहुत छोटी छोटी फुंसियाँ निकलती हैं।

विद्धायुध
संज्ञा पुं० [सं०] धनुष का एक प्रकार। विशेष लंबाई का धनुष [को०]।

विद्धि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आघात करना। हनन। मारना। २. बेधना या छेदना।

विद्धि पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० विधि=काम करने का तरीका] विधि। जुगत। उ०—आहार पान घनसार पूर। बैंठे सु आइ एंकत सूर। सब कहिग बिद्धि कमधज दिसान। सुद्धरै बत्त सो काहु पान।—पृ० रा०, १।६२८।

विद्य
संज्ञा पुं० [सं०] लाभ। प्राप्ति [को०]।

विद्यमान
वि० [सं०] १. वर्तमान। उपस्थित। मौजूद। उ०— सूर समर करनी करहिं, कहि न जनावहिं आपु। विद्यमान रन पाय रिपु, कायर करहिँ प्रलापु।—सतवाणी०, पृ० ७३। २. तथ्यपूर्ण। तथ्यपूर्ण (को०)।

विद्यमानता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विद्यमान होने का भाव। उपस्थिति। मौजूदगी।

विद्यमानत्व
संज्ञा पुं० [सं०] विद्यमान होने का भाव। उपस्थिति। मौजूदगी।

विद्यांकुर
संज्ञा पुं० [सं० विद्या + अङ्कर] आरंभिक विद्या। बालकों को पढ़ाई जानेधाली ज्ञान की प्रथम पुस्तक। उ०—वहाँ राजा शिवप्रसाद सदृश विलक्षण विद्वान् के बनाए भूगोल हस्तामलक, इतिहास तिमिर नाशक, गुटका आदि विद्यांकुर से पढ़ाये जाते थे।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४१७।

विद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह ज्ञान जो शिक्षा आदि के द्वारा उपार्जित या प्राप्त किया जाता है। वह जानकारी जो सीखकर हासिल की जाती है। किसी विषय का विशिष्ट ज्ञान। इल्म। जैसे,— (क) विद्या पढ़कर मनुष्य पंडित होता है। (ख) आजकल पाठशालाओं मों अनेक प्रकार की विद्याएँ पढ़ाई जाती हैं। विशेष—हमारे यहाँ विद्या दो प्रकार की मानी गई है—परा और अपरा। जिस विद्या के द्वारा ब्रह्मज्ञान होता है, वह परा विद्या और इसके अतिरिक्त जो अन्य लौकिक या पदार्थ विद्याएँ हैं, वे सब अपरा विद्या कहलाती हैं। २. वह ज्ञान जिसके द्वारा मोक्ष की प्राप्ति या परमपुरुषार्थ की सिद्धि होती है। ३. वे शास्त्र आदि जिनके द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाता है। विशेष—हमारे यहाँ इनकी संख्या १८ बतलाई गई है। यथा— चारों वेद, छओ अंग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण, आयु- र्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद और अर्थशास्त्र। ४. दुर्गा। ५. देवी का मंत्र। ६. गनियारी। ७. सीता की एक सखी का नाम। ८. तंत्र में 'ई' अक्षर का वाचक शब्द (को०)। ९. छोटी घंटी (को०)। १०. ऐंद्रजालिक कौशल (को०)। ११. सिद्ध गुटिका। ऐंद्रजालिक गुटिका (को०)। विशेष—कहते हैं, इसे मुँह में रखने से व्यक्ति उड़ता हुआ कहीं भी गमन कर सकता था। १२. आर्या छंद का पाँचवाँ भेद, जिसमें चंद्रशेखर के मत से २३ गुरु और ११ लघु मात्राएँ होती हैं।

विद्याकर
संज्ञा पुं० [सं०] विद्या का आकार। विद्वान् व्यक्ति। वह जिससे ज्ञान प्राप्त हो। अध्यापक। शिक्षक [को०]।

विद्याकोशगृह
संज्ञा पुं० [सं०] पुस्तकालय। ग्रंथागार [को०]।

विद्याकोशसमाश्रय
संज्ञा पुं० [सं०] पुस्तकालय। लाइब्रेरी [को०]।

विद्यागम
संज्ञा पुं० [सं०] ज्ञानप्राप्ति। विद्याप्राप्ति [को०]।

विद्यागुरु
संज्ञा पुं० [सं०] वह गुरु जिससे विद्या पढ़ी हो। पवित्र ज्ञान का देनेवाला। पढ़ानेवाला गुरु। शिक्षक।

विंद्यागृह
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ विद्या पढ़ाई जाती हो। विद्यालय। पाठशाला।

विंद्याचंचु
वि० [सं० विद्याचञ्चु] विद्या द्वारा ख्यात। प्रसिद्ध विद्वान् [को०]।

विद्याचण
वि० [सं०] दे० 'विद्याचंचु'।

विद्याजंभक
वि० [सं० विद्याजम्भक] भाँति भाँति की ऐंद्रजालिक क्रिया अथवा जादू के खेल दिखानेवाला [को०]।

विद्यातीर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] १. महाभारत के अनुसार एक प्राचीन तीर्थ का नाम। २. शिव का एक नाम (को०)।

विद्यात्व
संज्ञा पुं० [सं०] विद्या का भाव।

विद्यादल
संज्ञा पुं० [सं०] भोजपत्र का पेड़।

विद्यादाता
संज्ञा पुं० [सं० विद्यादातृ] विद्या पढ़ानेवाला गुरु, जो शास्त्रों के अनुसार पिता माना जाता है।

विद्यादान
संज्ञा पुं० [सं०] १. विद्या पढ़ाना। शिक्षा देना। २. पुस्तक का दान (को०)।

विद्यादायाद
संज्ञा पुं० [सं०] विद्या का दायाद। किसी विद्या का उत्तराधिकारी [को०]।

विद्यादेवी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सरस्वती। २. जैनियों की सोलह जिन देवियों में से एक देवी का नाम।

विद्याधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. विद्या रूपी धन। २. वहु धन जो अपनी विद्या द्वारा उपार्जित किया जाय। ऐसे धन में किसी का हिस्सा नहीं लग सकता।

विद्याधर
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार की देवयोनि जिसके अंतर्गत खेचर, गंधर्व, किन्नर आदि माने जाते हैं। २. सोलह प्रकार के रतिबंधों में से एक प्रकार का रतिबंध। ३. वैद्यक में एक प्रकार का यंत्र जिससे पारे का संस्कार करते हैं। विशेष—इसमें एक थाली में पारा रखकर उसपर दूसरी थाली रखकर मिट्टी से बीच का जोड़ बंद कर देते हैं, और ऊपर की थाली में पानी भरकर दोनों मिली हुई थालियों को पाँच पहर तक आग पर रखते हैं। इसके उपरांत ठंढे होने पर पारा निकाल लेते हैं। ४. एक प्रकार का अस्त्र। उ०—(क) वर विद्याधर अस्त्र नाम नंदन जो ऐसो। मोहन स्वापन सयन सौम्य कर्षन पुनि है सो।— पद्माकर (शब्द०) (ख) महा अस्त्र विद्याधर लीजै पुनि नंदन जेहि नाऊँ।—रघुराज (शब्द०)। ५. विद्वान् व्यक्ति। पंडित। उ०—कविदल विद्याधर सकल कलाधर राज राज बर बेश बने।—केशव (शब्द०)।

विद्याधर रस
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार का रस जो पारे, गंधक, ताँबे, सोंठ, पीपल, मिर्च, धतूरे आदि की सहायता से बनाया जाता है और ज्वर में बहुत उपयोगी माना जाता है।

विद्याधरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] विद्याधर नामक की स्त्री। उ०—विद्या- धरी किन्नरी नामा त्यों वानरी अपारा।—रघुराज (शब्द०)।

विद्याधरेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० विद्याधरेन्द्र] जांबुवान का एक नाम।

विद्याधरेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक शिवलिंग का नाम।

विद्याधार
संज्ञा पुं० [सं०] पंडित। विद्वान्।

विद्याधारी
संज्ञा पुं० [सं० विद्याधारिन्] एक वृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरण में चार मगण होते हैं। उ०—मैं चारों बंधू गाँऊ भक्ती को पाऊँ। लाभै सारे यामें अंतै ना जाऊँ। जानै भेदा याको सत्संगा को धारी। वोही साँचो भक्ता साँचो विद्याधारी।—जगन्नाथ (शब्द०)।

विद्याधिदेवता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विद्या की अधिष्ठात्री देवी, सरस्वती।

विद्याधिप
संज्ञा पुं० [सं०] १. विद्या पढ़ानेवाला। गुरु। शिक्षक। २. विद्वान्। पंडित।

विद्याधिराज
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो बहुत बड़ा पंडित हो।

विद्याध्र
संज्ञा पुं० [सं०] विद्याधर नाम की देवयोनि।

विद्यानुपालन
संज्ञा पुं० [सं०] अध्ययन [को०]।

विद्यानुपाली
संज्ञा पुं० [सं० विद्यानुपालिन्] अध्येता [को०]।

विद्यानुसेवन
संज्ञा पुं० [सं०] विद्याध्ययन [को०]।

विद्यानुसेवी
संज्ञा पुं० [सं० विद्यानुसेविन्] अध्येता [को०]।

विद्यापति
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रमुख पंडित या विद्वान्। २. मैथिली भाषा के एक महान् गीतकार कवि (को०)।

वीद्यापीठ
संज्ञा पुं० [सं०] शिक्षा का केंद्र। विद्यालय [को०]।

विद्याबल
संज्ञा पुं० [सं०] १. जादू की शक्ति। २. विद्या की शक्ति। विद्वत्ता का बल (को०)।

विद्याभाक्
वि० [सं० विद्याभाज्] विद्वान्।

विद्याभ्यसन, विद्याभ्यास
संज्ञा पुं० [सं०] विद्याध्ययन।

विद्यामंडलक
संज्ञा पुं० [सं० विद्यामण्डलक] पुस्तकालय [को०]।

विद्यामंत पु
संज्ञा पुं० [सं० विद्यावत्]दे० 'विद्वान्'। उ०—व्यसनी व्यावहारिक विद्यामंत वादी व्युहपति वंदीजन वाहक।—वर्णा०, पृ० २०।

विद्यामंदिर
संज्ञा पुं० [सं० विद्यामन्दिर] विद्यालय।

विद्यामणि
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'विद्याधन'।

विद्यामय
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो पूर्ण पंडित हो।

विद्यामहेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

विद्यामार्ग
संज्ञा पुं० [सं०] वह कार्य जो मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाय। श्रेयः मार्ग (कठवल्ली उपनिषद्)।

विद्यारंभ
संज्ञा पुं० [सं० विद्यारम्भ] वह संस्कार जिसमें विद्या की पढ़ाई आरंभ होती है।

विद्याराज
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु की एक मूर्ति का नाम।

विद्याराशि
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

विद्यार्जन
संज्ञा पुं० [सं०] १. विद्या का अर्जन। विद्या की प्राप्ति। २. विद्या द्वारा होनेवाली प्राप्ति [को०]।

विद्यार्थ
वि० [सं०] विद्याप्राप्ति का इच्छुक [को०]।

विद्यार्थी
संज्ञा पुं० [सं० विद्यार्थिन्] वह जो विद्या पढ़ता हो। पढ़नेवाला छात्र। शिष्य।

विद्यालय
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ विद्या पढ़ाई जाती हो। पाठशाला।

विद्यालाभ
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विद्यार्जन' [को०]।

विद्यावंश
संज्ञा पुं० [सं०] किसी विद्या के शिक्षकों की क्रमागत परंपरा सूचनिका [को०]।

विद्यावधू
संज्ञा स्त्री० [सं०] सरस्वती [को०]।

विद्यावान
संज्ञा पुं० [सं० विद्यावान्] पंडित। विद्वान्। उ०—जीवन जग में काहि पिछानी। विद्यावान होइ जो प्रानी।—विश्राम (शब्द०)।

विद्यावार्तिक
वि० [सं०] तरह तरह के जादू के खेल करनेवाला [को०]।

विद्याविक्रय
संज्ञा पुं० [सं०] धन लेकर शिक्षा देना [को०]।

विद्याविद्
संज्ञा पुं० [सं०] विद्वान्। पंडित।

विद्याविरुद्ध
वि० [सं०] विद्या के विपरीत या विरुद्ध।

विद्यविशिष्ट
वि० [सं०] विद्याज्ञान या विद्वत्ता के लिये ख्यात [को०]।

विद्याविहीन
वि० [सं०] विद्याहीन। मूर्ख। अपढ़ [को०]।

विद्यावृद्ध
वि० [सं०] विद्या या ज्ञान में अग्रसर [को०]।

विद्यावेश्म
संज्ञा पुं० [सं० विद्यावेश्मन्] पाठशाला [को०]।

विद्याव्यवसाय
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'विद्याव्यसन'। २. दे० 'विद्याविक्रय'।

विद्याव्यसन
संज्ञा पुं० [सं० विद्या + व्यसन] विद्या या ज्ञानप्राप्ति के लिये उत्कट अभिलाषा। विद्याप्रेम। अध्ययन। उ०— क्षत्रियों के पास सैन्य बल था, राजनैतिक प्रभुता थी, विद्या- व्यसन भी था।—हिंदु० सभ्यता, पृ० ९७।

विद्याव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] वह व्रत जो गुरु के घर रहकर विद्या पढ़ने के उद्देश्य से धारण किया जाता है।

विद्यासागर
वि० [सं०] विद्या का समुद्र। अगाध विद्वान् [को०]।

विद्याव्रतस्नातक
संज्ञा पुं० [सं०] मनु के अनुसार वह स्नातक जो गुरु के पास रहकर वेद और विद्याव्रत दोनों समाप्त करके अपने घर लौटे।

विद्यास्नात
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विद्यास्नातक' [को०]।

विद्यास्नातक
संज्ञा पुं० [सं०] मनु के अनुसार वह स्नातक जो गुरु के घर रहकर वेदाध्ययन समाप्त करके घर लौटा हो।

विद्यु
संज्ञा स्त्री० [सं०] विद्युत्। बिजली।

विद्युच्चालक
संज्ञा पुं० [सं० विद्युत् + चालक] वह पदार्थ जिसमें विद्युत् की धारा प्रवाहित हो। जैसे, ताँबा आदि।

विद्युच्छिखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक पौधा जिसकी जड़ विषैली होती है। २. एक राक्षसी [को०]।

विद्युज्ज्वाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक नाग का नाम। २. बिजली की कौंध [को०]।

विद्युज्ज्वाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कलिकारी या कलियारी नामक वृक्ष। २. बिजली की कौंध। उ०—इसपर चमक रही है रक्तिम, विद्युज्ज्वाला बारंबार।—अपरा, पृ० ३५४।

विद्दुज्जिह्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. रामायण के अनुसार रावण के पक्ष के एक राक्षस का नाम जो शू्र्पर्णखा का पति था। २. एक यक्ष का नाम (को०)। ३. एक राक्षस का नाम।

