विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/स

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स (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. ईश्वर। २. शिव। महादेव। ३. साँप। ४. पक्षी। चिड़िया। ५. वायु। हवा। ६. जीवात्मा। ७. चंद्रमा। ८. भृगु। ९. दिप्ति। कांति। चमक। १० ज्ञान। ११. चिंता। १२. गाड़ी का रास्ता। सड़क। १३. संगीत में षड़ज स्वर का सूचक अक्षर। जैसे,—रे, ग, म, ध, नि, स। १४. छंद- शास्त्र में 'सगण' शब्द का सूचक अक्षर या संक्षिप्त रूप। दे० 'सगण'। १५. घेरा। बाड़ (को०)।

स (२)
उप० एक उपसर्ग जिसका प्रयोग शब्दों के आरंभ में, कुछ विशिष्ट अर्थ उत्पन्न करने के लिये होता है। जैसे,—(क) बहुब्रीहि समास में 'सह' के अर्थ में। जैसे,—सजीव = सह + जीव। सपरिवार = सह + परिवार। (ख) 'स्व या एक ही' के अर्थ में। जैसे,—सगोत्र। (ग) 'सु' के स्थान में। जैसे,— सपूत।

सआदत
संज्ञा स्त्री० [अ० सआदत] १. भलाई। कल्याण। २. प्रताप। इकबाल। ३. बरकत। शुभ होने का भाव [को०]। यौ०—सआदतमंद = (१) सौभाग्यशील। (२) आज्ञापालक। सआदतमंदी = सआदतमंद होने का भाव।

सइ पु (१)
अव्य० [सं० सह] से। साथ।

सइ पु (२)
अव्य० [प्रा० सुंतो] एक विभक्ति जो करण और अपादान कारक का चिह्न है।

सइअन †
संज्ञा पुं० [सं० शोभाञ्जन, हिं० सहिंजन] दे० 'सहिंजन'।

सइन †
संज्ञा स्त्री० [सं० सन्धि] नाड़ो का व्रण। नासूर।

सइना पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेना] दे० 'सेना'।

सइयो पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० सखी, प्रा० सहीयो] सखी। सहेली।

सइल ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० शल्य] लकड़ी की वह खूँटी या गुल्ली जो गाड़ी के कँधावर में लगाई जाती है। इसके लगने से बैल की करदन दो सैलों के बीच रहरी में ठहरी रहती है और वह इधर उधर नहीं हो सकता। कभी कभी यह लोहै की भी होती है। समदूल। सैला। घुल्ला।

सइल पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० शैल] दे० 'शैल'। उ०—मत्तभट मुकुट दसकंध साहस सइल सृंग बिद्दरनि जनु बज्र टाँकी।—तुलसी ग्रं०, पृ० १९३।

सइवर ‡
संज्ञा पुं० [सं० शैवल] सेवार। शैवाल।

सई (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० सही] मल्लाहों की परिभाषा में नाव खींचने की गून को कड़ा करना।

सई (२)
संज्ञा पुं० [अ०] पराक्रम। प्रयत्न। कोलिश। यौ०—सई सिफारिश = दौड़धूप या कोशिश पैरवी।

सई पु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० श्री] वृद्धि। बरकत। उ०—खग मृग सबर निसाचर सब की पूँजी बिनु बाढ़ी सई।—तुलसी (शब्द०)।

सई ‡ (४)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक नदी का नाम जो शाहजहाँपुर से निकल कर जौनपुर में गोमती से मिलती है। उ०—सई तीर बसि चले बिहाने। शृंगबेरपुर सब निअराने।—मानस, २।१८९।

सई † (५)
संज्ञा स्त्री० [सं० सखी, प्रा० सही] दे० 'सखी'।

सईकटा
संज्ञा पुं० [सं० शतकण्टक या सकण्टक] एक प्रकार पेड़।

सईद
वि० [अ०] १. तेजस्वी। २. भाग्यशाली। खुशनसीब। ३. कल्याणकारी। मांगलिक। शुभ [को०]।

सईल
संज्ञा स्त्री० [सं० शैल, प्रा० सइल] दे० 'सइल'।

सईस
संज्ञा पुं० [अ० साइस] दे० 'साईस'।

सउँ पु
अव्य० [हिं० सों ] दे० 'सों'।

सउख ‡
संज्ञा पुं० [अ० शौक] दे 'शौक'।

सउजा †
संज्ञा पुं० [सं० शावक या देशी] आखे टकरने योग्य जतू। शिकार। साउज।

सउत †
संज्ञा स्त्री० [सं० सपत्नी] दे० 'सौत'।

सउतिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सउत + इया (प्रत्य०)] दे० 'सौत'।

सउतेला †
वि० [हिं० सौत + एला (प्रत्य०) तेला ] दे० 'सौतेला'।

सऊर
संज्ञा पुं० [अ० शुऊर] दे० 'शऊर'।

सकंकूर
संज्ञा पुं० [ रूमो सकन्कूर, अ० सकन्कूर] गोह की तरह का एक जंतु। विशेष—इसका रंग लाल या पीला होता है। इसका माँस खारा और फीका होता है, पर बहुत बलवर्धक माना जाता है। इसे रेत की मछली या रेगमाही भी कहते हैं।

सकटक (१)
संज्ञा पुं० [सं० सकण्टक] १. करंज वृक्ष। कंजा। पूर्ति करंज। दुर्ग धकरंज। २. सिवार। शैवाल। सेवार।

सकंटक (२)
वि० १. कंटकयुक्त। काँटों से भरा हुआ। कँटीला। २. खतरनाक। कष्टदायी [को०]।

सकंपन
वि० [सं० सकम्पन] १. जो कंपन के साथ हो। २. कंपन- युक्त। काँपता हुआ [को०]।

सक †
संज्ञा पुं० [सं० शक] दे० 'शक'।

सक (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० शक्ति, सकत] दे० 'शक्ति', 'सकत'।

सक पु (३)
संज्ञा पुं० [अ० शक्] सदह। शंका शक।

सक पु (४)
संज्ञा पुं० [सं० शाका] साका। धाक। मुहा०—सक बाँधना = (१) धाक बाँधना। (२) मर्यादा स्थापित करना। यौ०—सकबंधी = धाक बाँधने या मर्यादा स्थापित करनेवाला। उ०—हों सो रतनसेन सकबंधी। राहु बेधि जीता सैरंधी।—जायसी (शब्द०)।

सकट (१)
संज्ञा पुं० [सं० शकट] शकट। गाड़ी। छकड़ा। सग्गड़। उ०—कोटि भार सकटनि महँ भरि कै। भए पठावत आनंद करि कै।—गिरिधरदास (शब्द०)।

सकट (२)
संज्ञा पुं० [सं०] शाखोट वृक्ष। सिहोर।

सकट (३)
वि० अधम। जघन्य। नीच। बुरा [को०]।

सकटान्न
संज्ञा पुं० [सं०] जिसे किसी प्रकार का अशौच हो, उसका अन्न। अशौचान्न। अशुद्ध अन्न। विशेष—शास्त्रों में इस प्रकार का अन्न खाने का निषेध है; और कहा गया है कि जो ऐसा अन्न खाता है, उसे भी अशौच हो जाता है।

सकटी
संज्ञा स्त्री० [सं० शकटी] १. गाड़ी। २. छोटा सग्गड़। (डि०)।

सकड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० श्रृङ्खली] दे० 'सिकड़ी', 'सिकरी'।

सकत † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति] १. बल। शक्ति। सामर्थ्य। ताकत। २. वैभव। संपत्ति।

सकत पु (२)
क्रि० वि० [सं० शक्ति] जहाँ तक हो सके। भरसक। उ०—का तोहिं जीव मरावों सकत आप के दोस। जो नहिं बुझै समुदजल सो बुझाइ कित ओस।—जायसी (शब्द०)।

सकता (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति] १. शक्ति। ताकत। २. सामर्थ्य। उ०—मिट्टी के बासन को इतनी सकता कहाँ जो अपने कुम्हार के करतब कुछ ताड़ सके। सच है जो बना हो सो अपने बनानेवाले को क्या सराहे।—इंशाअल्लाह खाँ (शब्द०)।

सकता (२)
संज्ञा पुं० [अ० सकतहु] १. एक प्रकार का मानसिक रोग जिसमें रोगी बेहोश हो जाता है। बेहोशी को बीमारी। २. विराम। यति। मुहा०—सकता पड़ना = छंद में यतिभंग दोष होना। सकते का आलम = विस्मय से मुग्ध होने की स्थिति। स्तब्ध या ठक होना। सकते की हालत = भय आश्चर्य आदि से स्तब्ध या निःसंज्ञ होने की स्थिति। बेहोशी की सी स्थिति। उ०—और हँसी का एक ऐसा ठहाका सुन पड़ा कि जिससे सबके सब सकते की हालत में हो गए, मानो सबके होश हवास गायब हो गए हों, केवल शरीर वहाँ बैठा हो।—पीतल०, भा० २, पृ० ६५।

सकती (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति] १. शक्ति। बल। ताकत। २. शक्ति नामक अस्त्र। ३. दे० 'शक्ति' —८-१३। उ०—स्यो सकती दोउ मुष जीवंत।—रामानंद; पृ० १२।

सकती पु † (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़० सख्ती] कड़ाई। जोर जबरदस्ती। उ०—कवि किंचित औसर जो अकती सकती नहीं हाँ पर कीजिए जू। हम तो अपनो बर पूजती हैं सपने नहीं पीपर पूजिए जू।—कविता कौ०, भा० १, पृ० ४०३।

सकन
संज्ञा पुं० [देश०] लता कस्तूरी। मुश्कदाना।

सकना
क्रि० अ० [सं० शक् या शक्य] कोई काम करने में समर्थ होना। करने योग्य होना। जैसे,—खा सकना, चल सकना, कह सकना। विशेष—इस क्रिया का व्यवहार सदा किसी दूसरी क्रिया के साथ संयोज्य क्रिया के रूप में ही होता है, अलग नहीं होता। परंतु बंगाल में कुछ लोग भूल से, या बँगला के प्रभाववश, कभी कभी अकेले भी इस क्रिया का व्यवहार कर बैठते हैं। जैसे,— हमसे नहीं सकेगा।

सकपक
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. हिचक। २. चकपकाहट [को०]।

सकपकाना
क्रि० अ० [अनु० सकपक] १. चकपकाना। आश्चर्ययुक्त होना। २. हिचकना। आगापीछा करना। ३. लज्जित होना। शरमाना। ४. प्रेम, लज्जा या शंका के कारण उदभूत एक प्रकार की चेष्टा। उ०—प्रथम समागम में एहो कवि रघुनाथ कहा कहौं रावरो सो एतनी सकाई है। मिलिवे की चरचा सुनत ही सकपकाई स्वेद भरै तन परै मुखिया पियराई है।—रघुनाथ (शब्द०)। ५. हिलना। डोलना। लहराना। उ०—सकपकाहिं विष भरे पसारे। लहरि भरे लहकति अति कारे।—जायसी (शब्द०)।

सकर पु
वि० [सं०] १. हंस्तयुक्त। २. किरणयुक्त। ३. जिसके ऊपर कर लगा हो। ४. सूड़वाला (हाथी) [को०]।

सकर (२)
संज्ञा पुं० [अ० सकर] दोजख। नरक [को०]।

सकर (३)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० शकर तुल० सं० शर्करा प्रा० शक्करा, अप० सक्कर 'जइ सक्कर सय खंड थिय'—पुरानी हिंदी] शर्करा। चीनी। खाँड।

सकरकंद
संज्ञा पुं० [फ़ा० शकरकंद] दे० 'शकरकंद'।

सकरकंदी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'शकरकंद'।

सकरकन
संज्ञा पुं० [हिं० शकरकंद] दे० 'शकरकंद'।

सकरखंडो †
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० शकर + हिं० खंड + ई (प्रत्य०) तुल० सं० शर्कराखण्ड] लाल और बिना साफ की हुई चीनी। खाँड़। शक्कर।

सकरणक
वि० [सं०] जो शरीर के किसी अवयव द्वारा संबहन किया गया [को०]।

सकरना
क्रि० अ० [सं० स्वीकरण] १. सकारा जाना। स्वीकृत या अंगीकृत होना। मंजूर होना। जैसे,—हुंड़ी सकरना, दाम सकरना। २. कबूला जाना। माना जाना। सयो० क्रि०—जाना।

सकरपाला
संज्ञा पुं० [फ़ा० शकरपारा] १. शकरपारा नाम की मिठाई। वि० दे० 'शकरपाला'। २. एक प्रकार का काबुली नीबू। ३. कपड़े पर की एक प्रकार की सिलाई जो शकरपारे की आकृति की होती है। दे० 'शकरपारा'।

सकरा
वि० [सं० सङ्कीर्ण, हिं० सँकरा] दे० 'सँकरा'।

सकरिया
संज्ञा स्त्री० [फा़ शकर + हिं० इया] लाल शकरकंद। रतालू।

सकरुंड
संज्ञा पुं० [गुज०] सकुरुंड या साकुंड नाम का वृक्ष। विशेष—इस वृक्ष को पत्तियों आदि का व्यवहार ओषधि के रूप में होता है। वैद्यक के अनुसार यह कवाय, रुचिकर, दीपन और वातनाशक माना जाता है।

सकरुण
वि० [सं०] १. जिसे करुणा हो। दयाशील। २. करुणा से भरा हुआ। करुणायुक्त। करुणार्द्र।

सकरुन पु
वि० [सं० सकरुण] १. सकरुण। दयाशील। २. करुणा से भरा हुआ। करुणार्द्र। उ०—सकरुन बचन सुनत भगवाना।— मानस, ६।६९।

सकर्ण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो सुनता या सुन सकता हो।

सकण (२)
वि० [वि० स्त्री० सकर्णा, सकर्णों] १. कानवाला। जिसे कान हों।

सकर्णक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन ऋषि का नाम।

सकणआवृत
वि० [सं०] जो कर्ण तक ढँका हुआ हो [को०]।

सकर्तृक
वि० [सं०] १. कर्ता से युक्त। २. जिसके पास साधन हो। उपकरणवाला [को०]।

सकर्मक
वि० [सं०] १. काम वाला। जिसके पास कार्य हो। २. कर्म कारक से युक्त। जैसे, सकर्मक क्रिया।

सकर्मक क्रिया
स्त्री० [सं०] व्याकरण में दो प्रकार की क्रियाओं में से एक। वह क्रिया जिसका कार्य उसके कर्म पर समाप्त हो। जैसे,—'खाना'। खाने का कार्य उस वस्तु पर समाप्त होता है, जो खाई जाती है; इसलिये यह सकर्मक क्रिया हुई। इसी प्रकार देना, लेना, मारना, उठाना आदि सकर्मक क्रियाएँ हैं।

