विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/श

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हिंदी वर्णमाला में व्यंजन का तीसवाँ वर्ण। इसका उच्चारण प्रधानतया तालु का सहायता से होता है, इससे इसे तलव्य श कहते है। यह महाप्राण है और इसक उच्चारण में एक प्रकार का धषण होता है; इसलिय इस ऊष्म भी कहते हैँ। आभ्यंतर प्रयत्न के विचार से यह इषतस्पृष्ट है; और इसमे बाह्य प्रयत्न श्वास और घाष होता है ।

शं (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कल्याण। मंगल। २. मुख। ३. शांति। ४. राग का अभाव। बाह्य वस्तुओ से वैराग्य। ५. शास्त्र।

शं (१)
वि० शुभ।

शंक (१)
संज्ञा पुं० [सं० शड़्क] १. बैल, जो छक़ड़ा खोंवता है। २. भय। डर। आशंका।

शंक पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० शड़्का] सदेह। खटका। आशंका।

शंकन
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कन] १. वह जो भयकारक हो। वह जिससे संभ्राति या विस्नयाकुल हो। २. भय, शका या संदह उत्पन्न करने की क्रिया।

शंकना पु
क्रि० अ० [सं शङ्का या शङ्कन] १. शका करना। २. भय करना। डरना। उ०—(क) साँसति शाक चली, डरपेंहु ते किकर से करना मुख मार।—तुलसी (शब्द०)। (ख) शंक्या शंभु शलजा समत देत मेरा शेल शक्रपद दत हो सुशक्यो सुरपाल है।—भक्तमाल (शब्द०)।

शंकनीय
[सं० शङ्कनीय] १. शंका करने योग्य। संदेहास्पद। २. भय के योग्य। ३. अनुमान के योग्य। जिसका अनुमान किया जा सके।

शंकर (१)
वि० [सं० शङ्कर] १. मंगल करनेवाला। २. शुभ। ३. लाभदायक।

शंकर (१)
संज्ञा पुं० १. शिव का एक नाम जो कल्याण करनेवाले माने जाते हैं। महादेव। शंभु। यौ०—शंकर की लकड़ी = कहारों री परिभाषा में ऊख। विशेष—जब कहार पालकी लेकर चलते हैं और रास्ते में उन्हें ऊख पड़ी हुई मिलती है, तब आगेवाला कहार पीछेवाले कहार को सचेत करने के लिये इस पद का प्रयोग करता है। २. दे० 'शंकराचार्य'। ३. भीमसेनी कपूर। ४. कबूतर। ५. एक छंद का नाम जिसके प्रत्येक चरण में १६ और १० के विश्राम से २६ मात्राएँ होती हैं और अंत में गुरु लघु होता है। ६. एक राग जो मेघ राग का आठवाँ पुत्र कहा गया है। विशेष—कहते है कि इसका रंग गोरा है; श्वेत वस्त्र धारण किए हुए है; तीक्ष्ण त्रिशूल इसके हाथ में है; पान खाए और अरगजा लगाए स्त्री के साथ विहार करता है। शास्त्रों में यह संपूर्ण जाति का कहा गया है। रात्रि का प्रथम पहर इसके गाने का समय है; और यों रात्रि में कियी समय गाया जा सकता है।

शंकर (३)
संज्ञा पुं० [सं० सङ्कर] दे० 'संकर' उ०—शंकर बरण पशु पक्षी में ही पाइयत अलकही पारत अरु भंग निरधारही।— गुमान (शब्द०)।

शंकर का फूल
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कर + हिं० फूल] शंखोदरी। गुलपरी।

शंकरकिंकर
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करकिङ्कर] शंकर का दास। शिवभक्त।

शंकरचूर
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करचूर (< सं०चूड़ = चूड़ा)] एक प्रकार का सर्प। विशेष—कहते हैं, इसकी उत्पत्ति पातराज और दूधराज सर्प के जो़ड़े से होतो है। यह कभी कभी ९, १० हाथ लंबा होता है। इसके जहर के दाँत बड़े होते हैं, इसी से इसका काटना सांघातिक होता है, यह बहुत कम देखने में आता है और वंग देश में केवल सुंदरवन में होता है। यह बहुत ही भयंकर होता और इसका पकड़ना बड़ा कठिन है।

शंकरजटा
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्करजटा] १. रुद्रजटा। जटाधारी नाम का पौधा। २. सागूदाना। साबूदाना। ३. एक प्रकार की पिठवन।

शंकरताल
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करताल] संगीत में एक प्रकार का ताल। इसमें ११ मात्राएँ होती हैं। इसमें ९ आघात और २ खाली होते हैं। इसके मृदंग की बोल इस प्रकार है— + १ ० २ ३ ४ ० २ धा धिन ता देत खून्ना केटे ताग धाधिन ता, देत खून्ना तेदे केटे ६ ७ ८ + नाग् देत तेटे कता गदि धेने। धा।

शंकरतीर्थ
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करतीर्थ] पुराणानुसार एक प्राचीन तीर्थ का नाम।

शंकरप्रिय
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करप्रिय] १. तीतर पक्षि। २. धतूरा। ३. गूमा। द्रोणपुष्पी। गोम।

शंकरमत्त
संज्ञा पुं० [सं०शङ्करमत्त] एक प्रकार का लोहा जिसे शंकरलोह भी कहते हैं।

शंकरवाणी
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्करवाणी] शंकर का वाक्य अर्थात् ब्रह्मवाक्य जिसका सत्य होना परम निश्चित माना जाता है। सदा ठीक घटनेवाली बात।

शंकरशुक्र
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करशुक्र] पारा। पारद।

शंकरशैल
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करशैल] महादेव जी का पर्वत, कैलास। उ०—शंकरशैल शिला तल मध्य किधौ शुक की अवली फिरि आई।—केशव (शब्द०)। (ख) शंकरशैल चढ़ी मन मोहति। सिद्धन की तनया जनु सोहति।—केशव (शब्द०)।

शंकरश्वशुर
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करश्वशुर] हिमवान् पर्वत।

शंकरस्वामी
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करस्वमिन्] दे० 'शंकराचार्य'।

शंकरा (१)
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कर] १. एक प्रकार का राग जिसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं। यह दीपक राग का पुत्र माना जाता है। विशेष दे० 'शंकर'-७. और 'शंकराभरण'। २. शमी। सफेद कीकर। ३. मजीठ। ४. शिवा। भवानी। पार्वती।

शंकरा (२)
वि० स्त्री० [सं० शङ्करा] कल्याण करनेवाली। मंगल करनेवाली।

शंकराचारी
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कराचारिन्] श्रीशंकराचार्य द्वारा संस्थापित शैव धर्म का अनुयायी।

शंकराचार्य
संज्ञा पुं० [सं०] अद्बैत मत के प्रवर्तक एक प्रसिद्ब शैव आचार्य। विशेष—इनका जन्म सन् ७८८ ई० में केरल देश में कालपी अथवा काषल नामक ग्राम में नंबूदरीपाद ब्राह्मण के घर हुआ था; और ये ३२ वर्ष की अल्प आयु में सन् ८२० ई० में केदारनाथ के समीप स्वर्गवासी हुए थे। इनके पिता का नाम शिवगुरु और माता का नाम सुभद्रा था। बहुत दिनों तक सपत्नीक शिव की आराधना करने के अनंतर शिवगुरु ने पुत्ररत्न पाया था, अतः उसका नाम शंकर रखा। जब ये तीन ही वर्ष के थे, तब इनके पिता का देहांत हो गया था। ये बड़े हो मेधावी तथा प्रतिभाशाली थे। छहु वर्ष की अवस्था में ही ये प्रकांड पंडित हो गए थे और आठ वर्ष की अवस्था में इन्होने संन्यास ग्रहण किया था। इनके संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी विचित्र है। कहते है, माता अपने एकमास पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थी। एक दिन जब शंकर अपनी माता के साथ किसी आत्मीय के यहाँ से लौट रहे थे, तब नदी पार करने के लिये वे उसमें धुसे। गले भर पानी में पहुँचकर इन्होने माता को संन्यास ग्रहण करने की आज्ञा न देने पर डूब मरने की धमकी दी। इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी होन की आज्ञा प्रदान की और इन्होंने गोविंद स्वामी से संन्यास ग्रहण किया। शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्रों की बड़ी ही विशद और रोचक व्याख्या की है। पहले ये कुछ दिनों तक काशी में रहें थे और तब इन्होंने विजिलविंदु के तालवन में मंडन मिश्र को सपत्नीक शास्त्रार्थ में परास्त किया। इन्होंने समस्त भारतवर्ष में भ्रमण करके बौद्ध धर्म को मिथ्या प्रमाणित करके वैदिक धर्म को पुनरुजीवित किया था। उपनिषदों और वेदांतसूत्र पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। इन्होंने भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिनके प्रबंधक तथा गद्दी के अधिकारी शंकराचार्य कहे जाते है। वे चारों स्थान निम्न- लिखित हैं—(१) बद्रिकाश्रम, (२) करवीरपीठ, (३) द्वारिका- पीठ और (४) शरदापीठ। इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दक्षित किया था। ये शंकर के अवतार माने जाते है।

शंकरादि
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करादि] सफेद आक। सफेद मदार।

शंकराभरण
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कराभरण] संपूर्णा जाति का एक प्रकार का राग जो नटनारायण राग का पुत्र माना जाता है। इसके गाने का समय प्रभात है, और किसी किसी के मत से सायंकाल में १६ दंड से दंड तक भी गाया जा सकता है। उ०—गाऊँ कैसे शंकराभरण, दरसाऊँ कैसे स्वर लक्षण।—क्वासि, पृ० ७३।

शंकरालय
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करालय] कैलास।

शंकरावास
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करावास] १. कैलास। २. कर्पूर (को०)।

शंकरवास कर्पूर
संज्ञा पुं० [सं० शङ्करावास कर्पूर] भीमसेनी कपूर। बरास।

शंकराह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्कराह्वा] शमी का वृक्ष।

शंकरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्करी] १. शिव की पत्नी पार्वती। २. मंजिष्ठा। मजीठ। ३. शमी का वृक्ष। ४. एक रागिनी जो मालकोश राग की सहचरी मानी जाती है।

शंकरी (२)
वि० कल्याण करनेवाली। मंगल करनेवाली।

शंकर्षण
संज्ञा पुं० [सं० शडकर्षणा] १. विष्णु का एक नाम। २. रोहिणि के पुत्र का नाम। दे० 'संकर्षण'।

शंकव
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्कव] सकुची मछली। विशेष दे० 'सकुची'।

शंकव्य
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कव्य] १. वह वस्तु जो शंकु या कील के योग्य हो। जैसे, काष्ठ आदि। २. वह जिसके संबंध में शंका या संदेह किया जा सके [को०]।

शंका
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्का] १. मन में होनेवाला अनिष्ट का भय। डर। खौफ। खटक। उ०—(क) टेढ़ जान शंका सब काहू। वक्र चंद्रमहि ग्रसै न राहू।—तुलसी (शब्द०)। (ख) शंका है दशानन को हंका दै सुबंका बीर, डंका दै विजय को कपि कूद परयो लंका में।—पद्माकर (शब्द०)। २. किसी विषय की सत्यता या असत्य़ता के संबंध में होनेवाला संदेह। आशंका। संशय। शक। उ०—(क) नृप विलोकि शंका उपजावा। सजल नयन मुख बचन न आवा।—सबल (शब्द०)। (ख) तुमहि वरण चाहत हौं आपहि। पै हिडंव शंका मन आवहि।—सबल (शब्द०)। ३. साहित्य के अनुसार एकसंचारी भाव। अपने किसी अनुचित व्यवहार अथवा किसी और कारण से होनेवाली इष्टहानि की चिंता। ४. भ्रांत- विश्वास। मिथ्या धारणा (को०)। ५. तर्कवितर्क या वादविवाद में आपत्ति खान करना (को०)। ६. परिकल्पना। संभावना (को०)। यौ०—शंकाजनक = संदेह उत्पन्न करनेवाला। शंकानिवारण = संदेह, भय आदि का दूर होना। शंकानिवृत्ति = सदेह दूर होना। खटका मिटना। शंकाशंकु। संदेह का काँटा। शंकाशील = प्रत्येक बात में संदेह करनेवाला। शंकालु।

शंका अतिचार
संज्ञा पुं० [सं० शङ्काअतिचार] जेनियों के अनुसार एक प्रकार का पाप या अतिचार जो जिनवचन में शंका करने से होता है।

शंकाकुल
वि० [सं० शङ्काकुल] शकित। संदेहयुक्त। उ०—लख शकाकुल हो गए अतुल बल शोषशयन। खिंच गए द्दगों में सोता के राममय नयन।—अनामिका, पृ० १२२।

शंकान्वित
वि० [सं० शङ्कान्वित] दे० 'शंकाकुल'।

शंकाभियोग
संज्ञा पुं० [सं० शङ्काभियोग] संदेह वा शंका का दोषारोपण [को०]।

शंकालु
वि० [सं० शङ्कालु] जो प्रायः शंका या संदेह करता हो। शंकाशील।

शंकासमाधान
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कासमाधान] शंका या संदेह का निवारण या निराकरण। २. शंका और समाधान। संदेह और उसका निवारण [को०]।

शंकास्पद
वि० [सं० शङ्कास्पद] संदेह, खटका वा भय का विषय [को०]।

शंकित (१)
वि० [सं० शड़िकत] [वि० स्त्री० शंकिता] १. डरा हुआ। भयभीत। त्रस्त। जिसे संदेह हुआ हो। ३. अनिश्चित। सदेहयुक्त। सदिग्ध। उ०—दशन धरि धरनि चिक्करत दिग्गज कमठ, शेष सकुचित, शंकित पिनाकी।—तुलसी (शब्द०)। ४. विचलित। अद्दढ़। अस्थिर (को०)। यौ०—शांकतचित्त, शकितमना = (१) शंकाकुल। संशयालु। (२) भीरु। कातरह्वदय। डरपोक। (३) सदिग्ध। शांकितवर्ण। शांकतवर्णक।

शंकित (२)
संज्ञा पुं० भटेउर या चोरक नाम का गंधद्रव्य।

शंकितवर्ण
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कतवर्ण]दे० 'शंकितवर्णक'।

शंकितवार्णक
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कतवर्णक] तस्कार। चोर।

शंकिनी
वि० स्त्री० [सं० शङ्किनी] शंकायुक्त। संदेहास्पद। उ०— प्रिये, ठीक कहती हो तुम यह, सदा शंकिनी आशा है।—साकेत, पृ० ३६९। २. संदेह करनेवाली। शंका करनेवाली।

शंकी
वि० [सं० शड्किन्] [वि० स्त्री० शंकिनी] १. शंका या संदेह करनेवाली। शंका से पूर्ण (को०)। २. खतरनाक।

शंकु
संज्ञा पुं० [सं०शङकु] १. कोई नुकीली वस्तु। २. मेख। कील। ३. खूँटी। ४. भाला। बरछा। ५. गाँसी। फल। ६. लीलावती के अनुसार दस लक्ष कोटि की एक संख्या। शंख। ७. एक प्रकार की मछली। सकुची मंछली। ८. कामदेव। ९. शिव। १०. राक्षस। ११. विष। १२. हंस। १३. वल्मीक। बाँबी। १४. कलुष। पाप। १५. प्राचीन काल का एक प्रकार का बाजा। १६. बारह अंगुल की एक नाप। १७. बारह अंगुल की एक खूँटी, जिसका व्यवहार प्राचीन काल में सूर्य या दीए की छाया आदि नापने में होता था। १८. वृक्षों में की रस खींचने की शक्ति। १९. गावदुप खंभा जिसके ऊपर का हिस्सा नुकीला और नीचे का मोटा हो। २०. पुराणानुसार उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के नवरत्न पडितों में से एक। २१. उग्रसेन का एक पुत्र। २२. दाँव। २३. पत्तों की नसें। २४. नखी नामक गंधद्रव्य। २५. लिंग। २६. शिव के अनुचर एक गंधर्व का नाम। २७. कटे हए वृक्ष का तना। ठूँठ (को०)। २८. बाणा का अग्रभाग। तीर की गाँसी (को०)। २९. साल का वृक्ष (को०)। ३०. (ज्योतिष में) लंब रेखा या ऊँचाई (को०)।

शंकुक
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कुक] १. संस्कृत के एक प्रसिद्ध विद्बान् जिनका मत रसविवेचन के संबंध में समाद्दत साहित्यशास्त्रों में है। २. छोटी खूँटी।

शंकुकर्ण
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कुकर्ण] १. वह जिसके कान शंकु के समान लंबे और नुकीले हों। २. गदहा। ३. एक नाग का नाम।

शंकुकर्णी
संज्ञा पुं० [सं० शङकुकर्णिन्] शिव। महादेव।

शंकुचि
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्कुचि] सकुची मछली।

शंकुच्छाया
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्कुच्छाया] १. शंकु की छाया। २. प्राचीन काल की बारह अंगुल की एक नुकीलो खूँटी जिसका ऊपरी भाग नुकीला होता था। इसकी छाया से समय का परिमाण मालूम किया जाता था।

शंकुजीवा
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्कुजीवा] ज्योतिष के अनुसार शंकु की ज्या या ज्यापिंड।

शंकुतरु
संज्ञा पुं० [सं० शड़कुतरु] शाल का वृक्ष। साखू का पेड़।

शंकुद्वार
संज्ञा पुं० [सं० शङकुद्वार] गुजरात के समीप के एक छोटे टापू का नाम। यहाँ शकु नारायण की मूर्ति है।

शंकुधान
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कुधान] वह सूराख जिसमें शंकु बैठाई वा जड़ी जाय [को०]।

शंकुनारायण
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कुनारायण] नारायण की वह मूर्ति जो शंकुद्वार टापू में है।

शंकुपुच्छ
संज्ञा पुं० [सं० शंङ्कुपुच्छ] भौरे आदि का डंक [को०]।

शंकुफणी
संज्ञा पुं० [सं० शङकुकणिन्] जल में रहनेवाले जंतु। जलचर।

शंकुफलिका, शंकुफली
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्कुफलिका, शङकुफली] सफेद कीकर। शमी।

शंकुमती
संज्ञा स्त्री० [सं० शङकुमती] एक वैदिक छंद जिसके पहले पाद में पाँच और शेष तीनों में छह छह या इससे कुछ न्यूना- धिक वर्ण होते हैं।

शंकुमुख
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कुमुख] १. मगर। २. चूहा।

शंकुमुखी
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्कुमुखी] जोंक।

शंकुमूली
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कुमूली] अगहन मास के शुक्ल पक्ष का १५वाँ दिन [को०]।

शंकुयंत्र
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कुयन्त्र] एक यंत्र जिसके द्वारा सूर्य चंद्र के दिगंश और उन्नतांश का ज्ञान होता है (ज्योतिष)।

शंकुर (१)
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कुर] पुराणानुसार एक दानव का नाम।

शंकुर (२)
वि० भयंकर। भीषण।

शंकुला
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्कुला] १. सुपारी काटने का सरौता। २. एक प्रकार का चाकू या शलाका। उत्पलपत्र। उत्पल- पात्रिका (को०)।

शंकुवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कुवृक्ष] शाल का वृक्ष।

शंकुशिर
संज्ञा पुं० [सं० सङ्कुशिरस्] भागवत के अनुसार एक असुर का नाम।

शंकुश्रवण
संज्ञा पुं० [शङ्कुश्रवण]दे० 'शंकुकर्ण'।

शंकोच, शंकोचि
संज्ञा पुं० [सं० शङ्कोच, शङ्कोचि] सकुची मछली।

शंकोशिक
वि० [सं० शङ्कोशिक] नैमित्तिक। (सांख्य)।

शंक्य
वि० [सं० शङ्क्य]दे० 'शंकनीय'।

शंख
संज्ञा पुं० [सं० शङ्ख] १. एक प्रकार का बड़ा घोंघा जो समुद्र में पाया जाता है। विशेष—इसे एक प्रकार का जलजंतु, जिसे शंख कहते हैं, अपने रहने के लिये तैयार करता है। लोग इस जंतु को मारकर उसका यह कलेवर बजाने के उपयोग में लाते हैं। यह बहुत पवित्र समझा जाता है और देवता आदि के सामने तथा लड़ाई के समय मुँह से फूँककर बजाया जाता है। पुराणों के अनुसार विष्णु भगवान् के चारों हाथों में से एक हाथ में शंख भी रहता है। इसके दो भेद होते हैं। एक दक्षिणावर्त्त और दूसरा वामावर्त्त। इनमें से दक्षिणावर्त्त बहुत कम मिलता है। वैद्यक के अनुसार यह नेत्रों को हितकारी, पित, कफ, रुधिरविकार विषविकार, वायुगोला, शूल, श्वास, अजीर्ण, संग्रहणी और मुँहासे को नष्ट करनेवाला माना गया है। दक्षिणावर्त में इससे भी अधिक गुण होते हैं। कहते है, जिसके घर में यह रहता है, उसके धन की अधिक वृद्धि होती है। वामावर्त्त ही अधिक मिलता है और यही औषध के काम आता है। जो शंख उज्वल और चमकदार होता है, वह उत्तप्त समझा जाता है। इसको विधिपूर्वक शुद्ध कर भस्म बनाकर देने से सब प्रकार के ज्वर, सब प्रकार की खाँसी, श्वास, अतिसार आदि रोगों में उचित अनुपान से अत्यंत लाभकारी है। यह स्तंभक और वाजीकरण भी है। इसकी मात्रा चार रत्ती से डेढ़ माशे तक है। मुहा०—शंख बजना = विजय प्राप्त होना। सफलता मिलना शंख बजाना = (१) सफल होने पर अथवा कृतकार्य होने पर आनंद मनाना। (२) किसी की बुराई या हानि देखकर आनंद मनाना। (३) असफल एवं अकृतकार्य होने पर दुःखी होना। झंखना (व्यंग्य)। यौ०—शंख का मोती = एक प्रकार का कल्पित मोती। कहते है, यह समुद्र के अंतर्गत दुर्गम स्थानों में शंख के अंदर उत्पन्न होता है। पर्या०—कंब कंबोज। पावनध्वनि अतःकुटिल। सुनाद। महानाद। मुखर। बहुनाद। दीर्घनाद। हरिप्रिय। २. दस खर्व की एक संख्या। एक लाख करोड़। ३. कनपटी। ४. हाथी का गंडस्थल, अथवा दाँतों के बीच का भाग। ५. चरणचिह्न। ६. एक दैत्य का नाम जो देवताओँ को जीतकर वेदों को चुरा ले गया था और जिसके हाथों से वेदों का उद्धार करने के लिये भगवान् को मत्स्यावतार धारण करना पड़ था। शंखासुर। ७. नखी नाम का सुगंधित द्रव्य। ८. एक निधि। उ०—शंख खर्व नीलाठए नवई निद्धि जु कुंद। विश्राम (शब्द०)। ९. राजा विराट् का पुत्र जिसे द्रोणाचार्य ने मारा था। इसके भाई का नाम उत्तर था। उ०—उत्तर शंख नृपति सुख वीरा। औरा सजे अमित रणधीरा।—सबल (शब्द०)। १०. एक राजमंत्री का नाम। उ०—सुरति, सुधन्वा जू सों दोष के करत मरे शख औ लिखित विप्र भयो मैलो मल है।—नाभादास (शब्द०)। ११. कुवेर की निधि के देवता १२. चंपकपुरी के राजा हंसध्वज का उपरोहित और लिखित का भाई जो स्मृतिकार थे। उ०—शख लिखित उपरोहित दोई। रहे तहाँ जानत सब कोई।—सबल (शब्द०)। १३. धारा नगर के राजा गंधर्वसेन का बड़ा लड़का और राजा विक्रमादित्य का वड़ा भाई जिसे मारकर विक्रम ने गद्दी प्राप्त की थी। १४. छप्पय के ७१ भेदों में से एक भेद। इसमें १५२ मात्राएँ या १४९वर्ण होते हैं, जिनमें से ३गुरु और शेष १४६ लघु होते है। १५ दंडक वृत्त के अंतर्गत प्रचित का एक भेद। इसमें दो नगण और चौदह रगण होते हैं। १६. कपाल। लिलार। १७ पवन के चलने से होनेवाला शब्द। १८. मस्तक की हड्डी (को०)। १९. सौनिक ढोल या मारू बाजा (को०)। २०. नागो के आठ नायको में से एक का नाम (को०)। २१. शंख का बना हुआ वलय (को०)।