विद्युज्जिह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कार्तिकेय की एक मातृका का नाम।

विद्युता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विद्युत्। बिजली। २. महाभारत के अनुसार एक अप्सरा का नाम।

विद्युताक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] कार्तिकेय के एक अनुचर का नाम।

विद्युत् (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संध्या। २. बिजली। ३. बृहत्संहिता के अनुसार एक प्रकार की उल्का। ४. एक प्रकार की वीणा। ५. वज्र (को०)। ६. उषा (को०)। ७. प्रजापति बाहुपुत्र की चार कन्थाएँ (को०)। ८. अतिजंगली छंद का एक भेद या प्रकार (को०)।

विद्युत् (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्राचीन ऋषि का नाम। २. समाधि का एक प्रकार (को०)। ३. एक असुर का नाम (को०)।

विद्युत् (३)
वि० १. जिसमें बहुत अधिक दीप्ति हो। बहुत चमकीला। २. जिसमें किसी प्रकार की दीप्ति या प्रभा न हो।

विद्युत्कंप
संज्ञा पुं० [सं० विद्युत्कम्प] बिजली की कौंध या चमक [को०]।

विद्युत्केश
संज्ञा पुं० [सं०] रामायण के अनुसार हेति नामक राक्षस का पुत्र, जो काल की कन्या भया के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। इसी विद्युत्केश और पौलोमी से राक्षसों के वंश की वुद्धि हुई थी।

विद्युत्केशी
संज्ञा पुं० [सं० विद्युत्केशिन्] दे० 'विद्युत्केश' [को०]।

विद्युत्त
संज्ञा पुं० [सं०] विद्युत् का भाव या धर्म। बिजलीपन।

विद्युत्पताक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रलय के समय के सात मेघों में से एक मेघ का नाम।

विद्युत्पर्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अप्सरा का नाम जिसका उल्लेख महाभारत में है।

विद्युत्पात
संज्ञा पुं० [सं०] बिजली का गिरना। वज्रपात।

विद्युत्पुंज
संज्ञा पुं० [सं० विद्युन्पुञ्ज] एक विद्याधर [को०]।

विद्युत्प्रपतन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विद्युत्पात' [को०]।

विद्युत्प्रभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. महाभारत के अनुसार एक ऋषि का नाम। २. वह जो विद्युत् के समान दाप्तिमान् हो। ३. एक दैत्य का नाम।

विद्युत्प्रभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दैत्यों के राजा बलि को पोती का नाम। २. अप्सराओं का एक गण। ३. बिजली का प्रकाश या दीप्ति।

विद्युत्प्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] काँसा नामक धातु या उसका कोई बरतन, जिसकी ओर बिजली जल्दी खिँचती है।

विद्युत्य
वि० [सं०] विद्युत् या बिजली से उत्पन्न।

विद्युत्वत्
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसमें विद्युत् हो। जैसे, बादल। (को०)। २. मेघ। बादल।

विद्युत्वान् (१)
संज्ञा पुं० [सं० विद्युत्वत्] १. एक पर्वत। २. बादल। मेघ [को०]।

विद्युत्वान् (२)
वि० १. बिजली के समान चमकीला। २. बिजली के समान क्षणिक [को०]।

विद्युदक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक दैत्य का नाम।

विद्युदुन्मेष
संज्ञा पुं० [सं०] बिजली की चमक। विद्युत्कंप [को०]।

विद्युद्गौरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] शक्ति की एक मूर्ति का नाम।

विद्युद्दाम
पुं० [सं० विद्युद्दामन्] वक्रगति युक्त बिजली की कौंध या चमक। विद्युल्लता। विद्युल्लेखा। उ०—दुहार विद्युद्दाम चढ़ा द्रुत, इंद्रधनुष की कर टंकार।—पल्लव, पृ० ९२।

विद्युद्द्योत
संज्ञा पुं० [सं०] बिजली की चमक या कौंध [को०]।

विद्युद्ध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक असुर का नाम। २. दे० 'विद्युत्पताक'।

विद्युद्वर्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अप्सरा [को०]।

विद्युद्वल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] बिजली की कौंधा। विद्युल्लता [को०]।

विद्युन्मापक
संज्ञा पुं० [सं० विद्युत् + मापक] एक विशेष प्रकार का यंत्र जिससे यह जाना जाता है कि विद्युत् का बल कितना और प्रवाह किस ओर है।

विद्युन्माल
संज्ञा पुं० [सं०] १. रामायण के अनुसार एक बंदर का नाम। २. दे० 'विद्युन्माला'।

विद्यु्न्माला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बिजली का समूह या सिलसिला। २. एक यक्षिणी का नाम। ३. एक छंद जिसके प्रत्येक चरण में आठ आठ गुरु वर्ण अथवा दो मगण और दो गुरु वर्ण (म म ग ग) होते हैं और चार वर्णीं पर यति होती है। उ०— मैं मागों गोपी सो दाना। भागी बोली नाहीं काना। कारी सारी ताही माला। भासी मोही विद्युन्माला।—जगन्नाथ (शब्द०)।

विद्युन्माली
संज्ञा पुं० [सं० विद्युन्मालिन्] १. पुराणानुसार एक राक्षस का नाम। उ०—विद्युत्माली रजनिचर, हन्यो सुषेणहिं बान। मारि सुषेणहुँ शृंग इक, तोस्रो वाकर यान।—रघुराज (शब्द०)। विशेष—इसने शिव की भक्ति करके सोने का एक विमान प्राप्त किया था और उसी विमान पर चढ़कर यह सूर्य के पोछे पीछे घूमा करता था। इससे रात के समय भी उस विमान में अंधकार नहीं हाने पाता था। इससे घबराकर सूर्य ने अपने तेज से वह विमान गलाकर जमीन पर गिरा दिया था। रामायण में कहा है कि धर्म के पुत्र सुषेण के साथ इसका युद्ध हुआ था। २. महाभारत के अनुसार एक असुर का नाम। ३. एक छंद का नाम जिसके प्रत्येक चरण में एक भगण, एक मगण ओर अंत में दो गुरु होते हैं। ४. एक प्रकार के देवता (को०)। ५. एक विद्याधर का नाम (को०)।

विद्युन्मुख
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार के उपग्रह।

विद्युल्लक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] अथर्ववेद का ५९ वाँ परिशिष्ट [को०]।

विद्युल्लता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विद्युत्। बिजली। उ०—नीरव विद्- युल्लता आज लंका पर टूटा।—सकित, पृ० ४०८।

विद्युल्लेखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक वृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरण मे दो मगण होत है। इसे शेषराज भी कहते है। उ०— मैं माटी खाई। झूठे ग्वाला माई। मू बायो मा देखा। जोती विद्युल्लेखा।—जगन्नाथ (शब्द०)। २. विद्युत्। बिजली का कौंध। बिजली।

विद्युल्लोचन
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की समाधि [को०]।

विद्युल्लोचना
संज्ञा पुं० [सं०] एक नागकन्या [को०]।

विद्येश
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

विद्येश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव। २. शव मतानुसार एक उन्नत योनि। ३. एक ऐंद्रजालिक [को०]।

विद्योत (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विद्युत्। बिजली। २. प्रभा। दीप्ति। चमक। ३. एक अप्सरा का नाम।

विद्योत (२)
वि० चमकीला। प्रकाशमान [को०]।

विद्योतक
वि० [सं०] द्योतित करनेवाला। दीप्त करनेवाला [को०]।

विद्योतन (१)
वि० [सं० स्त्री० विद्योतिनी] १. प्रकाश करनेवाला। चमकानेवाला। २. उदाहरण के साथ निरूपण करनेवाला। व्याख्याता [को०]।

विद्योतन (२)
संज्ञा पुं० बिजली [को०]।

विद्योती
वि० [सं० विद्योतिन्] [वि० स्त्री० विद्योतिनी] द्योतित करनेवाला। व्यक्त वा प्रकाशित करनेवाला [को०]।

विद्योपयोग
संज्ञा पुं० [सं०] प्राप्त ज्ञान को प्रयोग में लाना या विद्या- दान करना।

विद्योपार्जन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विद्यार्जन'।

विद्योपार्जित
वि० [सं०] जिसे विद्या द्वारा अर्जित किया जाय। जैसे, विद्योपार्जित धन।

विद्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. छिद्र। छेद। २. फाड़ना। खंड खंड करना। छेद करना (को०)।

विद्रध (१)
वि० [सं०] १. मोटा ताजा। २. द्दढ़। मजबूत। पक्का। ३. जो किसी काम के लिये अच्छी तरह तैयार हो।

विद्रध (२)
संज्ञा पुं० एक फोड़ा। दे० 'विद्रधि'।

विद्रधि
संज्ञा पुं०, स्त्री० [सं०] पेट के अंदर का एक प्रकार का फोड़ा जो बहुत घातक होता है। यौ०—विद्रधिघ्न। विद्रधिनाशन = सिहिजन।

विद्रधिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का छोटा फोड़ा जो प्रमेह रोग के बहुत दिनों तक रहने के कारण होता है।

विद्रधिघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] शोभांजन। सहिजन।

विद्रम पु
संज्ञा पुं० [सं० विद्रुम] दे० 'विद्रुम'। उ०—गति गयंद जँघ केलिप्रभ केहरि जिमि कटि लंक। हरो डसण, विद्रम अधर, मारू भृकुटि मयंक।—ढोला०, दू० ४५४।

विद्रव
संज्ञा पुं० [सं०] १. पलायन। भागना। २. बुद्घि। अक्ल। ३. नाश। ४. भय। आतंक। घबराहट। डर। ५. युद्ध। लड़ाई। ६. प्रवाह। बहना। ७. पिघलना। द्रवीभूत होना। ८. निंदा। शिकायत।

विद्रवण
संज्ञा पुं० [सं०] १. पलायन। भागना। २. पिघलना। गलाना [को०]।

विद्रवित
वि० [सं० वि + द्रवित] १. भागा हुआ। पलायित। २. छितराया या बिखरा हुआ। ३. जो द्रवित हो चुका हो। उ०— कितु कौन तुम, मौन ज्योति विद्रवित जलद से।—रजत०, पृ० ६७।

विद्राण
वि० [सं०] सुप्ति से जाग्रत अवस्था में लाया हुआ। [को०]।

विद्राव
संज्ञा पुं० [सं०] १. बहना। क्षरण। २. पिघलना। गलना। ३. पलायन। 'विद्रव'।

विद्रावक
वि० [सं०] १. भगानेवाला। २. द्रवित करनेवाला [को०]।

विद्रावण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. भगाना। पराजित करना। २. पिघलाना। ३. गलाना। ४. उड़ाना। ५. फाड़ना। ६. वह जो नष्ट करता हो। ७. एक दानव का नाम।

विद्रावण (२)
वि० आतंकित करनेवाला। भगानेवाला। घबरा देनेवाला। जैसे—महामोह विद्रविण।

विद्राविणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कौवाठोंठी।

विद्रावित
वि० [सं०] १. खदेड़ा या भगाया हुआ। डराया हुआ। २. फैलाया या बिखराया हुआ। तितर बितर किया हुआ। ३. पिघलाया या गलाया हुआ [को०]।

विद्रावी
संज्ञा पुं० [सं० विद्राविन्] १. भागनेवाला। २. भगानेवाला। ३. गलनेवाला। ४. फाड़नेवाला।

विद्राव्य
वि० [सं०] १. जिसका विद्राव करणीय हो। भगाने के लायक। २. पिघलाने या गलाने योग्य [को०]।

विद्रुत (१)
वि० [सं०] १. भागा हुआ। २. गला हुआ। ३. पिघला हुआ। ४. आतकित। भयभीत (को०)। ५. नष्ट (को०)।

विद्रुत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. युद्ध का एक विशेष ढंग। २. उड़ान [को०]।

विद्रुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भागना। २. गलना। ३. पिघलना। ४. नष्ट होना।

विद्रुधि
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'विद्रधि'।

विद्रुम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रवाल। मूँगा। २. मुक्ताफल नामक वृक्ष। ३. वृक्ष का नया पत्ता। कोंपल। ४. एक पहाड़ का नाम (को०)।

विद्रुम (२)
वि० द्रुमहीन [को०]।

विद्रुमच्छवि
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

धिद्रु मदंड
संज्ञा पुं० [सं०] मुक्ताफल या रत्नवृक्ष की शाखा [को०]।

विद्रुमफल
संज्ञा पुं० [सं०] कुंदुरु नामक सुगंधित गोद।

विद्रुमलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नलिका या नली नामक गंधद्रव्य। २. मूँगा।

विद्रुमलतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विद्रुमलता' [को०]।

विद्रूप
संज्ञा पुं० [सं०] पारहास। व्यंग्य। मजाक। ठठ्ठा। उ०— प्रगतिशील साहित्य के मानदंड पुस्तक में डा० रांगेय राघव का यह आक्रोश भरा विद्रूप।—हिंदी आ०, पृ० १२।

विद्रोह
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी के प्रति होनवाला वह द्वेष या आचरण जिससे उसको हानि पहुँचे। २. राज्य मे होनेवाला भारी उपद्रव जो राज्य को हानि पहुँचाने या नष्ट करने के उद्देश्य सो हो। क्रांति। बलवा। बगावत।

विद्रोही
वि, संज्ञा पुं० [सं० विदोहिन्] [स्त्री० विद्रोहिणी] १. जो किसी के प्रति विद्राह या द्वेष करता हो। २. राज्य का अनिष्ट करनेवाला। बागी।

विद्वज्जन
संज्ञा पुं० [सं० विद्वत् + जन] १.विद्वन् या कुशल व्यक्ति। २. संत। तपस्वी ऋषि (को०)।

विद्वत्
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम। यौ०—विद्वत्कल्प = जो विद्वान् न हो। कम पढ़ा लिखा। विद्वज्जन। विद्वत्तम = (१) शिव। (२) विद्वानों में श्रेष्ठ। महान् विद्वान्। विद्वद्देश्य। विद्वद्देशीय = विद्वत्कल्प।

विद्वत्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] बहुत अधिक विद्वान् होने का भाव। पांडित्य।

विद्वत्व
संज्ञा पुं० [सं०] बहुत अधिक विद्वान् होने का भाव। विद्वत्ता। पांडित्य।

विद्वद्देशीय
वि० [सं०] विद्वत्कल्प। कम शिक्षित [को०]।

विद्वान् (१)
संज्ञा पुं० [सं० विद्वस्] १. वइ जो आत्मा का स्वरूप जानता हो। २. वह जिसने बहुत अधिक विद्या पढ़ी हो। पंडित। ३. वह जो सब कुछ जानता हो। सर्वज्ञ।

विद्वान् (२)
वि० १. ज्ञाता। जानकार। २. बुद्धिमान्। पंडित। विद्यायुक्त।

विद्विट् (१)
संज्ञा पुं० [सं० विद्विष] शत्रु [को०]।

विद्विट् (२)
वि० द्वेषी। द्वेष रखनेवाला [को०]।

विद्विष
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो विद्वेष या शत्रुता करता हो। शत्रु। दुश्मन।