सकर्मा
वि० [सं० सकर्मन्] १. साथ साथ अथवा एक प्रकार का काम करनेवाला। २. दे० 'सकर्मक' [को०]।

सकल (१)
वि० [सं०] १. सब। सर्व। समस्त। कुल। २. कलाओं से युक्त (को०)। ३. मंद और मधुर स्वरवाला (को०)। ४. जगत् से प्रभावित। ५. व्याज देनेवाला (को०)। यौ०—सकलकामदुध, सकलकामप्रद = सभी कामनाएँ करनेवाला। उ०—सकल कामप्रद तीरथराऊ।—मानस, २।२०३। सकलवर्ण = जो क और ल वर्ण से युक्त हो। कलह।

सरल (२)
संज्ञा पुं० १. रोहित तृण। गंध तृण। रोहिस घास। २. निर्गुण ब्रह्म और सगुण प्रकृति। ३. समग्र वस्तु। प्रत्येक वस्तु। हर एक चीज (को०)। ४. दर्शनशास्त्र के अनुसार तीन प्रकार के जीवों में से एक प्रकार के जीव। पशु। विशेष—जीव तीन प्रकार के माने गए हैं—विज्ञानाकल, प्रलया- कल, और सकल। सकल जीव मल, माया और कर्म से युक्त होता है। इसके भी दो भेद कहे गए हैं—पक्व कलुष और अपक्व कलुष।

सकल (३)
संज्ञा स्त्री० [अ० शक्ल] दे० 'शकल (२)'।

सकलकल
वि० [सं०] संपूर्ण, सोलहों कलाओं से युक्त (चंद्रमा)।

सकलखोरा
संज्ञा पुं० [हिं० शकरखोरा] एक पक्षी। दे० 'शकरखोरा'।

सकलजननी
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रकृति।

सकलदार पु
वि० [अ० शक्ल + फ़ा० दार (प्रत्य०)] शक्लवाला। सूरतवाला। खूबसूरत। उ०—सकलदार मैं नहीं, नीच फिर जाति हमारी।—पलटू०, पृ ९।

सकलप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो सबको प्रिय हो। सबको अच्छा ल गानेवाला। २. चना। चणक।

सकललक्षरण
संज्ञा पुं० [सं०] शाल निर्यास। धूना। राल।

सकलसिद्धि
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसे सब सिद्धियाँ प्राप्त हों। २. समग्र सिद्धियाँ। सभी विषयों में सफलता।

सकलसिद्धिदा
संज्ञा पुं० [सं०] तांत्रिकों के अनुसार एक भैरवी का नाम।

सकलात
संज्ञा पुं० [सं० सकाल (= ऋतु या अवसर के उपयुक्त)?] १. ओढ़ने की रजाई। दुलाई। उ०—(क) लग्यो शीत गात सुनो बात प्रभु काँपि उठे दई सकलात आनि प्रीति हिये भोई है। (ख) शीत लगत सकलात विदित पुरुषोत्तम दीनी। शौच गए हरि संग कृत्य सेवक की कीनी।—भक्तमाल (शब्द०)। २. उपहार। भेंट। सौगात। उ०—सौ गाड़ी सकलात सलौनी। पातसाह कौ जात पठौनी।—लाल कवि (शब्द०)।

सकलाधार
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

सकली
संज्ञा स्त्री० [डिं०] मत्स्य। मछली।

सकलेंदु
संज्ञा पुं० [सं० सकलेन्दु] पूर्णिमा का चंद्रमा। यौ०—सकलेंदुमुख = जिसका मुख पूर्णिमा के चाँद जैसा हो।

सकलेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का एक नाम।

सकल्प (१)
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

सकल्प (२)
वि० वेद के एक अंग कल्प से युक्त। वेद के उस अंग से युक्त जिसमें यज्ञादि का विधान किया गया है [को०]।

सकवा †
संज्ञा पुं० [हिं० साखू] शाल। अश्वकर्ण।

सकषाय
वि० [सं०] १. जो कषाय रस से युक्त हो। कसैला। २. जागतिक वासनाओं काम, क्रोध आदि से युक्त [को०]।

सकस ‡
संज्ञा पुं० [अ० शख्स] दे० 'शख्स'।

सकसाकाना †
क्रि० अ० [अनु०] बहुत डरना। डर के कारण काँपना। उ०—सकसकात तनु भीजि पसीना उलटि उलटि तन जोरि जँभाई।—सूर (शब्द०)।

सकसना †
क्रि० अ० [हिं० स + कसना] इतना कस उठना कि जरा सा भी स्थान स्थाली न रहे। २. डरना। भयभीत होना।

सकसाना पु † (१)
क्रि० अ० [अनु०] डर मानना। भयभीत होना। उ०—दस्तेबाज बारन के द्वार ठाढ़े रस्ते पर छिति के अधीस दस्तबस्त सकसात हैं।—नकछेदी (शब्द०)।

सकसाना † (२)
क्रि० स० इतना अधिक भर देना कि जगह खाली न रह जाय। अड़साना। ठूसना।

सका †
संज्ञा पुं० [अ० सक्का] १. पानी भरनेवाला, भिस्ती। २. वह जो घूम घूमकर लोगों को पानी पिलाता हो; विशेषतः मशक से (मुसलमानोंको) पानी पिलानेवाला।

सकाकुल
संज्ञा पुं० [?] १. एक प्रकार का कंद जिसे अंबर कंद कहते हैं। २. एक प्रकार का शतावर। ३. शकाकुल मिस्त्री। सुधामूली।

सकाकुल मिसरी
संज्ञा स्त्री० [?] दे० सकाकुल मिस्त्री।

सकाकुल मिस्त्री
संज्ञा स्त्री० [? ] १. सुधामूली। २. अंबरकंद।

सकाकोल
संज्ञा पुं० [सं०] १. मनु के अनुसार एक नरक का नाम। २. नरक भूमि। यमपुरी जहाँ काकोल नाम का नरक है।

सकाना पु † (१)
क्रि० अ० [सं० शङकन] १. शंका करना। संदेह करना। डरना। उ०—(क) जोरि कटक पुनि राजा घर कहँ कोन पयान। दिवसहिं भानु अलोप भा बासुक इंद्र सकान।—जायसी (शब्द०)। (ख) देखि सैन ब्रज लोग सकात। यह आयो कीन्हें कछु घात।—सूर (शब्द०)। २. भय के कारण संकोच करना। हिचकना। ३. दुःखी होना। रंज होना ।

सकाना † (२)
क्रि० स० 'सकना' का प्रेरणार्थक रूप। उ०—जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई।— मानस, ७।११९। विशेष—इसका क्वचित् हास्य प्रयोग भी प्राप्त होता है।

सकाम
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह व्यक्ति जिसे कोई कामना या इच्छा हो। २. वह व्यक्ति जिसकी कामना पूर्ण हुई हो। लब्धकाम। ३. कामवासना युक्त व्यक्ति। मैथुन की इच्छा रखनेवाला व्यक्ति। कामी। ४. वह व्यक्ति जो कोई कार्य भविष्य में फल मिलने की इच्छा से करे। जो निःस्वार्थ होकर कोई कार्य न करे, बल्कि स्वार्थ के विचार से करे। ५. प्रेम करनेवाला। प्रेमी।

सकाम निर्जरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जैनियौं के अनुसार चित्त की वह वृत्ति जिसमें बहुत अधिक क्षति होने पर भी शत्रु या पीड़ा देनेवालों को परम शांतिपूर्वक क्षमा कर दिया जाता है। यह वृत्ति उपशांत चित्तवाले साधुओं में होती है।

सकामा
संज्ञा स्ञी० [सं०] वह स्ञी जो मैथुन को इच्छा रखती हो। कामपीड़िता। कामवती।

सकामारि
संज्ञा पुं० [सं०] कामियों वा विषयी जीव के शत्रु, शिव [को०]।

सकामी
संज्ञा पुं० [सं० सकामिन्] १. वह जिसे किसी प्रकार की कामना हो। कामनायुक्त। वासनायुक्त। २. कामी। विषयी।

सकार † (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. 'स' अक्षर। २. 'स' वर्ण की सी ध्वनी। जैसे,—उसके मुँह से सकार भी न निकला। ३. सगण/?/।

सकार (२)
वि० उत्साही। सक्रिय। फुर्तीला [को०]।

सकारथ †
वि० [सं० सु + कार्यार्थ] १. सार्थक। उपयोग में आने लायक। २. सफल। अकारथ का उलटा।

सकारना
क्रि० अ० [सं० स्वीकरण] १. स्वीकार करना। मंजूर करना। २. महाजनों का हुंडी की मिती पूरी होने के एक दिन पहले हुंडी देखकर उसपर हस्ताक्षर करना। विशेष—जो लोग किसी महाजन को हुंडी पर रुपए देते हैं, वे मिती पूरी होने से एक दिन पहले अपनी हुंडी उस महाजन के पास उसे दिखलाने और उससे हस्ताक्षर कराने के लिये ले जाते हैं। इससे महाजन को दूसरे दिन के दातव्य धन की सूचना भी मिल जाती है और रुपये पानेवाले को यह निश्चय भी हो जाता है कि कल मुझे रुपए मिल जायँगे।

सकारा (१)
संज्ञा पुं० [सं० स्वीकरण] १. महाजनी में वह धन जो हुंडी सकारने और उसका समय फिर से बढ़ाने के लिये लिया जाता है। २. सुबह का समय।

सकारा (२)
संज्ञा पुं० [बं० सकाल] सुबह। प्रभात।

सकारे, सकारें †
क्रि० वि० [सं० सकाल] १. प्रातःकाल। सबेरे। तड़के। उ०—अवधेश के द्वारे सकारे गई, सुत गोद कै भूपति लै निकसे। अवलोकिहौं सोच विमोचन की ठगि सो रही, जे न ठगे धिक से।—तुलसी (शब्द०)। यौ०—साँझ सकारे = सायंकाल और प्रातःकाल। सुबह शाम। उ०—गए मयूर तमचूर जो हारे। उन्हहि पुकारे साँझ सकारे।—जायसी (शब्द०)। २. नियत समय पर। ठीक वक्त पर। (क्व०)।

संकारौ †
क्रि० वि० [हिं० सकारे] दे० 'सकारे'।

सकार्थ †
वि० [हिं० सकारथ] दे० 'सकारथ'। उ०—नानक गुर मुखि छूटी औ जन्मु सकार्थ होय।—प्राण०, पृ० २१५।

सकल (१)
वि० [सं०] समयोचित [को०]।

सकाल (२)
अव्य १. तड़के। सबेरे। २. ठीक समय पर [को०]।

सकाल †
संज्ञा पुं० [बं०] प्रभात। सुबह। भोर।यौ०—सकाल बिकाल = (१) सुबह शाम। (२) हर समय। हर काल।

सकालत
संज्ञा स्त्री० [अ० सकालत] १. सकील या गरिष्ठ होने का भाव। २. गुरुता। भारीपन।

सकाश (१)
वि० [सं०] दृश्यमान। पास। निकट। समीप।

सकाश (२)
संज्ञा पुं० १. सामीप्य। निकटता। २. पड़ोस। प्रतिवेश। ३. उपस्थिति [को०]।

सकाश (३)
अव्य० पास। निकट। समीप।

सकिलना † (१)
क्रि० अ० [हिं० फिसलना या अनु.] १. फिसलना। सरकना। २. सिमटना। सिकुड़ना। उ०—उखरत बार सकिल गई नासा। भयो तहाँ ते रुधिर प्रकासा।—रघुराज (शब्द०)। ३. हो सकना। पूरा होना। जैसे,—तुमसे यह काम नही सकिल सकता। ४. एकत्र होना। बटुरना। पुंजीभूत होना। उ०—मेघा महिगत सो जल पावन। सकिलि श्रननमग चलेऊ सुहावन।—मानस, १।३६।

सकिलाना ‡
क्रि० स० [हिं० सकिलना का सक० रूप] १. फिसलाना। सरकाना। २. सिमटना। समेटना। ३. पूरा करना। निष्पन्न करना। ४. एकत्र करना। बटोरना।

सकीन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का जंतु।

सकीबकी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० सक = शक्ति) + बक (= बकने की क्रिया)] १. शक्ति। सामरर्थ्य। २. बड़ बड़ करने की बात। बढ़ बढ़कर बोलना। उ०—सकीबकी सब गइल हिराई। प्रभु बिन तो कहँ कौन छोड़ाई।—गुलाल०, पृ० २४।

सकीर्न पु
वि० [सं० सङ्कीर्ण] दे० 'संकीर्ण'। उ०—थल सकीर्न ईकार लघु, दीर्घ दोस है नाँहि।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ५३३।

सकील (१)
वि० [अ० सको़ल] १. जो जल्दी हजम न हो। गरिष्ठ। गुरुपाक। २. भारी। वजनी। ३. जो कठिन हो। क्लिष्ट (शब्द०)।

सकील (२)
संज्ञा पुं० [सं०] संभोग कार्य में कमजोर पड़ने के कारण अपनी पत्नी को स्वयं संभोग करने के पहले किसी और व्यक्ति से संयुक्त करानेवाला पुरुष [को०]।

सकुंत पु
संज्ञा पुं० [सं० शकुन्त, प्रा० सकुन] दे० 'शकुंत' (पक्षी)।—अनेकार्थ०, पृ० १०१।

सकुक्षि
वि० [सं०] एक ही पेट से पैदा होनेवाला। सहोदर [को०]।

सकुच पु †
संज्ञा पुं०, स्त्री० [सं० सङ्कोच] संकोच। लाज। शर्म। उ०—(क) सुनु मैया तेरी सौं करौं याकी टेव लरन की, सकुच बेंचि सी खाई।—तुलसी (शब्द०)। (ख) सकुच सुरत आरंभ ही, बिछुरी लाज लजाय। ढरकि ढार ढुरि ढिग भई, ढीठ ढिठाई आय।—बिहारी (शब्द०)। (ग) हम सों उन सों कौन सगाई। हम अहीर अबला ब्रजवासी वै जदुपति जदूराई। कहा भयो जु भए नँदनंदन अब इह पदवी पाई। सकुच न आवत घोष बसत की तजि ब्रज गए पराई।—सूर (शब्द०)।

सकुचना
क्रि० अ० [सं० सङ्कोच, हिं० सकुच + ना (प्रत्य०)] १. संकोच करना। लज्जा करना। शरमाना। उ०—(क) सकुची, डरी, मुरी मन बारी। गहु न बाँह रे जोगि भिखारी।—जायसी (शब्द०)। (ख) सुनि पग धुनि चितई इतै, न्हाति दिए ही पीठि। चकी, झुकी, सकुची, डरी, हँसी लजीली दीठ।—बिहारी (शब्द०)। २. (फूलों का) संपुटित होना। होना। संकुचित होना। उ०—गिरिधरदास कहै सकुची कुमोदिनी यों देखि पर पुरुष लजात जैसे खंडिता।—गिरधर (शब्द०)।