शंखकंद
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खकन्द] शंखालु। साँक।

शंखक
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खक] १. वैद्यक के अनुसार एक प्रकार का असाध्य रोग। शंखवात। विशेष—इस रोग में बहुत गरमी होती है और त्रिदोष बिगड़ने से कनपटी में दाह सहित लाल रंग की गिल्टी निकल आती है, जिससे सिर और गला जकड़ जाता है। कहते हैं, यह असाध्य रोग है और तीन दिन के अंदर इसका इलाज संभव है, इसके बाद नहीं।२. हवा के चलने का शब्द। ३. हीरा कसीस। ४. मस्तक। माथा। ५. नौ निधियों में से एक निधि। ६. शंख का बना कंकण या वलय।

शंखकर्ण
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खकर्ण] शिव के एक अनुचर का नाम। शिव का एक गण।

शंखकार शंखकारक
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खकार, शंखकारक] पुराणा- नुसार एक वर्णसंकर जाति जिसकी उत्पत्ति शूद्रा माता और विश्वकर्मा पिता से मानी गई है। इस जाति के लोग शंख की चीजें बनाने का काम करते हैं।

शंखकुसुमा
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खकुसुमा] १. शंखपुष्पी। २. सफेद अपराजिता। सफेद कोयल लता।

शंखकूट
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खकूट] १. एक नाग का नाम। २. पुराणानुसार एक पर्वत का नाम।

शंखक्षीर
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खक्षीर] शंख का दूध अर्थात् कोई असंभव और अनहोनी बात।

शंखचरी, शंखचर्ची
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खचरी, शङ्खचर्ची] १. चंदन का तिलक (ललाट पर का)। २. एक राक्षास का नाम जिसे कंस ने कृष्ण को मारने के लिये भेजा था। विशेष—कहते है, यह सुदामा नामक गोप था जो राधा के शाप से असुर हो गया था इसका विवाह तुलसी से हुआ था। ब्रह्मवैवर्त पुराण में लिखा है कि इसका संहार महादेव जी ने अपने शूल से किया था। २. कुवेर के दूत और सखा का नाम। ३. एक यक्ष का नाम। ४. पुराणानुसार द्बारिका निवासी एक गृहस्थ का नाम जिसके पुत्र उत्पन्न होकर अदृश्य हो जाते थे। ५. एक नाग का नाम। ६. एक तीर्थस्थान।

शंखचूर्ण
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खचूर्ण] शंख की बुकनी। शंख का चूरा [को०]।

शंखज
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खज] बड़ा मोती जो शंख से निकलता है।

शंखजीरा
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खजीरा] संग जराहत। विशेष—जान पड़ता है, यह शब्द फारसी संग जराहत का बनाया हुआ संस्कृत रूप है।

शंखण
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खण] रामायण के अनुसार प्रवृद्ध के लड़के का नाम।

शंखतीर्थ
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खतीर्थ] एक प्राचीन तीर्थ का नाम।

शंखदारक
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खदारक] एक वर्णसंकर जाति। दे० 'शंखकार'।

शंखद्राव (१)
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खद्राव] वैद्यक के अनुसार एक प्रकार का अर्क जिसमें शंख भी गल जाता है। विशेष—आध सेर हीरा कसीस, सेर भर सेंधा नमक और सेर भर शोरा चूर्णा करके ढेकली यंत्र से रस निकाल लिया जाता है, जो शंखद्राव कहलाता है। कहते हैं, इसके सेवन से शूल, गुल्म अर्श, प्लीहा, उदररोग, अजीर्ण और वातरोग सब दूर होते हैं। इसे काँच या चीनी की शीशी में रखना चाहिए; अन्यथा पात्र गल जायगा। इसके सेवन के समय मुँहमें घी लगा देना चाहिए, नहीं तो खिह्ला और दाँतों को हानि पहुँचेगी।

शंखद्राव
वि० कोई ऐसा तीक्ष्ण रस था क्षार जिसमें डालने से शंख गल जाय।

शंखद्रावक
संज्ञा पुं० वि० [सं० शङ्खद्रावक]दे० 'शंखद्राव'।

शंखद्रावी
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खद्रविन्] अमलबेल। चुक।

शंखद्बीप
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खद्विप] पुराणानुसार एक द्बीप का नाम। (संभवतः यह आधुनिक अफ्रीका है)

शंखधर
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खधर] १. शंख को धारण करनेवाले, अर्थात् विष्णु। २. श्रीकृष्ण। उ०—गिरिधर वज्रवर धरनी- धर पीताबंरधर मुकुटधर गोपधर शंखधर सारंगधर चक्रधर रस धरें अधर सुधाधर।—सूर (शब्द०)।

शंखधरा
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खधरा] हुरहुर का साग। हिलमोचिका।

शंखधवना
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खधवना] जूही। यूथिका।

शंखध्म, शंखध्मा
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खध्म, शङ्खध्मा] शंखवादक। वह जो शंख बजावे [को०]।

शंखध्वनि
संज्ञा स्त्री० [शङ्खध्वनि] शंख की आवाज जो विजय, सफ- लता या कभी कभी आतंक औक निराशा व्यक्त करती है।

शंखन
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खन] १. अयोध्या के राजा कल्माषपाद के एक पुत्र का नाम। २. वज्रनाभ के पुत्र का नाम।

शंखनक
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खनक] छोटा शंख। घोंवा [को०]।

शंखनख
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खनख] १. घोघा। छोटा शंख। २. व्याघ्रनख। नखा नाम का गंधद्रव्य।

शंखनखा, शंखनखी
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खनखा, शङ्खनखी] १. घोघा। छोटा शंख। २. नखा नामक गंधद्रव्य।

शंखनाभि
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खनाभ] १. एक प्रकार का शख। २. एक प्रकार का गंधद्रव्य।

शंखनाम्नी
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खनाम्नी] शंखाहुली। शंखपुष्पी।

शंखनारी
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खनारी] एक वृत का नाम जिसमें छह वर्ण होते है। यह दो यगण का वृत्त है। इसे सामराजी वृत्त भी कहते हैं।

शंखनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खिनी] दे० 'शंखिनी'।

शंखपलीता
संज्ञा पुं० [सं० शङ्ख + हिं० पलीता] एक प्रकार का रेशेदार खनिज पदार्थ जो ज्वालामुखी पर्वतों से निकलता है। विशेष—इसका रंग सफेद या हरा होता है और इसमें रेशम की सी चमक होती है। इसका विशेष गुण यह है कि यह जल्दी जल्दी जलता नहीं, इसी लिये गैस के भट्ठे बनाने में इसका बहुत उपयोग होता है। आग से न जलनेवाले कपड़े तैयार करने में भी यह काम में लाया जाता है। गरमी ओर बिजली का प्रवेश इसमें बहुत कम होता है; इसी से यह बिजली के तार आदि लपेटने में भी काम आता है। इंजिनो के जोड़ इसी सेभरे या बंद दिए जाते हैं। यह कारसिका, स्काँटलैड, कनाडा, इटली आदि देशों में अधिक मिलता है।

शंखपाणि
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खपाणि] हाथ में शंख धारण करनेवाले विष्णु।

शंखपाल
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खपाल] १. शकरपारा नाम की मिठाई। विशेष दे० 'शकरपारा'। २. एक प्रकार का साँप। ३. एक नाग का नाम। ४. कर्दम के पुत्र का नाम। ५. सूर्य का एक नाम (को०)।

शंखपाषाण
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खपाषाण] संखिया।

शंखपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खपुष्पिका] दे० 'शंखपुष्पी'।

शंखपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खपुष्पी] १. सफेद अपराजिता। श्वेत- अपराजिता। सफेद कोयल लता। २. जूही। यूथिका। ३. शंखाहुली। शंखाह्वा।

शंखप्रस्थ
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खप्रस्थ] चंद्रमा का कलंक।

शंखभस्म
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खभस्म] १. चूना। २. शंख का वैद्यक विधि से निर्मित भस्म।

शंखभृत्
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खभृत्] शंख धारण करनेवाले विष्णु।

शंखमालिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खमालिनी] शँखाहुली। शंखपुष्पी।

शंखमुक्ता
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खमुक्ता] शंखज नाम का बड़ा मोती।

शंखमुख
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खमुख] कुंभीर। घड़ियाल। ग्राह।

शंखमूलक
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खमूलक] मूली।

शंखयूथिका
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खयूथिका] जूहो। यूथिका।

शंखरी
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खरी] वह जो शंख की चूड़ी बनाने का व्यवसाय करता हो।

शंखलिखित (१)
वि० [सं० शङ्खलिखिन] निर्दोंष। दोषरहित। बेऐब।

शंखलिखित (२)
संज्ञा पुं० १. न्यायशील राजा। २. शंख ओर लिखित नाम के दो ऋषि जिन्होंने एक स्मृति बनाई थी।

शंखलिखित (३)
संज्ञा स्त्री० शंख और लिखित ऋषियों द्बारा लिखी हुई स्मृति। उ०—सचिव सुधन्वै चह्यो जरावा। शंखलिखित फल आपुइ पावा।—रघुनाथ (शब्द०)।

शंखवटी
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खवटी] वैद्यक में एक प्रकार की बटी या गोली। विशेष—इसके प्रस्तुत करने प्रणाली यह है—नीबू के रस में बुझाई हुई शंख की भस्म टके भर और जवाखार, सेंका हींग, पाँचों नमक, सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली, शुद्ध सिगा मुहरा, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक की कजली ये सब दस दस टंक एक मे मिलाकर सबका चूर्णा करके नीबू के रस मे खरल करके चने के बराबर गोलियाँ बनाते हैं। कहते है, लौंग के जल के साथ इसकी एक गाली सेवन करने से संग्रहण, शूल और वायुगोला आदि रोग दूर होते हैं।

शंखवटी रस
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खवटा रस] वैद्यक में एक प्रकार की वटी या गोली जो शूल राजा का तत्काल दूर करनेवाली मानी जाती है। विशेष—इसके प्रस्तुत करने की विधि यह हैं,—बड़े शंख को तपा तपाकर ग्यारह बार नीबू के रस में बुझाते हैं, और इस शंख के चूर्णा में टके भर इमली का खार, ५. टंक साँचर नमक, टके भर सेंधा नमक, टके भर विड़ नोन, ६. माशे सोंठ, ६ माशे काली मिर्च, ६. माशे पिप्पली, टके भर सेकी हींग टके भर शुद्ध गंधक, टके भर शुद्ध पारा, १. टंक सिंगी मुहरा, इन सबकी मिलाकर जल के साथ घोंटकर छोटे बैर के बराबर गोलियाँ बना लेते हैं।

शंखवात
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खवात] सिर की पीड़ा। विशेष दे० 'शंखक'—१।

शंखविष
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खविष] संखिया।

शंखवेलान्याय
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खवेलान्याय] एक प्रकार का न्याय जिसमें किसी एक कार्य के होने से किसी दूसरी बात का वैसे ही ज्ञान होता है, जैसे शख बजने से समय का ज्ञान होता है।

शंखशुक्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खशुक्तिका] सीप।

शंखसंकाश
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खसंङ्काश] संखालु। सफेद शकरकंद।

शंखस
संज्ञा पुं० [सं० शँङ्खस] शंख की चूड़ी़ या कड़ा।

शंखस्वन
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खस्वन] शंख का शब्द या ध्वनि [को०]।

शंखांतर
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खान्तर] ललाट। मस्तक [को०]।

शंखाख्य
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खाख्य] बृहन्नखी या बघनखा नामक गंधद्रव्य।

शंखारु, शंखालु
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खरु, शङ्खालु] शंखालुक। शंखकंद। सफेद शकरकंद।

शंखालुक
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खालुक] शंखालु। सफेद शकरकंद।

शंखावर्त
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खावर्त] एक प्रकार का भगंदर रोग जिसे शंबुकावर्त भी कहते हैं। विशेष दे० 'शंबुकावर्त्त'।

शंखासुर
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खसुर] एक दैत्य जो ब्रह्मा के पास से वेद चुराकर समुद्र के गर्भ में जा छिपा था। इसी को मारने के लिये विष्णु ने मत्स्यावतार धारण किया था। उ०—बहुरो किलाल बैठ मारयो जिन शंखासुर ताते वेद अनेक विधाता को दिख हैं।—हनुमन्नाटक (शब्द०)। २. दैत्य का पिता। उ०—शंखासुर सुत पितु वध जान्यो। तब बन जाइ तहाँ तप ठान्यो।—रघुनाथ (शब्द०)।

शंखास्थि
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खस्थि] १. सिर की हडड़ी। २. पीठ की हड्डी।

शंखाहुली
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खपुष्पी या शङ्खफुल्ल] १. शंखाहुली। शंखपुष्पी। विशेष दे० 'कौड़ियाला'—४। २. सफेद अपराजिता या कोयल लता।

शंखाहोली
संज्ञा स्त्री० [सं० शंखपुष्पी, शंङ्खफुल्ली, हि० शंखाहुली] शखपुष्पी। कौड़ियाला। कौड़ेना।

शंखाह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खह्वा] शंखपुष्पी [को०]।

शंखिका
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खिका] अंधाहुली। चोरपुष्पी।

शंखिन
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खिन] सिरस। शिरिष का वृक्ष।

शंखिनिका
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खिनिका] ग्रंथिपर्णी। गठिवन।

शंखिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खिनी] १. एक प्रकार की वनौषधि। विशेष—इसकी लता और फल शिवलिंगी के समान होते हैं। अंतर केवल यही है कि शिवलिंगी के फल पर सफेद छींटे होते हैं जो शंखिनी के फल पर नहीं होते। इसके बीज शंख के समान होते हैं जिनका तेल निकलता है। वैद्यक में यह चरपरी, स्निग्ध और कड़वी, भारी, तीक्ष्ण, गरम, अग्निदीपक, बलकारक, रुचिकारी और विषविकार, आमदोष, क्षय, रुधिरविकार तथा उदरदोष आदि को शांत करनेवाली मानी जाती है। पर्या०—यवतिक्ता। महातिक्ता। भद्रातिक्ता। सूक्ष्मपुष्पी। द्दढ़पादा। विसर्पिणी। नाकुली। नेञमीला। अक्षपीड़ा। माहेश्वरी। तिक्ता। यावी। २. पद्मिनी आदि स्त्रियों के चार भेदों में से एक भेद। उ०—कोइ शंखिनि युत रोष दय़ा बिन बेगि प्रचारै।—विश्राम (शब्द०)। विशेष—कहते हैं, ऐसी स्त्री कोपशील, कोविद, सलीम शरीरवाली, बड़ी बड़ी और सजल आँखोंवाली, देखने में सुंदर, लज्जा और शंकारहित, अधीर, रतिप्रिय, क्षार गंधयुक्त और अरुण नखवाली होती है, यह वृषभ जाति के पुरुष के लिये उपयुक्त होती है। ३. गुदाद्बार की नस। ४. मुँह की नाड़ी। उ०—मुख अस्थान शंखिनी केरा। ये नाड़िन के नाम निबेरा।—विश्राम (शब्द०)। ५. एक देवी का नाम। ६. सीप। ७. एक शक्ति जिसकी पूजा बौद्ब लोग करते हैं। ८. एक तीर्थस्थान का नाम। ९. एक प्रकार की अप्सरा। १०. शंखाहुली।

शंखिनी डंकिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्खिनी] एक प्रकार का उन्माद। विशेष—इस उन्माद रोग के लक्षण इस प्रकार कहे गए हैं।— सर्वांग में पीड़ा होना, नेत्र बहुत दुखना, मूर्छा होना, शरीर काँपना, रोना, हँसना, बकना, भोजन में अरुचि, गला बैठना, शरीर के बल तथा भूख का नाश, ज्वर चढ़ना और सिर में चक्कर आना, आदि।

शंखिनी फल
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खिनीफल] सिरस का वृक्ष।

शंखिनीवास
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खिनीवास] शाखोट वृक्ष। सहोरा।

शंखिया
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० 'संखिया'।

शंखी
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खिन्] १. विष्णु। २. समुद्र। ३. एक प्रकार का साँप। ४. शंख बजानेवाला।

शंखोदक
संज्ञा पुं० [सं० शङ्खोदक] शंख में भरा हुआ जल जो पवित्र माना जाता है।

शंखोदधिमल
संज्ञा पुं० [सं०] समुद्रफेन।

शंखोदरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मध्यम आकार का एक प्रकार का बीज जो बागों में शोभा के लिये लगाते हैं। गुलपरी। गुलतुरी। सिद्धेकर। विशेष—इसके पत्तो चकवँड़ के पत्ते के समान होते हैं। पीले और लाल फुलों के भेद से यह वृक्ष दो प्रकार का होता है। इसकी कलियाँ उँगली के समान मोटी, चिपटी तथा चार पाँच अंगुल लंबी होती हैं और इसमें ७-८ दाने होते हैं। इसके फूल गुच्छों में लगते हैं जो बारहों महीने रहते हैं, परंतु और महीनों की अपेक्षा आषाढ़ में अधिक फूल लगते हैं। फूलों में गंध नहीं होती। इसकी लकड़ी मजबूत होती है। इसके वृक्ष बीज और कलम दोनों से ही लगते हैं। कई प्रकार के रोगों में इसका क्वाथ भी दिया जाता है। वैद्यक के अनुसार यह गरम, कफ, वात, शूल, आमवात और नेत्ररोग को दूर करनेवाली है।

शंगजराहत
संज्ञा पुं० [सं० शंङ्ख, फा़० संग + जदाहत] दे० 'संग जराहत'।

शंगर
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बहुत ऊँचा वृक्ष जो मदरास और सुंदरबन में अधिकता से होता है। विशेष—इसकी लकड़ी लाल और मजबूत होती है और मकान तथा गाड़ी आदि बनाने के काम में आती है। इसके पत्तों से रंग भी निकाला जाता है।

शंगरफ (१)
संज्ञा पुं० [फा़० शंगर्फ़, शंगरफ़] ईगुर। शिंगरफ [को०]।

शंगरफ (२)
वि० ईगुर के रंग का लाल [को०]।

शंजरफ
संज्ञा पुं० [फा़० शंजर्फ़ शंज़रफ़]दे० 'शिगरफ'।

शंठ
संज्ञा पुं० [सं० शण्ठ] १. अविवाहित। २. नपुंसक। हींजड़ा। ३. मूर्ख। बेवकूफ। उ०—मुग्ध मूढ़ जड़ मूक नर अज्ञ अवुध वद शंठ।—नंददास (शब्द०)।

शंड
संज्ञा [सं० शण्ड] १. नपुंसक। हींजड़ा। २. वह पुरुष जिसे संतान न होती हो। वंध्या पुरुष। ३. साँड़। ४. उन्मत्त। पागल। ५. कमालिनी। पद्मिनी। ६. दही (को०)। ७. प्राचीन काल में अंतःपुर का परिचारक जो हींजड़ा होता था (को०)। ८. एक देत्य का नाम। ९. पद्म आदि का समूह वा राशि (को०)।

शंडता
संज्ञा स्त्री० [सं० शण्डता] शंड का भाव या धर्म। नपुंसकत्व। हिजड़ापन।

शंडा
संज्ञा पुं० [सं० शण्डा] १. फटा हुआ खट्टा दूध अथवा दही। २. शुक्राचार्य का पुत्र जो असुरा का पुरोहित था। ३. एक यक्ष का नाम।