विद्विषाण
वि० [सं०] द्वेष या शत्रुता करनेवाला [को०]।

विद्विष्
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'विद्विष'।

विद्विष्ट
वि० [सं०] १. जिसके साथ विद्वेष या शत्रुता की जाय। द्वेष का पात्र या भाजन। २. घृणित। कुत्सित (को०)।

विद्विष्टता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विद्विष्ट होने का भाव।

विद्विष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] विद्वेष। शत्रुता। दुश्मनी।

विद्वेष
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रुता। दुश्मनी। वैर। द्वेष। २. अभि- मत वा ईप्सित की प्राप्ति होने पर भी उद्धत गर्व या मान के कारण अनादर या घृणाभाव (को०)।

विद्वेषक
वि० संज्ञा पुं० [सं०] वह जो विद्वेष करता हो। द्वेषी शत्रु। बैरी।

विद्वेषण
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० विद्वेषणी] १. शत्रुता। दुश्मनी। बैर। २. तंत्र के अनुसार एक प्रकार की क्रिया जिसके द्वारा दो व्यक्तियों में द्वेष या शत्रुता उत्पन्न की जाती है। ३. वह जो द्वेष करता हो। शत्रु। बैरी। ४. सज्जनता का उल्टा। दुष्टता।

विद्वेषणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रोषपूर्ण स्वभाव की स्त्री। कोपना स्त्री। २. द्वेष या बैर रखनेवाली औरत [को०]।

विद्वेषिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार दुःसह नामक यक्ष की आठवीं और अंतिम कन्या जो निर्याष्टि के गर्भ से उत्पन्न हुई थी। विशेष—कहते हैं, यही लोगों में द्वेष उत्पन्न करती है। इसे शांत करने के लिये दूध, शहद और घी में मिले हुए तिलों से होम आदि करने का विधान है। २. दे० 'विद्वेषणी'।

विद्वेषिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] शत्रुता। शात्रव भाव। दुश्मनी [को०]।

विद्वेषी
संज्ञा पुं० [सं० विद्वेषिन्] [स्त्री० विद्वेषिणी] १. वह जो विद्वेष करता हो। द्वेषी। २. शत्रु। बैरी।

विद्वेष्टा
संज्ञा पुं० [सं० विद्वेष्टृ] १. वह जो विद्वेष करता हो। २. शत्रु। बैरी।

विद्वेष्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. जिसके साथ विद्वेष किया जाय। द्वेष का पात्र या भाजन। २. कंकोल।

विधंस पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० विध्वंस] विध्वंस। नाश। उ०—माया कंस विधंस मुरारी। दारिद बारिद प्रबल बयारी।—रघुराज (शब्द०)।

विधंस (२)
वि० विध्वस्त। नष्ट। विनष्ट।

विधंसना पु ‡
क्रि० स० [सं० विध्वंसन] नष्ट करना। बरबाद करना। उ०—चाँद सुरज सौं होइ विवाहू। बारि विधंसब, बेधव राहु।—जायसी (शब्द०)।

विध पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० विधि] विधि। ब्रह्मा। उ०—नैन की कोर ते नेह कियो विध डील की छाँह ते शील सँवारी।—हृदय० (शब्द०)।

विध (२)
संज्ञा स्त्री० दे० 'बिध'।

विध (३)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रकार। किस्म। २. ढंग। रीति। रूप। ३. प्रकार। तरह। किस्म। ४. हाथियों का आहार। ५. समृद्धि। वैभव। ६. छेदन [को०]।

विधत्री
संज्ञा स्त्री० [सं० विधात्री] ब्रह्मा की शक्ति, महासरस्वती।

विधन
वि० [सं०] जिसके पास धन न हो। निर्धन। गरीब।

विधनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विधन होने का भाव। निर्धनता। गरीबी।

विधना (१)
क्रि० स० [सं० विधि] १. प्राप्त करना। अपने साथ लगाना। ऊपर लेना। २. वेधन करना। वेधना। उ०—(क) लए फँदाह बिहंग मानो मदन व्याध विधए।—सूर (शब्द०)। (ख) थाके सूर पथिक मग मानो मदन व्याधि विधए री।— सूर। (शब्द०)।

विधना (२)
क्रि० अ० १. बिंधा जाना। विद्ध होना। २. उलझना। फँसना। दे० 'बिंधना'।

विधना (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० विधि] वह जो कुछ होने को हो। भवित- व्यता। होनी।

विधना (४)
संज्ञा पुं० विधि। ब्रह्मा। उ०—विधना ऐसी रैन कर भोर कभी ना होय।—(शब्द०)।

विधनुष्क
वि० [सं०] धनुष से रहित। धनुषहीन [को०]।

विधन्वा
वि० [सं० विधन्वन्] दे० 'विधनुष्क'।

विधमन
संज्ञा पुं० [सं०] १. धौंकनी या नल आदि के द्वारा हवा पहुँचाकर आग सुलगाना। धौंकना। विधूनन। उड़ाना। २. अग्नि आदि। बुझाना। नष्ट करना (को०)।

विधमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक राक्षसो [को०]।

विधर †
क्रि० वि० [पुं० हिं०] दे० 'उधर'। उ०—जैसे रथ के घोड़े बाग के आश्रय जिधर ले जाते हैं, विधर जाता है।—यमुना- शंकर (शब्द०)।

विधरकता †
संज्ञा स्री० [हिं० बेधड़क + ता (प्रत्य०)] निर्भयता। उ०—या प्रकार बोहोत ही आर्ति सों श्री गुसाईं जी सो हरिदास की बेटी ने प्रार्थना करि कै अपनी सास तै विधरकता सों बाली।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २५५।

विधरण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पकड़ना। रोकना। २. दे० 'विधृत'।

विधरण (२)
वि० पकड़नेवाला। रोकने या रुद्ध करनेवाला [को०]।

विधर्ता
वि०, संज्ञा पुं० [सं० विधर्तृ] व्यवस्था करनेवाला। सँभाल करनेवाला। प्रबंधक [को०]।

विधर्म (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अपने धर्म को छोड़कर और किसी का धर्म। पराया धर्म। २. अन्याय। अधर्म (को०)। ३. अपने धर्म को छोड़तर दूसरे का धर्म ग्रहण करना, जो पाँच प्रकार के अधर्मीं में से एक कहा गया है।

विधर्म (२)
वि० [सं०] १. जिसकी धर्मशास्त्र में निंदा की गई हो। २. जिसमें गुण न हो। गुणहीन।

विधर्मक
वि० [सं०] दे० 'विधर्मिक'।

विधर्मा
वि० [सं० विधर्मन्] अनुचित या गलत कार्य करनेवाला। अन्यायकारी [को०]।

विधर्मिक
वि० [सं०] १. जो धर्मविरुद्ध आचरण करता हो। २. जो दुसरे धर्म का अनुयायी हो।

विधर्मी
वि० [सं० विधर्मिन] १. जो अपने धर्म के विपरीत आचरण करता हो। धर्मभ्रष्ट। २. जो किसी दूसरे धर्म का अनुयायी हो। ३. विभिन्न प्रकार का (को०)।

विधवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. कंपन। २. हिलाना [को०]।

विधवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पति मर गया हो। पति- हीन स्त्री। रड़ि। बेवा। उ०—(क) सुत वधू विधवा सों बोलि कै सुनायो लेहु धनपति गेह श्री गुपाल भरतार है।—नाभा (शब्द०)। (ख) ब्राह्मण विधवा नार सुर गुरु अंश चुरावहीं। कहैं न वचन विचार, परै सोई निरश्वास मँह।—विश्राम (शब्द०)। विशेष—स्मृतियों में विधवा स्त्रियों के लिये ब्रह्मचर्य तथा कठिन कठिन नियमो का पालन विधेय है। जैसे,—तांबूल और मद्य- मांस आदि का त्याग। द्विजातियों में विधवा के लिये पुनर्विवाह का नियम नहीं है। केवल पराशर संहिता में यह कहा गया है कि स्वामी के नष्ट अर्थात् लापता होने, मरने, अथवा संन्यासी, क्लीव या पतित होने पर स्त्री दूसरा पति कर सकती है। पर और स्मृतियों के साथ अविरोध सिद्ध करने के लिये पंडित लोग 'अन्य पति' शब्द का अर्थ 'दूसरा पालनकर्ता' किया करते हैं।

विधवागामी
संज्ञा पुं० [सं० विधवागामिन्] विधवा स्त्री के साथ यौन संबंध रखनेवाला व्यक्ति। विधवा का जार [को०]।

विधवापन
संज्ञा पुं० [सं० विधवा + हिं० पन (प्रत्य०)] विधवा होने की अवस्था। वह अवस्था जिसमें पति के मरने के कारण स्त्री पतिहीन हो जाती है। रँड़ापा। वैधव्य। उ०—लिख्यो न विधि मिलिबे तिहि मोंही। प्राणजई विधवापन तोही।—रघुराज (शब्द०)।

विधवाविवाह
संज्ञा पुं० [सं०] विधवा स्त्री के साथ विवाह करना।

विधवावेदन
संज्ञा पुं० [सं० विधवा + आवेदन] दे० 'विधवाविवाह'।

विधवाश्रम
संज्ञा पुं० [सं० विधवा + आश्रम] विधवाओं के रहने का स्थान। अनाथ विधवाओं का शरणगृह। वह स्थान जहाँ विध- वाओं के पालन पोषण तथा शिक्षा आदि का प्रबंध किया जाता है। उ०—इन बालिकाओं के लिये अध्यापक कर्वे ने पूना में 'अनाथ विधवाश्रम' खोला है।—सरस्वती (शब्द०)।

विधव्य
संज्ञा पुं० [सं०] कंपन। थरथराहट। विक्षोभ [को०]।

विधस
संज्ञा पुं० [सं०] मोम।

विधस्
संज्ञा पुं० [सं०] सृष्टिकर्ता। ब्रह्मा [को०]।

विधाँसना पु †
क्रि० सं० [सं० विध्वंसन] १. नष्ट करना। बरबाद करना। उ०—(क) औ जोबन मैमंत विधाँसा। बिचला बिरहबिरह लै नासा।—जायसी (शब्द०)। (ख) भएउ जूझ जस रावन रामा। सेज विधाँस, बिरह सग्रामा।—जायसी (शब्द०)। २. अस्तव्यस्त करना। इधर उधर करना। गड़बड़ कर देना।

विधा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. माध्यम। रीति। रूप। ढंग। २. प्रकार। तरह। किस्म। ३. हाथी घोड़े आदि का चारा। ४. समृद्धि। संपन्नता। ५. वेधन कर्म। छेदना। ६. उच्चारण। ७. पारिश्रमिक। मजदूरी। ८. व्यवहार। आचरण। क्रिया। चेष्टा [को०]।

विधातव्य
वि० [सं०] १. विधान के योग्य। विधेय। २. करने योग्य। कर्तव्य।

विधाता (१)
संज्ञा पुं० [सं० विधातृ] [स्त्री० विधात्री] १. विधान करनेवाला। रचनेवाला। बनानेवाला। २. उत्पन्न करनेवाला। तैयार करनेवाला। उ०—विद्या वारिध बुद्धि विधाता।— तुलसी (शब्द०)। ३. व्यवस्था करनेवाला। प्रबंध करनेवाला। इंतजाम करनेवाला। ठीक तरह से लगानेवाला। उ०—ए गोसाइँ ! तू ऐस विधाता। जावत जीव सबन्ह भुकदाता।—जायसी (शब्द०)। ४. सृष्टि बनानेवाला। जगत् की रचना करनेवाला। सृष्टिकर्ता। ब्रह्मा या ईश्वर। उ०—कुछ संदेह नहीं कि विधाता ने मुझे अत्यंत सुकुमारी बनाया है।—ताताराम (शब्द०)। ५. वितरण करने वा देनेवाला। दाता (को०)। ६. दैव। भाग्य। किस्मत (को०)। ७. विश्वकर्मा (को०)। ८. कामदेव (को०)। ९. मदिरा। शराब। (स्त्रीलिंग में भी प्रयुक्त)। १०. माया (को०)।

विधातृका
संज्ञा स्त्री० [सं०] विधान करनेवाली। विधात्री।

विधातृभू
संज्ञा पुं० [सं०] नारद का एक नाम जो विधाता के पुत्र हैं [को०]।

विधात्रायु
संज्ञा पुं० [सं० विधात्रायुस्] १. सूर्यमुखो का फूल। २. सूर्य की ज्योति। सूर्यप्रभा [को०]।

विधात्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विधान करनेवाली। रचनेवाली। बनानेवाली। २. व्यवस्था करनेवाली। प्रबंध करनेवाली। ३. पिप्पली। पीपल। ४. माता। जननी। ५. सरस्वती। शारदा। उ०—सती विधात्री इंदिरा देखी अमित अनूप। जेहि जेहि वेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप।—मानस, १।५४।

विधान
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी कार्य का आयोजन। काम का होना या चलना। विन्यास। संपादनक्रम। अनुष्ठान। जैसे— जो कुछ करना है, उसी का विधान अब होना चाहिए। क्रि० प्र०—करना।—होना। २. व्यवस्था। प्रबंध। इंतजाम। बंदोबस्त। जैसे,—पहले ही से ऐसा विधान करो कि कार्य आरंभ करने में देर न हो। ३. कार्य करने की रीति। विधि। प्रणाली। पद्धति। जैसे— शास्त्रों में ऐसा विधान है। उ०—तुम विज्ञ विविध विधान।— केशव (शब्द०)। ४. रचना। निर्माण। ५. ढंग। तरकीब। उपाय। युक्ति। जैसे—कोई ऐसा विधान निकालो कि कार्य निर्विघ्न हो जाय। ६. उतना चारा जितना हाथी एक बार मुँह में डालता है। हाथी का ग्रास। ७. हानि पहुँचाने का दाँवपेंच। शत्रुता का आचरण। ८. प्रेरण। भेजना। ९. अनुमति देने का कार्य। आज्ञा करना। १०. धन संपत्ति। ११. पूजा। अर्चन। १२. नाटक में वह स्थल जहाँ किसी वाक्य द्वारा एक साथ सुख और दुःख प्रकट किया जाता है। जैसे,—'बाल्यकाल ही में तुम्हारा ऐसा उत्साह देख मुझे हर्ष और विषाद दोनों होते हैं। १३. पीड़ा। वेदना। संताप (को०)। १४. प्राप्ति। लाभ (को०)। १५. प्रतिकार (को०)। १६. वेद (को०)। १७. भाग्य। दैव (को०)। १८. उपसर्ग या प्रत्यय का योग (को०)। १९. नियम। कानून (को०)।

विधानक
संज्ञा पुं० [सं०] १. विधान। विधि। २. विधानवेत्ता। विधि या रीति जाननेवाला। ३. कष्ट। पीड़ा (को०)।

विधानग
संज्ञा पुं० [सं०] १. विधान का ज्ञाता। पंडित। २. आचार्य। अध्यापक [को०]।

विधानज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] १. विधान का ज्ञाता। २. अध्यापक। आचार्य [को०]।