सकुचाई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सङकोच, हिं० सकुच + आई (प्रत्य०)] संकुचित होने का भाव। २. संकोच। शर्म। लज्जा। हया।

सकुचाना (१)
क्रि० अ० [सं० सङकोच, हिं० सकुच + आना (प्रत्य०)] संकुचित होना। लजाना। संकोच करना। जैसे,—वह आपके पास आने में सकुचाता है। उ०—(क) एहिं विधि भरत फिरत बन माहीं। नेम प्रेम लखि मुनि सकुचाहीं।—मानस, २।३११। (ख) राम की तो ऐसी बात कंज पात गात जाके सामने मरीच ताहि देख सकुचाइ है।—हृदयराम (शब्द०)।

सकुचाना पु (२)
क्रि० स० [हिं० सकुचाना का प्रे० रूप] किसी को संकोच करने में प्रवृत्त करना। लज्जित करना।

सकुचाना पु (३)
क्रि० स० [सं० सङकुञ्वन] सिकोड़ना। उ०— श्रवण शरण ध्वनि सुनत लियो प्रभु तनु सकुचाई।—सूर (शब्द०)।

सकुचावना पु †
क्रि० स० [हिं० सकुचाना का प्रे० रूप] लज्जित करना। संकुचित करना। उ०—निज करनी सकुचेहिं कत, सकुचावत इहिं चाल। मोहूँ से नित बिमुख त्यों सनमुख रहि गोपाल।—बिहारी (शब्द०)।

सकुचावनी पु
वि० स्त्री० [हिं० सकुचना] विर्निदित करनेवाली। लजानेवाली। संकुचित करनेवाली। उ०—खाँड की खजावनी सी, कंद की कुढ़वनी सी, सिता की सातावनी सी सुभ्रा सकु- चावनी।—पोद्यार आभि० ग्रं०, पृ० ३०५।

सकुची
संज्ञा स्त्री० [सं० सकुलमत्स्य] एक प्रकार की मछली जो साधारम मछलियों से भिन्न और प्रायः कछुए के आकार की होती है। विशेष—इसके छोटे छोटे चार पैर होते हैं और एक लंबी पूँछ होती है। इसी पूँछ से यह शत्रु को मारती है। जहाँपर इसकी चोट लगती है, वहाँ घाव हो जाता है और चमड़ा सड़ने लगता है। कहते हैं कि यह मछली ताड़ के वृक्ष पर चढ़ जाती है। पानी में और जमीन पर दोनों जगह यह रह सकती है।

सकुचीला
वि० [हिं० सकुच + ईला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० सकुचीली] जिसे अधिक संकोच हो। संकोच करनेवाला। शरमीला।

सकुचीली
संज्ञा स्त्री० [हिं० सकुचीला] लाजवंती। लज्जावती लता।

सकुचौंहा पु
वि० [सं० सङ्कोच, हिं० सकुच + औहाँ (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० सकुचौहीं] संकोच करनेवाला। लजीला। शरमीला। उ०—गह्यो अबोलो बोलि प्यौ आपुहिं पठै बसीठि। दीठि चुराई दुहुन की लखि सकुचौहीं दीठि।—बिहारी (शब्द०)।/?/हिं० श० १०-१०

सकुड़ना
क्रि० अ० [हिं० सिकुड़ना] दे० 'सिकुड़ना'।

सकुन पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० शकुन्त] पक्षी। चिड़िया। य़ौ०—सकुनाधम।

सकुन (२)
संज्ञा पुं० [सं० शकुन] दे० 'शकुन' (सगुन)।

सकुनाधम पु
संज्ञा पुं० [सं० शकुन, प्रा० सकुन + अधम] वह पक्षी जो पक्षियों में अत्यंत निम्नकोटि का माना जाय। काग। कौआ। उ०—सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जगपावन।—मानस, ७।१२३।

सकुनी पु † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शकुन्त] पखेरु। चिड़िया। पक्षी।

सकुनी (२)
संज्ञा पुं० [सं० शकुनि] दुर्योधन का मामा। विशेष दे० 'शकुनि'। उ०—भीषम, द्रोन, करन अस्थामा सकुनी सहित काहु न सरी।—सूर०, १।२४९।

सकुपना पु
क्रि० अ० [हिं० सकोपना] दे० 'सकोपना'।

सकुरुंड
संज्ञा पुं० [सं० सकुरुण्ड ?, गुज०] साकुरुंड वृक्ष।

सकुल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छा कुल। उत्तम कुल। ऊँचा खान- दान। २. सकुची मछली। सकुल मत्स्य। ३. नेवला (को०)। ४. संबंधी। रिश्तेदार।

सकुल (२)
वि० १. उत्तम कुलबाला। कुलीन। २. एक ही परिवार का। ३. सपरिवार। परिवार के साथ। उ०—सकुल सदल प्रभु रावन मारयो।—मानस, ६।११५।

सकुलज
वि० [सं०] एक ही कुल में उत्पन्न।

सकुला
संज्ञा पुं० [सं० स + कुल] बौद्ध भिक्षुओं का नेता या सरदार।

सकुलादनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गरेठी। महाराष्ट्री लता। २. कुटकी।

सकुली
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'सकुची'।

सकुल्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो एक ही कुल का हो। सगोत्र। २. वह जो एक ही गोत्र का किंतु तीन पीढ़ी के उपर चौथी, पाँचवीं, छठी, सातवीं, आठवीं या नवीं पीढ़ी का हो। ३. दूरवर्ती संबंधी (को०)।

सकूतरा
संज्ञा पुं० [देश०] एक द्वीप का नाम। विशेष—यह टापू अरब सागर में अफ्रीका के पूर्वी तट के समीप है। यहाँ मोती और प्रवाल अधिक मिलते हैं।

सकूनत
संज्ञा स्त्री० [अ० सकूनत] [वि० सकूनती] रहने का स्थान। निवास स्थान। पता। जैसे,—अदालत में गवाहों की वल्दियत और सकूनत भी लिखी जाती है।

सकृत् (१)
अव्य० [सं०] १. एक बार। एक मरतबा। २. सदा। ३. साथ। सह। ४. एक समय। किसी समय (को०)। ५. तुरंत। तत्काल (को०)।

सकृत् (२)
संज्ञा पुं० १. पशूओं का मल। विष्ठा। गृह। २. कौआ। काक।

सकृत्प्रज
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसके एक ही बच्चा हो। २. काक। कौआ। ३. सिंह। मृगेंद्र (को०)।

सकृत्प्रजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बंध्यारोग। बाँझपन। २. शेरनी। सिंहनी।

सकृत्प्रसूता, सकृतप्रसूतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक ही संतान पैदा करनेवाली स्त्री। २. एक ही बार की व्याई हुई गाय [को०]।

सकृत्फल
संज्ञा पुं० [सं०] वह चीज जो केवल एक ही बार फलती हो।

सकृत्फला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह जो एक बार फले। २. कदली। केला।

सकृत्सू
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसने अभी अभी बालक प्रसव किया हो। सद्यः प्रसूता स्त्री।

सकृत्स्नायी
वि० [सं० सकृतस्नायिन्] एक बार नहानेवाला [को०]।

सकृदागामी मार्ग
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध मतानुसार एक प्रकार का धार्मिक मार्ग जिसमें जीव केवल एक बार जन्म लेकर मोक्ष प्राप्त करता है।

सकृदाच्छिन्न
वि० [सं०] जो एक ही वार में काटकर अलग कर दिया गया हो [को०]।

सकृदाह्नत
वि० [सं०] एक ही बार में चुकाया जानेवाला सूद [को०]।

सकृद्गति
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक ही गति, मार्ग या संभावना [को०]।

सकृद्गर्भ
संज्ञा पुं० [सं०] खच्चर। अश्वतर।

सकृद्गर्भा
संज्ञा स्त्री० [सं०] केवल एक बार गर्भ धारण करनेवाली स्त्री [को०]।

सकृद्ग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] १. महाभारत के अनुसार एक प्राचीन देश का नाम। २. इस देश का निवासी।

सकृद्वीर
संज्ञा पुं० [सं०] एकबीर या अकलबीर नामक वृक्ष।

सकृञंदा
संज्ञा स्त्री० [सं० सकृत्रन्दा] महाभारत के अनुसार एक प्राचीन नदी का नाम।

सकृपण
वि० [सं०] दीन। दुखिया [को०]।

सकेत पु † (१)
संज्ञा पुं० [सं० सङ्केत] १. संकेत। इशारा। २. प्रेमी और प्रेमिका के मिलने का निर्दिष्ट स्थान।

सकेत (२)
वि० [सं० सङकीर्ण] तंग। संकुचित। संकीर्ण।

सकेत (३)
संज्ञा पुं० विपत्ति। दुःख। कष्ट। उ०—खिनहि उठै, खिन बाड़ै अस हिय कँवल सकेत। हीरामनहिं बुलावहिं, सखी ! गहन जिउ लेत।—जायसी (शब्द०)।

सकेत (४)
संज्ञा पुं० [सं०] एक आदित्य का नाम [को०]।

सकेतना पु †
क्रि० अ० [हिं० संकेत] संकुचित होना। सिकुड़ना। उ०—कँवल सकेता कुमुदिनि फूली। चकवा बिछुरा चकई भूली।—जायसी (शब्द०)।

सकेती ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० सकेत] विपत्ति। कष्ट। आपत्ति।

सकेतु
वि० [सं०] १. पताका या ध्वजा से युक्त। २. केतु ग्रह के साथ। केतु ग्रह से युक्त [को०]।

सकेरना पु
क्रि० स० [हिं० सकेलना] दे० 'सकेलना'। उ०—पीठिदिएँ सब दिठि परैँ निमुहें, जग ईठिनि कौन सकेरै।—घनानंद, पृ० १३१।

सकेलंग
संज्ञा पुं० [अं० सक्लिंग] एक प्रकार का वृक्ष जो बहुत ऊँचा होता है। विशेष—इसकी लकड़ी नरम और सफेद होती है जो इमारत और संदूक आदि बनाने के काम में आती है। यह अधिकतर हिमालय के पूर्वी भाग में पाया जाता है।

सकेलना †
क्रि० स० [सं० सकल अथवा सङ्कलन] एकत्र करना। इकट्ठा करना। जमा करना। उ०—(क) अब हम जाना हो हरि बाजी को खेल। डंक बजाय देखाय तमाशा बहुरि सो लेत सकेल।—कबीर (शब्द०)। (ख) कहुँ हरि कथा कहूँ हरि पूजा कहुँ संतन को डेरो। जो बनिता सुत यूथ सकेलै ह्णैगै स्थनि पनेरो।—सूर (शब्द०)।

सकेला (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० सैक़ल] एक प्रकार की तलवार जो कड़े और नरम लोहे के मेल से बनाई जाती है।

सकेला (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का लोहा।

सकेला † (३)
वि० [सं० सकल] संगी साथी से युक्त। साथी या मित्र से युक्त। अकेला का विलोम।

सकेश
वि० [सं०] १. बालदार। रोएँदार। झबरीला। २. (भोजन) जिसमें बाल या केश पड़ गया हो [को०]।

सकैतव (१)
वि० [सं०] कैतवयुक्त। कपटी। धोखा देनेवाला [को०]।

सकैतव (२)
संज्ञा० पुं० वंचक या धूर्त व्यक्ति [को०]।

सकोच पु
संज्ञा पुं० [सं० सङ्कोच] दे० 'संकोच'।

सकोचना पु
क्रि० स० [सं० सङ्कोच, हिं० सकोच + ना (प्रत्य०)] संकुचित करना। उ०—सोच पोच मोचि कै सकोच भीम वेष को।—केशव (शब्द०)।

सकोड़ना
क्रि० स० [हिं० सिकोड़ना] दे० 'सिकोड़ना'।

सकोतर पु
वि० [सं० स + कातर] १. कातरता से युक्त। भयभीत। डरना हुआ। शंकित। २. जिसका चित्त कोटर या घोसले की ओर हो। उ०—चकचक्कि विचक्कहि थानवर। उडि पंष सकोतर चित्त धरं।—पृ० रा०, १३।१२३।

सकोतरा
संज्ञा पुं० [हिं० चकोतरा] दे० 'चकोतरा'।

सकोप
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सकोपा] क्रोधयुक्त। कोपाविष्ट। उ०—बारंबार सकोप मुनि करै निरूपन ज्ञान।—मानस, ७।१११।

सकोपना पु †
क्रि० स० [सं० सकोप + हिं० ना (प्रत्य०)] कोप करना। क्रोध करना। गुस्सा करना। उ०—पुनि पुनि सुनि विपरीत सकोपा। और प्रकाक कीन्ह व्यक्षेपा।—शंकर दिग्विजय (शब्द०)।

सकोपित पु
वि० [सं० सकोप] कुपित। क्रुद्ध। नाराज।

सकोरना †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'सिकोड़ना'।

सकोरा
संज्ञा पुं० [हिं० कसोरा] [स्त्री० सकोरी] मिट्टी की एक प्रकार की छोटी कटोरी। कसोरा।

सक्करी
संज्ञा स्त्री० [सं० शर्करी] एक प्रकार का छंद। विशेष दे० 'शर्करी'।

सक्कस
वि० [फ़ा०] जो किसी से न दबे। जोरदार। कठिन। सरकश। उ०—जानि पन सक्कस तरक्कि उठयो तक्कस करक्कि उठयो कोदँड फरक्कि उठयो भुजदंड।—भिखारी० ग्रं०, भा० २, पृ० ३३।

सक्का
संज्ञा पुं० [अ० सक्क़ा] १. भिश्ती। माशकी। उ०—उछरि भड़क्का से परत पुनि छक्का से सड़क्का से भजन नेकु चाबुक खड़क्का से। सक्का से सवारै देत जीवन समर सदा जदुराज बाजी पर प्रान से उचक्का से।—गोपालचंद (शब्द०)। २. वह जो मशक में पानी भरकर लोगों को पिलात फिरता हो। ३. एक प्रकार का पक्षी (को०)।

सक्त (१)
वि० [सं०] १. दे० 'आसक्त'। २. मिला हुआ। सटा हुआ। संलग्न। ३. प्रवृत्त। लगा हुआ। लीन। ४. जड़ा हुआ। खचित। जटित (को०)। ५. संबंद्ध। संबंध या लगाववाला (को०)। ६. बाधित (को०)। ७. सावधान (को०)। यौ०—सक्तचक्र। सक्तद्विष = दे० 'सक्तवैर'। सक्तमूत्र। सक्त- सामंत।

सक्त पु (२)
वि० [सं० शक्त] समर्थ। दे० 'शक्त'।

सक्तचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह राष्ट्र जो चोरों और शक्तिशाली राष्ट्रों से घिरा हो।