शंडाकी मद्य
संज्ञा स्त्री० [सं० शण्डाकी मद्य] अर्कप्रकाश के अनुसार एक प्रकार की शराब जो राई, मूली और सरसों के पत्तो का रस चावलों की पीठी मे मिलाकर अर्क निकालने से तैयार होती है।

शंडामर्क
संज्ञा पुं० [सं० शण्ड़ामर्क] शंड और मर्क नाम के दो दैत्य जिनका नाम साथ ही साथ लिया जाता है। उ०—शंडामर्क से कहियो जाय।—शब्दावली (शब्द०)।

शंडिल
संज्ञा पुं० [सं० शण्डिल] एक ऋषि। दे० 'शंडील' [को०]।

शंडील
संज्ञा पुं० [सं० शण्डील] एक प्राचीन गोत्रकार ऋषि जिनके गोत्र के लोग शंडिल्य कहलाते हैं।

शंढ
संज्ञा पुं० [सं० षण्ढ] १. नपुंसक। वंध्या पुरुष। २. वृष। साँड़। ३. उन्मत्त साँड़। ४. राजाओं के अंतःपुर का वह सेवक जो पुस्त्वविहीन हिंजड़ा होता था। ५. उन्मत्त पुरुष। पागल व्यक्ति [को०]।

शंतनु पु
संज्ञा पुं० [सं० शन्तनु] दे० 'शांतनु'।—(क) वरणी शंतनु की कथा, पुनि ययाति कर भोग।—रघुनाथ (शब्द०)। (ख) बिष्णूसुता सत्य सुत माहीं। तासु पुत्र शंतनु नृप आहीं।—सबल (शब्द०)।

शंतनुसुत पु
संज्ञा पुं० [सं० शन्तनुसुत] गंगा के गर्भ से उत्पन्न शांतनु के पुत्र, भीष्म पितामह। विशेष दे० 'भीष्म'।

शंपा
संज्ञा स्त्री० [सं० शम्पा] १. बिजली। उ०— उन्नत सिर पर जब तक हो शंपा का प्रहार। सोओ तब तक जाज्वल्यमान मेरे विचार।—सामधेनी, पृ० ५२। २. कमरबंद। मेखला। करधनी।

शंपाक, शंपात
संज्ञा पुं० [सं० शम्पाक, शम्पात] आरग्वध वृक्ष। अमलतास।

शंब (१)
संज्ञा पुं० [सं० शम्ब] १. इंद्र का वज्र। २. लोहे की जंजीर जो कमर के चारों तरफ पहनी जाय। ३. प्राचीन काल की एक माप। ४. नियमित रूप से हल जोतने की क्रिया। ५. दुहरी जुताई। दुबारा हल चलाने की क्रिया। ६. मुसल के सिरे पर लगी हुई लोहे की गोल पट्टी। साम (को०)।

शंब (२)
वि० १. सुखी। भाग्यवान्। २. दरिद्र। अभागा [को०]।

शंबपाणि
संज्ञा पुं० [सं० शम्बपाणि] इंद्र जिनका आयुध वज्र है [को०]।

शंबर (१)
संज्ञा पुं० [सं० शम्बर] १. एक दैत्य जो वेद के अनुसार दिवोदास का बड़ा शत्रु था। दिवोदास की रक्षा के लिये इंद्र ने इसे पहाड़ पर से नीचे गिराकर मार डाला था। २. एक दैत्य जो रामायण और महाभारत में कामदेव का शत्रु कहा गया है। ३. प्राचीन काल का एक प्रकार का शस्त्र। ४. युद्ध। समर। लड़ाई। ५. एक प्रकार का मृग। ६. मछली। ७. एक पर्वत का नाम। ८. जल। पानी। ९. चीता नामक पेड़। चितउर। १०. लोध वृक्ष। ११. अर्जुन वृक्ष। १२. ताल वृक्ष। १३. साबर हिरन। १४. मुश्क जमीं। १५. एक जिन देव (को०)। १६. बौद्धों का एक व्रत (को०)। १७. एक प्रकार का व्रत (को०)। १८. मेघ। बादल (को०)। १९. चित्र। तस्वीर (को०)। २०. धन। संपत्ति। (को०)। २१. एक प्रकार के शैव (को०)। यौ०—शंबरघ्न, शंबरदारण, शंबररिपु = कामदेव या प्रद्युम्न।

शंबर (२)
वि० १. अति उत्तम। बहुत बढ़िया। २. भाग्यवान्। ३. सुखी।

शंबरकंद
संज्ञा पुं० [सं० शम्बरकन्द] बारही कंद। शूकर कंद।

शंबरघ्न
संज्ञा पुं० [सं० शम्बरघ्न] दे० 'शंबरारि' [को०]।

शंबरचंदन
संज्ञा पुं० [सं० शम्बर चन्दन] एक प्रकार का चंदन जिसे कैरात, बहलगंध और गंधकाष्ठ भी कहते हैं।

शंबरमाया
संज्ञा स्त्री० [सं० शम्बरमाया] १. इंद्रजाल। जादू। २. शक्ति।

शंबरसूदन
संज्ञा पुं० [सं० शम्बरसूदन] १. कामदेव। २. प्रद्युम्न।

शंबरहा
संज्ञा पुं० [सं० शम्बरहन्] दे० 'शंबरारि'।

शंबरारि
संज्ञा पुं० [सं० शम्बरारि] १. शंबर का शत्रु अर्थात् कामदेव। मदन। उ०—शबर ज्यों शंबरारि दुःख देह को दहै।— केशव (शब्द०)। २. प्रद्युम्न जो कामदेव के अवतार कहे जाते है। उ०—मुरछि मुरछि गिरावो भूमि पर शंबरारि ललकारि।—गर्गसंहीता (शब्द०)।

शंबरासुर
संज्ञा पुं० [सं० शम्बरासुर] शंबर नाम का दैत्य [को०]।

शंबराहार
संज्ञा पुं० [सं० शम्बराहार] झरबेरी। भूबदरी।

शंबरी
संज्ञा पुं० [सं० शम्बरी] मूमाकानी। आखुपर्णी लता। २. बड़ी देती। बगरेंडा। ३. माया। ४. मायाविनी। जादू- गरनी (को०)।

शंबरीगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० शम्बरीगन्धा] बनतुलसी। बर्बरी।

शंबरीद्भव
संज्ञा पुं० [सं० शम्बरोदभव] सफेद लोघ।

शंबल
संज्ञा पुं० [सं० शम्बल] १. यात्रा के समय रास्ते के लिये भोजनसामग्री। संवल। पाथेय। २. तट। किनारा। ३. कूल। ४. ईर्ष्या। द्वेष। ५. दे० 'शंबर'।

शंबली
संज्ञा स्त्री० [सं० शम्बली] शंभली। कुटनी [को०]।

शबसादन
संज्ञा पुं० [सं० शम्बसादन] वाल्मीकीय रामायण के अनुसार एक दैत्य जिसे केशरी वानर ने मारा था।

शंबा
संज्ञा पुं० [अ० शंबहु] १. शनिवार। शनैश्र्वरवार। २. वार। दिन (को०)।

शंबाकृत
संज्ञा पुं० [सं० शम्बाकृत] वह खेत जो दो बार जोता गया हो। वह खेत जिसकी दुहरी जुताई हुई हो [को०]।

शंबु
संज्ञा पुं० [सं० शम्बु] सीपा। घोंघा।

शंबुक, शंबुक्क
संज्ञा पुं० [सं० शम्बुक, शम्बुक्क] १. घोंघा। २. छोटा शंख।

शंबुकपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं० शम्बुकपुष्पी] दे० 'शंखपुष्पी'।

शंबुकावर्त (१)
वि० [सं० शम्बुकावर्त] घाघे या छोटे शंख की भँवरी के सदृश घूमा हुआ।

शंबुकावर्त (२)
संज्ञा पुं० पाँच प्रकार के भगंदरों में से एक प्रकार का भगंदर। विशेष—इसका कई प्रकार का वर्ण होता है और इसमें सदैव पीव बहा करता है। इसके फोड़ने से अनेक प्रकार की पीड़ा होती है। इसका फोड़ा गौ के थन के आकार का हो जाता है और उसका छिद्र घोघे के घेरे के समान घूमता हुआ होता है। इसे शंखावर्त भी कहते हैं।

शंबूक
संज्ञा पुं० [सं० शम्बूक] १. एक तपस्वी शूद्र। विशेष—शूद्र होने के कारण इसकी कठोर तपस्या के प्रभाव से त्रेतायुग में रामराज्य में एक ब्राह्मण का पुत्र अकाल मृत्यु कोप्राप्त हुआ था; अतः इसे राम ने मारकर मृत ब्राह्मणपुत्र को पुनरुज्जीवित किया था। २. घोंघा। ३. शंख। ४. एक दैत्य का नाम। ५. हाथी के सूँड़ का अगला भाग।

शंबूकपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'शंखपुष्पी'।

शंबूका
संज्ञा स्त्री० [सं० शम्बूका] सीपी।

शंभ
संज्ञा पुं०, वि० [सं० शम्भ]दे० 'शंब' [को०]।

शंभली
संज्ञा स्त्री० [सं० शम्भली] कुटनी। शंबली [को०]।

शंभु (१)
संज्ञा पुं० [सं० शम्भु] १. शिव। महादेव। २. ग्यारह रुद्रों में से एक जो प्रधान रुद्र हैं। विशेष दे० 'महादेव' और 'रुद्र'। ३. रामायण के अनुसार एक दैत्य का नाम। ४. एक वृत्त का नाम। जिसके प्रत्येक चरण में १९ वर्ण होते है; और उनका क्रम इस प्रकार होता है—स, त, य, भ, म, म और ग (IIS, SSI, ISS, SII, SSS, SSS, S)। ५. ब्रह्मा। ६. विष्णु। ७. सफेद आक। ८. पारा। ९. ऋषि। संत। तपस्वी (को०)। १०. एक प्रकार के सिद्ध (को०)। ११. बुद्ध (को०)। १२. अग्नि (को०)।

शंभु पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० स्वायम्भुव] दे० 'स्वायंभुव'। उ०—कह शौनक शंभू मनु पाछे। कीन्ह राज्य केहि कहिए आछे।—रघुनाथ (शब्द०)।

शंभुकांता
संज्ञा स्त्री० [सं० शम्भुकांता] १. शंभु की स्त्री, पार्वती। २. दुर्गा।

शंभुगिरि
संज्ञा पुं० [सं० शम्भुगिरि] शम्भु का पर्वत, कैलास।

शंभुतनय
संज्ञा पुं० [सं० शम्भुतनय] १. कार्तिकेय। २. गणेश [को०]।

शंभुतेज
संज्ञा पुं० [सं० शम्भुतेजस्] पारा। पारद।

शंभुनंदन
संज्ञा पुं० [सं० शम्भुनन्दन]दे० 'शंभुतनय'।

शंभुबीज
संज्ञा पुं० [सं० शम्भुबीज] पारा। पारद।

शंभुप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं० शम्भुप्रिया] १. दुर्गा। शंभुकांता। २. आमलकी [को०]।

शंभुभूषण
संज्ञा पुं० [सं० शम्भुभूषण] महादेव जी का भूषण, चंद्रमा।

शंभुमनु पु
संज्ञा पुं० [सं० स्वायम्भुव मनु] स्वायभुव मन्वंतर जो सबसे पहला मन्वंतर है। विशेष दे० 'स्वायंभुव' और मनु।

शंभुलोक
संज्ञा पुं० [सं० शम्भुलोक] महादेव जी का लोक, कैलास।

शंभुवल्लभ
संज्ञा पुं० [सं० शम्भुवल्लभ] श्वेत कमल जो शिव को विशेष प्रिय है [को०]।

शंयु (१)
वि० [सं०] प्रसन्न। शुभान्वित। सुखी [को०]।

शंयु (२)
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार यज्ञ के अधिष्ठातृ देव अग्नि जो बृहस्पति के पुत्र रूप कहे गए हैं [को०]।

शंव
संज्ञा पुं०, वि० [सं०]दे० 'शंब' [को०]।

शंस
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिज्ञा। इकरार। २. शपथ। कसम। ३. जादू। ४. प्रशंसा। तारीफ। ५. इच्छा। ख्वाहश। ६. चापलुसी। चाटुता। ७. घोषणा। ८. वक्तृता। ९. किसी के प्रति शुभ वा मंगल की कामना (को०)।

शंसन
संज्ञा पुं० [सं०] १. कथन। कहना। वर्णन करना। २. प्रशंसा करना। प्रशंसन। ३. पाठ करना [को०]।

शंसनीय
वि० [सं०] कथन या प्रशंसा के योग्य [को०]।

शंसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रशंसा। २. अभिलाषा। आशा। इच्छा। ३. वर्णन। कथन। ४. दुहराना। ५. पाठ करना। ६. अनुमान। कल्पना [को०]।

शंसित
वि० [सं०] १. कथित। घोषित। २. प्रशंसित।३. इच्छित। काम्य। ४. निश्चित किया हुआ। निर्धारित। ५. जिसपर झुठा दोष मढ़ा गया हो। कलंकित। ६. अनुष्ठित [को०]। यौ०—शंसितव्रत = व्रत करनेवाला। व्रत अनुष्ठित करनेवाला।

शंसी
वि० [सं० शंसिन्] १. कहनेवाला। २. प्रशंसक।३. संकेत करनेवाला। सूचक। व्यंजक। ४. भविष्यसूचक। भविष्यवक्ता [को०]।

शंस्ता
संज्ञा पुं०, वि० [सं० शंस्तृ] १. स्तुति करनेवाला। प्रशंसक। स्तुतिपाठक। २. ऋचाओं का पाठ करनेवाला। मंत्र- पाठक [को०]।

शंस्य (१)
वि० [सं०] १. प्रशंसा के योग्य। २. इच्छित। चाहा हुआ। ३. उच्च स्वर से पठित (को०)। ४. कहने योग्य (को०)।

शंस्य (२)
संज्ञा स्त्री० अग्नि।


संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव। २. कल्याण। मंगल। ३. शस्त्र। हथियार। ४. विनाशक। काटनेवाला (को०)। ५. शास्त्र (को०)। ६. आनंद। सौख्य (को०)।

शअबान
संज्ञा पुं० [अ० शअ़बान] अरबी आठवाँ महीना जिसकी चौदहवीं तारीख को मुसलमानों का शब्बरात नामक त्योहार होता है। यह रजब के बाद आता है।

शऊर
संज्ञा पुं० [अ० शुऊर] १. किसी चीज की पहचान या जानकारी। २. काम करने की योग्यता। ढंग। ३. बुद्धि। अक्ल। ४. सभ्यता। तमीज (को०)। क्रि० प्र०—आना।—सीखना। मुहा०—शऊर पकड़ना = ढंग सीखना। अक्ल सीखना। बुद्धिमान् होना।

शऊरदार
संज्ञा वि० [अ० शुऊर + फा० दार (प्रत्य०)] [संज्ञा स्त्री० शऊरदारी] जिसमें शऊर हो। काम करने की योग्यता रखनेवाला। हुनरमंद। समझदार।

शक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्राचीन जाति। विशेष—पुराणों में इस जाति की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत से कही गई है। राजा सगर ने राजा नरिष्यंत को राज्यच्युत तथा देश से निर्वासित किया था। वर्णाश्रम आदि के नियमों का पालन न करने के कारण तथा ब्राह्मणों से अलग रहने के कारण वे म्लेच्छ हो गए थे। उन्हीं के वंशज शक कहलाए।आधुनिक विद्वनों का मत है कि मध्य एशिया पहले शकद्वीप के नाम से प्रसिद्ध था। युनानी इस देश को सीरिया कहते थे। उसी मध्य एशिया के रहनेवाला शक कहे जाते है। एक समय यह जाति बड़ी प्रतापशालिनी हो गई थी। ईसा से दो सौ वर्ष पहले इसने मथुरा और महाराष्ट्र पर अपना अधिकार कर लिया था। ये लोग अपने को देवपुत्र कहते थे। इन्होंने १९० वर्ष तक भारत पर राज्य किया था। इनमें कनिष्क और हविष्क आदि बड़े बड़े प्रतापशाली राजा हुए हैं। २. वह राजा या शासक जिसके नाम से कोई संवत् चले। ३. राजा शालिवाहन का चलाया हुआ संवत् जो ईसा के ७८ वर्ष पश्चात् आरंभ हुआ था। ४. शालिवाहन के अनुयायी अथवा उसके वंशज। ५. संवत्। यौ०—शककर्ता, शककृत् = दे० 'शककारक'। शककाल = दे० 'शक संवत्'। शक संवत् = राजा शालिवाहन का चलाया हुआ संवत्। दे० 'शक'—३। ६. तातार देश। ७. जल। ८. मल। गोमय। ९. एक प्रकार का पशु। १०. संदेह। आशंका। भय। त्रास। डर।

शक (२)
संज्ञा पुं० [अ०] शंका। संदेह। द्विविधा। क्रि० प्र०—करना।—डालना।—निकालना।—पड़ना।— मिटना।—मिटना।

शककारक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसने कोई नया संवत् (शक) चलाया हो। संवत् का प्रवर्तक।

शकट
संज्ञा पुं० [सं०] १. छकड़ा। बैलगाड़ी। २. भार। बोझ। ३. शकटासुर नामक दैत्य जिसे कृष्ण ने मारा था। ४. तिनिश वृक्ष। ५. धव का वृक्ष। धौ। ६. शरीर। देह। ७. दो हजार पल की तौल। ८. रोहिणी नक्षत्र, जिसकी आकृति शकट या छकड़े के समान है। ९. शकट के आकार का सैनिक व्यूह। दे० 'शकट व्यूह' (को०)। १०. एक गाड़ी भार। बौझ जो दो हजार पल के बराबर होता है (को०)। ११. अन्न सिद्ध करने का एक उपकरण (को०)।

शकटकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] गाड़ी या और कोई सवारी हाँकने का काम। २. गाड़ी आदि सवारियों की सामग्री बनाने और बेचने का काम।

शकटधूम
संज्ञा पुं० [सं०] १. गोबर या उपले आदि का धूआँ। २. एख नक्षत्र का नाम।

शकटभिद्
संज्ञा पुं० [सं०] १. शकटासूर को मारनेवाले, श्रीकृष्ण। २. विष्णु [को०]।

शकटभेद
संज्ञा पुं० [सं०] किसी ग्रह द्वारा शकट अर्थात् रोहिणी नक्षत्र का विभाजन। यदि यह भेदन शनि ग्रह द्वारा हो तो १२ वर्ष अनावृष्टि होती है [को०]।

शकटविल
संज्ञा पुं० [सं०] जलकुक्कुट [को०]।

शकटव्यूह
संज्ञा पुं० [सं०] १. शकट के आकार का सेना का निवेश। सेना को इस प्रकार रखना कि आगे का भाग पतला और पीछे का मोटा हो; और वह देखने में शकट के आकार का जान पड़े। २. कौटिल्य के अनुसार वह भोग व्युह जिसके अंदर उरस्थ में दोहरी पक्तियाँ हों और पक्ष स्थिर हो।

शकटव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] एक विशेष प्रकार का व्रत [को०]।

शकटसार्थ
संज्ञा पुं० [सं०] गाड़ियों का कारवाँ [को०]।

शकटहा
संज्ञा पुं० [सं० शकटहन्] शकटासुर नामक दैत्य के मारनेवाले, श्रीकृष्ण।

शकटाक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] गाड़ी का धुरा।

शकटाख्य, शकटाख्यक
संज्ञा पुं० [सं०] धौ या धव का वृक्ष।

शकटार
संज्ञा पुं० [सं०] १. राजा महानंद का प्रधान मंत्री। विशेष—इसने अपने अपमान का बदला चुकाने के लिये चाणक्य से मिलकर षडयंत्र रचा था और इस प्रकार नंदवंश का नाश किया था। २. एक प्रकारी की शिकारी चिड़िया।

शकटारि
संज्ञा पुं० [सं०] शकट दैत्य के शत्रु, श्रीकृष्ण।

शकटाल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शकटार'।

शकटासुर
संज्ञा पुं० [सं०] एक दैत्य जिसे कंस ने कृष्ण को मारने के लिये भेजा था और स्वयं ही कृष्ण द्वारा मारा गया था।

शकटाह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] रोहिणी नक्षत्र [को०]।

शकटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. छोटी बैलगाड़ी।२. बच्चों के खेलने की गाड़ी।

शकटोर्वी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कोई चौरस भूभाग [को०]।

शकटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी गाड़ी।

शकठ
संज्ञा पुं० [सं० शकट] मचान। उ०—कृष्णचंद्र के समय में भी वृंदावन वन गिना जाता था, और गोप लोग उसमें शकठों पर रहते थे।—शिवप्रसाद (शब्द०)।

शकर (१)
संज्ञा स्त्री० [फा०; मि० सं० शर्करा] कच्ची चीनी। शर्करा। शक्कर। यौ०—शकरकंद। शकरखोरा। शकरख्वाब = मीठी नींद। शकरगुड़। शकरपा। शकरापार। शकरपूरा। शकरबादाम। शकर- रंगी, शकररंजी = नाराजी। मनमुटाव। शकररेज = (१) न्यौछावर। (२) खुशी का रोना। शकरलब = (१) मीठे अधरवाला। (२) मिष्टभाषी। (३) माशूक (लाक्ष०)।

शकर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] टुकड़ा। खंड। शकल [को०]।

शकरकंद
संज्ञा पुं० [हिं० शकर + सं० कन्द] एक प्रकार का प्रसिद्ध कंद। विशेष—इसकी खेती प्रायः सारे भारत में होती है। यह साधारणतः सूखी जमीन में बोया जाता है। इसका कंद दो प्रकार का होता है—एक लाल दूसरा सफेद। लाल शकरकंद रतालु या पिंडालु कहलाता है और सफेद को शकरकंद या कंदा कहते हैं। यह भूनकर वा उबालकर खाया जाता है। प्रायः हिंदु लोग व्रत के दिन फलाहार रुप में इसका व्यवहार करते हैं। यह कंद बहुत मीठा होता है और इसमें से एक प्रकार की चीनीनिकलती है। अनेक पाश्चत्य देशों में इससे चीनी भी निकाली जाती है, और इसी लिये इसकी बहुत अधिक खेती होती है। वनस्पति शास्त्र के आधुनित विद्वानों का अनुमान है कि यह मूलतः अमेरिका का कंद है, और वहीं से सारे संसार में फैला है।