विधानपरिषद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यवस्थापिका सभा। प्रांत में सुचारु रूप से व्यवस्था के लिये विधान या कानून बनानेवाली सभा।

विधानयुक्त
वि० [सं०] विधिविहित। विधि के अनुकूल [को०]।

विधानविधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] रचना। वाक्यविन्यास। वाक्य रूप या आकार प्रकार। (अ० फार्म) उ०—विधानविधि का भेद ऊपर सूचित किया गया।—चिंतामणि, भा० २, पृ० १३९।

विधानव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य का एक व्रत। दे० 'विधानसप्तमी व्रत' [को०]।

विधानशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यवस्था शास्त्र। आईन। २. नीतिशास्त्र [को०]।

विधानसप्तमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] माघ शुक्ला सप्तमी।

विधानसप्तमी व्रत
संज्ञा स्त्री० [सं०] सूर्य का एक व्रत जो माघ शुक्ला सप्तमी को आरंभ करके साल भर तक (पौष तक) किया जाता है। इसमें सूर्य का पूजन होता है।

विधानापहार
संज्ञा पुं० [सं०] विधान का अपहरण करना। निषेध को विधि के रूप में लाना। उ०—विधानापहार—विधान को बदल देना अर्थात् निषेध को विधि रूप में कहना।—संपूर्णा० अभि० ग्रं०, २६३।

विधानिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वृहती।

विधानी
संज्ञा पुं० [सं० विधान + ई (प्रत्य०)] १. विधान का जानने- बाला। विधानज्ञ। २. विधिपूर्वक कार्य करनेवाला।

विधानीक पु
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का डिंगल छंद। उ०— तुक तुक में क्रम सों तवै, अवर अवर विध जांण। सझ चौथी तुक नाम सों विधानीक बाँखाण।—रघु० रू०, पृ० २४६।

विधायक
वि, संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० विधायिका] १. विधान करनेवाला। कार्य करनेवाला। २. बनानेवाला। रचनेवाला। संस्थापक। उ०—हे विरंचि तैं विश्वविधायक।—रघुराज(शब्द०)। ३. व्यवस्था करनेवाला। प्रबंध करनेवाला। व्यवस्था देनेवाला। प्रस्तुत करनेवाला। उ०—मंगल मूरति सिद्ध विधायक।—शंकर दि (शब्द०)। ४. विधाननिर्माता। कानून बनानेवाला (आधु०)। ५. रचनात्मक।

विधायिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विधायक'।

विधायी
वि० [सं० विधायिन्] १. विधानकर्ता। २. व्यवस्थापक। ३. नियामक। दे० 'विधायक' [को०]।

विधायिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संस्थापिका। २. निर्माञी [को०]।

विधारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. सँभालना। रोकना। २. वहन करना। ढोना। ३. वह जो अलग करे। पृथक्कर्ता [को०]

विधारा
संज्ञा पुं० [सं० वृद्ध + दारु] एक प्रकार की लता जो दक्षिण भारत में बहुतायत से होती है। विशेष—इसका झाड़ बहुत बड़ा और इसकी शाखाएँ बहुत घनी होती हैं। इसकी डालियों पर गुलाब के से काँटे होते हैं। पत्ते तीन अंगुल लंबे अंडाकार और नोकदार होते हैं। डालियों के सिरे पर चमकदार पीले फूलों का गुच्छा होता है। वैद्यक में इसे गरम, मधुर,मेधाजवक, अग्निप्रदीपक, धातुवर्धक और पुष्टिदायक माना है। उपदंश, प्रमेह, क्षय० वातरक्त आदि में इसे ओषाधि की भाँति व्यवहार में लाते हैं। पर्या०—जीर्णदारु। वृद्धदारु। बृद्धदारुक। गर्भवृद्धि।

विधि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कोई कार्य करने की रीति। कार्यक्रम। प्रणाली। ढंग। नियम। कायदा। जैसे—पूजा की विधि, यज्ञ की विधि। २. व्यवस्था। संगति। योजना। करीना। मेल या सिलसिला। मुहा०—विधि बैठना = (१) परस्पर अनुकूलता होना। मेल बैठना। मेल खाना। व्यवहार निभना। जैसे,—हमारी उनकी विधि नहीं बैठेगी। (२) सब बातों का ठीक होना। इच्छानुकूल व्यवस्था होना। जैसे,—फिर क्या है, तुम्हारी विधि बैठ गई। ३. किसी शास्त्र या ग्रंथ में लिखी हुई व्यवस्था। शास्त्रोक्त विधान। मुहा०—कुंडली की विधि मिलना = कुंडली में लिखी बात का पूरा होना। फलित ज्योतिष द्वारा बताई हुई बात का ठीक घटना। ४. किसी शास्त्र या धर्मग्रंथ में किया हुआ कर्तव्यनिर्देश। कर्म के अनुष्ठान की आज्ञा या अनुमति। शास्त्र में इस प्रकार का कथन कि मनुष्य यह काम करे। विशेष—किसी काम को करने की आज्ञा को 'विधि' और न करने की आज्ञा को 'निषेध' कहते हैं। पूर्वमीमांसा में नियोग का नाम विधि है। अर्थात् जो वाक्य किसी इष्ट फल की प्राप्ति का उपाय बताकर उसे करने की प्रवृत्ति उत्पन्न करे, वही विधि है। जैसे,—'स्वर्ग चाहनेवाला यज्ञ करे'। विधि दो प्रकार की कही गई है—प्रधान विधि और अंग विधि। फल देनेवाली संपूर्ण क्रिया के आदेश करनेवाले वाक्य को 'प्रधान विधि' कहते हैं। जैसे,—'जिसे पुत्र की कामना हो, वह पुत्रेष्टि करे'। प्रधान क्रिया के अंतर्गत होनेवाली छोटी छोटी क्रियाओं के निर्देश को 'अंग- विधि' कहते हैं। जैसे,—'चावल से यज्ञ करे, दधि का हवन करे, इत्यादि। यौ०—विधि निषेध = किसी काम को करने और न करने की शास्त्रीय आज्ञा। उ०—विधिनिषेध मय कलिमल हरनी।—तुलसी (शब्द०)। ५. व्याकरण में क्रिया का वह रूप जिसके द्वारा किसी को कोई काम करने का आदेश किया जाता है। जैसे,—यह काम करो या काम करना चाहिए। यह लिङ्लकार में होता है और इसके दो भेद हैं। एक विधिलिङ् दूसरा आशिष् लिङ्। ६. साहित्य में एक अर्थालंकार जिसमें किसी सिद्ध विषय का फिर से विधान किया जाता है। जैसे—वर्षा काल के ही मेघ मेघ हैं। ७. आचार व्यवहार। चालढाल। यौ०—गतिविधि = चेष्टा और कार्रवाई। जैसे,—उसकी गतिविधि पर ध्यान रखना। ८. भाँति। प्रकार। किस्म। तरह। उ०—एहि विधि राम सबहिं समुझावा।—तुलसी (शब्द०)। ९. प्रयोग (को०)।

विधि (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सृष्टि का विधान करनेवाला। ब्रह्मा। उ०—विधि करतब सब उलटे अहुहीं।—तुलसी (शब्द०)। २. भाग्य। दैव (को०)। ३. विष्णु (को०)। ४. अग्नि (को०)। ५. समय (को०)। ६. हाथियों का खाद्य या चारा (को०)। ७. चिकित्सक। वैद्य (को०)। ८. कर्म (को०)। १०. यज्ञ नियमों का उपदेशक ग्रंथ (को०)।

विधिकर
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] नौकर। दास। आज्ञाकारी। सेवक [को०]।

विधिकृत्
वि संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विधिकर'।

विधिघ्न
वि० [सं०] नियमों का उल्लंघन करनेवाला। विधि को न माननेवाला [को०]।

विधिज्ञ (१)
वि० [सं०] १. विधि को जाननेवाला। शास्त्रोक्त विधान को जाननेवाला। २. रीति जाननेवाला।

विधिज्ञ (२)
संज्ञा पुं० वह ब्राह्मण जो शास्त्रोक्त विधियों का पारगंत हो। शास्त्रवेत्ता। विद्वान् [को०]।

विधित्समान
वि० [सं०] करने या देने की इच्छा रखनेवाला। २. मतलबी।

विधित्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संपन्न करने या विधान करने की इच्छा। २. आयोजन [को०]।

विधित्सित (१)
वि० [सं०] जिसे करने की इच्छा की गई हो [को०]।

विधित्सित (२)
संज्ञा पुं० अभिप्राय। नीयत [को०]।

विधित्सु
वि० [सं०] करने की इच्छा रखनेवाला [को०]।

विधिदर्शक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विधिदर्शी' [को०]।

विधिदर्शी
संज्ञा पुं० [सं० विधिदर्शिन्] १. यज्ञ में यह देखने के लिये नियुक्त पुरुष कि होता, आचार्य आदि ठीक ठीक विधि के अनुकूल कर्म कर रहे हैं या नहीं। २. सदस्य।

विधिद्दष्ट
वि० [सं०] विधि के अनुकूल [को०]।

विधिदेशक
संज्ञा पुं० [सं०] १. सदस्य। दे० 'विधिदर्शी'। २. अध्यापक। आचार्य [को०]।

विधिद्वैध
संज्ञा पुं० [सं०] विधि या समादेश की विविधता। नियमों की भिन्नता [को०]।

विधिना
संज्ञा पुं० [सं० विधि हिं० + ना (प्रत्य०)] विधि। ब्रह्मा।

विधिनिषेध
संज्ञा पुं० [सं०] करणीय और अकरणीय कर्म का निर्देश।

विधिपत्त पु
संज्ञा पुं० [सं० विधि + पत्र, प्रा० विधि + पत्त] विधि का पत्र। भाग्यलेख। उ०—दिय दरिद्र मंगन वरहु को मेटै विधिपत्त।—पृ० रा०, ६१।५७८।

विधिपाट
संज्ञा पुं० [सं०] मृदंग के चार वर्णो में से एक वर्ण। चारों वर्ण ये हैं—पाट, विधिपाट, कूटपाट और खंडपाट।

विधिपुत्र
संज्ञा पुं० [सं० विघि + पु्त्र] ब्रह्मा के पुत्र, नारद।

विधिपुर
संज्ञा पुं० [सं० विधि + पुर] ब्रह्मा का लोक, ब्रह्मलोक। उ०—स्वर्ग लोक महँ बचब न देखी। बिधिपुर गयो त्राण निज लेखी।—रघुराज (शब्द०)।

विधिपूर्वक
अव्य० [सं०] नियम के अनुसार। 'विधिवत्' [को०]।

विधिप्रयोग
संज्ञा पुं० [सं०] विधि या नियम का प्रयौग [को०]।

विधिबोधित
वि० [सं०] शास्त्र विधि द्वारा बताया हुआ। शास्त्र संमत।

विधियज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] वह यज्ञ जिसके करने की विधि हो। जैसे,—दर्शपौर्णमास।

विधियोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. नियम का अनुसरण या पालन। २. भाग्य का प्रभाव [को०]।

विधिरानी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० विधि + हिं० रानी] ब्रह्मा की पत्नी, सरस्वती। उ०—बंदौ वाणी वीण कर विधिरानी विख्यात।— रघुराज (शब्द०)।

विधिलोक
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मलोक। सत्यलोक। २. शास्त्रीय विधानों का अभाव या न होना।

विधिलोप
संज्ञा पुं० [सं०] विधि या नियमों का तिरस्कार [को०]।

विधिवत्
क्रि० वि० [सं०] १. विधिपूर्वक। विधि से। पद्धति के अनुसार। कायदे के मुताबिक। २. जैसा चाहिए। उचित रूप से। यथायोग्य।

विधिवधू
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्रह्मा की पत्नी, सरस्वती।

विधिवशात्
अव्य० [सं०] भाग्यतः। भाग्य से। दैवयोग से।

विधिवाहन
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा की सवारी हंस।

विधिविपर्यय
संज्ञा पुं० [सं०] भाग्य का फेर। दुर्भाग्य [को०]।

विधिविहित
वि० [सं०] शास्त्र के अनुकूल। नियमानुकूल। [को०]।

विधिसेध
संज्ञा पुं० [सं०] विधि और निषेध।

विधिहीन
वि० [सं०] नियमशून्य। अशास्रीय। अविहित [को०]।

विधुंत पु
संज्ञा पुं० [सं० विधन्तुद] दे० 'विधुंतुद'।

विधुंतुद
संज्ञा पुं० [सं० विधुन्तुद] चंद्रमा को दुःख देनेवाला, राहु। उ०—ज्ञानराकेस ग्रासन विधुंतुद चलन काम करि मत्त हरि।— तुलसी (शब्द०)।

विधुंसन पु
क्रि० स० [सं० विध्वंसन]दे० 'विधाँसना'। उ०—पंड कोपियौ किनां धार पण, वीर भद्र दिख ज्याग विधुंसण—रा० रू०, पृ० ९५।

विधुंसना पु
क्रि० [सं० विध्वंसप] विध्वंस करना। नाश करना। उ०—ज्याग विधुंसे जावै।—रघु० रू०, पृ० ६४।

विधु
संज्ञा पुं० [सं०] १. चद्रंमा। २. वायु। ३. कपूर। ४. ब्रह्मा। ५. विष्णु। ६. एक राक्षस का नाम। ७. आयुध। ८. जलस्नान। ९. पापक्षालन। पाप छुड़ाना। प्रायश्चित्तपरक आहुति। १०. शिव (को०)। ११. युद्ध। लड़ाई (को०)। १२. काल। समय (को०)। १३. एक राजा का नाम (को०)।

विधुक्रांत
संज्ञा पुं० [सं० विधुक्रान्त] संगीत का एक ताल।

विधुक्षय
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा की कलाओं का नाश। असित पक्ष। कृष्ण पक्ष [को०]।

विधुत
वि० [सं०] १. त्यक्त। २. कंपित। दे० 'विधूत' [को०]।

विधुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] संक्षोभ। कंपन। विधूति [को०]।

विधुदार
संज्ञा पुं० [सं० विधु + दार] चंद्रमा की स्त्री। रोहिणी। उ०—तारा किधों बिधुदार किधों धृतधार सी पावक है परिरंभौ।—मन्नालाल (शब्द०)।

विधुदिन
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रवार। सोमवार [को०]।

विधुनन
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'विधूनन' [को०]।

विधुपंजर
संज्ञा पुं० [सं० विधुपञ्जर] खड्ग। खाँड़ा।

विधुपरिध्वंस
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रग्रहण [को०]।

विधुपिंजर
संज्ञा पुं० [सं०] [विधु + पिञ्जर] खड्ग। खाँड़ा [को०]।

विधुप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चंद्रमा की स्त्री, रोहिणी। २. कुमुदिनी। कोई।

विधुबंधु
संज्ञा पुं० [सं० विधुबन्धु] कुमुद का फूल।

विधुबंधुर पु
संज्ञा पुं० [सं० विधु + बन्धुर (= प्रिय)] कुमुद। उ०— विधुबंधुर मुख भा बड़ी वारिज नैन प्रभाति।—रामसहाय (शब्द०)।

विधुबैनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० विधु + वदन, प्रा० वयन] चंद्रमुखी। सुंदरी स्त्री। उ०—संग लिए बिधुबैनी बधू रति हू जोहि रंचक रूप दियो है।—तुलसी (शब्द०)।

विधुमंडल
संज्ञा पुं० [सं० विधुमण्डल] चंद्रमा की परिधि या परिवेश। चंद्रमंडल [को०]।

विधुमणि
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रकांत मणि [को०]।

विधुमास
संज्ञा पुं० [सं०] चांद्रमास। महीने की वह गणना जो कृष्ण प्रतिपदा से लेकर शुक्ल पूर्णिमा तक (१ मास) मानी जाती है।

विधुमुखी
संज्ञा स्त्री० [सं०]दे० 'विधुबदनी'।

विधुर (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० विधुरा] १. दुःखी। २. घबराया हुआ। ३. डरा हुआ। ४. विकल। व्याकुल। जैसे—विरह बिधुर। ५. असमर्थ। अशक्त। ६. परित्यक्त। शून्य। वंचित। ७. विमूढ़। ८. विरोधी (को०)। ९. एकाकी। अकेला। १०. (गाड़ी) जिसमें धुरा न हो (को०)।

विधुर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कष्ट। दुःख। २. वियोग। जुदाई। ३. अलग होने की क्रिया या भाव। ४. कैवल्य। मोक्ष। ५. शत्रु। दुश्मन। बैरी। ६. वह पुरुष जिसकी स्त्री मर गई हो [को०]।

विधुरा (१)
वि० स्त्री० [सं०] १. कातर। व्याकूल। पीड़ित। २. विधवा। पतिहीना।

विधुरा (२)
संज्ञा स्त्री० १. कानों के पोछे की एक स्नायु ग्रंथि जिसके पीड़ित या खराब होने से प्राणी बहरा हो जाता है। ३. दही की एक प्रकार की गाढ़ी लस्सी जिसे श्रीखंड भी कहते हैं। रसाला।

विधुरित
वि० [सं०] १. विवर्ण। मंदप्रभ। २. कपित [को०]।

विधुबदनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] चंद्रमा के समान मुखवाली स्त्री। सुंदरी स्त्री। उ०—विधुवदनी सब भाँति सँवारी। सोह न बसन बिना वर नारी।—तुलसी (शब्द०)।

विधुवन
संज्ञा पुं० [सं०] कंपन। हिलना [को०]।

विधूत
वि० [सं०] १. कंपित। काँपता हुआ। २. हिलता हुआ। डोलता हुआ। ३. त्यागा हुआ। छोड़ा हुआ। त्यक्त। ४. दूर किया हुआ। हटाया हुआ। ५. निकाला हुआ। बाहर किया हुआ।

वितधूकल्मष
वि० [सं०] दे० 'विधूतपाप्मा' [को०]।

विधूतकेश
वि० [सं०] जिसके बाल लहरा रहे हों [को०]।

विधूतनिद्र
वि० [सं०] सोते से जगाया हुआ [को०]।

विधूतपक्ष
वि० [सं०] जिसने अपने पखने हिलाए हों [को०]।

विधूतपाप्मा
वि० [सं० विधूतपाप्मन्] पाप से मुक्त। पापों से छुटकारा पाया हुआ [को०]।

विधूतबंधन
संज्ञा [सं० विधूतबन्धन] जिसने बंधन दूर कर दिया हो। बधनमुक्त।

विधूतवेश
वि० [सं०] जिसके वस्त्र लहरा या हिल रहे हों [को०]।

विधूति
संज्ञा स्त्री० [सं०] थरथरी। कँपकँपी। विक्षोभ [को०]।

विधूनन (१)
पुं० [सं०] कंपन। काँपना। विक्षोभ।

विधूनन (२)
वि० १. प्रतिघाती। विरोधक। विकर्षणशील। उ०—रस वास्तल्य करन अनुभव नित। विरह विधूनन हरि मुख नाम।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४८१।

विधूनित
वि० [सं०] १. क्षुब्ध। कंपित। उ०—हैं विटप विधूनित होते, है छिपता पुलिन दिखाता। पत्तों पर बूँद पतन का, हैं टप टप नाद सुनाता।—पारिजात, पृ० १२५। २. उत्पीड़ित।

विधूम
वि० [सं०] धूमरहित। बिना धुएँ का। उ०—जारि बारि कै विधूम वारिधि बुताई लूम।—तुलसी (शब्द०)।

विधूम्र
वि० [सं०] धूमिल या मटमैले रंग का। धूसर वणी।

विधूवन
संज्ञा पुं० [सं०] कंपन। काँपना।

विधृत (१)
वि० [सं०] १. धारण या ग्रहण किया हुआ। २. पृथक् वा वियुक्त किया हुआ। ३. उठाया हुआ। ४. अधिकृत। स्वायत्तीकृत। अपनाया हुआ। ५. अवरुद्ध। ६. समर्थित। ७. रखा हुआ। रक्षित [को०]।

विधृत (२)
संज्ञा पुं० १. असंतोष। २. आदेश की अवहेलना। आज्ञा न मानना [को०]।

विधुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पृथक्ता। अलगाव। विभाजन। २. व्यवस्था। नियमन। उ०—सत्ता और विधृति ये दोनों प्रतिष्ठा के रूप हैं।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ६२२।

विधेय
वि० [सं०] १. विधान के योग्य। जिसका विधान या अनुष्ठान उचित हो। जिसका करना उचित हो। कर्तव्य। २. जिसका विधान हो या होनेवाला हो। जो किया जाय या किया जानेवाला हो। ३. जो नियम या विधि द्वारा जाना जाय। जिसके करने का नियम या विधि हो। ४. वचन या आज्ञा के वशीभूत। अधीन। ५. वह (शब्द या वाक्य) जिसके द्वारा किसी के संबंध में कुछ कहा जाय। जैसे,—'गोपाल सज्जन है' इस वाक्य में 'सज्जन है' विधेय है; क्योंकि वह गोपाल के संबंध में कुछ विधान करता है, अर्थात् उसकी कोई विशेषता बताता है। विशेष—न्याय और व्याकरण में वाक्य के दो मुख्य भाग माने जाते हैं—उद्देश्य और विधेय। जिसके संबंध में कुछ कहा जाता है (अर्थात् कर्ता), वह उद्देश्य कहलाता है; और जो कुछ कहा जाता है, वह 'विघेय' कहलाता है। ६. आश्रित। निर्भर (को०)। ७. प्राप्य (को०)। ८. प्रज्वलित करने योग्य (को०)।

विधेय
संज्ञा पुं० १. वह जो किया जाना चाहिए। कर्तव्य कर्म। प्रतिज्ञा या प्रस्थापन की उक्ति। ३. सेवक। भृत्य [को०]।

विधेयक
संज्ञा पुं० [सं०] अधिपत्र। विधान लिपि। अधिनियम का प्रस्तावित एवं प्राथमिक रूप। (अं० बिल) उ०—गवर्मेंट आफ इंडिया विधेयक (बिल) पार्लमेंट में प्रेषित किया गया।—भारतीय०, पृ० २।

विधेयज्ञ
वि० [सं०] अपने कर्तव्य का ज्ञान रखनेवाला [को०]।

विधेयता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विधि की योग्यता। विधान का औचित्य। २. अधीनता। वश्यता।

विधेयत्व
संज्ञा पुं० [सं०] विधेयता।

विधेयवर्ती
वि० [सं० विधेयवर्तिन्] दूसरे की आज्ञा में रहनेवाला। अधीन। वश्य [को०]।

विधेयात्मा (१)
संज्ञा पुं० [सं० विधेयात्मन्] विष्णु [को०]।

विधेयात्मा (२)
वि० संयतात्मा। आत्मा को वश में रखनेवाला [को०]।

विधेयाविमर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] साहित्य में एक वाक्यदोष जो विधेय अंश को अप्रधान स्थान प्राप्त होने पर होता है। जो बात प्रधानतः कहनी है, उसका वाक्यरचना के बीच दबा रहना। विशेष—प्रत्येक वाक्य में विधेय की प्रधानता के साथ निर्देश होना चाहिए। ऐसा न होना दोष है। 'विधेय' शब्द के समास के बीच पड़ जाने से या विशेषण रूप से आ जाने पर प्रायः यह दोष होता है। जैसे,—किसी वीर ने खिन्न होकर कहा— 'मेरी इन व्यर्थ फूली हुई बाहों से क्या'। इस वाक्य में कहनेवाले का अभिप्राय तो यह है मेरी बाहें व्यर्थ फूली हैं; पर 'फूली हैं' के विशेषण रूप में आ जाने से विधेय की प्रधानता नहीं स्पष्ट होती। दूसरा उदाहरण—'मुझ रामानुज के सामने राक्षस क्या ठहरेंगे।' यहाँ कहना चाहिए था कि—'मैं राम का अनुज हुँ' तब राम के संबंध से लक्ष्मण की विशेषता प्रकट होती।

विधौत
वि० [सं०] धुला हुआ। धोकर निर्मल किया हुआ। उ०— कंठलग्न मुक्तामाला इव मंजुल सुरसरि धारा। होता है विधौत पग पावन पूत पयोनिधि द्वारा।—पारिजात, पृ० १०।

विध्यापन
संज्ञा पुं० [सं०] विकीर्ण करने या बिखेरनेवाला। तितर बितर करनेवाला [को०]।

विध्य
वि० [सं०] १. बिँधने योग्य। छिदने योग्य। २. जिसे बेधना हो। जो छेदा जानेवाला हो।

निध्यपराध
संज्ञा पुं० [सं०] विधि या नियम की अवहेलना [को०]।

विध्यपाश्रय
संज्ञा पुं० [सं०] विधि के अनुकूल आचरण [को०]।

विध्यलंकार
संज्ञा पुं० [सं० विध्यलङ्कार] एक काव्यालंकार जिसमें किसी सिद्ध बात का पुनर्विधान किया जाता है। दे० 'विधि'—६।

विध्यलंक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विध्यलंकार'।

विध्याभास
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक अर्थालंकार जिसमें घोर अनिष्ट की संभावना दिखाते हुए अनिच्छापूर्वक किसी बात की अनुमति दी जाती है। जैसे,—विदेश जाते हुए नायक के प्रति नायिका का यह कथन 'जाते हो तो जाओ' ! जहाँ जाते हो, मैं भी वहाँ जन्म लेकर पहुँचूँगी'।

विध्र पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० ब्रध्न ?] सूर्य। उ०—विध्र, विरोचन, विभावसु, मार्तंड, त्रयिअंग।—नंद० ग्रं०, पृ० ११२।

विध्र (२)
वि० सूर्य की तरह निर्मल। निर्दोष [को०]।

विध्वंस
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनाश। नाश। बरबादी। २. घृणा। ३. अनादर। ४. बैर। ५. वैमनस्य।

विध्वंसक
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाश करनेवाला। २. छिछोरा। लंपट (को०)। ३. शत्रुओं के समुद्री पोतों को नष्ट करनेवाला पोत या अस्त्रशस्त्र (आधुनिक)।

विध्वंसन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० विध्वंसित, विध्वस्त] ध्वंस करना। नाश करना। बरबाद करना।

विध्वंसात्मक
वि० [सं०] विध्वंस या विनाश करनेवाला। विनाशक। संहारक। उ०—यह समय भारत में ईसाइयत के प्रचार और (डेरोजीयनिज्म ऐसे) अति विध्वंसात्मक मतों के प्रसार का था।—हिं० का० प्र०, पृ० ३४।

विध्वंसित
वि० [सं०] विध्वंस किया हुआ। नष्ट किया हुआ। बरबाद किया हुआ।

विध्वंसी
संज्ञा पुं० [सं० विध्वंसिन्] [स्त्री० विध्वंसिनी] १. नाशकारी। सतीत्वनाश करनेवाला। २. बरबाद करने या होनेवाला। ३. दुश्मन। शत्रु। अरि (को०)।

विध्वस्त
वि० [सं०] १. नष्ट किया हुजा। बरबाद किया हुआ। २. इधर उधर विकीर्ण या छितराया हुआ (को०)। ३. अस्पष्ट। धुँधला (को०)। ४. ग्रहणग्रस्त (को०)।

विनंशी
वि० [सं० विनंशिन्] नष्ट होनेवाला। लुप्त होनेवाला [को०]।

विन (१)
सर्व० [हिं० वा (=उस)] प्रथम पुरुष बहुवचन सर्वनाम का वह रूप जो उसे कारकचिह्न लगने के पहले प्राप्त होता है। जैसे,—विन ने, विन को, इत्यादि।

विन (२)
अव्य० [सं० विना] दे० 'विना'।

विनअ पु
संज्ञा पुं० [सं० विनय, प्रा० विणअ] दे० 'विनय'। उ०— तासु तनअ नअ विनअ गुन गरुअ राए गएनेस। जे पट्ठाइअ दसओ दिस कित्ति कुसुम संदेश।—कीर्ति०, पृ० १०।

विनक्क पु
संज्ञा पुं० [सं० वणिक, (स्वरव्यत्यय से) विणक्] दे० 'वणिक्'। उ०—गुरु षंडन गुरु विदुष लच्छि षंडन विनक्क धर।—पृ० रा० , ५५। ६३।

विनग्न
वि० [सं०] निर्वस्त्र। नंगा [को०]।

विनटन
वि० [सं०] इधर उधर घूमना। चंक्रमण [को०]।

विनत (१)
वि० [सं०] १. नीचे की ओर प्रवृत्त। झुका हुआ। २. टेढ़ा पड़ा हुआ। वक्र। ३. संकुचित। सिकुड़ा हुआ। ४. विनीत। नम्र। ५. शिष्ट। शिक्षित। ६. अवसन्न। ७. हतोत्साह। ८. खिन्न (को०)।

विनत (२)
संज्ञा पुं० १. सुग्रीव को सेना का एक बंदर। २. शिव। महादेव। ३. एक प्रकार को चींटी (को०)। ४. सुद्युम्न का एक पुत्र (को०)। ५. व्याकरण में स् का ष् या न का ण होना। दे० विनाम।

विनतक
संज्ञा पुं० [सं०] एक पर्वत का नाम।

विनतड़ी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० विनत + हिं० ड़ी (प्रत्य०)]दे० 'विनती'। उ०—स्वामी तमों हौं संग न मेल्हौं बीनतड़ी कहेस।—दादू (शब्द०)।