सक्तता
संज्ञा स्त्री० [सं०] आसक्ति। तल्लीनता [को०]।

सक्तत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सक्तता' [को०]।

सक्तमूत्र
संज्ञा पुं० [सं०] चरक के अनुसार वह व्यक्ति जो थोड़ा थोड़ा करके पेशाब करे।

सक्तवैर
वि० [सं०] दुश्मनी करनेवाला। शत्रुता में लगा हुआ [को०]।

सक्तव्य
वि० [सं०] जो पीसने योग्य हो (अन्न)। सत्तू बनाने योग्य।

सक्तसामंत
संज्ञा पुं० [सं० सक्त सामन्त] ग्रामसमूह का जमींदार जो उसका सामंत होता था। विशेष—पराशर स्मृति में कहा है कि किसी ग्राम के पास का जो ताल्लुकेदार होता था, वही उस ग्राम का सक्तसामंत होता था। सीमा संबंधी झगड़ों में सबसे पहले इसी की गवाही ली जाती थी।

सक्ति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति] एक अस्त्र। दे० 'शक्ति'। उ०—(क) खंग कर चर्मवर वर्मधर, रुचिर कटि तून, सर सक्ति सारंगधारी।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४८५। (ख) सो ब्रहूमदत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही।—मानस, ६।८२।

सक्ति (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लगना। लिपटना। (लता आदि का)। २. आसक्ति। लगाव। संबंध। ३. मेल। संगम [को०]।

सक्तिवान पु
वि० [सं० शक्तिमत्, शक्तिमान्] दे० 'शक्तिमान्'। उ०—जो कहौ सक्तिवान अस कौन। तुमकों दंड धरि सकै जौन।— नंद० ग्रं०, पृ० ३१२।

सक्तु
संज्ञा पुं० [सं०] भुने हुए अनाज (यव) को पीसकर तैयार किया हुआ आटा। सत्तू। यौ०—सक्तुकार। सक्तुकारक। सक्तुधानी। सक्तुपिंडी। सक्तुहोम।

सक्तुक
संज्ञा पुं० [सं०] १. सत्तू। २. एक प्रकार का विष जिसकी गाँठ में सत्तू के समान चूरा भरा रहता है।

सक्तुकार, सक्तुकारक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो सत्तू बनाता और बेचता हो।

सक्तुधानी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सत्तू रखने का बर्तन [को०]।

सक्तुपिंडी
संज्ञा स्त्री० [सं० सक्तुपिणडी] सत्तू की बनी हुई पिड़िया या सत्तू का बना हुआ लड्डू।

सक्तुफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] शमी वृक्ष। सफेद कीकर।

सक्तुफली
संज्ञा स्त्री० [सं०] शमी वृक्ष। सफेद कीकर।

सक्तुल
वि० [सं०] सत्तू से युक्त। जिसमें सक्तु मिला हो [को०]।

सक्तुहोम
संज्ञा पुं० [सं०] सत्तू का पिंडदान [को०]।

सक्थि
संज्ञा पुं० [सं०] १. सश्रुत के अनुसार एक प्रकार का मर्म (स्थान) जो शरीर के ग्यारह मर्म स्थानों में माना गया है। २. जंघा। जाँघ (को०)। ३. जंघे की हड्डी (को०)। ४. गाड़ी का आगे का लट्ठा। जिसके बीच में अश्व वा बैल रहता है। दे० 'बम (३)' (को०)।

सक्थी
संज्ञा पुं० [सं० सक्थिन्] १. हड्डी। अस्थि। हाड़। २. उरु। जंघा। जाँघ। ३. छकड़े या बैलगाड़ी का एक अंग या अंश। दे० 'बम' (३)।

सक्र पु
संज्ञा पुं० [सं० शक्र] देवताओं का राजा इंद्र। विशेष दे० 'शक्र'। उ०—बहुरि सक्र सम बिनवौं तेहीं।—मानस, १।४। यौ०—सक्रजीत = मेघनाद। सक्रधनु। सक्रसरोवर।

सक्रघण
संज्ञा पुं० [सं० सक्रघन] इंद्र का अस्त्र, बज्र। (डिं०)।

सक्रतु
वि० [सं०] समान कर्म या प्रज्ञावाला। जो एकमत हो।

सक्रधनु
संज्ञा पुं० [सं० शक्रधनु] इंद्रधनुष।

सक्रपति
संज्ञा पुं० [सं० शक्रपति] विष्णु। (डिं०)।

सक्रसन
संज्ञा पुं० [सं० शक्रसन] कुटज वृक्ष।

सक्रसरोवर
संज्ञा पुं० [सं० शक्रसरोवर] इंद्रकुंड नामक स्थान जो ब्रज में है।

सक्रारि पु
संज्ञा पुं० [सं० शक्रारि] इंद्र का शत्रु। मेघनाद। उ०— कुंभकरन सम बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि।—मानस, ६।२७।

सक्रिय
वि० [सं०] १. जो क्रिया से युक्त हो। काम करनेवाला। २. डोलने या भ्रमण करनेवाला। ३. क्रियाशील। स्फूर्तिशील। फुर्तिला (को०)। यौ०—सक्रिय आंदोलन = देश से ब्रिटिश शासन हटाने का आंदोलन जिसके पिकेटिंग, बहिष्कार आदि कई अंग थे। सक्रिय सहयोग = वह सहयोग जो मात्र मौखिक न हो। सक्रिय सेवा = युद्ध क्षेद्र या मोर्चे पर की हुई विशिष्ट सेवा या काम।

सक्ष
वि० [सं०] १. अतिक्रमण करने योग्य। २. हारा हुआ। पराजित।

सक्षण
वि० [सं०] १. हारा हुआ। पराभूत। २. प्राप्तावसर। लब्धा- वकाश। सावकाश (को०)। ३. निर्व्यापार। कार्यरहित (को०)। ४. विजेता। विजयी (को०)।

सक्षणि
वि० [सं०] सेवा करने के योग्य। सेव्य।

सक्षत
वि० [सं०] क्षतयुक्त। अक्षत का उलटा। व्रणयुक्त। चुटैल।

सक्षम
वि० [सं०] १. जिसमें क्षमता हो। क्षमताशाली। २. काम करने के योग्य। कार्य में समर्थ। ३. जो क्षमाशील हो। क्षमा से युक्त (को०)।

सक्षार
वि० [सं०] खारी। क्षारयुक्त। नमकीन [को०]।

सख
संज्ञा पुं० [सं० सखि शब्द का कर्ताकारक एकवचन] १. सखा। मित्र। साथी। (समासांत में) जैसे,—वसंतसख, सचिवसख। २. एक प्रकार का वृक्ष।

सखत †
वि० [अ० सख़्त] दे० 'सख्त'।

सखती †
संज्ञा स्त्री० [अ० सख़्त + ई] दे० 'सख्ती'।

सखत्व
संज्ञा पुं० [सं०] सखा होने का भाव। सखापन। मित्रता। दोस्ती।

सखर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक राक्षस का नाम।

सखर † (२)
वि० [हिं० सखरा] १. दे० 'सखरा'। २. खरा। चोखा। कटु। ३. 'खर' राक्षस से युक्त। जहाँ 'खर' की चर्चा हुई हो। उ०—सखरसुकोमल मंजु, दोष रहित दूष णसहित।—मानस, १।१४।

सखरच †
वि० [फ़ा० शाहखर्च] दिल खोलकर व्यय करनेवाला। खर्च करने में जो कंजूस न हो।

सखरज †
वि० [हिं० सखरच] दे० 'सखरच'।

सखरण †
संज्ञा पुं० [हिं० शिखरन] दे० 'शिखरन'।

सखरस
संज्ञा पुं० [सं० सख ? + हिं० रस] मक्खन। नैनू।

सखरा (१)
संज्ञा पुं० [सं० सक्षार] १. खारा। क्षारयुक्त। २. निखरा का उलटा। दे० 'सखरी'।

सखरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० निखरी] वह भोजन जो घि में न पकाया गया हो। कच्ची रसोई। दे० 'सखरी'।

सखरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० निखरा या निखरी का उल्टा] कच्ची रसोई। कच्चा भोजन, जैसे,—दाल, भात, रोटी आदि जो हिंदू लोग चौके के बाहर या किसी अन्य आदमी के हाथ की नहीं खाते और जिसमें छूत मानते हैं। विशेष दे० 'निखरी'।

सखरी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० शिखर] छोटा पहाड़। पहाड़ी (डिं०)।

सखस †
संज्ञा पुं० [फ़ा० शख़्स] दे० 'शख्स'।

सखसावन
संज्ञा पुं० [फ़ा० शख़्स + हिं० आवन, अथवा सं० सुख + शयन या सुखासन] १. पालकी। पीनस। २. आरामकुरसी। ३. पलंग।

सखा (१)
संज्ञा पुं० [सं० सखि] १. वह जो सदा साथ रहता हो। साथी। संगी। २. मित्र। दोस्त। ३. सहयोगी। सहचर। ४. एक वृक्ष (को०)। ५. साहित्य में वह व्यक्ति जो नायक का सहचर हो और जो सुख दुःख में उसके समान सुख दुःख को प्राप्त हो। विशेष—सखा चार प्रकार के होते हैं—पीठमर्द, बिट, चेट और विदूषक। ६. पत्नी की बहन का पति। साढ़ू (को०)। यौ०—सखाभाव = मित्रता। सखाविग्रह = आपसी तकरार। मित्रों की लड़ाई।

सखा (२)
संज्ञा स्त्री० [अ० सख़ा] दे० 'सखावत' [को०]।

सखावत
संज्ञा स्त्री० [अ० सख़वत] १. सखी या दाता होने का भाव। दानशीलता। २. उदारता। फैयाजी।

सखिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सखी होने का भाव। २. बंधुता। मैत्री। दोस्ती।

सखित्व
संज्ञा पुं० [सं०] बंधुता। मित्रता। दोस्ती।

सखिपूर्व (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बंधुता। मित्रता।

सखिपूर्व (२)
जिससे पहले मित्रता रही हो [को०]।

सखिल
वि० [सं०] मित्रता से युक्त। मैत्रीपूर्ण। दोस्ती से भरा हुआ [को०]।

सखी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सहेली। सहचरी। संगिनी। २. साहित्य ग्रंथों के अनुसार वह स्त्री जो नायिका के साथ रहती हो और जिससे वह अपनी कोई बात न छिपावे। विशेष—सखी का चार प्रकार का कार्य होता है—मंडन, शिक्षा, उपालंभ और परिहास। ३. एक प्रकार का छंद जिसके प्रत्येक चरण में १४ मात्राएँ और अंत में एक मगण या एक यगण होता है। इसकी रचना में आदि से अंत तक दो दो कलें होती हैं—२ + २ + २ + २ + २ + २ और कभी कभी २ + ३ + ३ + २ + २ + २ भी होता है और विराम ८ और ६ पर होता है। विरामभेद के अनुसार कवियों ने इसके दो भेद किए हैं—(१) विजात और (२) मनोरम। यौ०—सखी भाव। सखी संप्रदाय।

सखी (२)
वि० [अ० सखी] दाता। दानी। दानशील। जैसे,—सखी से सूम भला जे तुरंत दे जबाब। (कहावत)।

सखीभाव
संज्ञा पुं० [सं०] वैष्णवों के अनुसार भक्ति का एक प्रकार जिसमें भक्त अपने आपको इष्टदेवता श्री कृष्ण आदि की पत्नी या सखी मानकर उपासना करता है।

सखीसंप्रदाय
संज्ञा पुं० [सं० सखी सम्प्रदाय] वैष्णवों का एक संप्रदाय। विशेष—इस संप्रदाय में भगवत्प्राप्ति के लिये गोपीभाव को एकमात्र उन्नत साधन माना गया है। इसके प्रवर्तक स्वामी हरिदासजी हैं। यह संप्रदाय निंबार्क मत की ही एक अवांतर शाखा है।

सखुआ
संज्ञा पुं० [सं० शाल] शालवृक्ष। साखू। विशेष—दे० 'शाल'।

सखुन
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुख़न] १. बातचीत। वार्तालाप। २. कविता। काव्य। उ०—जुल्म है गर न दो सखुन की दाद। कहर है गर न करो मुझको प्यार।—कविता कौ, भा० ४, पृ० ४६०। ३. कौल। वचन। जैसे,—मर्दों का सखुन एक होता है। मुहा०—सखुन देना = वचन हारना। वादा करना। सखुन डालना = (१) कोई बात कहना। कुछ चाहना या माँगना। उ०—सखुन उन्हीं पर डाले जो हँस हँस रखें मान।— (शब्द०)। (२) प्रश्न करना। पूछना। सवाल करना। ४. कथन। उक्ति।

सखुनचीन
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुख़नचीँ] चुगुलखोर। चवाई। इधर उधर बात लगानेवाला।

सखुनचीनी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सुखनचीनी] सखुनचीन का भाव। चुगुलखोरी। चवाव।

सखुनतकिया
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुखनतकिया] वह शब्द या वाक्यांश जो कुछ लोगों की जबान पर ऐसा चढ़ जाता है कि बातचीत करने में प्रायः मुँह से निकला करता है। तकियाकलाम। विशेष—बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो बातचीत करने में बार बार 'जो है सो', 'क्या नाम', 'समझ लीजिए कि' आदि कहा करते हैं, ऐसे ही शब्दों या वाक्यांशों को सखुनतकिया कहते हैं।

सखुनदाँ
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुखनदाँ] १. वह जो सखुन या काव्य अच्छी तरह समझता हो। काव्य का रसिक। २. वह जो बातचीत का मर्म अच्छी तरह समझता है।

सखुनदानी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सुख़नदानी] १. बातचीत की समझ- दारी। २. काव्यमर्मज्ञता। काव्यरसिकता।

सखुनपरवर
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुख़नपरवर] १. वह जो अपनी कही हुई बात का सदा पालन करता हो। जबान या बात का धनी। २. वह जो अपनी कही हुई अनुचित या गलत बात का भी बराबर समर्थन करता हो। हठी। जिद्दी।

सखुनफहम
वि० [फा़० सुखनफ़ह्म] काव्यमरर्मज्ञ। सहृदय। स०—हम सकुनफहम हैं गालिब के तरफदार नहीं।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० ४५४।

सखुनवर
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुख़नवर] कवि। शायर। उ०—देख इस तरह से कहते है सखुनवर सेहरा।—कविता कौ० भा० ४, पृ० ४५५।

सखुनशनास
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुखनशनास] १. वह जो सखुन या काव्य भलीभाँति समझता हो। काव्य का मर्मज्ञ। २. वह जो बातचीत का मर्म बहुत अच्छी तरह समझता हो।