शकरखोरा
संज्ञा पुं० [फा० शकर + खोर (=खानेवाला)] एक प्रकार का छोटा सुंदर पक्षी। विशेष—इसकी लंबाई प्रायः एक बालिश्त से भी कम होती है और यह भारत, फारस तथा चीन में पाया जाता है। इसका रंग नीला और चोंच काली होती है और यह पेड़ों में लटकता हुआ घोंसला बनाता है। यह प्रायः खेतों में रहता और खेती को हानि पहुँचानेवाले कीड़े मकोड़े आदि खाता है। यह सफेद रंग के दो या तीन अंडे एक साथ देता है पर इसके अंडा देने का कोई निश्चित समय नहीं है।

शकरख्वारा
वि० [फा० शकरख्वारहु] १. मीठी चीजें खानेवाला। तर माल खानेवाला। २. रस लेनेवाला। आंद लेनेवाला। रसग्राही [को०]।

शकरपा
वि० [फा०] जिसका एक पाँव टेढ़ा हो। लँगड़ा [को०]।

शकरपारा
संज्ञा पुं० [पा० शकरपारहु] १. एक प्रकार का फल जो नीबू से कुछ बड़ा होता है। विशेष—इसका वृक्ष नीबू के वृक्ष के समान होता है, पर पत्ते नीबू से कुछ बड़े होते हैं। फूल कुछ लाल रंग के होते हैं, फल सुगंधित और खट्टा मीठा होता है। २. एक प्रकार का प्रसिद्ध पकवान जो बरफी की तरह चौकोर कटा हुआ होता है। विशेष—यह मीठा भी बनता है और नमकीन भी। इसके बनाने के लिये पहले मैद में मोयन डालकर उसे दूध या पानी से गुँथते हैं और तब उसे मोटी रोटी की तरह बेलकर छुरी आदि से छोटे छोटे चौकोर टुकड़ों में काटकर घी में तल लेते हैं। यदि नमकीन बनाना होता है तो मैदा गुँधते समय ही उसमें नमक, अजवायन आदि डाल देते हैं और यदि मीठा बनाना होता है, तो कटी हुई टुकड़ियों कोतलने के बाद चीनी के शोरे में पाग लेते हैं। ३. रुईदार कपड़े पर की एक प्रकार की सिलाई जो शकरपारे के आकार की चौकोर होती है। ४. माशूक, जिसकी अदाएँ मीठी लगती हैं (को०)।

शकरपाला
संज्ञा पुं० [फा० शकापारा] दे० 'शकरपारा'।

शकरपीटन
संज्ञा पुं० [देशी] एक प्रकार की कँटीली झाड़ी। विशेष—यह हिमालय पर्वत की पथरीली और सुकी, जमीन में कुमायुँ और उसके पश्चिम ओर बोई जाती है। यह थूहर का ही एक भेद है; पर साधारण सेहुँड़ या थूहड़ के वृक्ष से कुछ भिन्न होता है।

शकरपूरा
संज्ञा पुं० [फा० शकरपूरहु] मीठा समोसा। पिराक। गुझिया [को०]।

शकरबादाम
संज्ञा पुं० [फा० शकर + बादाम] खुबानी या जर्दआलु नामक फल जो पश्चिंमोत्तर सीमाप्रांत में होता है।

शकरवार
वि० [फा़०] १. शकर बरसानेवाला, बहुत मीठा। २. मिष्टभाषी।

शकरबूजा
संज्ञा पुं० [फा० शकरबूजड़] दे० 'शकरपूरा' [को०]।

शकरी (१)
संज्ञा पुं० [फा० शकर] फालसा नामक फल।

शकरी (२)
वि० शकबर संबंधी। शकर की [को०]।

शकल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. त्वचा। चमड़ा। २. छाल। छिलका। दालचीनी। ४. आँवला। ५. कमल को नाल। कमलदंड। ६. खाँड़। शक्कर। ७. खंड। टुकड़ा। ८. मनु के अनुसार एक प्राचीन देश का नाम। ९. घड़े या पात्र का एक अंश (को०)। १०. स्फुर्लिंग। चिनगारी (को०)। ११. मछली की चोइयाँ। मछली के शरीर के ऊपर का छिलका (को०)। १३. अर्धाश। आधा भाग। जैसे, चंद्रशकल (को०)।

शकल (२)
संज्ञा स्त्री० [अ० शक्ल] १. मुख की बनावट। आकृति। चेहरा। रुप। जैसे,—शकलन सूरत, गधे की मूरत। मुहा०—शकल बिगड़ना = मारते मारते चेहरे का रुप बिगाड़ना। बहुत मारना। यौ०—सूरत शकल = डेहरे की बनावट। आकृति। २. मुख का भाव। चेष्टा। ३. किसी चीज की बनावट। गढ़न। ढाँचा। मुहा०—शकल बनाना = कोई चीज बनाकर उसका स्वरुप तैयार करना। रुपरेखा या ढाँचा तैयार करना। ४. किसी चीज का बनाया हुआ आकार। आकृति। स्वरूप। ५. उपाय। तरकीब। ढब। जैसे—अब इस मुकदमें से पीछा छुड़ाने की कोई शक्ल निकालती चाहिए। क्रि० प्र०—निकलना। निकालना। ६. मूर्ति।

शकलित
वि० [सं०] खंड खंड किया हुआ। जो टुकड़ों में विभक्त किया गया हो [को०]।

शकली
संज्ञा स्त्री० [सं० शकलिन्] १. सकुची मछली। २. मछली।

शकलीकृत
वि० [सं०] विभक्त। टुकड़े टुकड़े किया हुआ [को०]।

शकव
संज्ञा पुं० [सं०] राजहंस।

शकांतक
संज्ञा पुं० [सं० शकान्तक] शक जाति का अंत करनेवाला, विक्रमादित्य।

शकाकुल
संज्ञा पुं० [अ० शकाकुल] शतावर की जाति की एक प्रकार की वनस्पति। शकाकुल मिस्त्री। धुधली। दुधली। गर्सदस्ती। विशेष—यह प्रायः मिस्त्र देश में अधिकता से होती और भारत के भी कुछ स्थानों, विशेषतः काश्मीर और अफगानिस्तान में पाई जाती है। यह प्रायः नम जमीन में वृक्षों के नीचे उगती है। यह बारहों मास रहती है। इसके डंठल डेड़ दो हाथऊँचे होते है। इसके पत्ते प्रायः अंगुल चौड़े और एक बालिश्त लंबे होते हैं। इसके पौधे को प्रत्येक गाँठ पर पत्ते होते हैं। इसमें नीली या लाल रंग के छोटे छोटे फूल गुच्छों में होते और काले रंग के फल लगते हैं। इसकी जड़ कंद के रुप में होती और बाजार में प्रायः 'शकाकुल मिस्त्री' के नाम से मिलती है। यह जड़ कामोद्दीपक तता स्नायुओं के लिये बलकारक मानी जाती है और विविध प्रकार का पौष्टिक औषधों में डाली जाती है। कंधार में इसके बीज ओषधि के काम में आते है। इसकी राख का क्षार (नमक) अर्श रोग में लाभदायक समझा जाता है। यह जड़ प्रायः काबूल से आती है और वहीं सबसे अच्छी भी होती है।

शकाब्द
संज्ञा पुं० [सं०] राजा शालिवाहन का चलाया हुआ शक संवत्। विशेष—ईसवी सन् संवत् में से ७८, ७९ घटाने से शकाब्द निकल आता है।

शकार
संज्ञा पुं० [सं०] १. शकवंशीय व्यक्ति। वह जो शक वंश का हो। २. संस्कृत नाटकों की परिभाषा में राजा का वह साला जो नीच जाति का हो। विशेष—नाटक में इस पात्र को बेवकूफ, चंचल, घमंडी, नीच तथा कठोर हृदयवाला दिखलाया जाता है। जैसे,— मृच्छकटिक में संख्यानक।

शकारि
संज्ञा पुं० [सं०] शक जाति का शत्रु विक्रमादित्य।

शकील
वि० [अ०] [वि० स्त्री० शकीला] अच्छी शक्लवाला। खूब- सूरत। सुंदर।

शकुंत
संज्ञा पुं० [सं० शकुन्त] १. पक्षी। चिड़िया। उ०—जिस पर निज पक्षीं की छाया रक्खी शकुन द्विजवर ने। मृदु कोंपल सी वह मुनिकन्या देखा कणव मुनीश्वर ने।—शकुं०, पृ० २। २. एक प्रकार का कीड़ा। ३. विश्वामित्र के लड़ने का नाम। ४. नीला चाष पक्षी। नीलकंठ (को०)। ५. भास नाम का पक्षीविशेष (को०)।

शकुंतक
संज्ञा पुं० [सं० शकुन्तक] १. एक प्रकारकी छोटी चिड़िया। २. पक्षी। चिड़िया।

शकुंतला
संज्ञा स्त्री० [सं० शकुन्तला] १. राजा दुष्यत की स्त्री जो भारतवर्ष के सुप्रसिद्ध राजा भरत की माता और मेनका अप्सरा की कन्या थी। विशेष—महाभारत में लिखा है कि शकुंतला का जन्म विश्वामित्र के वीर्य से मेनका अप्सरा के गर्भ से हुआ था जो इसे वन में छोड़कर चली गई थी। वन में शकुंतों (पक्षियों) आदि ने हिंसक पशुओं से इसकी रक्षा की थी इसी से इसका नाम शकुंतला पड़ा। वन में से इसे कणव ऋषि उठा लाए थे और अपने आश्रम में रखकर कन्या के समान पालते थे। एक बार राजा दुष्यंत अपने साथ कुछ सैनिकों को लेकर शिकार खेलने निकले और घूमते फिरते कणव ऋषि के आश्रम में पहुँचे। ऋषि उस समय वहाँ उपस्थित नहीं थे, इससे युवती शकुंतला ने ही राजा दुष्यंत का आतिथ्य सत्कार किया था। उसी अवसर पर दोनों में पहले प्रेम और फिर गंधर्व विवाह हो गया। कुछ दिनों के बाद राजा दुष्यंत वहाँ से अपने राज्य को चले गए। कणव मुनि जब लौटकर अपने आश्रम में आए, तब वे यह जानकर बहुत प्रसन्न हुए कि शकुंतला का विवाह दु्ष्यंत से हो गया। शकुंतला उस समय गर्भवती हो चुकी थी अतः समय पाकर उसके गर्भ से बहुत ही बलवान् और तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम भरत रखा गया। कहते हैं, इस देश का भारतवर्ष नाम इसी के कारण पड़ा कुछ दिनों बाद शकुंतला अपने पुत्र को लेकर राजा दुष्यंत दरबार में पहुँची। परंतु शकुंतला को बीच में दुर्वासा ऋषि का शाप मिल चुका था, इससे राजा ने बिलकुल न पहचाना और स्पष्ट कह दिया कि न तो मैं तुम्हैं जानता हुँ और न तुम्हें अपने यहाँ आश्रय दे सकता हुँ। परंतु उसी अवसर पर एक आकाश वाणी हुई जिससे राजा को विदित हुआ कि यह मेरी ही पत्नी है और यह पुत्र भी मेरा ही है। उसी समय उन्हें कणव मुनि के आश्रम के भी सब बातें स्मरण हो आईँ और उन्होंने शकुंतला को अपनी प्रधान रानी बनाकर अपने यहाँ रख लिया। २. महाकवि कालिदास का लिखा हुआ एक प्रसिद्ध नाटक जिसमें राजा दुष्यंत और शकुंतला के प्रेम, विवाह, प्रत्याख्यान और ग्रह्यण आदि का वर्णन है।

शकुंति
संज्ञा पुं० [सं० शकुन्ति] १. भास नाम की चिड़िया। २. चिड़िया। पक्षी [को०]।

शकुंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० शकुन्तिका] १. छोटी चिड़िया। २. रिआया। प्रजा। ३. एक प्रकार का पक्षी (को०)। ४. टिड्डी। झींगुर (को०)।

शकुंद
संज्ञा पुं० [सं० शकुन्द] सफेद कनेर।

शकुची
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्कुचि] दे० 'सकुची'।

शकुन
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी काम के समय दिखाई देनेवाले लक्षण जो उस काम के संबंद में शुभ या अशुभ माने जाते हैं। वे चिह्न आदि जो किसी काम के संबंद में शुभ या अशुभ माने जाते हैं। विशेष—प्रायः लोग कुछ घटनाओं को देखकर उनका शुभ या अशुभ फल होना मानते हैं, और उन घटानाओं को शकुन कहते हैं। जैसे,—कहीं जाते समय रास्ते में बिल्ली का रास्ता काट जाना अशुभ शकुन समझा जाता है और जलपूर्ण कलश या मृतक आदि का मिलना शुभ शकुन माना जाता है। इसी प्रकार अंगों का फड़कना, विशिष्ट पशुओं या पक्षियों आदि का बोलना या कुछ विशिष्ट वस्तुओं का दिखाई पड़ना भी शकुन समझा जाता है। हमारे यहाँ इस विषय का एक अलग शास्त्र ही बन गया है; और उसके अनुसार दही, घी, दुब, चंदन, शीशा, शंखमछली, देवमूर्ति, फल, फूल, पान, सोना, चाँदी, रत्न, वेश्या आदि का दिखाई पड़ना शुभ और साँप, चमड़ा, नमक, खाली बरतन आदि दिखाई पड़ना अशुभ समझा जाता है। प्रायः लोग अशुभ शकुन देखकर काम रोक या टाल देते हैं। साधाणतः बोलचाल में लोग शकुन से प्राय; शुभ शकुन का ही अभिप्राय लेते हैं; अशुभ शकुन को अपशकुन, असगुन कहते हैं। मुहा०—शकुन विचारना या देखना = कोई कार्य करने से पहले किसी उपाय से लक्षण आदि देखकर यह निश्चय करना कि यह काम होगा या नहीं; अथवा काम अभी करना चाहिए या नहीं। २. शुभ मुहुर्त या उसमें होनेवाला कार्य। ३. पक्षी। चिड़िया। ४. गिद्ध नामक शिकारी पक्षी। ५. मंगल अवसरों पर गाए जानेवाले गीत (को०)।

शकुनक
संज्ञा पुं० [सं०] पक्षी। खग [को०]।

शकनुज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो शकुनों का शुभाशुभ फल जानता हो।

शकुनज्ञा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गिरगिट। गृहगोधा [को०]।

शकुनज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] शकुन की जानकारी [को०]।

शकुनद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] शकुन शास्त्र के अनुसार एक साथ ही शुभ और अशुभ दोनो प्रकार के शकुन होना जो यात्रा आदि के लिये बहुत शुभ माना जाता है।

शकुनशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह शास्त्र जिसमें शकुनों के शुभ और अशुभ फलों का विवेचन हो। शकुन बतानेवाला शास्त्र।

शकुनाहृत
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का चावल जिसे दाऊद- खानी कहते हैं। २. एक प्रकार की मछली। ३. एक प्रकार का बालरोग। शकुनी ग्रह। विशेष दे० 'शकुनी'—१। ४. वह पदार्थ जो चिडि़यों द्वारा लाया गया हो।

शकुनाहृता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चिड़ियों द्वारा लाई हुई वस्तु। २. एक प्रकार का चावल।

शकुनि
संज्ञा पुं० [सं०] १. पक्षी। चिड़िया। २. गिद्ध पक्षी। ३. एक नाग का नाम। ४. एक दैत्य जो हिरणयाक्ष का पुत्र और वृक का पिता था। ५. पूराणानुसार दुःसह के आठ पुत्रों में से एक जो निर्माष्टि के गर्ब से उत्पन्न हुआ था। ६. पूराणनुसार विकुक्षि के पाँच पुत्रों में से एक। ७. गांधारी का भाई और कौरवों का मामा जो सुवलराजा का पुत्र था और इसी लिये सौवल कहलाता था। विशेष—यह बहुत ही दुष्ट और पापाचारी था। दुर्यौधन ने इसे अपना मंत्री बना रखा था और इसके परामर्श से उसने पांडवों के साथ अनेक कपटपूर्ण व्यवहार किए थे। कौरव कुल के नाश का मुख्य कारण यही शकुनि था। यह अपने पुत्र सहित सहदेव के हाथ से मारा गया था। ८. बड़ा भारी दुष्ट और पाजी आदमी। ९. फलित ज्योतिष के अनुसार वव आदि ग्यारह करणों में से आठवाँ करण। विशेष—कहते हैं, जो बालक इस करण में जन्म लेता है, वह बड़ा भारी धुर्त, ठग, कृतघ्न, क्रोधी और लंपट होता है। १०. चील पक्षी (को०)। ११. मुर्गा (को०)।

शकुनिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूराणानुसार स्कंद की अनुवरी एक मातृका का नाम।

शकुनिग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुराणानुसार स्कद के एक अनुचर का नाम। २. एक बालग्रह। शकुनी।

शकुनिप्रपा
संज्ञा स्त्री० [सं०] चिड़ियों के पानी पीने का बर्तन या स्थान [को०]।

शकुनिवाद्
संज्ञा पुं० [सं०] उषा काल के समय चिड़ियों का चहचहाना।

शकुनी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. श्यामा पक्षी। २. गोरैया पक्षी की मादा। ३. पूराणानुसार एक पूतना का नाम जो बहुत क्रूर और भयंकर कही गई है। ४. सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का बालग्रह। विशेष—कहते हैं, जिस बालक पर इसका आक्रमण होता है, उसके अंग शिथिल पड़ जाते हैं, शरीर में जलन होती है, फोड़े फुसियाँ आदि निकल आती है शरीर से पक्षियों की सी गंध आने लगती है और वह रह रहकर चौंक उठता है।

शकुनी (२)
संज्ञा पुं० [सं० शकुन + ई (प्रत्य०)] वह जो शकुनों का शुभ और अशुभ फल जानता हो। शकुनज्ञ।

शकुनी (३)
संज्ञा पुं० [सं० शकुनि] दुर्यौधन का मामा सौवल। विशेष दे० 'शकुनि'।उ०—वे दुःशासन और शकुनी बन गए।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३०७।

शकुनीमातृका
संज्ञा स्त्री० [सं०] बालकों की एक प्रकार की व्याधि। विशेष—यह बालकों के जन्म से छठे दिन, छठे मास या छठे वर्ष होती है और इसमें उन्हें ज्वर तता कंप होता है, द्दष्टि ऊदर्ध्व हो जाती है और हरदम बहुत कष्ट बना रहता है।

शकुनीश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] पक्षियों का स्वामी, अर्थात् गरुड़।

शकुर
वि० [सं०] पालतु (पशु आदि) [को०]।

शकुल, शकुलगंड
संज्ञा पुं० [सं० शकुल, शकुलगण्ड] सौरी मछली।

शकुला
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुटकी। कटुकी।

शकुलाक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. सफेद दूब। श्वेत दुर्वा। २. गाँडर दुब। गंडदु्र्वा।

शकुलाक्षका, शकुलाक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'शकुलाक्ष'।

शकुलाक्षी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गाँडर दूब।

शकुलादनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कुटकी। कटुकी। २. जलपिप्पली। जल चौलाई। कंचट शाक। ४. कायफल। कटफल। ५. गजपीपल। गजपिप्पली। ६. गाँडर दुब। गंडदु्र्बा। ७. जटा- मासी। बालछड़। ८. केचुआ। गंडुपद।

शकुलार्भक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की मछली। गडुई मछली।

शकुलाहनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जलपीपल।

शकुली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सकुचै मछली। २. पुराणानुसार एक नदी का नाम।

शकृत्
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्ठा। गृह। २. गोबर गोमय।

शकृत्करि
संज्ञा पुं० [सं०] गाय का बच्चा। बछड़ा।

शकृतकरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बछिया। वत्ससरी [को०]।

शकृत्कीट
संज्ञा पुं० [सं०] १. मल का कीड़ा। विष्टकीट। २. गुबरैला।

शकृतपिंड, शकृत्पिंडक
संज्ञा पुं० [सं० शकृत्पण्ड, शकृत्णड] मक का पिंड। लेंड़। लेंड़ा [को०]।

शकृद्देश
संज्ञा पुं० [सं०] मलद्वार। गुदा।

शकृद्द्वार
संज्ञा पुं० [सं०] मलद्वार। गुदा।

शकृद्रुद
संज्ञा पुं० [सं०] अतिसार। ग्रहणी रोग [को०]।

शक्क
संज्ञा पुं० [अ०] संदेह। शंका। दे० 'शक' [को०]।

शक्कर (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शर्करा, प्रा० सक्कर सक्करा; मि० फा० शकर (=चीनी)] १. चीनी। २. कच्ची चीनी। खाँड़।

शक्कर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] बैल। वृष।

शक्करि
संज्ञा पुं० [सं०] बैल। वृष।

शक्करी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वर्णवृत्त के अंतर्गत चौदह अक्षरोंवाले छंदों की संज्ञा जिनके नाम इस प्रकार है—वसंततिलका, असंबाधा, अपराजिता, ग्रहणकलिका, वासंती, मंजर, कुटिल, इंदुदिना, चक्र नांदीमुख, लाला और अनंद। इनमें से वसत- तिलका सबसे अधिक प्रसिद्ध है। २. मेखला। ३. एक प्राचीन नदी का नाम। ४. अँगुली। उँगली (को०)। ५. निम्न वर्ण की महिला। नीच जाति की स्त्री (को०)।

शक्की
वि० [अ० शक्क + ई (प्रत्य०)] जिस हर बात में संदेह होता हो। सदा शक करनेवाला। उ०—इनका मिजाज निहायत शक्की है, य सबको बेवफा समझते हैं।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ११५।