विनता (१)
वि० स्त्री० [सं०] कुबड़ी या खंज (स्त्री)।

विनता (२)
संज्ञा स्त्री० १. दक्ष प्रजापति की एक कन्या जो कश्यप की स्त्री और गरुड़ की माता थी। यौ०—विनतातनय, विनतात्मज, विनतानंदन, विनतासुत=दे० 'विनतासूनु'। २. एक प्रकार का भयानक फोड़ा जो प्रमेह या बहुमुत्र के रोगियों को होता है। विशेष—जिस स्थान पर यह फोड़ा होता है, वह स्थान मुरदा हो जाने के कारण नीला पड़ जाता है। सुश्रुत आदि प्राचीन ग्रंथों में प्रमेह के अंतर्गत इसकी चिकित्सा लिखी है। यह प्रायः धातक होता है। इसमें अंग बहुत तेजो के साथ सड़ता चला जाता है। यदि बढ़ने के पहले ही वह स्थान काटकर अलग कर दिया जाय, तो रोगी बच सकता है। ३. महाभारत के अनुसार एक राक्षसी जो व्याधि लाती हे। ४. एक प्रकार की टोकरी वा डलिया (को०)। ५. रामायण। के अनुसार एक राक्षसी का नाम जिसे रावण ने सीता को समझाने के लिये नियुक्त किया था।

विनतातनया
संज्ञा स्त्री० [सं०] विनता की कन्या जिसका नाम सुमति था। [को०]।

विनतासूनु
संज्ञा पुं० [सं०] १. अरुण। २. गरुड़।

विनति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. झुकाव। २. नम्रता। विनय। शिष्टता। सुशीलता। ३. अनुनय। प्रार्थना। विनती। ४. निवारण। रोक। ५. दमन। शासन। दंड। ६. विनियोग।

विनतिय पु
संज्ञा स्त्री० [सं० विनति] दे० 'विनति'। उ०—अतुल तेज प्रथिराज करब विनतिय हितकारिय।—प० रासो, पृ० ४३।

विनती
संज्ञा स्त्री० [सं० विनति] दे० 'विनति'।

विनतोदर
वि० [सं०] उदर के पास से झुका हुआ [को०]।

विनद
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का पेड़। विन्याक वृक्ष। २. कोलाहल। ध्वनि। शीर (को०)।

विनदी
वि० [सं०] कोलाहल करनेवाला।

विनद्ध
वि० [सं०] १. बंधा हुआ। नंधा हुआ। २. जिसका बधन दूर किया गया हो। मुक्त।

विनमन
संज्ञा पु० [सं०] [वि० विनत] १. नम्र करना। झुकाना। २. लचाना। लपाना।

विनमित
वि० [सं०] १. लचाया हुआ। नम्र। २. झुका हुआ [को०]।

विनम्र (१)
वि० [सं०] १. झुका हुआ। नम्र। २. विनीत। सुशील। ३. अवसन्न (को०)।

विनम्र (२)
संज्ञा पुं० तगर का फूल।

विनम्रक
संज्ञा पुं० [सं०] तगर वृक्ष का फूल [को०]।

विनय (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. व्यवहार में दीनता या अधीनता का भाव। नम्रता। प्रणति। आजिजी। २. शिक्षा। नैतिक शिक्षण। मार्गदर्शन। ३. प्रार्थना। विनती। अनुनय। ४. शासन। तंबीह। (स्मृति)। ५. नीति। उ०—नमत सबै करि विनय, विनय मत सबै बखानत।—गोपाल (शब्द०)।

विनय (२)
संज्ञा पुं० वणिक्। बनिया। २. वला। बरियारा। ३. जितेंद्रिय। संयमी। ४. विनयपिटक (बौद्ध०)। उ०—'विनय जिसमें पांच ग्रंथ हैं।'—हिंदु० सभ्यता, पृ० २४६।

विंनय (३)
वि० १. फेंका हुआ। क्षिप्त। २. गुप्त। छिपाया हुआ। ३. दुर्वृत्त। अशिष्टाचारी। ४. अलग अलग करनेवाला। पृथक्कर्ता [को०]।

विनयकर्म
संज्ञा पुं० [सं० विनयकर्मन्] शिक्षण। मार्गदर्शन [को०]।

विनयग्राही
वि० [सं० विनयग्राहिन] अनुशासन के नियमों का पालक। आज्ञाकारी [को०]।

विनयधर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुरीहित। २. अध्यक्ष। उ०—कम से कम निश्चित तथा अनिवार्य संख्या को 'गणपूर्ति' (कोरम) कहा जाता था और इसमें अघ्यक्ष (विनयधर) की गणना नहीं होती थी।—आ० भा०, पृ० १६१।

विनयन
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिक्षा। अनुशासन। २. दूरीकरण। हटाना। दूर करना। उ०—रुधिर भरी वेदियाँ भयंकर उनमें ज्वाला, विनयन का उपचार तुम्हीं से खींच निकाला।—कामायनी, पृ० १९६।

विनयपिटक
संज्ञा पुं० [सं०] आदि बौद्ध शास्त्रों में से एक। विशेष—आदि बौद्ध शास्त्र, जो पाली भाषा में हैं, तीन भागों में विभक्त हैं—विनयपिटक, सुत्रपिटक और अभिधर्मपिटक। ये तीनों 'त्रिपिटक' नाम से प्रसिद्ध हैं। बुद्ध देव ने अपनी शिष्यमंडली को भिक्षु धर्म के जो उपदेश दिए थे, वे ही विनय- पिटक में संगृहीत है। इसके संकलन के संबंध में यह कथा है कि बुद्ध भगवान् तथा सारिपुत्र मौद्लायन आदि प्रधान प्रधान शिष्यो के निवर्णिलाभ करने पर बौद्ध शास्त्र के लुप्त होने का भय हुआ। इससे महाकश्यप ने अजातशत्रु के राजत्वकाल में राजगृह के पास वैभार पर्वत की सप्तपर्णी नाम की गुफा में पाँच सौ स्थविरों को आमंत्रित करके एक बड़ी सभ की, जिसमें उपालि ने बुद्ध द्वारा उपदिष्ट 'विनय' का प्रकाश किया। इसके पीछे एक बार फिर गड़बड़ उपस्थित होने पर वैशाली के वलिकाराम में सभा हुई, जिसमें 'विनय' का फिर संग्रह हुआ। इस प्रकार कई संकलनों के उपरांत अशोक के समय में 'विनय' पूर्ण रूप से संकलित हुआ।

विनयप्रमाथी
वि० [सं० विनयप्रमाथिन्] शिक्षा या अनुशासन न माननवाला [को०]।

विनयभाक्
वि० [सं० विनयभाज्] विनयी। विनम्र [को०]।

विनययोगी
वि० [सं० विनययोगिन्] दे० 'विनयभाक्'।

विनयवाक्
वि० [सं० विनयवाच्] मधुरभाषी। नम्रता से बात करनेवाला [को०]।

विनयवान्
वि० [सं० विनयवत्] [स्त्री० विनयवती] जिसमें नम्रता हा। शिष्ट।

विनयशील
वि० [सं०] विनययुक्त। नम्र। सुशील। शिष्ट।

विनयस्थ
वि० [सं०] विनयशील [को०]।

विनयस्थिति स्थापक
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल में विनय वा वाणिज्य विभाग की देख रेख करनेवाला अधिकारी। उ०— प्रांतीय शासन के आधकारियों में कई पद थे जैसे, 'कुमारामात्य,' 'विनयस्थिति स्थापक' आदि।—आ० भा०, पृ० ४०२।

विनया (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] वाट्यालक। बरियारा।

विनया पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० विनय] विनय। नम्रता। प्रार्थना। उ०—विना विनया नृप बद्ध कराय।—प० रासो, पृ० ४३।

विनयावनत
वि० [सं०] विनय या शिष्टता से नम्र। नम्रता से झुका हुआ [को०]।

विनयासुर
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल में राजसभा का एक कर्मचारी जो आगंतुकों के आगमन को सूचित करता, उनकी देखरेख करता एवं उन्हें राजसभा में ले जाता था।—[आ० भां०, पृ० ४४४।]

विनयी
वि० [सं० विनयिन्] विनययुक्त। नम्र।

विनर्दन
संज्ञा पुं० [सं०] गरजन। चिग्धाड़। शोरगुल [को०]।

विनयोक्ति
संज्ञा पुं० [सं०] विनयभरी उक्ति या कथन [को०]।

विनर्दी
वि० [सं० विनर्दिन्] गरजनेवाला।

विनवना पु
क्रि० अ०, क्रि० स० [सं० विनयन]दे० 'बिनवना'।

विनशन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० विनष्ट, विनश्वर] १. नष्ट होना। नाश। बरबादी। हानि। लोप। क्षय। २. एक स्थान का नाम जहाँ सरस्वती नदी रेत में लुप्त हुई है (को०)।

विनशना पु
क्रि० अ० [सं० विनशन]दे० 'विनसना'।

विनशानी पु
क्रि० स० [सं० विनाशन] दे० 'विनसाना'।

विनश्वर
वि० [सं०] सब दिन या बहुत दिन न रहनेवाला। नष्ट होनेवाला। ध्वंसशील। अचिरस्थायी। अनित्य। जैसे,—शरीर विनश्वर है।

विनश्वरता
संज्ञा स्त्री० [सं०] अनित्यता। अचिरस्थायित्व।

विनश्वरत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विनश्वरता' [को०]।

विनष्ट
वि० [स०] १. नाश को प्राप्त। जो बरबाद हो गया हो। जो न रह गया हो। जिसका अस्तित्व मिट गया हो। ध्वस्त। २. मृत। मरा हुआ। ३. जो विकृत या खराब हो गया हो। जो व्यवहार के योग्य न रह गया हो। जो निकम्मा हो गया हो। बिगड़ा हुआ। ४. जिसका आचरण बिगड़ गया हो। भ्रष्ठ। पतित। ५. ओझल। लुप्त। अलोप । क्रि० प्र०—करना।—होना। यौ०—विनष्टचक्षु = जिसके चक्षु देख न सकें। विनष्टद्दष्टि=दे० 'विनष्टचक्षु'। विनष्टधर्म = (१) धर्मभ्रष्ट व्यक्ति। (२) देश जिसका विधान भ्रष्ट हो।

विनष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नाश। २. लोप। ३. पतन।

विनष्टोपजीवी
वि० [सं० विनष्टीपजीविन्] शव या सड़ी गली वस्तुओं को खाकर जीवन धारण करनेवाला [को०]।

विनस
वि० [सं०] जिसे नासिका न हो। बिना नाक का। नकटा।

विनसना पु
क्रि० अ० [सं० विनशन] नष्ट होना। न रहना। लुप्त होना। उ०—उपजै विनसै ज्ञान जिमि पाइ सुसंग कुसंग।— तुलसी (शब्द०)।

विनसाना पु (१)
क्रि० स० [हिं० विनसना का सक० रूप] १. ध्वस्त या नष्ट करना। २. बिगाड़ना।

विनसानी (२)
क्रि० अ० [सं० विनशन] दे० 'विनसना'।

विना
अव्य० [सं०] १. अभाव में। न रहने की अवस्था में। बगैर। जैसे—तुम्हारे विना यह कान न बनेगा। २. छोड़कर। अतिरिक्त। सिवा। जैसे,—तुम्हारे विना और कौन यह काम कर सकता है।

विनाकृत
वि० [सं०] १. अलग किया हुआ। २. परित्यक्त ३. निर्जन। निभृत। एकांत [को०]।

विनाडि, विनाडिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विनाडी'।

विनाडी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक घड़ी का साठवाँ भाग। २४ सेकेंड का समय। पल।

विनाती पु ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० विनती] विनती। विनय। उ०—ए गोसाइँ, सुनु मोरि विनाती।—जायसी (शब्द०)।

विनाथ
वि० [सं०] जिसका कोई रक्षक न हो। अनाथ। उ०—नाथ नाथ विनाथ नाथ अनाथ नाथ सुसिद्ध।—केशव (शब्द०)।

विनादित
वि० [सं०] शब्दित या ध्वनित [को०]।

विनादी
वि० [सं० विनादिन्] नाद करनेवाला। शब्द करनेवाला। शोर करनेवाला [को०]।

विनान पु
संज्ञा पुं० [सं० विज्ञान, प्रा० विन्नाश] १. विज्ञान। सद् बोध। २. मेधा। मति। बुद्धि। उ०—सुकी कहै सुकसंभरौ, कहौ कथा प्रति प्रान। पृथु भोरा भीभंग पहु, किम हुअ बेर विनान।—पृ० रा०, ५।१।

विनाभव
संज्ञा पुं० [सं०] पृथक्ता। पार्थक्य। अलगाव [को०]।

विनाभाव
संज्ञा पुं० [सं०] दे० विनाभव।

विनाम
संज्ञा पुं० [सं०] १. झुकाव। टेढ़ापन २. भावप्रकाश के अनुसार किसी पीड़ा द्वारा शरीर का झुक जाना। ३. व्याकरण में स् का ष् अथवा न् का ण् होना (को०)।

विनयित
वि० [सं०] नम्र किया हुआ। झुकाया हुआ [को०]।

विनायक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] गणों के नायक, गणेश। २. गरुड़। ३. विध्न। बाधा। उ०—लसत विनायक केतु विनायक नसत निरखि रथ।—गोपाल (शब्द०)। ४. गुरु। ५. देवी का एक स्थान। ६. बुद्धदेव। ७. नेता। नायक (को०)। ८. वह जो (विघ्न) दूर करता हो (को०)।

विनायक (२)
वि० १. ले जानेवाला। २. हटानेवाला। दूर करनेवाला। ३. विना नायक का। अनाथ [को०]।

विनायककेतु
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़ध्वज। श्रीकृष्ण। उ०—लसत विनायककेतु विनायक नसत निरखि रथ।—गोपाल (शब्द०)।

विनायक चतुर्थी
संज्ञा स्त्री० [सं०] माघ महीने की शुक्ला चतुर्थी। माघ सूदी चौथ। गणेश चतुर्थी। विशेष—इस दिन गणेश का पूजन और व्रत होता है।

विनायिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विनायक की पत्नी। २. गरुड़ की पत्नी [को०]।

विनारुहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'त्रिपर्णिका' [को०]।

विनाल
वि० [सं०] नालरहित। विना डंठल का [को०]।

विनाश
संज्ञा पु० [सं०] १. अभाव हो जाना। अस्तित्व का न रह जाना। न रहना। नाश। मिटना। ध्वंस। बरबादी। २. लोप।। अदर्शन। ३. बिगड़ जाने का भाव। खराब हो जाना। चौपट हो जाना। खराबी। ४. बुरी दशा। तबाही। ५. हानि। नुकसान।

विनाशक
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] १. विनाश करनेवाला। क्षय करनेवाला। २. बिगाड़नेवाला। खराब करनेवाला। घातक।

विनाशधर्मा
वि० [सं० विनाशधर्मन्] नश्वर। नाशवान् [को०]।

विनाशधर्मी
वि० [सं० विनाशधर्मिन्] दे० 'विनाशधर्मा' [को०]।

विनाशन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० विनाशी, विनाश्य] १. नष्ट करना। ध्वस्त करना। बरबाद करना। २. संहार करना। बध करना। उ०—दससीस विनाशन बीस भुजा।—तुलसी (शब्द०)। ३. खराब करना। बिगाड़ना। ४. एक असुर जो काल का पुत्र था।