सखुनसंज
संज्ञा पुं० [फा़० सुख़नसंज] १. वह जो बात समझता हो। २. वह जो काव्य समझता हो।

सखुनसंजी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सुखनसंजी] सखुनसंज का भाव।

सखुनसाज
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुख़नसाज़] १. वह जो सखुन कहता हो। काव्य रचना करनेवाला। कवि। शायर। २. वह जो सदा झूठी बातें गढ़ता हो। अपने मन से झूठी बातें बनाकर कहनेवाला।

सखुनसाजी
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुख़नसाज़ी] १. सखुनसाज का भाव या काम। २. कवि होने का भाव या काम। ३. झूठी बातें गढ़ने का गुण या भाव।

सखोल
संज्ञा पुं० [सं०] राजतरंगिणी के अनुसार एक प्राचीन नगर का नाम।

सख्त
वि० [अ० सख़्त] १. कठोर। कड़ा। जो मुलायम न हो। २. मजबूत। दृढ़। ३. अत्यंत। बहुत ज्यादा। जैसे,—जान सखत मुश्किल में आ पड़ी है। ४. तीव्र। तेज। प्रचंड। ५. निर्दय। बेरहम। ६. बहुत बड़ा। विशाल [को०]। यौ०—सख्तकमान = (१) योद्धा। पहलवान। (२) ताकतवर। (३) धनुर्धर। सख्तकलाम = कटुभाषी। सख्तकलामी = कटु या दुर्वचन कहना। सख्तगीर = कड़ी सजा देनेवाला। सख्तगीरी = सख्तगीर का काम। सख्तजबान = कटुभाषी।सखतजाँ = (१) कठिन परिश्रमी। (२) निलर्ज्जता का जीवन बितानेवाला। (३) सख्तमीर। सख्तजानी = बेहया जीवन। सख्तदिल = निर्दय या बेरहम। सख्तदिली = कठोरहृदयता। सख्तबाजू = अत्यंत परिश्रमी। सख्तमिजाज = कड़े मिजाजवाला। सख्तमीर = जिसके प्राण कठिनता से निकलें। सख्त- मुश्किल = (१) भारी कठिनाई। गहरी बाधा। (२) अत्यंत कठिन। सख्तलगाम = मुँहजोर घोड़ा।

सख्ती
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सख़्ती] १. सख्त होने का भाव। कठोरता। कड़ाई। २. बेहयाई। निर्लज्जता। ३. कठिनाई। ४. निर्दयता। ५. तेजी। तीखापन। ६. द्दढ़ता। ७. तंगी [को०]। यौ०—सख्तीकश = कठिनाइयाँ झेलनेवाला। मुहा०—सख्ती उठाना = (१) जुल्म सहना। (२) कठिनाइयाँ झेलना। सख्ती से पेश आना = कठोरता का व्यवहार करना।

सख्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. सखा का भाव। सखत्व। सखापन। २. मित्रता। दोस्ती। ३. वैष्णव मतानुसार ईश्वर के प्रति वह भाव जिसमें ईश्वरावतारको भक्त अपना सखा मानता है। जैसे,—महात्मा सूरदास का श्रीकृष्ण के प्रति सख्य भाव था। ४. दोस्त। मित्र (को०)। ५. समानता। बराबरी (को०)। यौ०—सख्यभंग, सख्यविसर्जन = मित्रता टूटना। मैत्रीभंग। दोस्ती खत्म होना।

सख्यता
संज्ञा स्त्री० [सं० सख्यत + ता (प्रत्य०)] दे० 'सख्य'।

सगंध (१)
वि० [सं० सगन्ध] १. जिसमें गंध हो। गंधयुक्त। महकदार। २. जिसे अभिमान हो। अभिमानी। ३. संबद्ध। संबंधी। संबंधित (को०)।

सगंध (२)
संज्ञा पुं० जातिबंधु। ज्ञातिसंबंधी।

सगंधा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सगन्धा] एक प्रकार का चावल। सुगंध- शालि। बासमती चावल।

सगंधा (२)
वि० दे० 'सगा'।

सगंधी (१)
वि० पुं० [सं० सगन्धिन्] जिसमें गंध हो। महकदार।

सगंधी (२)
वि० दे० 'सगा'।

सग (१)
संज्ञा पुं० [फ़ा०] कुक्कुर। कुत्ता। श्वान। यौ०—सगजाँ = (१) लालची। लोभी। (२) बेरहम। सगजादा = कुत्ते की औलाद (गाली)। सगबच्चा। पिल्ला। सगबान = कुत्ते की देखरेख करनेवाला। सगबानी = कुत्ते की देखरेख। सगसार = कुत्ते की तरह अपवित्र और निकृष्ट।

सग पु (२)
वि० [सं० स्वक् अथवा 'सगर्भ' (वर्णलोप)] सगा। (समस्त पदों में प्रयुक्त) जैसे, सगपन।

सग † (३)
संज्ञा पुं० [सं० शाक, हिं० साग] शाक। साग। (समस्त पदों में प्रयुक्त) जैसे, सगपहिता।

सगजुबान
संज्ञा पुं० [फ़ा०] वह घोड़ा जिसकी जीभ कुत्ते के समान लंबी और पतली हो। ऐसा घोड़ा प्रायः ऐबी समझा जाता है।

सगड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० शकटी, शकटिका, हिं० सग्गड़] छोटा सग्गड़।

सगण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. छंद?शास्त्र में एक गण जिसमें दो लघु और एक गुरु अक्षर होते हैं। इस गण का प्रयोग छंद के आदि में अशुभ है। इसका रूप/?/है। २. शिव का एक नाम।

सगण (२)
वि० १. जो गणों से युक्त हो। साथियों या दल से युक्त। सदल बल। २. सेना से युक्त। ससैन्य [को०]।

सगत †
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति] १. शिव की भार्या, पार्वती। (डिं०)। २. शक्ति। ताकत। बल। सामर्थ्य।

सगतिक
वि० [सं०] १. उपसर्ग से युक्त (को०)। पु २. जिसकी कहीं गति हो। अगतिक का विलोम।

सगती †
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति] १. पार्वती। (डिं०)। २. एक अस्त्र। शक्ति। ३. ताकत। बल।

सगदा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का मादक द्रव्य जो अनाज से बनाया जाता है।

सगन (१)
संज्ञा पुं० [सं० सगण] १. छंद शास्त्र का एक गण। दे० 'सगण (१)'।

सगन † (२)
संज्ञा पुं० [सं० शकुन, हिं० सगुन] दे० 'शकुन'। जैसे, सगनौती।

सगनौती
संज्ञा स्त्री० [हिं० शकुनौती] दे० 'शकुनौती'।

सगपन
संज्ञा पुं० [हिं० सगापन] दे० 'सगापन'।

सगपहता, सगपहिता ‡
संज्ञा पुं० [सं० शाक प्रहित] दे० 'सगपहती'।

सगपहती, सगपहिती ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० साग + पहिती] एक प्रकार की दाल जो साग मिलागर बनाई जाती है। विशेष—प्रायः लोग सगपहिती बनाने के लिये उड़द की दाल में चना, पालक या बथुए का साग मिलाते हैं। कभी कभी अरहर की दाल भी मिलाकर बनाई जाती है।

सगपिस्ताँ
संज्ञा पुं० [फ़ा०] लिसोड़ा। बहुवार।

सगपु
संज्ञा पुं० [सं०] अमरवल्ली।

सगबग (१)
वि० [अनु०] १. सराबोर। लथपथ। उ०—(क) बरसावत बहु सुमन को सौरभ मद धारि। सगबग बिंदु मरंद सों, ब्रज की चलत बयारि।—अंबिकादत (शब्द०)। (ख) पिय चूम्यो मुँह चूमि होत रोमांचन सगबग।—व्यास (श्ब्द०)। २. द्रवित। उ०—मुरली नलिका सों अमी नाथ रहे बगराय। सगबग होत पषान जिहिं सूखे तरु हरिराय।—(शब्द०)। ३. परिपूर्ण। उ०—कित तूठयो रतिराज साज सब सजि सुख पागे। किहि सुहाग सगबगे भाग काके पुनि जागे।—(शब्द०)। ४. शंकित। डरा हुआ। भीत।

सगबग (२)
क्रि० वि० तेजी से। जल्दी से। चटपट। उ०—उतरि पलँग ते न दियो है धरा पै पग तेऊ सगबग निसि दिन चली जाती हैं।—भूषण (शब्द०)।

सगबगना पु
क्रि० अ० [अनु० सगबग + हिं० ना (प्रत्य०)] १. लथपथ या सराबोर होना। उ०—तन पुलकित किहिं हेतु कपोलन परि गई पीरी। रोम सेद सगबगे चाल हू भई अधीरी।—अंबिकादत्त (शब्द०)। २. दे० 'सगबगाना'।

सगबगाना
क्रि० अ० [अनु० सगबग] १. लथपथ होना। किसी वस्तु से भींगना या सराबोर होना। २. सकपकाना। शंकित होना। भयभीत होना। ३. हिलना डुलना।

सगभत्ता †
संज्ञा पुं० [हिं० साग + भात] एक प्रकार का भात जो साग मिलाकर बनाया जाता है। इसमें पकाते समय चावल में साग मिला देते हैं।

सगर (१)
संज्ञा पुं० [हिं० तगर] तगर का फूल और उसका पौधा।

सगर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अयोध्या के एक प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा जो बहुत धर्मात्मा तथा प्रजारंजक थे। विशेष—इनका विवाह विदर्भराजकन्या केशिनी से हुआ था। इनकी दूसरी स्त्री का नाम सुमति था। इन स्त्रियों सहित सगर ने हिमालय पर कठोर तपस्या की। इससे संतुष्ट होकर महर्षि भृगु ने आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी पहली स्त्री से तुम्हारा वंश चलानेवाला पुत्र होगा, और दूसरी स्त्री से ६० हजार पुत्र होंगे। सगर की पहली स्त्री से असमंजस नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो बड़ा उद्धत था। उसे सगर ने अपने राज्य से निकाल दिया। इसके पुत्र का नाम अंशुमान था। सगर की दूसरी स्त्री से साठ हजार पुत्र हुए। एक बार सगर ने अश्वमेध यज्ञ करना चाहा। अश्वमेध का घोड़ा इंद्र ने चुरा लिया और उसे पाताल में जा छिपाया। सगर के पुत्र उसे ढुँढ़ते ढुँढ़ते पाताल में जा पहुँचे। वहाँ महर्षि कपिल के समीप अश्व को बँधा पाकर उन्होंने उनका अपमान किया। मुनि ने क्रुद्ध होकर उन्हें शाप देकर भस्म कर डाला। अपने पुत्रों के न आने पर सगर ने अंशुमान को उन्हे ढूँढ़ने के लिये भेजा। अंशुमान ने पाताल में पहुँच कर मुनि को प्रसन्न किया और वहाँसे घोड़ा लेकर अयोध्या पहुँचा। अश्वमेध यज्ञ समाप्त करके सगर ने तीस सहस्र वर्ष राज्य किया। राजा भगीरथ इन्हीं के वंश के थे।

सगर (३)
वि० विष मिला हुआ। विषाक्त [को०]।

सगर (४)
संज्ञा पुं० [सं० सागर] सागर। तालाब।

सगरा † (१)
वि० [सं० सकल] [वि० स्त्री० सगरी] सब। तमाम। पूरा समग्र। सकल। कुल।

सगरा † (२)
संज्ञा पुं० [सं० सागर] १. तालाब। २. झील।

सगरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्राचीन नगरी का नाम।

सगर्भ (१)
वि० [सं०] १. एक ही गर्भ से उत्पन्न। सहोदर। सगा। (भाई, बहन आदि)। २. रहस्य युक्त। तात्पर्य युक्त। जिसमें भीतर कुछ हो। उ०—नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुननिधि वृषकेतू।—मानस, १।७२। ३. जिसके पत्ते खुले न हों (को०)। ४. अनुरूप। समान (को०)।

सगर्भ (२)
संज्ञा पुं० सगा भाई [को०]।

सगर्भा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह स्त्री जिसे गर्भ हो। गर्भवती स्त्री। २. सहोदरा। सगी बहन।

सगर्भ्य
वि० [सं०] एक ही गर्भ से उत्पन्न। सहोदर। सगा (भाई, बहन आदि)।

सगल पु †
वि० [हिं० सकल] दे० 'सकल'।

सगलगी ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० सगा + लगना] १. किसी से बहुत सगापन दिखाने की क्रिया। बहुत आपसदारी दिखलाना। क्रि० प्र०—करना। दिखाना। २. खुशामद। चापलूसी। व्यर्थ की प्रशंसा।

सगला ‡
वि० [सं० सकल] [वि० स्त्रि० सगली] सब। सगस्त। कुल।

सगवती
संज्ञा स्त्री० [देश०] खाने का मांस। गोश्त। कलिया। सगौती।

सगवा
संज्ञा पुं० [देश०] सहिंजन। शोभांजन। मुनगा।

सगवारा †
संज्ञा पुं० [सं० स्वक्, हिं० सगा] गाँव के आसपास की और उससे संबंध रखती हुई भूमि।

सगा
वि० [सं० स्वक्] [वि० स्त्री० सगी] १. एक माता से उत्पन्न। सहोदर। जैसे,—सगा भाई। २. जो संबंध में अपने ही कुल का हो। बहुत ही निकट के संबंध का। जैसे,—सगा चाचा, सगा भतीजा, सगा मामा।

सगाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सगा + आई (प्रत्य०)] १. यह निश्चय कि अमुक कन्या के साथ अमुक वर का विवाह होगा। विवाह संबंधी निश्चय। मँगनी। २. स्त्री पुरुष का वह संबंध जो छोटी जातियों में विवाह ही के तुल्य माना जाता है। प्रायः ऐसा संबंध विधवा स्त्री या पतिपरित्यक्ता स्त्री के साथ होता है। उ०—बल कह्नो जो तुम मन ऐसी आइ। तौ तुम क्यों किन्हीं न सगाई।—सूर (शब्द०)। ३. संबंध। नाता। रिश्ता। उ०—(क) घोष ग्वाल पशुपाल अधम कुल ईश एक को कैन सगाई। सूर श्याम ब्रजवास बिसारे बाबा नंद यशोदा माई।—सूर (शब्द०)। (ख) मातु पिता प्रिय लोग सबै सनमानि सुभाय सनेह सगाई। संग सुभामिनी भाइ भलो दिन द्वै जनु औध हुते पुहुनाई।—तुलसी (शब्द०)।

सगाना
संज्ञा पुं० [फ़ा०] ममोला। खंजन पक्षी।

सगापन
संज्ञा पुं० [हिं० सगा + पन] सगा होने का भाव। संबंध की आत्मीयता।

सगाबी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सग + आबी] १. एक प्रकार का नेवला। २. ऊदबिलाव नामक जंतु जो पानी में रहता है।