शक्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसमें शक्ति हो। शक्तिसंपन्न। समर्थ। ताकतवर। २. वह जो प्रिय बातें कहता हो। मिष्टभाषा।

शक्ति (२)
वि० १. योग्य। काबिल। समर्थ। २. शक्तिसंपन्न। ताकतवर। ३. धनाढ्य। समृद्धियुक्त। ४. अर्थ का अभिव्यंजक या अर्थद्योतक, जैसे कोई शब्द। ५. प्रियभाषा। मिष्टभाषा। ६. चतुर। चालाक। पटु [को०]।

शक्तव
संज्ञा पुं० [सं०] भूने हुए अनाज का आटा। सत्तु।

शक्ति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह शारीरिक गुण या धर्म जिसके द्वारा अंगों का संचालन तथा दूसरे काम होते हैं। बल। पराक्रम। ताकत। जोर। जैसे—(क) उसमें दो मन बोझ उठान की शक्ति है। (ख) अब तो उनमें उठन बैठन का भी शक्ति नहीं रह गई। (ग) दुर्बलों पर शक्ति का प्रयोग नहीं करना चाहिए। क्रि० प्र०—देखना।—रखना।—लगना।—लगाना। २. किसी प्रकार का बल या ताकत जिससे कोई काम हो। जैसे,— मानसिक शक्ति स्मरण शक्ति, सैनिक शक्ति, शब्द शक्ति। ३. किसी पदार्थ के संयोजक अगों या द्रव्यों आदि का प्रकट होनेवाला बल। दूसरे पदार्थों पर प्रभाव डालनेवाला बल। जैसे,—(क) इस औषध में ऐसी शक्ति है कि मृत्यु को भी कुछ देर के लिये रोक देती है। (ख) इस इंजन में बीस घोड़ों की शक्ति है। (ग) पानी के बहाव में बड़ी बड़ी चट्टानों तक को तोड़ने की शक्ति होती है। ४. वश। अधिकार। जैसे,— इसकी रक्षा करना मेरी शक्ति के बाहर है। ५. राज्य के वे साधन जिनसे शत्रुओं पर विजय प्राप्त की जाती है। विशेष—हमारे यहाँ राजाओं की तीन प्रकार की शक्ति कही गई है—प्रभुशक्ति, मंत्रशक्ति, और उत्साहशक्ति। कोश और दंड आदि के संबंध की शक्ति प्रभुशक्ति, संधि, विग्रह आदि के संबंध की शक्ति मंत्रशक्ति और पराक्रम प्रकट करने तथा विजय प्राप्त करने की शक्ति उत्साहशक्ति कहलाती है। ६. बड़ा और पराक्रमी राज्य जिसमें यथेष्ट धन और सेना आदि हो। जैसे,—इस समय युरोप में इंगलैंड, फ्रांस, जर्मनी, और रूस आदि कई बड़ी बड़ी शक्तियाँ हैं। ७. न्याय के अनुसार वह संबंध जो किसी पदार्थ और उसका बोध करानेवाले शब्द में होता है। इस शब्द का यह अर्थ बोद्धव्य है— इस प्रकार का अनादि संकेत। जैसे घट शब्द के कहने मात्र से श्रोता को घट शब्द के रूपाकार आदि का ज्ञान हो जाता है। ८. ईश्वर की वह कल्पित माया जो उसकी आज्ञा से सब काम करनेवाली मानी जाती है। प्रकृति। माया। ९. किसी देवता का पराक्रम या बल जो कुछ विशिष्ट कार्यों का साधक माना जाता है। जैसे,—रौद्री शक्ति, वैष्णवी शक्ति। विशेष—हमारे यहाँ पुराणों में भिन्न भिन्न देवताओं की अनेक शक्तियों की कल्पना की गई है और ये शक्तियाँ बहुधा देवी के रूप में और मूर्तिमती मानी गई है। जैसे, विष्णु की कीर्ति, कांति, तुष्टि, पुष्टि, शांति, प्रीति आदि शक्तियाँ; रुद्र की गुणोदरी, गोमुखी, दीर्घजिह्वा, ज्वालामुखी, लंबोदरी खेचरी, मजरी आदि शक्तियाँ; देवी की इंद्राणी, वैष्णवी, ब्रह्मणी, कौमारी, नार- सिंही, वाराही, माहेश्वरी और सर्वमंगला आदि शक्तियाँ। १०. तंत्र के अनुसार किसी पीठ की अधिष्ठात्री देवी। विशेष—इनकी उपासना करनेवाले शक्ति कहि जाते है। ऐसी शक्ति समस्त सृष्टि की रचना करनेवाली और सब तरह की सामर्थ्य रखनेवाली मानी जाती है। ११. दुर्गा। भगवती। १२. गौरी। १३. लक्ष्मी। १४. तांत्रिकों की परिभाषा में वह नटी, कापालिकी, वेश्या, धोबिन, नाउन, ब्राह्मणी, शूद्रा, ग्वालिन या मालिन जो युवती, रूपवती और सौभाग्यवती हो। ऐसी स्त्रियों का विधिपूर्वक पूजन सिद्धिप्रद और मोक्षदायक माना जाता है। १५. स्त्री की मूत्रेंद्रिय। भग। (तांत्रिक)। १६. एक प्रकार का शस्त्र। साँग। १७. तलवार। १८. क्षमता। योग्यता (को०)। १९. साहित्य में शब्द के अर्थ की बोधक शक्ति। अभिधा, लक्षणा और व्यंजना नाम की शब्दशक्ति (को०)। २०. काव्यादि निर्माण की क्षमता। रचनाशक्ति। कवित्वशक्ति (को०)। २१. द्यूतक्रीड़ा का उपकरण वा यंत्र (को०)।

शक्ति (२)
संज्ञा पुं० प्राचीन ऋषि का नाम जो पराशर के पिता थे।

शक्तिक
संज्ञा पुं० [सं०] गंधक।

शक्तिकुंठन
संज्ञा पुं० [सं० शक्तिकुण्ठन] शक्ति का दब जाना। नरम पड़ जाना [को०]।

शक्तिग्रह (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव। महादेव। २. कार्तिकेय। ३. शब्द का अर्थ बतलानेवाली शक्ति या वृत्ति का ज्ञान। ४. वह जो भाला या बरछी चलाता हो। भालाबरदार।

शक्तिग्रह (२)
वि० १. शक्ति या अर्थ को ग्रहण करनेवाला। २. बर्छा- धारी (को०)।

शक्तिग्राहक (१)
वि० [सं०] शब्दार्थ का निश्चय अथवा निर्धारण करने वाला [को०]।

शक्तिग्राहक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] कार्तिकेय।

शक्तिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] शक्ति का भाव या धर्म शक्तित्व।

शक्तितः
अव्य० [सं० शक्तितस्] यथाशक्ति। शक्ति के अनुसार [को०]।

शक्तित्रय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शक्ति' —५।

शक्तिधर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्कंद। कार्तिकेय। उ०—शक्ति शक्तिधर पासहिं पासी। गर्गसंहिता (शब्द०)। २. भाला- बरदार। बर्छीधारी (को०)।

शक्तिधर (२)
वि० शक्तिशाली। ताकतवर। मजबूत [को०]।

शक्तिध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्तिकेय। स्कंद। २. वह जो शक्ति नामक अस्त्र धारण करता हो (को०)।

शक्तिनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

शक्तिपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] छतिवन। सतिवन। सप्तपर्ण वृक्ष।

शक्तिपाणि
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्तिकेय। स्कंद। २. शक्ति नामक अस्त्र या बर्छा धारण करनेवाला व्यक्ति (को०)।

शक्तिपात
संज्ञा पुं० [सं०] शक्ति का क्षय। पराजय। २. योग दर्शन में एक आध्यात्मिक प्रक्रिया जिसके द्वारा गुरु अपनी आध्यात्मिक शक्ति शिष्य में स्थापित करता है [को०]।

शक्तिपूजक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो शक्ति की उपासना करता हो। शक्ति। २. तांत्रिक। वाममार्गी।

शक्तिपूजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] शक्ति का शाक्तों द्वारा होनेवाला पूजन।

शक्तिपूर्व
संज्ञा पुं० [सं०] पराशर का एक नाम।

शक्तिबोध
संज्ञा पुं० [सं०] शब्दशक्ति का ज्ञान। शब्द के अर्थ का बोध।

शक्तिभृत्
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्तिकेय। स्कंद। २. साँग या भाला धारण करनेवाला पुरुष (को०)।

शक्तिमत्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] शक्तिमान् होने का भाव या धर्म।

शक्तिमत्य
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शक्तिमत्ता'।

शक्तिमान्
वि० [सं० शक्तिमत्] [वि० स्त्री० शक्तिमती] १. बलवान्। बलिष्ठ। ताकतवर। २. सामर्थ्य वा योग्यता का अतिक्रमण करनेवाला (को०)। ३. बाणधारी (को०)।

शक्तिवन
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक वन का नाम जो तीर्थ कहा गया हो।

शक्तिवादी
संज्ञा पुं० [शक्तिवादिन्] वह जो शक्ति की उपासना करता हो। शाक्त।

शक्तिवीर
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो शक्ति की उपासना करता हो। वाममार्गी।

शक्तिवैकल्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. शक्ति का नाश। दौर्बल्य कमजोरी। २. असमर्थता।

शक्तिशोधन
संज्ञा पुं० [सं०] शाक्तों का एक संस्कार जिसमें वे किसी स्त्री को शक्ति की प्रतिनिधि बनाने से पहले कुल विशिष्ट क्रियाएँ करके उसे शुद्ध करते हैं।

शक्तिष्ठ
वि० [सं०] जिसमें शक्ति हो। शक्तिशाली। मजबुत। ताकतवर। बलवान्।

शक्तिसंपन्न
वि० [सं० शक्तिसम्पन्न] शक्ति से युक्त। बलवान्। ताकतवर। मजबूत।

शक्तिहीन
वि० [सं०] १. जिसमें शक्ति का अभाव हो। निर्बल। बलहीन। असमर्थ। नाताकत। २. हींजड़ा। नपुंसक। नामर्द।

शक्ती (१)
संज्ञा पुं० [सं० शक्ति] एक प्रकार के मात्रिक छंद का नाम। विशेष—इसके प्रत्येक चरण में १८ मात्राएँ होता है और इसकी रचना ३ + ३ + ४ + ३ + ५ होती है। अंत में सगण, रगण, या मगण में से कोई एक और आदि में एक लघु होना चाहिए। इसकी १, ६, ११ और १७वीं मात्रा लघु रहती है। यह भुजंगी और चंद्रिका वृत की चाल पर होता है। अंतर यह है कि वे गणबद्ध होते है और यह स्वतंत्र है। यह छंद फारसी के 'करीमा' बबख्शाय बर हाल मा। कि हस्तम् असीरे कमंदे हवा' की बहर से मिलता है। जैसे, उ०—शिवा शंभु के पाँव पंकज गहौं। विनायक सहायक सदा दिन चहौं।—काव्य प्र० (शब्द०)।

शक्ती (२)
संज्ञा पुं० [सं० शक्तिन्] शक्तिवाला। शक्तिशाली। बलवान्।

शक्ती (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति] दे० 'शक्ति'।

शक्तु
संज्ञा पुं० [सं०] भुने हुए जो चने आदि का आटा। सत्तु।

शक्तुक
संज्ञा पुं० [सं०] भावप्रकाश के अनुसार एक प्रकार का बहुत तीव्र और उग्र विष जो भसोड़ के समना होता है। पीसने से यह सहज ही में पिसकर सत्तु के समान हो जाता है।

शक्तुफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] शमी वृक्ष। सफेद कीकर। छिकुर का पेड़।

शक्तुफलिका, शक्तुफली
संज्ञा स्त्री० [सं०] शमी का वृक्ष।

शक्त्यपेक्ष, दायन
संज्ञा पुं० [सं०] ऋणी की सामर्थ्य के अनुसार ऋण थोड़ा थोड़ा करके चुकता कराना।

शकि्तृ
संज्ञा पुं० [सं०] वशिष्ठ मुनि के सबसे बड़े लड़के का नाम। विशेष—महाभारत में लिखा है कि एक बार रास्ते में राजा कल्माषपाद से इनको कहा सुनी हो गई, जिसपर राजा ने इन्हें एक कोड़ा जमा दिया। इसपर इन्होंने राजा को शाप दियाकि तुम राक्षस हो जाओ। तदनुसार राजा राक्षस हो गया और पहले उसने इन्हीं को भक्षण कर लिया।

शक्न, शक्नु
वि० [सं०] प्रिय बोलनेवाला। प्रियंवद [को०]।

शक्मा
संज्ञा पुं० [सं० शक्मन्] १. पराक्रम। शक्ति। सामर्थ्य। २. इंद्र। संक्रंदन। ३. कर्म।

शक्य (१)
वि० [सं०] १. किया जाने योग्य। जो किया जा सके। संभव। क्रियात्मक। २. जिसमें शक्ति हो।

शक्य (२)
संज्ञा पुं० शब्दशक्ति के द्वारा प्रकट होनेवाला अर्थ। जैसे— 'अग्नि' पद में अंगार रुप की शक्ति है अतः अग्निपद का अंगार शक्य अथवा वाच्य है। (व्याकरण)।

शक्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शक्य होने का भाव या धर्म। क्रियात्मकता। २. क्षमता। समर्थता (को०)।

शक्यत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शक्यता' [को०]।

शक्यप्रतीकार
वि० [सं०] जिसका प्रतीकार किया जा सके [को०]।

शक्यप्राप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] न्याय दर्शन के अनुसार प्रमाता के वे प्रमाण जिनसे प्रमेय सिद्ध होता है।

शक्यसामंतता
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्यसामन्तता] पड़ोसी राजाओं की जीतने योग्य क्षमता [को०]।

शक्यार्थ
संज्ञा पुं० [सं०] वह अर्थ जो शब्द की अभिधाशक्ति द्वारा व्यक्त हो। अभिधेयार्थ [को०]।

शक्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दैत्यों का नाश करनेवालले, इंद्र। उ०—भरत शोक बरन्यो नहिं जाई। मनहु शक्र द्विज हत्या पाई।—लवकुश- चरित्र (शब्द०)। २. कुटज वृक्ष। कोरैया। ३. अर्जुन वृक्ष। कोह वृक्ष। ४. इंद्रजौ। कुटज बीज। ५. रगण के चौथे भेद अर्थात् (/?/) की संज्ञा जिसमें छह मात्राएँ होती हैं। जैसे— लोकवती। ६. ज्येष्ठा नक्षत्र, जिसके अधिष्ठता देवता इंद्र हैं। ७. उलुक पक्षी (को०)। ८. चौदह की संख्या (को०)।९. शिव का एक नाम (को०)।१०. स्वामी। राजा (को०)।

शक्र (२)
वि० समर्थ। योग्य।

शक्रकार्मुक
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रधनुष।

शक्रकाष्ठा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राची दिशा। पूर्व दिशा जिसका अधिपति इंद्र है [को०]।

शक्रकुमारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'शक्रमातृका'।

शक्रकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रध्वज।

शक्रक्रीड़ाचल
संज्ञा पुं० [सं० शक्रक्रीडाचल] इंद्र के क्रीड़ा करने का पर्वत अर्थात् सुमेरु पर्वत।

शक्रगोप, शक्रगोपक
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रगोप नामक कीड़ा। बीरबहुटी।

शक्रचाप
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रधनुष।

शक्रज, शक्रजात
संज्ञा पुं० [सं०] कौआ। काक पक्षी।

शक्रजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] इंद्रवारुणी लता। इंद्रायण। इमारुन।

शक्रजानु
संज्ञा पुं० [सं०] रामायण के अनुसार एक वानर का नाम।

शक्रजाल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'इंद्रजाल'।

शक्रजित्
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसने इंद्र पर विजय प्राप्त की हो। २. इंद्र को जीतनेवाले मेघनाद का एक नाम।

शक्रतरु
संज्ञा पुं० [सं०] भाँग का पेड़।

शक्रत्व
संज्ञा पुं० [सं०] शक्र का भाव या धर्म।

शक्रदारु
संज्ञा पुं० [सं०] १. देवदारु। २. साखु का पेड़। शाल।

शक्रदिक्
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्रदिश्] पूर्व दिशा जिसके स्वामी इंद्र माने जाते हैं।

शक्रदेव
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र। २. हरिवंश के अनुसार शृगाल के एक पुत्र का नाम।

शक्रदैवत
संज्ञा पुं० [सं०] ज्येष्ठा नामक नक्षत्र जिसके स्वामी इंद्र माने जाते हैं।

शक्रद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] १. देवदारु। २. मौलसिरी। बकुल वृक्ष। ३. सखु का पेड़ शाल वृक्ष।

शक्रधनु, शक्रधनुष
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रधनुष।

शक्रध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'इंद्रध्वज'।

शक्रनंदन
संज्ञा पुं० [सं० शक्रनन्दन] इंद्र का पुत्र अर्थात् अर्जुन।

शक्रनेमी
संज्ञा पुं० [सं० शक्रनेमिन्] १. देवदार का वृक्ष। २. मेढ़ा- सिंगी। मेषशृंगी। ३. कुड़ा। कोरैया। कुटज वृक्ष।

शक्रपर्याय, शक्रपादप
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुड़ा। कुटज वृक्ष। २. देवदार का पेड़।

शक्रपुर
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र के रहने की पूरी, अमरावती।

शक्रपुरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] शक्रपुर। अमरावती।

शक्रपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रजौ। कुटज बीज।

शक्रपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'शक्रपुष्पिका'।

शक्रपुष्पिका, शक्रपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अग्निशिखा नाम का वृक्ष। २. कलिहारी। लांगली। ३. नागदमनी। नागदौन।

शक्रप्रस्थ
संज्ञा पुं० [सं०] एक नगर जिसे पांडवों ने खांडन वन जलाकर बसाया था। इंद्रप्रस्थ। उ०—उठे सुनत हरि उद्धव बानी। भे पुनि शक्रप्रस्त प्रस्थानी।—सबल (शब्द०)।

शक्रबीज
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रजौ।

शक्रभवन
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्ग।

शक्रभिद्
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र को दबानेवाला, मेघनाद। इंद्रजित्।

शक्रभुवन
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्ग।

शक्रभूभवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] इंद्रवारुणी नाम की लता। इनारुन। इंद्रायण।

शक्रभूरुह
संज्ञा पुं० [सं०] कुटज वृक्ष। कुड़ा। कोरैया।

शक्रमाता
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्रमातृ] इंद्र की माता अर्थात् भार्गी।

शक्रमातृका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. इंद्रध्वज। २. भार्गी।

शक्रमूर्द्धा
संज्ञा पुं० [सं० शक्रमूर्द्धन्] वल्मीक। बाँबी।

शक्रयव
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रजौ। कुटज बीज।

शक्रलोक
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रलोक। स्वर्ग।

शक्रवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] इंद्रवारुणी नाम की लता। इनारुन। इंद्रायण।

शक्रवापी
संज्ञा पुं० [सं० शक्रवापिन] महाभारत के अनुसार एक नाग का नाम।

शक्रवास
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्ग। शक्रभवन [को०]।

शक्रवाहन
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र का वाहन अर्थात् मेघ। बादल।

शक्रवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] कुटज। कोरैया।

शक्रशरासन
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रधनुष।

शक्रशाखी
संज्ञा पुं० [सं० शक्शाखिन्] कुड़ा। कुटज वृक्ष।

शक्रशाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] यज्ञभूमि में वह स्थान जहाँ इंद्र के उद्देश्य से बलि दी जाती हो।

शक्रशिर
संज्ञा पुं० [सं० शक्राशिरम्] बाँबी। वल्मीक।

शक्रसारथी
संज्ञा पुं० [सं० शक्रसारथि] इंद्र का सारथी अर्थात् मातलि।

शक्रसूत
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र का पुत्र बालि, जिसे राम ने मारा था। २. जयंत (को०)। ३. अर्जुन (को०)।

शक्रसुधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुँदरु। गुंदवरोसा।

शक्रसृष्टा
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरीतकी। हर्रे।

शक्राख्य
संज्ञा पुं० [सं०] उल्लु। पेचक पक्षी।

शक्राग्नि
संज्ञा पुं० [सं०] विशाखा नक्षत्र जिसके स्वामी इंद्र और अग्नि माने जाते हैं।

शक्राणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] इंद्र की पत्नी शची। इंद्राणी। २. निर्गुंडी। शेफालिका। सेनुआर।

शक्रात्मज
संज्ञा पुं० [सं०] १. अर्जुन। २. जयंत (को०)।

शक्रादन
संज्ञा पुं० [सं०] भाँग। भंग।

शक्रानिल
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष में प्रभव आदि साठ संवत्सरों के बारहु युगों में से दसवें युग के अधिपति। इसके युग में ये पाँच संवस्तर होते हैं,—परिधावी, प्रमादी, आनंद, राक्षस और अनल।

शक्रावर्त
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक प्राचीन तीर्थ का नाम।

शक्राशन
संज्ञा पुं० [सं०] १. भाँग। विजया। भंग। २. कुड़ा। कटज। कोरैया। ३. इंद्रजौ। कुटज बीज।

शक्रासन
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र का आसन। २. सिंहासन।

शक्राह्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्रजौ। कुटज बीज। २. कुटज वृक्ष।

शक्राह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'शक्राह्व'।

शक्रि
संज्ञा पुं० [सं०] १. मेघ। बादल। २. वज्र। ३. हाथी। ४. पर्वत। पहाड़।

शक्रुक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का विष [को०]।

शक्रंद्र
संज्ञा पुं० [सं० शक्रीन्द] बीरबहुटी या इंद्रगोप नाम का कीड़ा।

शक्रोत्थान
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रध्वज नाम का उत्सव जो भाद्र शुक्ल द्धादशी को होता था। दे० 'इंद्रध्वज'—२, ३।