विनाशन (२)
वि नाशक। विध्वंसक [को०]।

विनाशयिता
वि० संज्ञा पुं० [सं० विनाशयितृ] विनाश करनेवाला। नाश करनेवाला [को०]।

विनाशांत
संज्ञा पुं० [सं० विनाशान्त] मरण। मृत्यु [को०]।

विनाशसंभव
संज्ञा पुं० [सं० विनाशसम्भव] विनाश का निदान या प्रधान कारण [को०]।

विनाशहेतु
संज्ञा वि० [सं०] विनाश का कारण या हेतु।

विनाशित
वि० [सं०] १. नष्ट किया हुआ। ध्वस्त किया हुआ। २. मारा हुआ। ३. बिगाड़ा हुआ। खराब किया हुआ।

विनाशी
वि० [सं० विनाशिन्] [वि० स्त्री० विनाशिनी] १. नष्ट करनेवाला। ध्वस्त करनेवाला। बरबाद करनेवाला। २. बध करनेवाला। मारनेवाला। ३. बिगाड़नेवाला। खराब करनेवाला।

विनाशोन्मुख
वि० [सं०] १. विनाश की ओर उन्मुख या प्रवृत्त। जिसका शीघ्र नाश होनेवाला हो। २. परिपक्व [को०]।

विनाश्य
वि० [सं०] विनाश के योग्य।

विनास (१)
वि० [सं०] नासारहित। बिना नाक का [को०]।

विनास पु (२)
संज्ञा पुं० [सं विनाश] दे० 'विनाश'।

विनासक (१)
वि० [सं०] विना नाक का। नकटा।

विनासक पु (२)
वि०, संज्ञा पुं० [सं० विनाशक] दे० 'विनाशक'।

विनासन पु
वि०, संज्ञा पुं० [सं० विनाशन] दे० 'विनाशन'।

विनासना (१)पु
क्रि० सं० [सं० विनाशन] १. नष्ट करना। ध्वस्त करना। बरबाद करना। न रहन देना। २. संहार करना। बध करना। ३. खराब करना। बिगाड़ना।

विनासना (२)
क्रि० अ० नष्ट होना। बरबाद होना। खराब होना।

विनासिक
वि० [सं०] बिना नाक का। नकटा [को०]।

विनासिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक विषयुक्त कीड़ी [को०]।

विनाह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'वीनाह' [को०]।

विनिंद
वि० [सं० विनिन्द] १. हँसोड़। २. बढ़ जानेवाला [को०]।

विनिंदक
विं०, संज्ञा पुं० [सं० विनिन्दक] १. अत्यंत निंदा करनेवाला। २. आगे बढ़ जानेवाला।

विनिंदा
संज्ञा स्त्री० [सं० विनिन्दा] अतिश निंदा। बहुत बुराई।

विनिंदित
वि० [सं० विनिन्दित] जिसकी बहुत निंदा या बुराई हुई हो। लांछित।

विनिः सरण
संज्ञा पुं० [सं०] निकलना। बहिर्गमन। बाहर जाना [को०]।

विनिःसृत
वि० [सं०] १. पलायित। भागा हुआ। २. निक्ला हुआ। बहिर्गत। जो बाहर हुआ हो।

विनिःसृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] बाहर निकलना। विनिःसरण। भागना। पलायन [को०]।

विनिः सृष्ट
वि० [सं०] निक्षिप्त। फेंका हुआ [को०]।

विनिकषण
संज्ञा पुं० [सं०] छीलने की क्रिया। खुरचना [को०]।

विनिकार
संज्ञा पुं० [सं०] १. त्रुटि। क्षति। हानि। २. अपराध [को०]।

विनिकीर्ण
वि० [सं०] १. बिखेरा हुआ। छितराया हुआ। इतस्ततः क्षिप्त। २. भरा हुआ। ढँका हुआ [को०]।

विनिकृत
वि० [सं०] क्षति पहुंचाया हुआ। जिसका तिरस्कार हुआ हो।

विनिकृंतन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो काटता या निकृंतन करता हो। २. काटना। निकृंतन। टुकड़े टुकड़े करना [को०]।

विनिकृत्त
वि० [सं०] काटा हुआ। निकृंतित [को०]।

विनिकेत
वि० [सं०] निकेतरहित। गृहहीन। बेघर का।

विनिलोचन
संज्ञा पुं० [सं०] सिकोडना। सकोचन। जैसे,—भ्रविनि- कोचन [को०]।

विनिक्षिप्त
वि० [सं०] १. नीचे गिराया या फेंका हुआ। २. किसी- में या नोचे को ओर रखा हुआ [को०]।

विनिक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. उछालना। फेंकना। २. अलगाव। ३. प्रेषण (को०)।

विनिगड
वि० [सं० विनिगड] जिसके पैरों में बेडी न हो। निगड- रहित (को०)।

विनिगमक
वि० [सं०] दो पक्षों में से किसी एक पक्ष को सिद्ध करनेवाला।

विनिगमना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दो परस्पर विरुद्ध पक्षों में से किसी एक पक्ष का युक्ति और प्रमाण द्रारा निश्चय। दो बातों में से किसी एक बात के ठीक होने का निर्णय जो विचार और तर्क द्रारा हो। (वैशेषिक)। २. सिद्धांत। नतीजा।

विनिगुहित
वि० [सं०] छिपाया हुआ। ढका हुआ [को०]।

विनिगुहिता
संज्ञा पुं० [सं० विनिगूहितृ] वह जो गोप्य को छिपावे। गोपन करने या ढकनेवाला [को०]।

विनिग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] १. नियम। बंधेज। प्रतिबंध। २. किसी वृत्ति को दबाकर अधीन करना। संयम। ३. अवरोध। रुकावट। ४. व्याधात। बाधा। ५. पारस्परिक विरोध (को०)। ६. पार्थक्य। अलगाव। विभाजन (को०)।

विनिग्राह्म
वि० [सं०] निग्रह के योग्य। अवरुद्ध करने लायक।

विनिघूर्णित
वि० [सं०] १. चक्कर करता हुआ। घूमता हुआ। २. अशांत। क्षुब्ध [को०]।

विनिघ्न
वि० [सं०] १. नष्ट। बरबाद। २. गुणित। वृद्धिगत। गुणा किया हुआ।

विनिच्चय
संज्ञा पुं० [विनिश्चय, पा० विनिच्चय] न्यायाधीश। उ०— अट्टकथा के अनुसार विनिच्चय यह आठ न्यायाघोश थे जो एक एक करके मुकद्द मों की जाँच करते थे।—हिंदु० सभ्यता पृ० २६२।

विनिद्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अस्त्र का एक संहार जिससे अस्त्र द्रारा निद्रित या मूर्छित व्यक्ति की नींद या बेहोशी दूर होती है। २. नींद न आने का एक रोग।

विनिद्र
वि० १. जिसकी नींद खुल गई हो। २. मुकुलित। खुला हुआ। फूला हुआ (को०)।

विनिद्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] निद्रा का अभाव। जागरण [को०]।

विनिद्रत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विनिद्रता'।

विनिघ्वस्त
वि० [सं०] नष्टम्रष्ट। विध्वस्त किया हुआ [को०]।

विनिपतित
वि० [सं०] अधः पतित। गिरा हुआ [को०]।

विनिपात
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनाश। ध्वंस। बरबादी। २. बध। हत्या। ३. अवसान। अनादर। नजर से गिरना। ४. अधः- पतन। गिराव (को०)। ५. नरकपात। नरक (को०)। ६. क्षय। मृत्यु (को०)। ७. घटित होना। घटना (को०)। ८. पीड़ा। कष्ट। दुःख (को०)। यौ०—विनिपातग्रस्त=अधः पतित। दुर्भाग्यग्रस्त। विपन्न। विनि- पातप्रतीकार=विपत्ति या कष्ट से बचने का उपाय। विनिपात- शंसी=उत्पात, विपत्ति या दुर्भाग्य का सुचक।

विनिपातक
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनाशकारी। २. संहारकर्ता। ३. अपमान करनेवाला।

विनिपातन
संज्ञा पुं० [सं०] गर्भपातन। गर्भ गिराने की क्रिया [को०]।

विनिपातित
वि० [सं०] १. जिसका विनिपात किया गया हो। गिराया हुआ। ध्वस्त या नष्ट किया हुआ। २. मारा हुआ। हत [को०]।

विनिपाती
वि० [सं० विनिपातिन] विनिपात करनेवाला। गिरानेवाला [को०]।

विनिबंध
संज्ञा पुं० [सं० विनिबन्ध] किसी वस्तु से लगाव या संबध होना [को०]।

विनिबंधन
संज्ञा पुं० [सं० विनिबन्धन] दे० 'विनिबध'।

विनिमग्न
वि० [सं०] डूबा हुआ। लीन।

विनिमय
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक वस्तु लेकर बदले में दूसरी वस्तु देने का व्यवहार। अदल बदल। परिवर्तन। परिदान। २. गिरवी। बंधक। ३. वर्णव्यत्यय। वर्णीं का परिवर्तन (को०)। ४. अन्योन्यता। परस्परता (को०)। ५. किसी देश की मुद्रा या सिक्के का अन्य देश की मुद्रा में परिवर्तन। जैसे, औंड या डालर का भारतीय सिक्के में। (अं० अक्सचेंज)।

विनिमित्त
वि० [सं०] निमित्त या कारणरहित। जिसका कोई मुख्य कारण न हो [को०]।

विनिमीलन
संज्ञा पुं० [सं०] बंद होना।

विनिमीलित
वि० [सं०] जो बंद हो गया हो। मुद्रित। संकुचित। मुँदा हुआ [को०]।

विनिमीलितेक्षण
वि० [सं०] मुँदी हुई आँकोंवाला [को०]।

विनिमेष, विनिमेषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. (आँखों का) झपकना। पलकों का गिरना। २. संकेत। इंगित [को०]।

विनियत
वि० [सं०] नियमन किया हुआ। नियंत्रित। प्रतिबद्ध [को०]। यौ०—विनियतचेता=जिसका चित्त वश में हो। संयतात्मा। विनियतवाक्=(१) संयत कथन। (२) जिसकी वाणी संयमित हो। विनियताहार=मितभोजी। कम खानेवाला।

विनियम
संज्ञा पुं० [सं०] १. निग्रह। रोक। संयम। प्रतिबंध। २. शासन [को०]।

विनियम्य
वि० [सं०] नियमन के योग्य। वश में रखने लायक [को०]।

विनियुक्त
वि० [सं०] १. किसी काम में लगाया हुआ। नियोजित। २. अर्पित। ३. प्रेरित। ४. अलग किया हुआ। विच्छिन्न (को०)। ५. व्यवहूत (को०)। ६. समादिष्ट। विहित (को०)।

विनियुक्तात्मा
वि० [सं० विनियुक्तात्मन्] जिसका मन किसी वस्तु में केंद्रित हो गया हो [को०]।

विनियोक्तव्य
वि० [सं०] १. नियुक्त करने योग्य। २. आदेश को पूर्ण करने में समर्थ [को०]।

विनियोक्ता
वि० [सं० विनियोक्तृ] नियुक्त करनेवाला [को०]।

विनियोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी फल के उद्देश्य से किसी वस्तु का उपयोग। किसी विषय में लगाना। प्रयोग। २. किसी वैदिक कृत्य में मंत्र का प्रयोग। ३. प्रेषण। भेजना। ४. प्रवेश। घुसना। ५. अलगाव। विभाग। विभाजन (को०)। ६. छोड़ना। त्यागना (को०)। ७. रुकावट। अड़चन। ८. संबंध। ताल्लुक (को०)।

विनियोजित
वि० [सं०] १. प्रयुक्त। नियुक्त। लगाया हुआ। २. अर्पित। ३. प्रेरित।

विनियोज्य
वि० [सं०] १. नियुक्त किया जानिवाला। २. उपयोग किया जानेवाला [को०]।

विनिरोध
वि० [सं०] १.जो निरोध न करे। निष्क्रिय।२. अप्रभावित (को०)।

विनिरोध
वि० [सं० विनिरोधिन्] निरोध करनेवाला। रोकनेवाला। बाधा उपस्थित करनेवाला।

विनिर्गत
वि० [सं०] १. निकला हुआ। जो बाहर हुआ हो। बहिर्गत। २. गया हुआ। जो चला गया हो। निष्क्रांत। ३. बीता हुआ। अतीत। व्यतीत।

विनिर्गम
संज्ञा पुं० [स०] १. बाहर होना। निकलना। २. प्रस्घान। चला जाना।

विनिर्घोष
संज्ञा पुं० [सं०] उच्च स्वर।

विनिर्जन
वि० [सं०] निर्जन। सुनसान। जनहीन [को०]।

विनिर्जय
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूरी जीत। पूर्ण विजय [को०]।

विनिर्जित
वि० [सं०] पूर्णतः पराजित। पूरी तौर से हारा हुआ [को०]।

विनिर्णय
संज्ञा पुं० [सं०] १. द्दढ़ निश्चय। २. निर्धारित नियम। ३. पूर्ण रूप रूप से निबटारा या फैसला [को०]।

विनर्णीत
वि० [सं०] १. निश्चित। २. स्पष्टतया निर्णीत [को०]।

विनिर्दग्ध
वि० [सं०] पूर्ण रूप से जला या नष्ट किया हुआ [को०]।

विनिर्दहन
संज्ञा पुं० [सं०] पूरी तौर से जला डालना। संपूर्णतया नष्ट कर देना [को०]।

विनिर्दिष्ट
वि० [सं०] जिसका निर्देश किया गया हो। विशेष रूप से निर्दिष्ट। सुस्पष्ट। उ०—देश (स्थान) और काल (उससे संबद्ध समय) दोनों दिए हों तो वह घटना या तथ्य पूर्णतया विनिर्दिष्ट होता है।—संपूर्ण० अभि० ग्रं०, पृ० २२३।

विनिर्देश्य
वि० [सं०] उल्लेख योग्य। जिसका निर्देश किया जाय।

विनिर्धुत, विनिर्धूत
वि० [सं०] कंपित या क्षुब्ध किया हुआ। २. क्षिप्त या फेंका हुआ [को०]।

विनिधौर्त
वि० [सं०] भली भाँति धुला हुआ। स्वच्छ। निर्मल।

विनिर्बंध
संज्ञा पुं० [सं० विनिर्बन्ध] आग्रह। द्दढ़ता।

विनिर्बाहु
संज्ञा पुं० [सं०] तलवार चलाने का एक प्रकार [को०]।

विनिर्भिन्न
वि० [सं०] खंडित। टूटा हुआ। छिन्न भिन्न। फटा हुआ।

विनिर्भोग
संज्ञा पुं० [सं०] एक कल्प का नाम।

विनिर्मद
वि० [सं०] निरभिमान। गर्वरहित। निर्विकार। उ०— श्यामश्यामा के युगल पद कोकनद मन के विनिर्मद।—अर्चना, पृ० ९९।

विनिर्मल
वि० [सं०] निर्मल। स्वच्छ। पूत। पवित्र। उ०—प्रथम बंदूँ पद विनिर्मल।—अर्चना, पृ० २७।