सगारत
संज्ञा स्त्री० [हिं० सगा + आरत (प्रत्य०)] सगा होने का भाव। संबंध की आत्मीयता। सगापन।

सगीर
वि० [अ० सग़ीर] जो बड़ा न हो। छोटा। यौ०—सगीरसिन = अल्पवयस्क। सगीरसिनी = बालपन। सगीरो- कबीर = छोटे बड़े सभी लोग।

सगीरा (१)
संज्ञा पुं० [अ० सग़ीरहू] क्षुद्र पाप।

सगीरा (२)
वि० स्त्री० कमसिन। अल्पवयस्का। कम उम्र की [को०]।

सगुण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. परमात्मा का वह रूप जो सत्व, रज और तम तीनों गुणों से युक्त है। साकार ब्रह्म। २. वह संप्रदाय जिसमें ईश्वर का सगुण रूप मानकर अवतारों की पूजा होती है। विशेष—मध्यकाल से उत्तरीय भारत में भक्तिमार्ग के दो भिन्न संप्रदाय हो गए थे। एक ईश्वर के निर्गुण, निराकर रूप का ध्यान करता हुआ मोक्ष की प्राप्ति की आशा रखता था और दूसरा ईश्वर का सगुण रूप राम, कृष्ण आदि अवतारों में मानकर उनकी पूजा कर मोक्ष की इच्छा रखता था। पहलेमत के कबीर, नानक आदि मुख्य प्रचारक थे और दूसरे के तुलसी, सूर आदि।

सगुण (२)
वि० १. गुणों से युक्त। सदगुणों से युक्त। २. भौतिक। सांसारिक। ३. प्रत्यंचा से युक्त (धनष)। ४. साहित्य या रचना में मान्य गुणों से युक्त [को०]।

सगुणता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सगुण होने का भाव। सगुणपन।

सगुणी
वि० [सं० सगुणिन्] १. दे० 'सगुण'। २. सदगुणों से विभू- षित (को०)।

सगुणोपासक
वि० [सं०] ईश्वर के सगुण रूप की उपासना करनेवाला।

सगुणोपासना
संज्ञा स्त्री० [सं०] ईश्वर को सगुणा मानकर उसके अवतारों की अर्चा या उपासना।

सगुन (१)
संज्ञा पुं० [सं० शकुन] दे० 'शकुन'। उ०—आगे सगुन सगु- नियै ताका।—जायसी (शव्द०)। मुहा०—सगुन विचारना = किसि शकुन के आधार पर शुभाशुभ का निर्णय करना। उ०—सगुन विचारि धरी मन धीरा।— मानस, ६।९९।

सगुन (२)
संज्ञा पुं० [हिं० सगुण] दे० 'सगुण'। उ०—अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा।—मानस, १।२२।

सगुनाना
कि० स० [सं० शकुन + हिं० आना (प्रत्य०)] १. शकुन बतलाना। उ०—आजु कोउ नीकी बात सुनावै। कैं मधुवन ते नंद लाडिले कै व दूत कोउ आवै। भौंरा इक चहुँ दिसि ते उसि उडि कान लागि कछु गावै। उत्तम भाषा ऊँचे चढ़ि चढ़ि अंग अंग सगुनावै। सूरदास कोऊ ब्रज ऐसो जो ब्रजनाथ मिलावै।—सूर (शब्द०)। २. शकुन निकालना या देखना। सगुन बिचारना।

सगुनिया
संज्ञा पुं० [सं० शकुन, हिं० सगुन + इया (प्रत्य०)] वह मनुष्य जो लोगों को सकुन बतलाता हो। शकुन बिचारने और बतलानेवाला। उ०—आगे सगुन सगुनियै ताका। दहिने माछ रूप के हाँका।—जायसी (शब्द०)।

सगुनी
वि० [सं० सगुणी] सगुणोपासक। 'निगुनी' का विलोम। जो निर्गुण रूप का उपासक न हो।

सगुनोपासक पु
वि० [सं० सगुणोपासक] ईश्वर के सगुण रूप की आराधना करनेवाला। उ०—सगुनोपासक मोक्ष न लेहीं।— मानस, ६।१११।

सगुनौती
संज्ञा स्त्री० [सं० शकुन, हिं० सगुन + औती (प्रत्य०)] प्रच- लित विश्वास के अनुसार वह क्रिया जिससे भावी शुभाशुभ का निर्णय किया जाता है। शकुन विचारने की क्रिया। उ०— बैठी जननि करति सगुनौती। लछमन राम मिलै अब मोकों दोउ अमोलक मोती। इतनी कहत सुकाग उहाँ ते हरी डाल उड़ि बैठ्यो। अंचल गाँठ दई दुख भाज्यो सुख जो आनि उर पैठ्यो।—सूर (शब्द०)।

सगुरा पु
[सं० सगुरु] जिसने गुरु से दीक्षा प्राप्त कर ली हो। निगुरा का उल्टा।

सगृह
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसकी स्त्री वर्तमान हो। घर गृहस्थीवाला। सपत्नीक।

सगोत †
वि० [सं० सगोत्र] एक ही गोत्र या कुल का।

सगोती (१)
संज्ञा पुं० [सं० सगोत्रिन्] १. एक गोत्र के लोग। सगोत्र। २. आपसदारी के या रिश्ते नाते के लोग। भाई बंधु।

सगोती (२)
वि० समान या एक कुल या गोत्र का।

सगोत्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक गोत्र के लोग। सजातीय। २. कुल। जाति। ३. एक ही कुल का श्राद्ध, पिंड, तर्पण करनेवाला व्यक्ति (को०)। ४. दूर का संबंधी (को०)।

सगोत्र (२)
वि० एक ही कुल में उत्पन्न। बंधु [को०]।

सगोत्री
वि० संज्ञा पुं० [सं० सगोत्र + ई] दे० 'सगोत्र'; 'सगोती'।

सगोनीमर
संज्ञा पुं० [हिं० सागौन] सागौन। शाल वृक्ष।

सगोष्ठी
संज्ञा स्त्री० [सं०] साहचर्य। मैत्री [को०]।

सगौती
संज्ञा स्त्री० [हिं० सगवती] खाने का मांस। गोश्त। कलिया।

सग्गड़
संज्ञा पुं० [सं० शकट] समान ढोने की गाड़ी या बोझ ढोने का ठेला।

सग्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] सहभोजन। एकत्र भोजन।

सग्धिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'सग्धि'।

सग्म
संज्ञा पुं० [सं०] यज्ञमान।

सग्रह
वि० [सं०] १. ग्रहण लगा हुआ। ग्रस्त (चंद्रमा)। २.ग्राहों से परिपूर्ण। जैसे —सग्रह नदी। ३. जिसपर कोई ग्रह लगा हो [को०]।

सघन
वि० [सं०] १. घना। गझिन। अविरल। गुंजान। जैसे,— सघन जंगल। उ०—सघन कुंज छाया सुखद शीतल मंद समीर।—बिहारी (शब्द०)। २. घन के साथ। बादलों से युक्त। मेघपूरित (को०)। ३. ठोस। ठस।

सघनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सघन होने का भाव। निविड़ता। अवि- रलता। गुंजानी।

सघली पु †
वि० स्त्री० [हिं० सगरी] समग्र। सब। सारी। सगरी।

सचंद्रक
वि० [सं० सचन्द्रक] [वि० स्त्री० सचंद्रिका] जिसपर चंद्रमा के समान आकृतियाँ हों [को०]।

सच (१)
वि० [सं० सत्य, प्रा० सत्त, अप० सच्च] जो यथार्थ हो। सत्य। वास्तविक। ठीक। दे० 'सत्य'।

सच (२)
वि० [सं० √ सच्] १. जो आदर संमान करे। पूजक। अर्चक। २. लगा हुआ। संबद्ध [को०]।

सचकित
वि० [सं० ] १. भौंचक्का। जिसे विस्मय हुआ हो। २. डर के मारे काँपता हुआ [को०]।

सचक्र
वि० [सं०] १. पहियों या गड़री से युक्त। २. चक्करदार। घेरा या वलय से युक्त। मंडलाकार। ३. चक्र नामक आयुध से युक्त। ४. सेना से युक्त। जिसके पास सेना हो [को०]।

सचक्री
संज्ञा पुं० [सं० सचक्रिन्] वह जो रथ चलाता हो। सारथी।

सचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेवा करने की क्रिया या भाव। सेवन। २. संमान। आदर (को०)। ३. सहयोगी। सहायक (को०)।

सचना पु † (१)
क्रि० स० [सं० सञ्चयन] १. संचय करना। एकत्रकरना। जमा करना। बटोरना। उ०—दान करन है दुइ जग तरा। रावन सचा आगिन महँ जरा।—जायसी (शब्द०)। २. सज्जित करना। सजाना। ३. संपादित करना। पूरा करना। उ०—बहु कुंड शोनित सों भरे पितु तर्पणादि किया सची।—केशव (शब्द०)।

सचना पु (२)
क्रि० अ०, क्रि० स० १. दे० 'सजना'। उ०—जो कछु सकल लोक की शोभा लै द्वारिका सची री।—सूर (शब्द०)। २. प्रसन्न होना। अनुकूल होना।

सचनावत्
संज्ञा पुं० [सं०] परमेश्वर, जिसका भजन सब लोग करते हैं।

सचमुच
अव्य० [हिं० सच + मुच (अनु०)] १. यथार्थतः। ठीक ठीक। वास्तव में। वस्तुतः। २. अवश्य। निश्चय। निस्संदेह।

सचर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] श्वेत झिरंटी। सफेद कटसरैया।

सचर (२)
वि० [सं० स + चर् (= गति)] सचल। जो चलता रहे। गतिशील। जंगम। यौ०—सचराचर।

सचरना पु
क्रि० अ० [सं० सञ्चरण] १. किसी बात का विख्यात होना। संचरित होना। फैलना। २. किसी वस्तु या प्रथा का अधिक व्यवहार में आना। बहुत प्रचलित या प्रसिद्ध होना। ३. संचार करना। प्रवेश करना। उ०—कुटिल अलक भ्रुव चारु नैन मिलि सचरे श्रवण समीप सुमीति। वक्र बिलोकनि भेद भेदिआ जोइ कहत सोई करत प्रतीति ।—सूर (शब्द०)।

सचराचर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. संसार की सब चर और अचर वस्तुएँ। स्थावर और जंगम सभी वस्तुएँ। २. जगत्। विश्व। संसार (को०)।

सचराचर (२)
वि० जिसमें सचल और अचल सभी आ जायँ। जंगम और स्थावर युक्त [को०]।

सचल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वह वस्तु जिसमें गति की सामर्थ्य हो। सचर। चर। जंगम।

सचल (२)
वि० चलायमान। चर। चलनेवाला।

सचल लवण
संज्ञा पुं० [सं०] सौवर्चल लवण। साँचर नमक।

सचलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सचल होने का भाव। जंगम होने का भाव। संचरणशीलता [को०]।

सचा
संज्ञा पुं० [सं० सचा (= निकट)] दे० 'सखा'।

सचाई
संज्ञा स्त्री० [सं० सत्य, प्रा० सच्च + हिं० आई (प्रत्य०)] १. सच्चा होने का भाव। सत्यता। सच्चापन। ईमानदारी। २. वास्तविकता। यथार्थता।

सचान
संज्ञा पुं० [सं० सञ्चान (= श्येन)] श्येनपक्षी। बाज। उ०— गएउ सहमि नहि कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।—मानस, २।२९।

सचारना पु †
क्रि० स० [सं० सञ्चारण] सचरना का सकर्मक रूप। संचारित करना। फैलाना।

सचारु
वि० [सं०] जो बहुत सुंदर हो। चारतायुक्त।

सचावट †
संज्ञा स्त्री० [हिं सच + आवट (प्रत्य०)] सच्चापन। सचाई। सत्यता।

सचिंक
वि० [सं० सचिङ्क] चेतनायुक्त।

सचिंत
वि० [सं० सचिन्त] [वि० स्त्री० सचिंता] जिसे चिंता हो। फिक्रमंद।

सचि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सखा। दोस्त। मित्र। २. मैत्री। दोस्ती। घनिष्ठता [को०]।

सचि (२)
संज्ञा स्त्री० इंद्र की पत्नी। शची [को०]।

सचिक्कण
वि० [सं०] अत्यंत चिकना। बहुत अधिक चिकना। जैसे—सचिक्कण केश।

सचिक्कन पु
वि० [सं० सचिक्कण] अत्यंत चिकना। अत्यंत स्निग्ध। उ०—सहज सचिक्कन स्याम रुचि, सुचि सुगंध सुकुमार। गनत न मन पथ अपथ लखि बिथुरे सुथरे बार।—बिहारी (शब्द०)।

सचित्
वि० [सं०] चित् से युक्त। जिसे ज्ञान या चेतना हो।

सचित्क
संज्ञा पुं० [सं०] चिंतन। विचारना। मनन [को०]।

सचित्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसका ध्यान एक ही ओर लगा हो।

सचित्त (२)
वि० १. समान चित्तवाला। २. सावधान। सचेत। ३. प्रज्ञायुक्त। बुद्धिमान्। ४. जिसका चित्त किसी एक तरफ लगा हो [को०]।

सचित्र
वि० [सं०] १. चित्रों से शोभित। चित्रों से सजा हुआ या अलंकृत। २. जिसमें चित्र हो। चित्रों से युक्त। ३.शबलित। रंगबिरंगा। चित्रित [को०]।

सचिल्लिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्लिन्नचक्षु। २. जिसकी दृष्टि खराब हो।

सचिव
संज्ञा पुं० [सं०] १. मित्र। दोस्त। सखा। २. मंत्री। वजीर। (अ० सेक्रेटरी)। ३. सहायक। मददगार। ४. काला धतूरा या काले धतूरे का वृक्ष। ५. किसी संघटन या संस्था के संचालन का उत्तरदायित्व बहन करनेवाला व्यक्ति।

सचिवता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सचिव होने का भाव या धर्म।

सचिवत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सचिवता' [को०]।

सचिवामय
संज्ञा पुं० [सं०] १. पांडु रोग। पीलिया। २. विसर्प रोग।

सचिवालय
संज्ञा पुं० [सं० सचिव + आलय] वह स्थान या भवन जहाँ किसी राज्य के विभिन्न विभागीय मंत्रियों तथा सर्वोच्च अधिकारियों के कार्यालय हों (अं० सेक्रेटरियट)।

सची
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. इंद्र की स्त्री का नाम। इंद्राणी। दे० 'शची'। २. अगर। अगरु। यौ०—सचीनंदन = सचीसुत।