शक्रोत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शक्रोत्थान'।

शक्ल
संज्ञा स्त्री० [अ०] दे० 'शक्ल (२)'। मुहा०—शक्ल चिड़ियों की नाज परियों का = हैसियत के बाहर गुमान रखना। उ०—ऐसी तो सूरत भी नहीं पाई है बीबी, शक्ल चिड़ियों की नाज परियों का।—फिसाना०, भा०३, पृ० १६। शक्ल दिखाना = (१) मिलना। (२) सामने आना। शक्ल देखते रह जाना = (१) चकित होना। २. मुग्ध होना। शक्ल देखा करना = दे० 'शक्ल देखते रह जाना'। शक्ल न दिखाना = (१) न मिलना। (२) मुँह छिपाना। शक्ल पकड़ना = मूर्त होना। आकार ग्रहण करना। शक्ल पहचानना = (१) रुपरेखा से परिचित होना (२) देखकर चरित्र की बारीकियाँ जानना। शक्ल बनाना = असुंदर या विचित्र हो जाना। शक्ल बिगाड़ना = (१) चेहरे को कुरुप या विचित्र कर लेना। (२) पीटते पीटते मुँह सुजा देना।

शक्व
संज्ञा पुं० [सं०] हाथी [को०]।

शक्वर
संज्ञा पुं० [सं०] १. बैल। २. आकाश।

शक्वरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उँगली। २. एक प्राचीन नदी का नाम। ३. मेखला। ४. गौ। गाय। ५. अँगुठी। मुद्रिका (को०)।६. एक साम (को०)। ७. शक्करी नामक छंद। विशेष दे० 'शक्करी'।

शक्वा (१)
संज्ञा पुं० [सं० शक्वन्] १. हाथी। गज। २. शिल्पी। निर्माता (को०)।

शक्वा (२)
वि० शक्तिमान्। ताकतवर। मजबूत [को०]।

शखस
संज्ञा पुं० [अ० शख्स] दे० 'शख्स'।

शख्स
संज्ञा पुं० [अ० शख्स] व्यक्ति। जन। मनुष्य। आदमी।

शख्सियत
संज्ञा स्त्री० [अ० शख्सियत] शख्स का भाव या धर्म। व्यक्तिता। व्यक्तित्व।

शख्सी
वि० [अ० शख्सी] शख्स का। मनुष्य का। व्यक्तिगत।

शगल
संज्ञा पुं० [अ० शग़ल; शग़ल शुग़्ल] १. व्यापार। कामधंधा। जैसे,—कहिए आजकल क्या शगल है। उ०—शगल बेहतर है इश्कबाजी का। क्या हकीकी व क्या मजाजी का।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० ४। २. वह काम जो यों ही समय बिताने या मन बहलाने के लिये किया जाय। मनोविनोद। उ०—मनियर को एक नये शगल में तल्लीन देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई।—जिप्सी, पृ० ११९।

शगुन
संज्ञा पुं० [सं० शकुन (मि० फा० शगुन, शुगुन, शुगुन)] १. किसी काम के समय होनेवाले लक्षणों का शुभाशुभ विचार। शकुन। विशेष दे० 'शकुन'। मुहा०—शगुन लेना या विचारना = कोई काम करने से पहले कुछ विशिष्ट क्रियाओं द्वारा यह जानना कि यह होगा कि नहीं।२. किसी काम के आरंभ में होनेवाले शुभ लक्षण। ३. एक प्रकार की रसम जो विवाह की बातचीत पक्की होने पर होती है। इसमें कन्या पक्ष के लोग वर पक्ष के लोगों के यहाँ कुछ मिठाई और नगद आदि भेजते हैं। तिलक। टीका। क्रि० प्र०—देना।—भेजना।—लेना। ४. नजराना। भेंट (को०)। ५. बहला में वह स्थान जहाँ बैल हाँकनेवाला बैठता है।

शगुनियाँ
संज्ञा पुं० [हिं० शगुन + ईयाँ (प्रत्य०)] वह जो ज्योतिष या रमल आदि के द्वारा शुभाशुभ शगुनों आदि का विचार करता हो। साधारण कोटि का ज्योतिषी। रम्माल।

शगुन
संज्ञा पुं० [फा़० शुगुन] दे० 'शगुन'।

शगुनियाँ
संज्ञा पुं० [फा़० शुगुन + हिं० इया] दे० 'शगुनियाँ'।

शगुफा
संज्ञा पुं० [फा० शिगुफहु] १. बिना खिला हुआ फूल। कली। २. पुष्प। फूल। ३. कोई नई और विलक्षण घटना। ४. कसीदा। बेलबूटा (को०)। मुहा०—शगुफा खिलना = कोई नई और विलक्षण घटना होना। शगुफा खिलाना = कोई ऐसी नई और विलक्षण बात कर बैठना जिससे सब लोग चकित हो जायँ। शगुफा छोड़ना = झगड़े फसादवाली बात करना। विशेष—इस मुहावरे का प्रयोग प्रायःऐसी बातों के संबंध में ही होता है जिनसे कोई लड़ाई झगड़ा या झंझट आदि पैदा हो।

शचि, शची
संज्ञा स्त्री० [सं०] इंद्र की पत्नी, इंद्राणी जो दानवराज पुलोमा की कन्या थी। पर्या०—सची। ऐंद्री। पुलोमजा। माहेंद्री। जयवाहिनी। २. सतावर। शतावरी। शतमूली। ३. स्पृक्का। असवरग। ४. वक्तुत्व शक्ति। वाग्मिता। ५. प्रज्ञा। बुद्धि। अक्ल। ६. बल। शक्ति (को०)। ७. क्षिप्रकापिता। क्रियात्मकता (को०)। ८. भक्ति। प्रीति (को०)। ९. पवित्र क्रिया (को०)।

शचीतीर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन तीर्थ का नाम।

शचीपति
संज्ञा पुं० [सं०] शची के पति, इंद्र।

शचीपती
संज्ञा पुं० [सं०] अश्विनीकुमार।

शचीबल
संज्ञा पुं० [सं०] नाटक में वह पात्र जो इंद्र के समान वेश- भूषा धारण करता हो।

शचीभर्ता
संज्ञा पुं० [सं० शचीभर्तु] शची के पति, इंद्र [को०]।

शचीश
संज्ञा पुं० [सं०] शची के पति, इंद्र।

शजर
संज्ञा पुं० [अ०] दरख्त। वृक्ष। पेड़।

शजरा
संज्ञा पुं० [अ० शजहु, शज्रुज्रहू] १. वह कागज जिसमें किसी की वंशपरंपरा लिखी हो। वंशवृक्ष। पुश्तानामा। कुर्सीनामा। वंशावली। २. वृक्ष। पौधा। ३. पटवारी का तैयार हुआ खेतों का नक्शा।

शट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. खटाई। अम्ल रस। ३. एक प्राचीन देश का नाम।

शट (२)
वि० [सं०] अम्ल। खट्टा [को०]।

शटा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जटा। २. शेर की गर्दन का बाल। सटा। केसर (को०)।

शटि, शटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कचूर। कर्चुर। २. गंधपलाशी। कपूरकचरी। ३. अमिया हल्दी। आम्रहरिद्रा। आमा हलदी। ४. सुंगधवाला। नेत्रबाला।

शट्टक
संज्ञा पुं० [सं०] घी और पानी में सना हुआ चावल का आटा जिसका व्यवहार वैद्यक में होता है।

शठ (१)
वि० [सं०] १. धुर्त। चालाक। धोखेबाज। २. पाजी। लुच्चा। बदमाश।

शठ (२)
संज्ञा पुं० १. तगर का फूल। २. केसर। कुंकुम। जाफरान। ३. लोहा। ४. इस्पात। फौलद। ५. धतुरे का वृक्ष। ६. चीता चित्रक। चितउर। ७. तालवृक्ष। ८. अमला का वृक्ष। ९. साहित्य में पाँच प्रकार के पतियों या नायकों में से एक प्रकार का पति या नायक। वह नायक जो छलपूर्वक अपना अपराध छिपाने में चतुर और किसी दुसरी स्त्री के साथ प्रेम करते हुए भी अपनी स्त्री से प्रेम प्रदर्शित करने का बहाना करता हो। उ०—सहित काज मधुरै मधुर, बैननि कहै बनाय। उर अंतर घट कपटमय, सो शठ नायक आय।—(शब्द०)। १०. छलिया वा धुर्त जन (को०)। ११. बेबकूफ। जड़बुद्धिं। १२. आलसी। १३. वह जो दो आदमियों के बीच में पड़कर उनके झगड़े का निपटारा करता हो। मध्यस्थ। यौ०—शठघी, शठबुद्धि, शठमति = जिसकी बुद्धि शठतापूर्ण हो। शठ या दुष्ट व्यक्ति। धुर्त आदमी।

शठता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शठ का भाव या धर्म। धूर्तता। २. बदमाशी। पाजीपन।

शठत्व
संज्ञा पुं० [सं०] शठ का भाव या धर्म। शठता।

शठांगा, शठान्वा
संज्ञा स्त्री० [सं० शठाङ्गा, शठान्वा] ब्राह्मणी लता। अंबष्ठा। पाढ़ा।

शठांबा
संज्ञा स्त्री० [सं० शठाम्बा] अंबष्ठा। पाढ़ा [को०]।

शठिका, शठी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कचूर। २. गंधपलाशी। कपूर- कचरी। ३. बन अदरक। पेऊ।

शठीरुपा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कंद गिलोय। कंद गुडू ची।

शठोदरक
वि० [सं० शठोदर्क] अंत में धोखा देनेवाला। धोखेबाज। धुर्त।

शड़ाप
संज्ञा पुं० [अनुध्व०] कोड़े, चाबुक आदि के मारने से होनेवाली ध्वनि। मुहा०—शड़ाप शड़ाप कोड़े जमाना = तेजी सी कोड़ा मारना। उ०—और आदमी इधर उधर से शड़ाप शड़ाप से कोड़े जमाते जाते हैं।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ४।

शण
संज्ञा पुं० [सं०] १. सन नामक पौधा। विशेष दे० 'सन'। २. भंग। विजया। ३. शणपुष्पी। बनसनई।

शणई
संज्ञा स्त्री० [सं० शण + हिं० ई] दे० 'सन'।

शणकंद
संज्ञा पुं० [शणकन्द] चर्मकषा नाम का सुगंधि द्रव्य।

शणकंदा
संज्ञा स्त्री० [सं० शणकन्दा] एक प्रकार का थूहड़ जिसे सातला कहते हैं।

शणक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन ऋषि का नाण। सनक।

शणघंटा, शणघंटिका
संज्ञा स्त्री० [सं० शणघण्टा, शणघण्टिका] शणपुष्पी नाम की लता। विशेष दे० 'शणपुष्पी'।

शणचुर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] सनई का वह बचा हुआ भाग जो उसे कूट कर सन निकाल लेने के बाद रह जाता।

शणतांतव
वि० [सं० शणतान्तव] [वि० स्त्री० शणतांतवी] सन के रेशे का बना हुआ [को०]।

शणपट्ट
संज्ञा पुं० [सं०] सन का बना हुआ वस्त्र वा पट्ट [को०]।

शणपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पटसन। अशनपर्णी [को०]।

शणपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'शणपुष्पी'।

शणपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की वनस्पति जो साधारणतः बनसनई कहलाती है। विशेष—यह छोटी और बड़ी दो प्रकार की होती है। छोटी शणपुष्पी प्रायःसब प्रांतों में पाई जाती है। इसका क्षुप, पत्ते, फूल इत्यादि सन के ही समान होते हैं, किंतु क्षुप सन से छोटा होता है। इसके फूल पीले, फलियाँ मटर के समान गोल और लंबी होती है। यह कड़वी, वमनकारक और पारे को बाँधने- व ली कही गई है। इसके फल सूख जाने पर अंदर के बीजों के कारण झन झन शब्द करते हैं; इसी से इसे झुनझुनियाँ कहते हैं। बड़ी शणपुष्पी प्रायः वाटिकाओं में लगाते हैं। इसका क्षुप, पत्ते आदि छोटी शणपुष्पी से बड़े होते हैं और फूल सफेद रंग के होते हैं। यह कसैली, गरमी और पारे को बाँधनवाली कही गई है और मोहन, स्तंभन आदि में व्यवहार की जाती है। १. अरहर। आढकी। रहर।

शणशिफा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सनई या सन की जड़। शणमूल।

शणसमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बनसनई। शणपुष्पी।

शणसुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] कुश आदि की बनी हुई पवित्री जो श्राद्ध, तर्पण आदि कृत्यों के समय कनिष्ठिका की बगलवाली उँगली में पहनी जाती है। पवित्रक। पवित्री। पैंती।

शणाल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शणालुक'।

शणालुक
संज्ञा पुं० [सं०] अमलतास का वृक्ष।

शणिका
संज्ञा स्त्री [सं] शणापुष्पी। बनसनई।

शणीर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सोन नदी के मध्य का उपजाऊ स्थल। २. सरयू नदी की शाखाओं से घिरा हुआ छपरे के समीप का एक द्वीप। दर्दरी तट।

शत (१)
वि० [सं०] दस का दस गुना। सौ।

शत (२)
संज्ञा पुं० १. सौ की संख्या। दस की दस गुनी संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है—१००। २. कोई बड़ी संख्या। जैसे, शतपत्र।

शतक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० शतिका] १. सौ का समूह। २. एक ही तरह की सौ चीजों का संग्रह। जैसे,—नीतिशतक, रहिमन शतक। ३. वह जिसमें सौ भाग या अवयव हो। ४. सौ वर्षों का समूह। शताब्दी। ५. विष्णु का एक नाम।

शतक (२)
वि० १ सौ। दस का दस गुना। २. जिसमें सौ का समावेश हो। सौ की संख्या से संबंद्ध [को०]।

शतकपालेश
संज्ञा पुं० [सं०] शिव की एक मूर्ति का नाम।

शतकर्मा
संज्ञा पुं० [सं० शतकर्मन्] शनि ग्रह।

शतकिरण
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की समाधि।

शतकीर्ति
संज्ञा पुं० [सं०] जैन पुराणनुसार एक भावी अर्हत् का नाम।

शतकुंत, शतकुंद
संज्ञा पुं० [सं० शतकपंन्त, शतकुन्द] सफेद कनेर। करवीर।

शतकुंभ
संज्ञा पुं० [सं० शतकुम्भ] १. एक प्राचीन पर्वत का नाम। २. सफेद कनेर। शतकुंत। ३.। सुवर्ण। सोना।

शतकुंभा
संज्ञा स्त्री० [सं० शतकुम्भा] महाभारत में वर्णित एक नदी का नाम।

शतकुलीरक
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का कीड़ा।

शतकुसुमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] शतपुष्पा। सौंफ।

शतकेसर
संज्ञा पुं० [सं०] भागवत के अनुसार एक वर्षपर्वत का नाम।

शतकोटि
संज्ञा पुं० [सं०] १. सौ करोड़ की संख्या। अर्बुद। २. इंद्र का वज्र। ३. हीरा। हीरक।

शतकौंभ, शतकौंभक
संज्ञा पुं० [शतकौम्भ, शतकौम्भक] स्वर्ण। सोना।

शतक्रतु
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र। २. वह जिसने सौ यज्ञ किए हों।

शतक्रुतुद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] काली कुड़ा। कृष्ण कुटज।

शतकातुयव
संज्ञा पुं० [सं०] कुटज। बीज इंद्रजौ।

शतखंड
संज्ञा पुं० [सं० शतखण्ड] १. सोना। स्वर्ण। २. सोने की बनी हुई कोई चीज। ३. सौ भाग। सौ टुकड़ा।

शतगु
वि० [सं०] मनु के अनुसार सौ गौओं का स्वामी। सौ गायों का रखनेवाला।

शतगुण, शतगुणित
वि० [सं०] सौगुना।

शतग्रंथि
संज्ञा स्त्री० [सं० शतग्रन्थि] १. सफेद दुब। दुर्वा। २. नीली दुब।

शतग्रीव
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की भूतयोनि।

शतघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम [को०]।

शतघ्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्राचीन काल का एक प्रकार का शस्त्र। विशेष—किसी बड़े पत्थर या लकड़ी के कुंद में बहुत से कीलकाँटे ठोंककर यह शस्त्र बनाया जाता था और इसका व्यवहार युद्ध केसमय शत्रुओं पर फेंकनें में होता था। लोग इसे तोप या राकेट जैसा शस्त्र कहते हैं जिससे सैकड़ों व्यक्ति मारे जा सकते थे। २. वृश्चिकाली। बिछाती। ३. एक प्रकार की घास। ४. करंज या कंजे का पेड़। ५. भावप्रकाश के अनुसार गले में होनेवाला एक प्रकार का रोग। विशेष—इसमें त्रिदोष के कारण गले में बत्ती के समान लंबी और मोटी तता कंठ को रोकनेवाली, मांस के अंकुरों से भरी हुई और बहुत पीड़ा देनेवाली सूजन हो जाती है। यह रोग प्राणनाशक कहा गया है।

शतचंद्र
संज्ञा पुं० [सं० शतचन्द्र] महाभारत के अनुसार वह तलवार या चर्म (ढाल) जिसपर चंद्रमा के समान चमकते हुए आकार बने हों [को०]। यौ०—शतचंद्रवर्त्म = (१) तलवार चलाने की एक विधि या पद्धति। (२) तलवार की धार।

शतचरणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कनखजूरा। गोजर। शतपरी [को०]।

शतच्छद
संज्ञा पुं० [सं०] १. कठफोड़वा या काठ ठोका नामक पक्षी। २. सौ पत्तों या पंखड़ियोंवाला कमल। शतदल पद्म।

शतजटा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सतावर। शतमूली।

शतजित्
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विष्णु का एक नाम। २. भागवत के अनुसार विराज के एक पुत्र का नाम। ३. एक यज्ञ का नाम।

शतजिह्व
संज्ञा पुं० [सं०] शिव। महादेव।

शततम
वि० [सं०] [वि० स्त्री० शततम] सौवाँ। सौ की संख्या पर पड़नेवाला [को०]।

शततारका, शततारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] शतभिषा नाम का नक्षत्र जिसमें सौ तारे हैं। विशेष दे० 'शतभिषा'।

शतदंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० शतदन्तिका] नखी नामक गंधद्रव्य। हाथी- शुंडी। नागदंती।

शतदल
संज्ञा पुं० [सं०] पद्म। शतपत्र।

शतदला
संज्ञा स्त्री० [सं०] सेवती। शतपत्री।

शतद्रु
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पंजाब की सतलज नाम की नदी। विशेष—यह नदी हिमालय पर्वत के दक्षिण पश्चिमी भाग में बहती हुई व्यास या विपासा से मिलकर मुल्तान के दक्षिण ओऱ सिंधु में मिलती हैं। २. गंगा नदी का एक नाम (को०)।

शतधन्वा
संज्ञा पुं० [सं० शतधन्वन्] १. एक प्राचीन ऋषि का नाम। २. एक योद्धा जिसे कृष्ण ने सत्राजित के मारने के अपराध में मारा था।

शतधा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दूब। दूर्वा।

शतधा (२)
क्रि० वि० [सं०] सौ टुकड़ों में। सौ पत्तो में। सौ प्रकार से। सैकड़ों बार। उ०—मूर्त प्रेरणा सी लहराती नभ में शतधा विद्युत्।—अतिमा, पृ० १३९।

शतधामा
संज्ञा पुं० [सं० शतधामन्] विष्णु का एक नाम।

शतधार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वज्र।

शतधार (२)
वि० सैंकड़ों धाराओं में प्रवहमान। २. जिसमें सौ कौण वा धारएँ हों [को०]।

शतधार वन
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन तीर्थ का नाम।

शतधृति
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र। २. ब्रह्मा। ३. स्वर्ग।

शतधौत
वि० [सं०] सैकड़ों बार धोया हुआ। पूर्णतःस्वच्छ [को०]।

शतनेत्रिका
संज्ञा स्त्री [सं०] शतावर।

शतपति
संज्ञा पुं० [सं०] सौ मनुष्यों का मालिक या सरदार।

शतपत्र (१)
वि० [सं०] १. सौ दलों या पत्तोंवाला। २. सौ पंखोंवाला।

शतपत्र (२)
संज्ञा पुं० १. कमल। २. सेवती। शतपत्री। ३. मोर नामक पक्षी। ४. कठफोड़वा नामक पक्षी। ५. सारस पक्षी। ६. मैना। शारीका। ७. बृहस्पति। ८. तोता या तोते की जाति का एक पक्षी (को०)।

शतपत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] १. कठफोड़वा नाम का पक्षी। २. एक प्रकार का विषैला कीड़ा। ३. पूराणानुसार एक पर्वत का नाम।

शतपत्रनिवास
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा।

शतपत्रभेदन्याय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'न्याय'—४ (९७)।

शतपत्रयोनि
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा।

शतपत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दूब। दूर्वा। २. नारी। स्त्री (को०)।

शतपत्रिका, शतपत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का गुलाब। श्वेत गुलाब।

शतपत्री केसर
संज्ञा पुं० [सं०] गुलाब का जीरा। गुलाबकेसर।

शतपथ
वि० [सं०] १. असंख्य मार्गोवाला। २. बहुत सी शाखाओंवाला।

शतपथ ब्राह्मण
संज्ञा पुं० [सं०] यजुर्वेद का एक ब्राह्मण। विशेष—इसके कर्ता महर्षि याज्ञवल्कय माने जाते हैं। इसकी माध्यंदिन और काण्व शाखाएँ मिलती हैं। इनमें से पहली की विशेष प्रतिष्ठा है। एक प्रणाली के अनुसार इसमें ६८ प्रपाठक हैं, और दुसरी के अनुसार यह १४ कांड़ों और १०० अध्यायों में विभक्त है। चारों ब्राह्मणों में से यह अधिक क्रमपूर्ण और रोचक है। इसमें अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यत कर्मकांड का बड़ा विशद और सुंदर वर्णन है।