विनिर्माण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० विनिर्मित] विशेष रूप से निर्माण होना। अच्छी तरह बनना।

विनिर्माता
संज्ञा पुं० [सं० विनिर्मातृ] निर्माता।

विनिर्मित
वि० [सं०] १. विशेष रूप से निर्मित या बना हुआ। जैसे,—प्रस्तरविनिर्मित भवन। २. बनाया हुआ। निर्माण किया हुआ (को०)। ३. (उत्सव आदि) जो संपन्न या मनाया गया हो (को०)। ४. निर्धारित। निश्चित (को०)।

विनिर्मिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] कृति। संरचना। निर्माण [को०]।

विनिर्मुक्त
वि० [सं०] १. बाहर निकला हुआ। बहिर्गत। २. जो खुला हो या ढंका न हो। अनाच्छन्न। ३. छूटा हुआ। बंधन से रहित।

विनिर्मुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूरी स्वतंत्रता होना। बधराहित्य। पूर्ण मुक्ति [को०]।

विनिर्मूढ़
वि० [सं० विनिर्मूढ] कर्तव्यबोध रखनेवाला [को०]।

विनिर्मीक
संज्ञा पुं० [सं०] १. निर्मीक रहित। २. बिना पहनावे का। वस्त्ररहित। परिधानशून्य।

विनिर्मोंक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विनिर्मुक्ति'।

विनिर्याण
संज्ञा पुं० [सं०] गमन। प्रस्थान [को०]।

विनिर्यात
वि० [सं०] गत। गया हुआ [को०]।

विनिर्वाण
संज्ञा पुं० [सं०] विशेष प्रकार की मुक्ति। उ०—तर्क सिद्ध है, स्वप्न एक है विनिर्वाण यह।—अपरा० पृ० १८७।

विनिवर्तक
वि० [सं०] रद्द करने या बदलनेवाला [को०]।

विनिवर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० विनिवर्तित, विनिवर्ती] लौटना।

विनिवर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] विराम। निर्वृत्ति [को०]।

विनिवर्तित
वि० [सं०] वापस किया हुआ। लौटाया हुआ [को०]।

विनिवर्ती
वि० [सं०] वापस करने या परिवर्तन करनेवाला [को०]।

विनिवारण
संज्ञा पुं० [सं०] निवारण करना। दूर करना। नियंत्रित करना।

विनिविष्ट
वि० [सं०] १. बसा हुआ। निवास किया हुआ। २. रखा हुआ। रक्षित [को०]।

विनिवेदन
संज्ञा पुं० [सं०] विशिष्ट रूप से निवेदन करना। घोषित करना [को०]।

विनिवृत्त
वि० [सं०] १. लौटा हुआ। वापस आया हुआ। २. (सेवा) मुक्त। ३. पूर्ण। संपन्न। ४. निकाला हुआ। उत्पन्न। ५. क्षांत [को०]। यौ०—विनिवृत्तकाम=आकांक्षारहित। कामनाओं से मुक्त। विनिवृत्तशाप=शापमुक्त।

विनिवृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विश्रांति। आराम। मुक्ति। २. निवारण। दूरीकरण। ३. अंत। अवसान। समाप्ति [को०]।

विनिवेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रवेश। घुसना। २. निवास करना। बसना। ३. छाप। चिह्न। ४. (पुस्तक आदि में) उल्लेख करना (को०)।

विनिवेशन
वि० [सं०] [वि० विनिवेशित, विनिवेशी] १. प्रवेश। घुसना। २. अधिष्ठान। स्थिति। वास। रहायश। ३. निर्माण (को०)। ४. व्यवस्था (को०)। ५. चिह्न या छाप डालना (को०)।

विनिवेशित
वि० [सं०] १. प्रविष्ट। घुसा हुआ। २. ठहरा या टिका हुआ। अधिष्ठित। स्थापित। ३. बसा हुआ। ४. निर्मित। रचा या बना हुआ (को०)।

विनिवेशी
वि० [सं० विनिवेशिन्] [स्त्री० विनिवेशिनी] १. प्रवेश करनेवाला। घुसनेवाला। २. रहनेवाला। बसनेवाला।

विनिश्चय
संज्ञा पुं० [सं०] १. निश्चित करना। तय करना। २. निर्णय। निश्चय।

विनिश्चल
वि० [सं०] अचल। द्दढ़। कंपरहित। स्थित [को०]।

विनिश्वसित
संज्ञा पुं० [सं०] साँस। प्रश्वास [को०]।

विनिश्वास
संज्ञा पुं० [सं०] उच्छ्वास। गहरी साँस। उसास [को०]।

विनिषूदित
वि० [सं०] पूर्ण रूप से उच्छिन्न या नष्ट किया हुआ [को०]।

विनिष्कंप
वि० [सं० विनिष्कम्प] स्थिर। अचल [को०]।

विनिष्टप्त
वि० [सं०] भली भाँति पकाया या भूना हुआ [को०]।

विनिष्पतित
वि० [सं०] आगे की ओर उछला या झपटा हुआ [को०]।

विनिष्पात
संज्ञा पुं० [सं०] तेजी से झपटना या टूट पड़ना [को०]।

विनिष्पाद्य
वि० [सं०] पूरा करने योग्य [को०]।

विनिष्पेष
संज्ञा पुं० [सं०] कुचलना। पीसना। मदिंत करना। रगड़ना। मलना [को०]।

विनिस्तंद्र
वि० [सं० विनिस्तन्द्र] तंद्राविहीन। निरलस। उ०—कुज्झ- टिका अट्टहास अंतर्द्दग विनिस्तंद्र।—आराधना, पृ० १३।

विनिस्तार
संज्ञा पुं० [सं०] १. पारगमन। मुक्ति। छुटकारा। उद्धार। उ०—कठिन यह संसार, कैसे विनिस्तार; ऊर्मि का पाथार, कैसे करे पार— अर्चना, पृ० ७५।

विनिस्मृत
वि० [सं०] निर्दिष्ट। स्मृत। कीर्तित। वर्णित। लिखित [को०]।

विनिहत (१)
वि० [सं०] १. चोट खाया हुआ। आहत। २. विनष्ट। ध्वस्त। बरबाद। ३. मारा हुआ। मृत। ४. लुप्त। ५. पूरी तरह परास्त किया हुआ (को०)। ६. उपेक्षित। उल्लंधित। तिरस्कृत (को०)।

विनिहत (२)
संज्ञा पुं० १. कोई बड़ी या अनिवार्य विपत्ति। भाग्यदोष से या दैवात् आनेवाला संकट। २. धूमकेतु।

विनिहित
वि० १. नीचे रखा हुआ। २. जमाया हुआ। नियुक्त। ३. विकीर्ण। विभक्त। अलग किया हुआ।

विनिहितद्दष्टि
वि० [सं०] जिसकी द्दष्टि किसी वस्तु पर लगी हो [को०]।

विनिहितमना
वि० [सं० विनिहितमनस्] जिसने किसी बात का द्दढ़ निश्चय कर लिया हो [को०]।

विनिहूनुत
वि० [सं०] १. छिपा हुआ। २. अस्वीकृत [को०]।

विनीत (१)
वि० [सं०] १. जिससमें उत्तम शिक्षा का संस्कार और शिष्टता हो। विनययुक्त। सुशील। २. व्यवहार में अधीनता प्रकट करनेवाला। शिप्ट। नम्र। ३. जितेंद्रिय। ४. संयमी। ५. ग्रहण किया हुआ। ६. सिखाया हुआ। ७. दूर किया हुआ। हटाया हूआ। ले गया हुआ। ८. जिसको तंबीह की गई हो। दंडित। शासित। ९. नीतिपूर्वंक व्यवहार करनेवाला। धार्मिक। १०. प्रिय। मनोहर (को०)। ११. साफ सुथरा (कपड़ा आदि)।

विनीत (२)
संज्ञा पुं० १. वणिक्। बनिया। साहु। २. निकाला हुआ घोड़ा। ३. पुलस्त्य के एक पुत्र का नाम। दमनक। दौने का पौधा। ५. सधाया हुआ बैल (को०)।

विनीतक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वाहन। पालकी। २. वह जो वहन करे। वाहक। [को०]।

विनीतता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विनीत होने का भाव। नम्रता।

विनीतत्व
संज्ञा पुं० [सं०] विनीतता। नम्रता [को०]।

विनीता
वि० स्त्री० [सं०] विनयवाली। नम्र (स्त्री)। उ०—कुछ नहीं कहा क्या सीता ने, वैदेही वधू विनीता ने ?—साकेत, पृ० १८५।

विनीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विनय। सुशीलता। २. सद् व्यवहार। ३. संमान।

विनीय
संज्ञा पुं० [सं०] १. पाप। दोष। जुर्प। अपराध। २. तलछट [को०]।

विनील
वि० [सं०] गहरा नीला। नील वर्ण का [को०]।

विनीलक
संज्ञा पुं० [सं०] वह मृत देह जो नीला पड़ गया हो। नीला शव। (बौद्ध)।

विनु पु् †
अव्य० [सं० विना] दे, विना'।

विनुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रशंसा। २. आश्वलायन श्रौत सूत्र के अनुसार एकाह कृत्य का नाम। ३. अपवारण। दूर करना (को०)।

विनुन्न
वि० [सं०] १. अपकारित। दूर किया हुआ। २. चोट खाया सुआ। घायल [को०]।

विनूट पु †
वि० [हि० अनुठा ?] दे० 'विनूठा'। उ०—श्रव सचिय मुद्र विनूट।—पृ० रा०, ६१। २३१।

विनुठा †
वि० [हिं० अनुठा ?] अनुठा। सुंदर। बढ़िया।

विने †
सर्व० [हिं० विन + ने] दे० 'वह'। उ०—मेरे घर कूँ मेहमान जो आएगा। के यो शीर खुरमाँ विने खाएगा। —दक्खिनी०, पृ०३३१।

विनेता (१)
संज्ञा पुं० [सं० विनेतृ] १. अगुआ। नेता। पथप्रदर्शक। २. अध्यापक। गुरु। शिक्षक। ३. दंड देनेवाला। ४. राजा। शासक [को०]।

विनेय (१)
वि० [सं०] १. दंडनीय। शासन के योग्य। जिसको दंड दिया जाय। २. हटा देने या ले जाने लायक। नेतव्य। ३. शिक्षा देने योग्य। जिसे शिक्षा दी जाय [को०]।

विनेय (२)
सं० पुं० शिष्य। वह जो शिक्षा ग्रहण करता हो। अंतेवासी। छात्र [को०]।

विनोक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अलंकार जिसमें (किसी वस्तु के अभाव में) किसी वस्तु की हीनता या श्रेष्ठता वर्णन की जाती है। जैसे—(क) जिय बिनु देह नदी बिनु वारी। तैसई नाथ पुरुष बिनु नारी।—तुलसी (शब्द०)। (ख) कैसे नीके लगत ये बिनु संकोच के बैन।—बिहारी (शब्द०)

विनोद
संज्ञा पुं० [सं०] १. कौतूहल। तमाशा। मनोरंजक व्यापार। २. क्रीड़ा। खेल कूद। लीला। ३. प्रमोद। हँसी। दिल्लगी। परिहास। ४. कामशास्त्र के अनुसार एक प्रकार का आलिंगन। ५. एक प्रकार का प्रासाद। प्रमोदगृह। ६. हर्ष। आनंद। प्रस- न्नता। थौ०—विनोदरसिक=क्रीड़ाशील। कौतुकी। विनोद में आनंद लेनेवाला। विनोदस्थान=आनंददायक स्थान। क्रीड़ा विनोद की जगह। ७. हटाना। दूर करना। अपनयन। जैसे, श्रमविनोद (को०)। ८. औत्सुक्य। उत्सुकता। उत्कंठा (को०)।

विनोदन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० विनोदित, विनोदी] १. ऐसे व्यापार करना जिनका उद्देश्य केवल मनोरंजन हो। आमोद प्रमोद करना। क्रीड़ा करना। खेल कूद करना। २. हँसी दिल्लगी या हास विलास करना। ३. आनंद करना। ४. हटाना। दूर करना। अपवारण (को०)।

विनोदित
वि० [सं०] १. हर्षित। प्रसन्न। २. अपवारित। दूर किया या हटाया हुआ (को०)। ३. कुतुहलयुक्त।

विनोदी
वि० [सं० विनोदिन्] [वि० स्त्री० विनोदिनी] १. कुतूहल करनेवाला। आमोद प्रमोद करनेवाला। क्रीड़ा करनेवाला। २. खेल कूद करनेवाला। चुहलबाज। ३. जिसका स्वभाव आमोद प्रमोद करने का हो। आनंदी। ४. हटाने या दूर करनेवाला। अपवारण करनेवाला (को०)। ५. क्रीड़ाशील। खेलकूद या हँसी ठट्ठे में रहनेवाला। उ०—श्याम बिनोदी रे मधुबनिया।—सूर (शब्द०)।

विन्न
वि० [सं०] १. जाना हुआ। ज्ञात। २. प्राप्त। लब्ध। हासिल। ३. रखा हुआ। ४. विचारविमर्श किया हुआ। अनुसंहित। विचारित। ५. अस्तित्वयुक्त। अस्तित्व या सत्ता रखनेवाला। ६. [स्त्री० विन्ना] परिणीत। विवाहित [को०]।

विन्नक
संज्ञा पुं० [सं०] अगस्त्य ऋषि [को०]।

विन्नप
संज्ञा पुं० [सं०] १. राजतरंगिणी के अनुसार एक राजा का नाम। २. अगस्त्य ऋषि [को०]।

विन्ना
संज्ञा स्त्री० [सं०] विवाहिता स्त्री [को०]।

विन्यय
संज्ञा पुं० [सं०] दशा। स्थिति। [को०]।

विन्यसन
संज्ञा पुं० [सं०] विन्यास करना [को०]।

विन्यस्त
वि० [सं०] १. रखा हुआ। स्थापित। २. यथास्थान बैठाया हुआ। जड़ा हुआ। ३. करीने से लगा हुआ। ४. डालाहुआ। क्षिप्त। ५. सौंपा हुआ। समर्पित (को०)। ६. उपस्थित किया हुआ। प्रस्तुत (को०)।

विन्याक
संज्ञा पुं० [सं०] बरियारा नाम का पौधा।

विन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० विन्यस्त] १. स्थापन। रखना। धरना। उ०—शेली ने प्रबंधक्षेत्र में भी अच्छी तरह घुसकर भावों की अनेकरूपता का विन्यास किया था।—रस०, पृ० ६९। २. यथास्थान स्थापन। ठीक जगह पर करीने से रखना या बैठाना। सजाना। रचना। ३. जड़ना। ४. किसी स्थान पर डालना। ५. सौंपना। समर्पण (को०)। ६. संग्रह। समवाय (को०)। ७. फैलाना। विस्तार करना (को०)। ८. आधार। स्थान (को०)। ९. स्थिति। जैसे, अंगविन्यास (को०)।