सचीसुत
संज्ञा पुं० [सं०] १. शची का पुत्र, जयंत। २. श्रीचैतन्यदेव।

सचु पु †
संज्ञा पुं० [सं० √ सच्] १. सुख। आनंद। उ०—(क) मुक्तामाल बाल बग पंगति करत कुलाहल कूल। सारस हंसमध्तय शुक्र सैना, वैजयंति सम तूल। पुरइनि कपिश निचोल विविध रंग बिहँसत सचु उपजावै। सूर श्याम आनंद कंद की शोभा कहत न आवै।—सूर (शब्द०)। (ख) अँखियन ऐसी धरनि धरी। नंदनँदन देखे सचु पावै या सों रहति डरी।—सूर (शब्द०)। २. प्रसन्नता। खुशी।

सचेत
वि० [सं० सचेतन] १. चेतनायुक्त। दे० 'सचेतन'। २. सज्ञान। समझदार। ३. सजग। सावधान। होशियार। जैसे,—जब वह आया करे, तब तुम सचेत रहा करो।

सचेतक
संज्ञा पुं० [सं० सचेत + क] संसद् वा विधान सभा का वह अधिकारी जो सदस्यों को आवश्यक सूचना देने, अनुशासन का पालन कराने, मतदान के निमित्त बुलाने आदि की व्यवस्था करता है। (अं० ह्मिप)।

सचेतन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह प्राणी जिसे चेतना हो। विवेकयुक्त प्राणी। २. वह वस्तु जो जड़ न हो। चेतन।

सचेतन (२)
वि० १. चैतन्य। चेतनायुक्त। २. सावधान। होशियार। ३. समझदार। चतुर।

सचेता
वि० [सं० सचेतस्] १. एक मत होनेवाला। एक राय होनेवाला। सहमत। २. बुद्धि या समझ रखनेवाला। ३. सचेत। भावनायुक्त। भावुक [को०]।

सचेती
संज्ञा स्त्री० [हिं० सचेत + ई (प्रत्य०)] १. सचेत होने का भाव। २. सावधानी। होशियारी।

सचेल
वि० [सं०] वस्त्रयुक्त। जो कपड़ा पहने हुए हो। परिधानयुक्त। वस्त्राच्छादित [को०]। यौ०—सचेलस्नान = वस्त्र पहने हुए स्नान करना।

सचेष्ट (१)
वि० [सं०] १. जिसमें चेष्टा हो। २. जो चेष्टा करे।

सचेष्ट (२)
संज्ञा पुं० [सं०] आम्रवृक्ष। आम का पेड़।

सचैयत ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० सच्च + ऐयत (प्रत्य०)] सचावट। सच्चाई। सत्यता। सच्चापन।

सचोर
संज्ञा पुं० [देश०] गुजराती ब्राह्मणों की एक जाति।

सच्चरित (१)
वि० [सं०] जिसका चरित अच्छा हो। सच्चरित्र। उ०— सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे।— मानस, ७।२८।

सच्चरित (२)
संज्ञा पुं० १. सत्पुरुषों का चरित्र या वृत्त। २. सत् आचरण। सदाचरण [को०]।

सच्चरित्र
वि० संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सच्चरित'।

सच्चर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] उत्तम आचरण। अच्छी चाल चलन।

सच्चा
वि० [सं० सत्य, प्रा० सत्त, अप० सच्च] [वि० स्त्री० सच्ची] १. सच बोलनेवाला। जो कभी झृठ न बोलता हो। सत्यवादी। ईमानदार। २. जिसमें झूठ न हो। यथार्थ। ठीक। वास्तविक। जैसे,—सच्चा मामला। ३. असली। विशुद्ध। जैसे,—सच्चा सोना। सच्चा घी। ४. बिलकुल ठीक और पूरा। जितना या जैसा चाहिए, उतना या वैसा। जैसे,— (क) तुमने भी उसपर खूब सच्चा हाथ मारा। (ख) यह तसवीर बहुत सच्ची जड़ी गई है।

सच्चाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सच्चा + आई (प्रत्य०)] सच्चा होने का भाव। सच्चापन। सत्यता।

सच्चापन
संज्ञा पुं० [हिं० सच्चा + पन (प्रत्य०)] सत्य होने का भाव। सत्यता। सचाई।

सच्चार
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो संपत्ति की रक्षा करता है। २. कुशल दूत। चतुर गुप्तचर (को०)।

सच्चारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] हलदी। हरिद्रा।

सच्चाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० सच्चा + हट (प्रत्य०)] सच्चा होने का भाव। सच्चापन। सत्यता।

सच्चिकन पु
वि० [सं० सचिक्कण] दे० 'सचिक्कण', 'सचिक्कन'।

सच्चित्
संज्ञा पुं० [सं०] सत् और चित् दोनों से युक्त, ब्रह्म।

सच्चिदानंद
संज्ञा पुं० [सं० सच्चिदानन्द] (सत्, चित् और आनंद से युक्त होने के कारण) परमात्मा का एक नाम। ईश्वर। परमेश्वर।

सच्चिन्मय
वि० [सं०] सत् और चित् अर्थात् चेतन्य से युक्त। सत् और चैतन्य का स्वरूप।

सच्छंद (१)
वि० [सं० सच्छन्द] [वि० स्त्री० सच्छंदा] समान अथवा एक ही तरह के छंदोंवाला [को०]।

सच्छंद पु (२)
वि० [सं० स्वच्छन्द] दे० 'स्वच्छंद'।

सच्छत पु
वि० [सं० स + क्षत] जिसे क्षत लगा हो। घायल। जखमी। उ०—जिनको जग अच्छत सीस धरै। तिनको जग सच्छत कौन करै।—केशव (शब्द०)।

सच्छाक
संज्ञा पुं० [सं० सत् + शाक] अदरक का पत्ता। आदी का पत्ता [को०]।

सच्छाय
वि० [सं०] १. समान या एक रंग का। २. भासमान्। भास्वर। जो चमकनेवाला हो। ३. छायादार। छायायुक्त। जिसमें छाया हो। जैसे,—सच्छाय वृक्ष [को०]।

सच्छाश्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह ग्रंथ जो सिद्धांतों का अच्छे ढंग से प्रतिपादन करे [को०]।

सच्छिद्र
वि० [सं०] १. दोषयुक्त। जिसमें ऐब हो। २. छिद्रयुक्त। छेदवाला [को०]।

सच्छी पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० साक्षी] गवाह या दर्शक। दे० 'साक्षी'।

सच्छी (२)
संज्ञा स्त्री० गवाही। दे० 'साक्षी'।

सच्छील (१)
वि० [सं०] शीलयुक्त। उदात्त गुणोंवाला [को०]।

सच्छील (२)
संज्ञा पुं० अच्छा या भला आचरण [को०]।

सच्छलोक
वि० [सं० सत् + श्लोक] जिसकी सुंदर कीर्ति हो। अच्छे नाम या ख्यातिवाला [को०]।

सच्युति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दल बल सहित चलना।

सच्युति (२)
वि० १. रेतस् स्खलन युक्त। २. स्खलन युक्त [को०]।

सछंद पु
वि० [सं० स + छन्द] १. जो छंद युक्त हो। २. स्वैरा- चारी। २. चालवाला। चालबाज। ४. समूह या परिकर से युक्त।

सजंबाल
वि० [सं० सजम्बाल] कीचड़ से युक्त। पंकिल [को०]।

सज (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सज्जा, हिं० सजावट] १. सजने की क्रिया या भाव। यौ०—सजधज। २. रूप। बनाव। डौल। शकल। ३. शोभा। सौंदर्य। सजावट। शृंगार।

सज (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बहुत लंबा वृक्ष। असीन का पेड़। विशेष—इस वृक्ष के पत्ते शिशिर ऋतु में झड़ जाते हैं। यह हिमालय, बंगाल और दक्षिण भारत में अधिकता से पाया जाता है। इसके हीर की लकड़ी बहुत कड़ी और मजबूत होती है। इसकी लकड़ी का रंग स्याही लिए भूरा होता है और यह जहाज, नाव आदि बनाने में काम आती है। इसे कहीं कहीं असीन भी कहते हैं। यह बहुत लंबा वृक्ष होता है।

सजग
वि० [हिं० (जागगा जागरूकता से युक्त)] सावधान। सचेत। सतर्क। होशियार। उ०—(क) तब आपुइ बस होइहै जिमि बनिया कर भूत। तदपि सजग रहि सदा रिपु सम जानि कपूत।—(शब्द०)। (ख) जौ राजा अस सजग न होई। काकर राज कहाँ कर होई।—जायसी (शब्द०)।

सजड़ा †
संज्ञा पुं० [हिं० सहिंजन] दे० 'सहिंजन' (वृक्ष)।

सजदार
वि० [हिं० सज + फ़ा० दार (प्रत्य०)] जिसकी आकृति अच्छी हो। सुंदर।

सजधज
संज्ञा स्त्री० [हिं० सज + धज अनु०] बनाव सिंगार। सजा- वट। जैसे,—उनकी बारात बहुत सजधज से निकली थी।

सजन (१)
संज्ञा पुं० [सं० सत् + जन (= सज्जन)] [स्त्री० सजनी] १. भला आदमी। सज्जन। शरीफ। २. पति। भर्ता। उ०— बहुत नारि सुभाग सुंदरि और घोष कुमारि। सजन प्रीतम नाऊँ लै लै देहिं परस्पर गारि।—सूर (शब्द०)। ३. प्रिय- तम। आशना। यार।

सजन (२)
वि० [सं०] जनयुक्त। जनसहित। जहाँ लोग रहते हों। जिसमें लोग हों।

सजन (३)
संज्ञा पुं० १. एक ही परिवार या कुल के आदमी। सबंधी जन। २. जनसमाज। लोग बाग [को०]।

सजनपद
वि० [सं०] समान या एक जनपद का [को०]।

सजना (१)
क्रि० अ० [सं० सज्जा] १. भूषण, वस्त्र आदि से अपने को सज्जित करना। अलंकृत करना। शृंगार करना। उ०—तीज परब सौतिन सजे, भूषन बसन सरीर। सबै मरगजे मुँह करी, बहै मरगजे चीर।—बिहारी (शब्द०)। २. शोभा देना। शोभित होना। भला जान पड़ना। जैसे,—यह गुलदस्ता भी यहाँ खूब सजता है। ३. शस्त्रास्त्र से सुसज्जित होना। रण के लिये तैयार होना। उ०—हमहीं चलिहैं ऋषि संग अबै। सजि सैन चलै चतुरंग सबै।—केशव (शब्द०)।

सजना (२)
क्रि० स० १. वस्तुओं को उचित स्थान में रखना जिसमें वे सुंदर जान पड़ें। व्यवस्थित करना। सजाना। सुसज्जित करना। साजना। जैसे,—मकान सजना, थाली सजना। २. किसी वस्तु को धारण करना।

सजना (३)
संज्ञा पुं० [हिं० सहिंजन] दे० 'सहिंजन'।

सजना पु (४)
संज्ञा पुं० [सं० सज्जन, हिं० सुजन] पति। प्रियतम।

सजनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० साजन] सखी। सहेली। मित्र स्त्री।

सजनीय
वि० [सं०] प्रसिद्ध। विख्यात। मशहूर।

सजनु
वि० [सं०] सहजात। एक साथ उत्पन्न या निर्मित [को०]।

सजन्य
संज्ञा पुं० [सं०] जो नातेदार या रिश्तेदार संबंधी हो [को०]।

सजप
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो तूष्णीम् या मौन भाव से जप में रत हो। २. एक प्रकार के संन्यासी [को०]।

सजबज
संज्ञा स्त्री० [हिं० सज + बज (अनु०)] दे० 'सजधज'।

सजल (१)
वि० [सं०] १. जल से युक्त या पूर्ण। जिसमें पानी हो। २. अश्रुपूर्ण (नेत्र)। आँसुओं से पूर्ण (आँख)। उ०—लोचन सजल मकरंद भरे अरविंद खुली खुले बूँदपति मधुप किशोर की।—काव्यकलाधर (शब्द०)। यौ०—सजलनयन, सजलनेत्र = आँसूभरी आँखोंवाला।

सजल पु (२)
वि० [सं० स + ज्वाल] १. स्नेहयुक्त। ज्वालायुक्त। जलता हुआ। २. दीप्त। प्रकाशित। उ०—धर नीगुल दोवउ सजल, छाजइ पुणग न माइ।—ढोला०, दू० ५०६।

सजला (१)
वि० [हिं० मँझला का अनु०] [हिं० सजली] चार सहोदरों में से तीसरा। मँझले से छोटा पर सबसे छोटे से बड़ा।

सजला (२)
वि० स्त्री० [सं०] जल से भरी हुई। जलयुक्त।

सजवना पु †
संज्ञा पुं० [हिं० सजना] सजने की क्रिया या भाव। तैयारी। उ०—बहुतन्ह अस गढ़ कीन्ह सजवना। अंत भई लंका जस रवना।—जायसी (शब्द०)।

सजवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सज (ना) + वाई (प्रत्य०)] १. सजवाने की क्रिया। २. सुसज्जित करवाने का भाव। ३. सजाने की मजदूरी। जैसे—इस टोपी की सजवाई दो रुपए लगे हैं।

सजवाना
क्रि० स० [हिं० सजाना का प्रे० रूप] किसी के द्वारा किसी वस्तु को सुसज्जित कराना। सुसज्जित करवाना। जैसे,—आज कल महाराज अपनी कोठी सजवा रहे हैं।

सजा (१)
संज्ञा पुं० [अ० सजा] तुक। अंत्यानुप्रास। अनुप्रास [को०]।

सजा (२)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सज़ा] १. अपराध आदि के कारण होनेवाला दंड। २. प्रत्यपकार। बुराई का बदला (को०)। ३. अर्थदंड (को०)। ४. कारागार का दंड। जेल में रखने का दंड। क्रि० प्र०—करना।—देना।—पाना।—भुगतना।—मिलना।—होना। यौ०—सजायाफ्ता। सजायाब।

सजाइ पु †
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सज़ा] सजा दंड। उ०—पर्वतसहित धोइ ब्रज डारौं देउ समुद्र बहाइ। मेरी बलि औरहि लै अरपत इनकी करै सजाइ।—सूर०, १०।८२२।

सजाई (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सजाना + आई (प्रत्य०)] १. सजाने कीक्रिया। सजाने का काम। २. सजाने का भाव। ३. सजाने की मजदूरी।

सजाई पु (२)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सज़ा] दे० 'सजा'। उ०—जौं असत्य कछु कहब बनाइ। तौ बिधि देइहि हमहि सजाहि।—मानस, २।१९।

सजागर
वि० [सं०] १. जागता हुआ। २. सजग। होशियार।

सजात (१)
वि० [सं०] १. सहजात। साथ साथ उत्पन्न। २. बंधु बांधव से युक्त [को०]। यौ०—सजातकाम = परिजनों पर शासन करने की इच्छावाला।