शतपथिक
वि० [सं०] १. बहुत से मतों का अनुयायी। २. शतपथ ब्राह्मण का जानने या पढ़नेवाला।

शतपद
वि० [सं०] सैकड़ों पैरोंवाला [को०]।

शतपद
संज्ञा पुं० [सं०] १. कनखजुरा। गोजर। २. च्यूँटी।

शतपद चक्र
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योति, में सौ कोष्ठोंवाला एक प्रकार का चक्र जिसकी सहायता से नक्षत्रों का ज्ञान सुगमतापू्र्वक हो जाता है।

शतपदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कनखजुरा। गोजर। २. सतावर। शतमूली। ३. मरसे की जाति का एक पौधा जिसके ऊपरकलँगी के आकार के लाल फूल लगते हैं। जटाधर। ४. नीली कोयल नाम की लता।

शतपद्म
संज्ञा पुं० [सं०] १. सफेद कमल। श्वेतकमल। २. सौ पंखुड़ियोंवाल कमल [को०]।

शतपरिवार
संज्ञा पुं० [सं०] समाधि का एक भेद।

शतपर्वी (१)
संज्ञा पुं० [सं० शतपर्वन्] १. बाँस। वंश। २. पौढ़ा। गन्ना। केतारा।

शतपर्वा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दूर्वा घास। दूब। २. बच। ३. कुटकी। ४. सुगंधिद्रव्य। ५. मार्गव की पत्नी का नाम। ६. कलंबी। करेमु का साग। ७. क्वार या आश्विन की पूर्णिमा। कोजागर पूर्णिमा (को०)।

शतपर्विका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दूब। २. बच। ३. यव। जौ।

शतपर्वेश
संज्ञा पुं० [सं०] भार्गव या शूक्र ग्रह [को०]।

शतपाद
वि० [सं०] सैकड़ों पैरवाला। जिसे सैकड़ों पैर हो [को०]।

शदपाद
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शतपद'।

शतपादिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. काकोली नामक अष्टवर्गीय ओषधि। २. कनखजुरा। गोजर।

शतपादी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'शतपादिका' [को०]।

शतपाल
संज्ञा पुं० [सं०] सौ गाँवों का अध्यक्ष वा अधिकारी [को०]।

शतपुत्रिका, शतपुत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सतपुतिया। तरोई। २. सतावर। शतावरी।

शतपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. साठी धान्य। २. किरतार्जुनीय महाकाव्य के रचयिता संस्कृत कवि 'भारवि' का एक नाम। इनका शतलुंपक और शतलुप नाम भी प्राप्त होता है (को०)।

शतपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सोआ नाम का साग। २. सौंफ। ३. गवेधुक।

शतपुष्पादल
संज्ञा पुं० [सं०] १. सौप का साग। शताह्वा।

शतपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'शतपुष्पा'।

शतपोद, शतपोदक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का वातजन्य भगंदर। विशेष—इसमें गुदा के समीप फोड़ा उत्पन्न होता है जिसके पकने पर बहुत से छेद हो जाते हैं और उनमें से मल, मूत्र, वीर्य निकलता है। २. एक प्रकार का रोग जिसमें वात और रक्त के कुपित होने से लिंग पर अनेक छेद हो जाते हैं।

शतपोन
संज्ञा पुं० [सं०] चलनी। छनना [को०]।

शतपोरक शतपौर
संज्ञा पुं० [सं०] पौंढ़ा। गन्ना।

शतप्रसूना
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'शतपुष्पा।

शतप्रास
संज्ञा पुं० [सं०] कनेर का वृक्ष। करबीर वृक्ष।

शतफल
संज्ञा पुं० [सं०] बाँस।

शतफली
संज्ञा पुं० [सं० शतफलिन्] बाँस। शतफल [को०]।

शतबला
संज्ञा स्त्री० [सं०] महाभारत के अनुसार एक प्राचीन नदी का नाम।

शतबलाक
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक आचार्य का नाम।

शतबलि
संज्ञा पुं० [सं०] १. मछली। २. रामायण के अनुसार एक बंदर का नाम।

शतबाहु
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का कीड़ा। २. भागवत के अनुसार एक असुर का नाम। ३. बौद्धों के अनुसार मार के पुत्र का नाम।

शतभिष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शतभिषा'।

शतभिषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अश्विनी आदि सत्ताइस नक्षत्रों में से चौबीसवाँ नक्षत्र। विशेष—यह सौ तारों का समूह है और इसकी आकृति मंडलाकार है। इसके अधिष्ठाता देवता वरुण कहे गए हैं, और यह ऊर्ध्वमुक माना गया है। कहते हैं, जो बालक इस नक्षत्र में जन्म लेता है, वह साहसी निष्ठुर चतुर और अपने वैरी का नाश करनेवाला होता है।

शतभीरु
संज्ञा पुं० [सं०] माल्लका। चमेली।

शतमख
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र। शतक्रतु। २. उल्लु। कौशिक।

शतमन्यु
वि० [सं०] १. क्रोधी। गुस्सावर। २. उत्साही।

शतमन्यु
संज्ञा पुं० १. इंद्र। २. उल्लु।

शतमयूख
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा।

शतमल्ल
संज्ञा पुं० [सं०] साखिया नामक विष।

शतमान
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुवर्ण की कोई वस्तु जो तौल में सौ मान की हो। २. सोना या चादी तौलने के लिये सौ मान की तौल या बाट। ३. चाँदी का एक पल। ४. आढ़क नाम की प्राचीन काल की तौल जौ प्रायः पौने चार सेर की होती थी। ५. रुपामाखी या तारमाक्षिक नाम की उपधातु।

शतमार्ज
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो अस्त्र आदि बनाता या उन्हें ठीक करता हो।

शतमुख (१)
वि० [सं०] जिसमें सैकड़ों मार्ग हों। सैकड़ों मुख या निकास रखनेवाला [को०]।

शतमुख (२)
क्रि० वि० [सं०] सौ खंड़ों या धाराओं में। अनेक ओर से। चारों ओर से। उ०—ताम्रपर्णा पापल से, शतमुख झरते चंचल स्वणिम निर्झर।—ग्राम्या, पृ० ६३।

शतमुखी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कूर्चिका। मार्जनी। झाड़ु [को०]।

शतमूर्धा
संज्ञा पुं० [सं० शतमूर्धनु] बिमौट। बाँबा [को०]।

शतमूला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बड़ी सतावर। २. बच। ३. नीली दूर्वा। नीली दूब।

शतमूलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आखुपर्णी नाम की लता। २. बड़ी दंती। बँगरेड़ा।

शतमूली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शतावरी नाम की ओषधि। २. तालमूला। मूसला। ३. बच।

शतयज्वा
संज्ञा पुं० [सं० शतयज्वन्] शतक्रतु। इंद्र [को०]।

शतयाष्टक
पुं० [सं०] वह हार जिसमें सौ लड़ हों।

शतयातु
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन वैदिक ऋषि का नाम।

शतरंज
संज्ञा पुं० [फा०; मि० सं० चतरङ्ग] एक प्रकार का प्रसिद्ध खेल जो चौंसठ खानों की विसात पर खेला जाता है। विशेष—यह खेल दो आदमी खेलते हैं जिनमें से प्रत्येक के पास १६-१६ मुहरे होते हैं। इन सालह मुहरों में एक बादशाह, एक वजीर, दो ऊँट, दो घोड़े, दो हाथी या किश्तया तथा आठ प्यादे होते हैं। इनमें से प्रत्येक मुहरे का कुछ विशिष्ट चाल हाती हैं, अर्थात् उसके चलनक कुछ विशिष्ट नियम होते है। उन्हीं नियमा के अनुसार विपक्षा के मुहरे मर जाते हैं। जब बादशाह किसी ऐसे घर मे पहुँच जाता है जहाँ से उसके चलने का जगह नहीँ रहता, तब बाजी मात समझा जाती है। इसका बिसात म आठ आठ खाना का आठ पक्तिया होती है। विशेष दे० 'चतुरंग' शब्द।

शतरंजबाज
संज्ञा पुं० [फा० शतरंज+ बाज] शतरंज का खिलाड़ा। शातर।

शतरंजबाजी
संज्ञा स्त्री० [फा० शतरंज + बाजी] १. शतरंज खेलने का व्यसन। २. शतरंज खेलने का काम या भाव।

शतरंजी
संज्ञा स्त्री० [फा०] वह दरी जो शतरंज का बिसात की तरह कई प्रकार के रंग बिरंगे सुता से बना हो। २. शतरंज खेलने की बिसात।३. वह राटा जो कइ प्रकार के अनाजों को मिलाकर बनाई गई हो। मिस्सा राटा। ४. वह जो शतरंज का अच्छा खिलाड़ी हो।

शतरथ
संज्ञा पुं० [सं०] एक राजा का नाम जिसका उल्लेख महाभारत में हो।

शतरात्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का यज्ञ जो सौ रातों में समाप्त होता था।

शतरुद्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. रुद्र का एक रुप जिसकि सौ मुँह माने जाते हैं। २. शिव दर्शन के अनुसार एक शक्ति जो आत्मा की उत्पादक कही गई है।

शतरुद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] हिमालय की एक नदी का नाम।

शतरुद्रिय, शतरुद्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. यज्ञ को हवि। २. यजुर्वेद का एक अंश जिसमें रुद्र स्तोत्र है। ३. महाभारत में वर्णित शिव का एख स्तुति (को०)।

शतरुप
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन ऋषि का नाम।

शतरुपा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बहुपा का मानसा कन्या तथा पत्नी का नाम। विशेष—इसी के गर्भ से स्वायभुव का उत्पात्त हुई थी। पर विष्णुपुराण में लिखा है कि शतरुप स्वायमुख अनु का स्त्री थी, ना कि माता।

शतरर्च्ची
संज्ञा पुं० [सं० शतर्च्चिन्] ऋग्वेद के प्रथम मंडल के मंत्रद्रष्टा ऋषियों की उपाधि।

शतलुपक
संज्ञा पुं० [सं० शतलुम्पक] भारवि का एक नाम [को०]।

शतलुप
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'शतलुंपक'।

शतलोचन (१)
वि० [सं०] सौ नेत्रोंवाला।

शतलोचन (२)
संज्ञा पुं० १. स्कंद के एक गण या अनुचर का नाम। २. पुराणानुसार एक असुर का नाम। ३. महाभारत के अनुसार इंद्र का एक नाम (को०)।

शतवनि
संज्ञा पुं० [सं०] एक गोत्रप्रवर्तक ऋषि का नाम।

शतवर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. सो वर्ष। एक शताब्दी। २. वह जो सौ वर्ष पुराना हो। ३. वह जो सौ वर्ष तक टिक सके। सौ वर्ष तक रहनेवाला [को०]।

शतवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नीली दुब। २. काकोली नामक अष्टवर्गीय ओषधि।

शतवादन
संज्ञा पुं० [सं०] बहुत से बाजों का एक साथ बजना।

शतवार
संज्ञा पुं० [सं०] एक कवच का नाम जो अथर्ववेद में है।

शतवार्षिक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० शतवार्षिकी] १. प्रति सौ वर्ष पर होनेवाला। २. सौ वर्ष तक रहने या होनेवाला।

शतवार्षिकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पानी न बरसना। अनावृष्टि। २. वह उत्सव जो सौ वर्ष बीतने पर मनाया जाय (को०)।

शतवाही
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जो मैके से बहुत सा धन साथ लेकर ससुराल आई हो।

शतविघ
वि० [सं०] सौ या अनंत प्रकार का। उ०—शंकर, जय कृष्ण, राम, शतविध, नामानुबंध, बांधव है निराकर।— आरोधना, पृ० ६७।

शतवीर
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का एक नाम।

शतवीर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सफेद दूब। सतावर। शतमूली। ३. मुनक्का। कपिलाद्राक्षा। ४. सफेद मूसली। ५. किसमिश।

शतवृषभ
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष में एक मूहूर्त का नाम।

शतवेधिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] चूका या चुक्रिका नामक साग।

शतवेधी
संज्ञा पुं० [सं० शतवेधिन्] १. अमलबेंत। २. चूका या चुक्रिका नामक साग।

शतशः
क्रि० वि० [सं० शतशस्] १. सैंकड़ों। २. सौ बार। ३. वैविध्यपूर्ण। अनेकानेक। उ०—अधिकताः बाँधता वह ध्यान था। ब्रजविभूषण हैं शतशः बने।—प्रिय प्र०, पृ० १६३।

शतशत
वि० [सं० शत का द्वित्व प्रयोग] सैकड़ों। अनंत। उ०— जग के सर से सरस्वता शतशत रुपों की निकली क्षिप, भंद, गति, रंकों की, भूपों की।—अपरा, पृ० १९४।

शतशलाका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छत्र।

शतशाख
वि० [सं०] १. सैकड़ों। २. शताधिक। जिसमें सैकड़ों शाखाएं हों। ३. अनेक प्रकार का। वैविध्यपूर्ण [को०]।

शतशीर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु का एक नाम। २. रामायण के अनुसार एक प्रकार का अभिमंत्रित अस्त्र।

शतशीर्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वासुकी देवी का एक नाम।

शतशृंग
संज्ञा पुं० [सं० शतश्रृङ्ग] पुराणानुसार एक पर्वत का नाम।विशेष—यह पर्वत महाभद्र के उत्तर में अवस्थित बतलाया गया है। अनुमान है कि यह वर्तमान मैसुर राज्य के एक पर्वत का प्राचीन नाम है।

शतसंख्य
संज्ञा पुं० [सं० शतसङ्ख्य] विष्णुपुराण के अनुसार दसवें मन्वंतर के एक देवता का नाम।

शतसहस्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. सौ हजार की संख्या। एक लाख की संख्या। २. कई सौ की संख्या अर्थात् एक बड़ी संख्या [को०]।

शतसहस्त्रक
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक प्राचीन तीर्थ का नाम।

शतसाहस्त्र
वि० [सं०] [वि० स्त्री० शतसाहस्त्री] १. सौ हजार से युक्त वा सौ हजार संबंधी। २. सौ हजार अर्थात् एक लाख मूल्य द्वारा क्रीत वा प्राप्त [को०]।

शतसुख
संज्ञा पुं० [सं०] अंतहीन आनंद। अनंत सुख [को०]।

शतसुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सतावर। शतमूली।

शतहृद
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरिवंश के अनुसार एक असुर का नाम।

शतहृदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विद्युत्। बिजली। २. बज्र। ३. दक्ष की एक कन्या का नाम जो बहुपुत्र की स्त्री थी। ४. विराध राक्षस की माता का नाम।

शतांग (१)
संज्ञा पुं० [सं० शताङ्ग] १. रथ। युद्ध का रथ। २. तिनिश। तिरिछ वृक्ष। ३. हरिवंश के अनुसार एक दानव का नाम (को०)।

शतांग (२)
वि० सौ अगों या अवयवोंवाला।

शतागुल
संज्ञा पुं० [सं० शताङ्गुल] १. ताल या ताड़ का वृक्ष। २. वह जो माप मे सौ अंगुल हो।

शतांश
संज्ञा पुं० [सं०] सौ भागों में से एक भाग। १००वाँ हिस्सा।

शता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सतावर।

शताकरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक किन्नरी का नाम।

शताकारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक गंधर्व का स्त्री का नाम।

शताक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] हरिवंश के अनुसार एक दानव का नाम।

शताक्षी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रात्रि। रात। २. शतपुष्पा नामक वनस्पति। सौंफ। ३. पार्वती। ४. दुर्गा।

शतानंद
संज्ञा पुं० [सं० शतानन्द] १. ब्रह्मा। २. विष्णु। ३. विष्णु का रथ। ४. कृष्ण।५. गौतम मुनि। ६. राजा जनक के एक पुरोहित का नाम। उ०—शतानद तब वाद प्रभु बैठे गुरु पहँ जाय।—तुलसी (शब्द०)।

शतानंदा
संज्ञा स्त्री० [सं० शतानन्दा] १. कार्तिकेय का एक मातृका का नाम।२. पुराणनुसार एक नदी का नाम।

शतानक
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहा मुरद जलाए जाते हों। मसान। श्मशान। मरघट।

शतानन
संज्ञा पुं० [सं०] बेल। श्रीफल।

शतानना
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक देवी का नाम।

शतानीक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वृद्ध पुरुष। बुड्ढा आदमी। २. एक मुनि का नाम जो ब्यास के शिष्य थे। ३. श्वसुर। ससुर। ४. पुराणानुसार चौथे युग में चंद्रवंश का द्वितीय राजा। इसका पिता जनमेजय और पुत्र सहस्त्रानीक थी। ५. भागवत के अनुसार सुदास राजा का पुत्र। ६. महाभारत के अनुसार नकुल के एक पुत्र का नाम जो द्रौपदी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। एक असुर का नाम। ८. सौ सिपाहियों का नायक।

शताब्द (१)
वि० [सं०] सौ वर्षवाला।

शताब्द (२)
संज्ञा पुं० सौ वर्ष। शताब्दी। सदी।

शताब्दी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सौ वर्षों का समय। २. किसी संवत् में सैकड़ें के अनुसार एक से सौ वर्ष तक का समय। जैसे,— ईसवी पाँचवीं शताब्दी अर्थात् ई० सन् ४०१ से ५०० तक का समय।

शतामघ
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र का एक नाम।

शतायु
संज्ञा पुं० [सं० शतायुस्] १. वह जिसकी आयु सौ वर्षों की हो। सौ वर्षों तक जीवित रहनेवाला। २. महाभारत के अनुसार पुरुरवा के एक पुत्र का नाम। ३. विष्णुपुराण के अनुसार उशना के एक पुत्र का नाम।

शतायुध
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो सौ अस्त्र धारण करता हो। सौ अस्त्रोवाला।

शतायुधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक किन्नरी का नाम।

शतार
संज्ञा पुं० [सं०] १. वज्र। २. सुदर्शन चक्र।

शतारु
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का कोढ़। विशेष—इस रोग में खाल पर लाल, काली और दाहयुक्त फुंसियाँ हो जाती हैं।

शतारुषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'शतारु'।

शतावधान
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह मनुष्य जो एक साथ बहुत सी बातें सुनकर उन्हें सिलसिलेवार याद रख सकता हो और बहुत से काम एक साथ कर सकता हो। श्रुतिधर। विशेष—कुछ मेधावी लोग ऐसे होते हैं जो एक साथ बहुत से काम करने का अभ्यास करते हैं। जैसे,—एक आदमी रह रहकर कुछ संख्या या अंकों का नाम लेता है। दुसरा आदमी रह रहकर घड़ियाल बजाता है। तीसरा आदमी किसी ऐसी भाषा के वाक्य के शब्द बोलता है जिससे शतावधान करनेवाला मनुष्य अपारचित होता है। एक आदमी पूर्ति के लिये कोई समस्या देता है। एक ओर शतरंज का खेल होता रहता है। शतावधान का यह कर्तव्य होता है कि वह संख्याओ और अपरिचित भाषा के वाक्य के शब्द याद रख, समस्या की पू्र्ति करे और शतरंज खेलता चले, ओर इसी प्रकार और जितने काम होते हों, उन सबमें संमिलित; और अंत में सबका ठीक ठीक उत्तर दे और सब काम ठीक ठीक पूरे उतारे। २. शतावधान का काम।

शततावधानी (१)
संज्ञा पुं० [सं० शतावधानिन्] दे० 'शतावधान'।

शतावधानी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० शतावधान] शतावधान का काम।

शतावर
संज्ञा पुं० [सं० शतावरी] शतावर नाम की ओषधि। सफेद मूसली।

शतावरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शतमूली। सताव। सफेद मूसली। २. कचूर। शटी। ३. इंद्र की भार्या, इंद्राणी।

शतावर्त
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु। २. महादेव। ३. हरिवंश के अनुसार एक पवित्र वन का नाम।

शतावर्त्ती
संज्ञा पुं० [सं० शतावर्त्तिन्] विष्णु।

शताशिन
संज्ञा पुं० [सं०] वज्र।

शताह्वया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सौंफ। २. सोआ। मधूरिका। ३. सतावर।

शताह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सौंफ। २. सतावर। ३. अजओदा। ४. एक प्राचीन नदी का नाम। ५. एक तीर्थ का नाम।

शतिक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० शतिकी] १. सौ संबंधी। सौ का। २. सौ में क्रीत (को०)। ३. जिसमे या जिसके पास सौ हो। सौ वाला (को०)। ४. सौ के बदले में परिवर्तित हुआ या प्राप्त (को०)। ५. (राशि) जिसपर प्रतिशत ब्याज या कर निर्धारित हो (को०)। ६. सौ या सौ की प्राप्ति का द्योतक (को०)।

शती (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शातन्] सौ का समूह। सैकड़ा। जैसे,— दु्र्गासप्तशती। २. दे० 'शताब्दी'।

शती (२)
वि० १. सौ गुना। शतगुणित। २. संख्यातीत। असंख्य [को०]।

शती (३)
संज्ञा पुं० वह जो सौ का स्वामा हो। सौ का स्वामी [को०]।

शतेर
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रु। २. घाव। जख्म। ३. हिंसा।

शतोदर
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव का एक नाम। २. शिव के एक गण का नाम। ३. रामायण के् अनुसार एक अस्त्र का नाम।

शतोदरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कार्तिकेय की एक मातृका का नाम।

श्तौदना
संज्ञा स्त्री० [सं०] यज्ञ में होनेवाला एक प्रकार का कृत्य।

शत्य
वि० [सं०] दे० 'शतिक' [को०]।

शत्रि
संज्ञा पुं० [सं०] १. गज। हाथी। २. बल। ताकत। ३. एक राजर्षि का नाम।

शत्रुंजय
संज्ञा पुं० [सं० शत्रुज्जय] १. काठियावाड़ प्रांत का एक प्रसिद्ध पर्वत जो विमलाद्रि भी कहलाता है। यह जैनियों का एक प्रसिद्ध तीर्थ है। गिरनार। २. रामायण के अनुसार एक नाग (हाथी) का नाम। ३. परमेश्वर।

शत्रुंजय (२)
वि० शत्रुओं को जीतनेवाला।

शत्रुंतप
वि० [सं० शत्रुन्तप] शत्तुओं को परास्त करने नष्ट करनेवाला [को०]।

शत्रु
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसके साथ भारी विरोध या वेमनस्य हो। रिपु। और। दुश्मन। २. एक असुर का नाम। ३. नाग- दवन या मारछाबी नाम की वनस्पति।

शत्रुकंटक
संज्ञा पुं० [सं० शत्रुकण्टक] पुगीवाला। सुपारी।

शत्रुकंटका
संज्ञा स्त्री० [सं० शत्रुकण्टका] सुपारा।

शत्रुक
संज्ञा पुं० [सं०] अरि। रिपु। शत्रु [को०]।

शत्रुकर्षण
वि० [सं०] दे० 'शत्रुदमन' [को०]।

शत्रुकुल
संज्ञा पुं० [सं०] वैरी का घर। शत्रु का निवासस्थान [को०]।

शत्रुगृह
संज्ञा पुं० [सं०] ज्यौतिष में लग्न से छठा स्थान [को०]।

शत्रुघात
वि० [सं०] शत्रुघाती। शत्रुहंता [को०]।

शत्रुघाती (१)
संज्ञा पुं० [सं० शत्रुघातिन्] राजा दशरथ के पुत्र शत्रुघ्न का एक पुत्र।

शत्रुघाती (२)
वि० शत्रु का नाश करनेवाला।

शत्रुघ्न (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. राम के एक भाई जो सुमित्रा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। इनका भरत के साथ वैसा ही प्रेम था जैसा लक्ष्मण का राम के साथ। २. श्वफल्क का एक पुत्र। ३. देवश्रवा के एक पुत्र का नाम।

शत्रुघ्न (२)
वि० शत्रु को मारनेवाला। अरि को नष्ट करनेवाला।

शत्रुघ्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] हथियार।

शत्रुजित्
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव। २. क्रुतुध्वज या कुवलयाश्व के पिता का नाम।

शत्रुजित् (२)
वि० शत्रु को जीतनेवाला।

शत्रुतपन
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव। २. एक दैत्य का नाम। कहते है, यह रोग फैलाता है।

शत्रुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] शत्रु का भाव या धर्म। दुश्मनी। वैर भाव। क्रि० प्र०—करना।—दिखलाना।—रखना।—होना।

शत्रुताई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शत्रुता + हिं० ई (प्रत्य०) या सं० शत्रु + ताति (प्रत्य०) ?] दे० 'शत्रुता'।

शत्रुतापन
वि० [सं०] शत्रुओं को जलानेवाला। शत्रुहंता।

शत्रुत्व
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रु का भाव या धर्म। शत्रुता। दुश्मनी।

शत्रुदमन (१)
वि० [सं०] दुश्मनों को वश में करनेवाला।

शत्रुदमन (२)
संज्ञा पुं० दशरथ के पुत्र शत्रुघ्न का एक नाम।

शत्रुद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] अमलबेंत।

शत्रुनिवर्हण
वि० [सं०] शत्रुओं का नाश करनेवाला [को०]।

शत्रुपक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रु का दल या दिशा। २. दुश्मन। वैरी। विरोधी [को०]।

शत्रुभंग
संज्ञा पुं० [सं० शत्रुभङ्ग] मुँज नामक तृण।

शत्रुभूमिज
संज्ञा पुं० [सं०] आँखों में लगाने का सुरमा।

शत्रुमर्दन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रुघ्न का एक नाम। २. कुवलयाश्व कपुत्र का नाम।

शत्रुमर्दन (२)
वि० शत्रुओं का मर्दन या नाश करनेवाला।

शत्रुलाव
वि० [सं०] शत्रुओं को मारनेवाला [को०]।

शत्रुविग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रु की चढ़ाई या आक्रमण [को०]।

शत्रुवनाशन
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

शत्रुशाल पु
वि० [सं० शत्रु + शल्य] शत्रु के हृदय में शूल उत्पन्न करनेवाला। उ०—नृप शत्रुशाल नंदन नवल भावसिंह भूपाल मान।—मतिराम (शब्द०)।

शत्रुसह, शत्रुसाह
वि० [सं०] शत्रु से लड़ने या भिड़नेवाला। शत्रु का सामना करनेवाला [को०]।

शत्रुसूदन
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रुघ्न का एक नाम।

शत्रुसेवी
वि० [सं० शत्रुसेविन्] शत्रु राजा की सेवा करनेवाला [को०]।

शत्रुहंता
वि० [सं० शत्रुहन्तृ] शत्रु का नाश करनेवाला।

शत्रुहत्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] शत्रु का वध या हनन। दुश्मन को मार डालना [को०]।

शत्रुहा (१)
संज्ञा पुं० [सं० शत्रुहन्] दशरथ के पुत्र शत्रुघ्न का एक नाम।

शत्रुहा (२)
वि० शत्रु का नाश करनेवाला।

शत्वरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] रात्रि। रात।

शद
संज्ञा पुं० [सं०] १. फलमूलाद। २. कर। महसूल। लगान। ३. तरकारी।

शदक
संज्ञा पुं० [सं०] वह अनाज जिसकी भूसी न निकाली गई हो।

शदीद
वि० [अ०] बहुत ज्यादह। जोर का। भारी। सख्त। जैसे,—उसका चाँट शदाद है।

शदेवी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'सहदवा'।

शद्द पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० शब्द, प्रा० सद्द; तुल० अ० शद, शद्द] आवाज ध्वनि। शब्द। उ०—सन्मुख्य सारस शद्द। अहि जीवनौ फनमद्द।—प० रासा०, पृ० ५८।

शद्द (२)
संज्ञा पुं० [अ०] १. किसी अक्षर को दुहराकर या दो बार पढ़ना। दृढ़ करना। मजबुत करना। २. स्वर का ऊँचा करना। आवाज पर जोर देना। ३. स्वर का आराहावराह या उतार चढ़ाव [को०]। यौ०—शद्द व मद, शद्दीमद = (१) धुमधाम। (२) जोर शोर। तेजी।

शद्दाद
संज्ञा पुं० [अ०] १. वह व्यक्ति जो बहुत अत्याचारी हो। २. एक प्राचीन शक्तिशाली सम्राट् जिसने ईश्वरत्व का दावा किया और खुद को ईश्वर कहलवाता था। इसने एक कृत्रिम स्वर्ग भी बनावाया था परंतु उसमें प्रवेश करते समय घाड़ गिरकर इसकी मृत्यु हो गई [को०]।

शद्रि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मेघ। बादल। २. हाथी। ३. अर्जुन का का एक नाम (को०)।

शद्रि (२)
संज्ञा स्त्री० १. खंड। टुकड़ा। २. बिंजली। दामिनी। ताड़ित। सोदामनी। ३. धनीभूत शकरा। जमाई हुई चाना। मिस्त्रा। खड़मादक (को०)।

शद्रु (१)
वि० [सं०] १. गिरानेवाला। नष्ट करनेवाला। पतन करनेवाला। २. जानेवाला। चलनेवाला। गतिशील (को०)।

शद्रु (२)
संज्ञा पुं० विष्णु।

शदवला
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूराणानुसार एक नदी का नाम।

शन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शांति। २. चुप्पी। खामोशी। मौनता।

शन (२)
संज्ञा पुं० [सं० शण] दे० 'सन' (पौधा)।

शनई पु
अव्य० [सं० शनः] दे० 'शनः'।

शनई शनई
क्रि० वि० [सं० शनैः शनैः] शनैः शनैः। धीरे धीरे। उ०—शनई शनई ताहि चढ़ावै। चक्कर चक्कर में पहुँचावै।—अष्टांग योग, पृ० ७६।

शनक
संज्ञा पुं० [सं०] हरिवंश के अनुसार शंबर के एक पुत्र का नाम।

शनकावलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] गजपीपल।

शनपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुट्टकी नाम की ओषधि।

शनपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बन सनई।

शनवा
वि० [फा़०] श्रोता। सुननेवाला [को०]।

शनवाई
संज्ञा स्त्री० [फा़० शनवा + ई] सुनवाई [को०]।

शनहुली
संज्ञा स्त्री० [सं० शणपुष्पी] १. दे० 'शनपुष्पी'। २. अरहर।

शनाख्त
संज्ञा स्त्री० [फा़० शनाख्त] पहचान। परख। दे० 'शिनाख्त'। उ०—जो इनको आदमी की ही शनाख्त होती तो नुक्स क्या था।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ११८। क्रि० प्र०—करना।—पहचानना। परखना।

शनावर
वि० [फा़० शनावर, शिनावर] तैराक। तैरनेवाला [को०]।

शनावर
संज्ञा स्त्री० [फा़० शनावरी, शिनावरी] तैराकी। तैरने का काम।

शनास
वि० [फा़० (प्रत्य०)] पहचाननेवाला। भले बुरे का विवेक करनेवाला। पारखी। विशेष—यह समास वा शब्द के अंत में आता है जैसे—मर्दुम- शनास, हकशनास। उ०—निहायत किसी ने कहा शाह पास, है यहाँ एक मेंहराँ इसम हकशनास।—दक्खिनी०, पृ० ३००।

शनासा
वि० [फा़०] १. पहचाननेवाला। जानकर। २. परिचित। वाकिप [को०]।

शनासाई
संज्ञा स्त्री० [फा़०] जान पहचान। परिचय [को०]।

शनि
संज्ञा पुं० [सं०] १. सौर जगत् के नौ ग्रहों में से सातवाँ ग्रह। शनैश्चर। विशेष—सूर्य से इस ग्रह का अंतर ८८३, ०००,००० मील अथवा पृथ्वी के अंतर से ९ १/२ गुना है। इसका व्यास७५८०० मील का है। प्रति सेकेंड ६ मील की चाल से सूर्य की परिक्रमा में इसको २९ वर्ष और १६७ दिन अर्थात् कुल १०७५९ दिन लगते हैं । इसका ताप १५ सें ० है। बृहस्पति को छोड़कर यह सबसे बड़ा ग्रह है पृथ्वी से इसका व्यास ९ गुना, विस्तार ६९७ गुना और मान ९३ गुना है। इसके साथ नौ उपग्रह या चंद्रमा हैं। जिनमें एक उपग्रह 'टाइटेन' बुध ग्रह से भी बड़ा है। बृहस्पति से छोटा होने पर भी यह सब ग्रहों से अधिक चमक दार है, जिससे इसका आकार सबसे बड़ा प्रतीत होता है। यह ग्रह ३७८ दिन में एक बार अपनी धुरी पर घुमता है। यह ग्रह विचित्र आकार का है। इसके बाहर चारों ओर कम से कम ३ एककैंद्रीय बहुत बड़े वलय है; और उस बाह्य वलय से इसके पिंड की दुरी ५,९०० मील है। इसके बाह्य वलय की चौड़ाई ११,२०० मील है। उस वलय का व्यास १,७२,८०० मील और मोटाई सौ मील से कुछ कम है। इस ग्रह पर पृथ्वी जैसा जीवन संभव नहीं हैं। फलित ज्योतिष के अनुसार यह ग्रह काले रंग का, शूद्र वर्ण औऱ सूर्यमुख है तथा इसका वाहन गृध्र है। यह सौराष्ट्रदेश का स्वामी, नपुंसक (मंदगामी) और तमोगुण से युक्त तथा कषाय रस का अधिपति है। यह मकर और कुंभराशि तता नीलकांत मणि (नीलन) का बी अधिपति है। यह चतुर्भुज है और इसके हाथों में बाण, शूल, धनुष और भल्ल है। इसके अधिपति देवता यम और प्रत्यधिदेवता प्रजापति हैं। इसका परिमाण चार अंगुल है। पद्यपुराण के अनुसार सूर्य की स्त्री छाया के गर्भ से इसकी उत्पत्ति हुई थी। अपनी स्त्री के शाप से इसकी द्दष्टि क्रूर हो गई और पार्वती के शाप के कारण यह खंज हो गया। इसे कश्यप मुनि की संतान भी मानते हैं। फलित के अनुसार शनि का फल इस प्रकार है यह पापग्रह और अशुभ फल का देनेवाला है, परंतु राशि और स्थानविशेष में शुभ फल भी प्रदान करता है। शनि और मंगल दोनों ग्रह स्थानविशेष पर एक साथ होने से राजयोग कारक होते हैं। यह भी माना जाता है कि लोगों पर जो भारी विपत्तियाँ आती हैं; वे प्रायः इसी की कुद्दष्टि के कारण होती हैं। इसका फल साढ़े सात दिन, साढ़े सात मास या साढ़े सात वर्ष तक रहता है। पर्या०—सौरि। शनिश्चर। नीलवासा। मंद। छायात्मज। पातगि। ग्रहनायक। छायासुत। भास्करी। नीलांबर। आर। क्रोड़। वक्र। कोल। सप्रांशु। पंगु। काल। सूर्यपुत्र। असित। २. शिव का एक नाम (को०)। ३. दुर्भाग्य। अभाग्य। बद- किस्मती। ४. दे० 'शनिवार'।

शनिचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष में मनुष्य के शरीर के आकार का एक प्रकार का चक्र। विशेष—इसमें शनिभोग्य नक्षत्र से आरंभ करके चक्ररुपी मनुष्य के भिन्न भिन्न अंगों में २७ नक्षत्रों की स्थापना करके शुभाशुभ फल जाने जाते हैं।

शनिज
संज्ञा पुं० [सं०] काली मिर्च।

शनिप्रदोष
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का प्रदोष (पर्व) जो शनिवार के दिन किसी मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी पड़ने पर होता है। इस दिन व्रत रहते हैं और शिव का पूजन किया जाता है।

शनिप्रसु
संज्ञा स्त्री० [सं०] शनि की माता छाया जो सूर्य की पत्नी कही गई है।

शनिप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] नीलमणि। नीलकांत मणि। नीलम।

शनिरुह
संज्ञा पुं० [सं०] १. शनिग्रह का वाहन। २. भैंसा। महिष।

शनिरुहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] भैंस। महिषी।

शनिर्भाव
संज्ञा पुं० [सं०] १. मंदता। शिथिलता। २. क्रमबद्धता। क्रमिकता [को०]।

शनिवार
संज्ञा पुं० [सं०] वह वार जो रविवार से पहले और शुक्र- वार के बाद पड़ता है।

शनिश्चचर
संज्ञा पुं० [सं० शनिश्चर] दे० 'शनि'।

शनैः (१)
अव्य० [सं०] १. धीरे। आहिस्ता। हौले। २. उत्तरोत्तर। ३. क्रमशः। क्रमानुसार (को०)। ४. धीमे धीमे। मृदुता या मुलायमियत से (को०)। ५. शिथिलता से (को०)। ६. स्वतंत्र या स्वच्चंद रुप से (को०)। यौ०—शनैः शनैः = धीरे धीरे। अहिस्ते आहिस्ते।

शनैः (२)
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० 'शनिवार'।

शनैःप्रमेह
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का प्रमेह रोग। विशेष—इस प्रमेह में रोगी को धीरे धीरे, थमकर और बहुत पतली धार में थोड़ा थोड़ा पेशाब आता है।

शनैमेंह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शनैःप्रमेह'।

शनैर्मेही
संज्ञा पुं० [सं० शनैर्मेहिन्] वह रोगी जिसे शनैःप्रमेह का रोग हो।

शनैश्वचर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शनि'।

शनैश्चर (२)
वि० धीरे धीरे गमन करनेवाला [को०]।

शन्न
वि० [सं०] १. पतित। गिरा हुआ। २. परीक्षण। क्षीण। ३. मुरझाया हुआ। कुम्हलाया हुआ [को०]।

शन्नाह
संज्ञा पुं० [फा़०] एक डोरी में बँधी हुई दो तुंबियाँ अथवा मशक जिसके सहारे तैरना सीखते हैं [को०]।

शप् (१)
[सं०] पाणिनि द्वारा प्रयुक्त एक विकरण जो स्वादि गण में प्रयुक्त होता है। धातुओं के बाद और तिडंत प्रत्ययों के पूर्व इसका प्रयोग होता है जिसका रुप 'अ' शेष रहता है। जैसे,/?/भू + शप् + ति =/?/भू + अ + ति = भवति।

शप् (२)
अव्य० [सं०] स्वीकरणसूचक शब्द। स्वीकार [को०]।

शप (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शाप। निर्भत्सना। २. शपथ। कसम [को०]।

शप (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० अनुध्व०] १. बेंत, छड़ी, चाबुक आदि के मारने की आवाज। २. कोई गाढ़ा और तरल पदार्थ तेजी से सुड़कते हुए निगलने की ध्वनि। ३. कुत्तें, बिल्ली आदि के द्वारा किसी वस्तु के चाटने की आवाज।

शप (३)
क्रि० वि० जल्दी से। झटपट। तुरत। यौ०—शपशप, शप से्, शपाशप = शीघ्रतापूर्वक। जल्दी से।

शपथ
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह कथन जिसके अनुसार कहनेवाला इस बात की प्रतिज्ञा करता है कि यदि मेरा कथन असत्य हो, मैने अमुक काम किया हो, मैं अमुक काम करुँ या न करुँ इत्यादि, तो मुझपर अमुक देवता का शाप पड़े अथवा मैं अमुक पाप का भागी होऊँ आदि। कसम। दिव्य। सौगंध। उ०— दुर्बलता का ही चिह्नविशेष शपथ है ।—साकेत, पृ० २२९। क्रि० प्र०—खाना।—देना।—लेना। मुहा०—दे० 'कसम' शब्द के मुहा०। २. दिव्य। विशेष दे० 'दिव्य'—२१। ३. अभिशाप। शाप (को०)। ४. प्रतिज्ञा या दृढ़तापूर्वक कोई काम करने या न करने आदि के संबंध में कथन। कोल। वचन। यौ०—शपथपत्र = हलफनामा।

पन
संज्ञा पुं० [सं०] १. शपथ। कसम। २. गाली। कुवाच्य।

शपशप शपाशप
संज्ञा स्त्री० [अनुध्व०] दे० 'शप (३)' का यौगिक।

शपित
वि० [सं०] दे० 'शप्त (२)'।

शप्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. उलुक अथवा उलप नामक तृण। २. वह व्यक्ति जिसे शाप दिया गया हो।

शप्त (२)
वि० १. शपाग्रस्त। अभिशप्त। २. भर्त्सित। जिसकी भर्त्सना की गई हो [को०]।

शफ
संज्ञा पुं० [सं०] १. वृक्ष की जड़। २. पशुओं का खुर। ३. नखी नामक गंधद्रव्य।

शफक
संज्ञा स्त्री० [अ० शफ़क़] प्रातःकाल या सायंकाल आकाश में दिखाई पड़नेवाली ललाई, विशेषः सध्या के समय दिखाई पड़नेवाली लालिमा जो बहुत ही मनोहर होती है। उ०—चढ़ा शाम को बाम पर गर वो माह। शफक का नया रंग लाई घटा।—भारतेंदु ग्रं०, भा०२, पृ० ४९०। मुहा०—शफक फूलना = प्रातःकाल या संध्या के समय आकाश में लालिमा फैलना।

शफकत
संज्ञा स्त्री० [अ० शफकत] १. कृपा। दया। मेहरबानी। २. प्यार। मुहब्बत। प्रेम। उ०—जो बात माने तो ऐन शफकत न माने तो ऐन हुस्ने खुबी।—भारतेंदु ग्रं०, भा०२, पृ० ८५७। क्रि० प्र०—दिखलाना।—रखना।

शफगोल
संज्ञा स्त्री० [हिं०] हिं० 'इसबगोल'।

शफतालु
संज्ञा पुं० [फा़० श़फ़तल] एक प्रकार का बड़ा आड़ु जिसे सप्तालुक या सतालु भि कहते हैं। विशेष दे० 'सतालु'।

शफर
संज्ञा पुं० [सं०] पोठी या पोठिया नाम की मछली। उ०— भरत सिहरे शफरवारि समान।—साकेत, पृ० १७१।

शपराधिप
संज्ञा पुं० [सं०] हिलसा मछली।

शफरी
संज्ञा संज्ञा [सं०] एक प्रकार की छोटी मछली। पोठी या पोठिया। उ०—शफरी, अरी, बता तु तड़प रही क्यों निममग्न भो इस सर में? जो रस निब गागर में सा रस गोरस नहीं स्वयं सागर में।—साकेत, पृ० २७८।

शफरुक
संज्ञा पुं० [सं०] १. संदुक। बक्स। २. पात्र। बरतन।

शफह
संज्ञा पुं० [अं० शफह] ओष्ठ। ओठ। अधर [को०]।

शफा
संज्ञा स्त्री० [अ० शफा़] शरीर का स्वस्थ होना। नोरोगता। आरोग्यता। तंदुरुस्ती। उ०—जो पीएगा दो की बीमारी में शफा पाएगा।—पिंजरें०, पृ० ७६। क्रि० प्र०—(किस को) शफा देना = किसी को रोग दूर करना। अच्छा करना। आराम देना। नीरोग करना।

शफाखाना
संज्ञा पुं० [अ० शफा + फा० खाना] वह स्थान वहाँ रोगियों की चिकित्सा होती है। चिकित्सालय। अस्पताल।

शफाअत
संज्ञा स्त्री० [अ० शफाअत] सिफारिश [को०]।

शफीक
वि० [अ० शफीक] १. कृपालु। दयालु। मित्र। दोस्त [को०]।

शफोरु (१)
वि० [सं०] १. जिसकी जाँघ गाय के खुर के समान हो।

शफोरु (२)
संज्ञा स्त्री० १. गाय के खुर के समान जाँघवाली स्त्री। २. वह स्त्री जिसकी जाँघ पर खुर का चिह्न हो (को०)।

शफ्फाक
वि० [अ० शफ्फा़फ़] १. निर्मल। शुद्ध। २. उज्वल। चमकदार। ३. पारदर्शी [को०]।