सजात (२)
संज्ञा पुं० भाई [को०]।

सजाति (१)
वि० [सं०] एक जाति का। समान जाति का। जैसे,— (क) वे तो हमारे सजाति ही हैं। (ख) ये दोनों वृक्ष सजाति हैं। २. समान। तुल्य (को०)।

सजाति (२)
संज्ञा पुं० १. वह बालक जो एक ही जाति के माता पिता से उत्पन्न हो [को०]।

सजातीय (१)
वि० [सं०] १. एक जाति या गोत्र का। २. समान। तुल्य (को०)।

सजातीय (२)
संज्ञा पुं० दे० 'सजाति (२)'।

सजात्य (१)
वि० [सं०] दे० 'सजातीय'।

सजात्य (२)
संज्ञा पुं० बंधुत्व। भाईचारा। [को०]।

सजान पु
संज्ञा पुं० [सं० सज्ञान] १. जानकार। जाननेवाला। २. चतुर। होशियार।

सजाना
क्रि० स० [सं० सज्जा] १. वस्तुओं को यथास्थान रखना। यथाक्रम रखना। तरतीब लगाना। २. अलंकृत करना। सँवारना। शृंगार करना।

सजानि
वि० [सं०] पत्नी के सहित। सपत्नीक [को०]।

सजाय (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह जो अपनी स्त्री के सहित वर्तमान हो।

सजाय †पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सजा] दे० 'सजा'। उ०—पैहहि सजाय नतु कहत बजाय तोहिं, बावरी न होहि बानि जानि कपिनाह की। आन हनुमान को दोहाई बलवान की, सपथ महाबीर की, जो रहै पीर बाँह की।—तुलसी (शब्द०)।

सजायाफता
संज्ञा पुं० [फ़ा० सज़ायाफ्तह्] वह जिसने दंड विधान के अनुसार दंड पाया हो। वह जो सजा भोग चुका हो। वह जो कैदखाने हो आया हो।

सजायाब
वि० [फ़ा० सज़ायाब] १. जो दंड पाने के योग्य हो। दंडनीय। २. जो कानून के अनुसार सजा भोग चुका हो। जिसे कारागार का दंड मिल चुका हो।

सजार,सजारु
संज्ञा पुं० [सं० शल्यक] साहिल। शल्यक। साही।

सजाल
वि० [सं०] अयालदार। केसरयुक्त [को०]।

सजाव (१)
संज्ञा पुं० [सं० सद्य, प्रा० सज्ज + हिं० आव (प्रत्य०)] एक प्रकार का दही। मलाईदार मीठा दही। विशेष—इसे बनाने के लिये दूध को पहले खूब उबाल कर गाढ़ा करते हैं और तब उसमें जामन छोड़ते हैं, इस प्रकार जमा हुआ दही बहुत उत्तम होता है; उसकी साढ़ी या मलाई बहुत मोटी और चिकनी होती है। प्रायः 'दही' शब्द के साथ ही इस शब्द का प्रयोग मिलता है और विशेष अर्थ देता है। जैसे,— भावभरी कोऊ लिए रुचिर सजाव दही कोऊ मही मंजु दाबि दलकति पाँसुरी।—रत्नाकर, भा० १, पृ० १५१।

सजाव (२)
संज्ञा स्त्री० दे० 'सजावट'।

सजावट
संज्ञा स्त्री० [हिं० सजाना + आवट (प्रत्य०)] १. सज्जित होने का भाव या धर्म। जैसे,—उनके मकान की सजावट भी देखने ही योग्य है। २. शोभा। ३. तैयारी।

सजावन पु †
संज्ञा पुं० [हिं० सजाना] १. सजाने की क्रिया। अलं- कृतकरण। मंडन। २. तैयार करने की क्रिया। सुसज्जित करना। उ०—अब तो नाथ विलंब न कीजै। सैन सजावन शासन दीजै।—रघुराज (शब्द०)।

सजावल
संज्ञा पुं० [तु० सज़ावुल] १. सरकारी कर उगाहनेवाला कर्मचारी। तहसीलदार। २. राजकर्मचारी। ३. सिपाही। जमादार।

सजावली
संज्ञा स्त्री० [तु० सज़ावुल + ई (प्रत्य०)] १. सजावल का काम। २. सजावल का पद या ओहदा।

सजावार
वि० [फ़ा० सज़ावार] १. जो दंड का भागी हो। जो सजा पाने के योग्य हो। २. योग्य। सत्पात्र (को०)।

सजिना
संज्ञा पुं० [हिं० सहिंजन] दे० 'सहिंजन'।

सजीउ पु †
वि० [सं० सजीव] दे० 'सजीव'।

सजीदा
वि० [फ़ा० सज़ीदह्] लायक। पात्र। योग्य [को०]।

सजीया
संज्ञा पुं० [अ०] आदत। स्वभाव। प्रकृति [को०]।

सजीला
वि० [हिं० सजना + ईला (प्रत्य०)][वि० स्त्री० सजीली] १. सदधज के साथ रहनेवाला। छैला। छबीला। जैसे,—वह बहुत अच्छा और सजीला जवान है। २. सुंदर। सुडौल। मनोहर।

सजीव (१)
वि० [सं०] १. जीवयुक्त। जिसमें प्राण हों। उ०—हस्ति सिंघली बाँधे बारा। जनु सजीव सब ठाढ़ पहारा।—जायसी (शब्द०)। २. कृरतीला। तेज। ३. ज्यायुक्त। प्रत्यंचायुक्त (को०)। ४. ओजयुक्त। ओजस्वी। जैसे,—उनकी कविता बड़ी सजीव है।

सजीव (२)
संज्ञा पुं० प्राणी। जीवधारी।

सजीवता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सजीव होने का भाव। सजीवपन।

सजीवन
संज्ञा पुं० [सं० सञ्जीवन] संजीवनी नामक बूटी। विशेष दे० 'संजीवनी'।

सजीवनबूटी
संज्ञा स्त्री० [सं० सञ्जीवनी + हिं० बूटी] रुदंती। रुद्रवंती। विशेष दे० 'संजीवनी'।

सजीवनसूर, सजीवनमूल पु
संज्ञा पुं० [सं० सञ्जीवनी] संजीवनी बूटी। विशेष दे० 'संजीवनी'।

सजीवनी मंत्र
संज्ञा पुं० [सं० सञ्जीवन + मन्त्र] १. पुराणादि में उक्त वह मंत्र जिसके संबंध में लोगों का विश्वास है कि मरे हुए मनुष्य या प्राणी को जिलाने की शक्ति रखता है। २. वह मंत्र जिससे किसी कार्य में सुभीता हो। उपकारी मंत्रणा।

सजीह
संज्ञा पुं० [फ़ा०] स्वभाव।

सजु (१)
वि० [सं० सजुष्] १. जो प्रिय हो। प्यारा। २. परस्पर संबंद्ध। एक साथ रहनेवाला [को०]।

सजु (२)
संज्ञा पुं० मित्र। दोस्त। साथी [को०]।

सजुग पु †
वि० [हिं० सजग] सजग। सचेत। होशियार। उ०— लोभी चोर दूत ठग छोरा रहहिं यह पाँच। जो यह हाट सजुग भा गँढ़ ताकर पै बाँच।—जायसी (शब्द०)।

सजुता
संज्ञा स्त्री० [सं० संयुता] एक प्रकार का छंद जिसके प्रत्येक चरण में एक सगण, दो जगण और एक गुरु होता है। (स ज ज ग) विशेष दे० 'संयुत'।

सजूरी
संज्ञा स्त्री० [सं० सजुष् (= प्रिय) ?] एक प्रकार की मिठाई। उ०—(क) कमल नैन हरि करौ बियारी। लुचुई लपसी सद्य जलेबी सोइ जेबहु जो लगै पियारी। घेवर मालपुवा मोतिलाडू सधर सजूरी सरस सवारी।—सूर०, १०।२२७। (ख) माधुरि अति सरस सजूरी। सद परसि धरी घृत पूरी।—सूर (शब्द०)।

सजोना †
क्रि० स० [हिं० सजाना] १. सज्जित करना। शृंगार करना। २. सामान करना। सरंजाम करना।

सजोयल पु
वि० [हिं० सजोना] दे० 'सँजोइल'।

सजोष
वि० [सं०] (वे) जिनमें समान प्रीति हो। मेल से कोई काम करनेवाले।

सजोषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. बहुत दिनों से चली आई हुई समान प्रीति। २. साथ साथ आनंद लेना। संमिलित रूपेण आनंद मनाना या लेना (को०)।

सज्ज पु (१)
संज्ञा पुं० [हिं० साज] दे० 'साज'।

सज्ज (२)
वि० [सं०] १. सज्जित। सजा हुआ। तैयार किया हुआ। २. परिधानयुक्त। कपड़े धारण किए हुए। ३. सँवारा हुआ। भूषित। अलंकृत। ४. शास्त्र आदि से सुसज्जित। सुरक्षित, दृढ़ या परिखा आदि से घेरा हुआ। ६. प्रत्यंचायुक्त [को०]।

सज्जक
संज्ञा पुं० [सं०] सज्जा। सजावट।

सज्जकर्म
संज्ञा पुं० [सं० सज्जकर्मन्] १. सज्जित करना या होना। २. धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना [को०]।

सज्जण (१)
संज्ञा पुं० [सं० सज्ज] फौज की तैयारी। (डिं०)।

सज्जण (२)
संज्ञा पुं० [सं० सज्जन] प्रिय। प्रियतम। दे० 'सज्जन'। उ०—चाल सखी तिण मंदिरइँ सज्जण रहियउ जेंण। कोइक मीठउ बोलड़इ लागो होसी तेंण।—ढोला०, दू० ३५९।

सज्जता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सज्जा का भाव। सजावट।

सज्जन
संज्ञा पुं० [सं० सत् + जन] १. भला आदमी। सत्पुरुष। शरीफ। २. अच्छे कुल का मनुष्य। ३. प्रिय मनुष्य। प्रियतम। ४. चौकीदार। संतरी। ५. घाट। ६. बाँधना या लटकाना। (को०)। ७. तैयारी करना (को०)। ८. शस्त्रादि से सज्जित होना (को०)। ९. सजाने की क्रिया या भाव। सज्जा।

सज्जनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सज्जन होने का भाव। सत्पुरुषता। भल- मनसाहत। भलमनसी। सौजन्य। साधुता।

सज्जताई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सज्जन + हिं० ताई (प्रत्य०)] दे० 'सज्ज्नता'।

सज्जना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह हाथी जिसपर नायक या सवार चढ़ता हो। २. अलंकृत करना। भूषित करना (को०)। ३. अलंकरण। प्रसाधन। भूषण। सजावट (को०)। ४. सवारी के पहले हाथी को सज्जित करना (को०)।

सज्जा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सजाने की क्रिया या भाव। सजावट। २. वेशभूषा। ३. युद्ध का उपकरण। सैनिक साजसमान। शस्त्र, कवच आदि (को०)।

सज्जा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० शय्या, प्रा० सज्जा, सेज्जा] १. चारपाई। शय्या। २. चारपाई, तोशक, चादर आदि वे सामान जो किसी के मरने पर उसके उद्देश्य से महापात्र को दिए जाते हैं। विशेष दे० 'शय्यादान'।

सज्जा (३)
वि० [सं० सव्य] दाहिना। (पश्चिम)।

सज्जाद
वि० [अ०] आराधक। उपासना करनेवला [को०]।

सज्जादगी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] गद्दोनशोनी [को०]।

सज्जादा
संज्ञा पुं० [अं० सज्जादह्] १. बिछाने का वह कपड़ा जिसपर मुसलमान नमाज पढ़ते हैं। मुसल्ला। जानमाज। २. आसन। ३. फकीरों या पीरों आदि की गद्दी।

सज्जादानशीन
संज्ञा पुं० [अ० सज्जादह् + फ़ा० नशीन] १. वह जो गद्दी या तकिया लगाकर बैठता हो। २. मुसलमान पीर या बड़ा फकीर।

सज्जित
वि० [सं०] १. जिसकी खूब सजावट हुई हो। अलंकृत। आरास्ता। २. आवश्यक वस्तुओं से युक्त। तैयार। जैसे,— युद्ध के निमित्त सज्जित सैन्य। ३. परिधानयुक्त। वस्त्र आदि धारण किए हुए (को०)। ४. शस्त्रों से सजा हुआ। ५. बद्ध। संबद्ध। लगा हुआ (को०)।

सज्जी
संज्ञा स्त्री० [सं० स्वर्जि, सर्जिका] एक प्रकार का प्रसिद्ध क्षार जो सफेदी लिए हुए भूरे रंग का होता है। विशेष—सज्जी दो प्रकार की होती है। एक वह जो मालावार की ओर बनाई जाती है। इसमें बड़ी बड़ी खाइयाँ खोदकर उनमे वृक्षों की शाखाएँ और पत्ते आदि भरकर आग लगा देते हैं। जब वे जलकर जम जाते हैं, तब उनकी राख को खारी कहते हैं। इसी खारी से भूमि में सज्जी बनाते हैं। दूसरे प्रकार की सज्जी खार (क्षार) वाली जमीन में होती है। खार के कारण भूमि फूल जाती है और उसी फूली हुई। मिट्टी को सज्जी कहते हैं। वैद्यक के अनुसार सज्जी गरम, तीक्ष्ण और वायुगोला, शूल, बात, कफ, कृमिरोग आदि को शांत करनेवाली मानी जाती है।

सज्जीखार
संज्ञा पुं० [सं० सर्जिका क्षार] दे० 'सज्जी'।

सज्जीबूटी
संज्ञा स्त्री० [सं० सञ्जीवनी] क्षुप जाति की एक वनस्पति जो प्रति वर्ष उत्पन्न होती है। विशेष—यह ६ से १८ इंच तक ऊँची होती है। इसकी शाखाएँ कोमल और पत्ते बहुत छोटे और तिकोने होते हैं। पुष्प छोटे और एक से तीन तक साथ लगते हैं। बीजकोष १।४ इंचतक के घेरे में गोलाकार होता है। इसका रंग प्रायः चमकीला गुलाबी होता है। इसमें बहुत ही छोटे छोटे बीज होते हैं। प्रायः इसी के डंठलों और पत्तियों से सज्जीखार तैयार होता है। यह क्षुप तीन प्रकार का पाया जाता हैं।

सज्जुई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सज + ई (प्रत्य०)] दे० 'सजाव'।

सज्जुता
संज्ञा स्त्री० [सं० संयुता] सयुता नामक छंद। वि० दे० संयुता'।

सज्जुष्ट
वि० [सं०] आनंददायक। सुखकारी। सज्जनो को प्रियकर।

सुज्जे † (१)
[सं० सर्व] सब। बिलकुल। संपूर्ण।

सज्जे ‡ (२)
अव्य० तमाम। सर्वतः। संपूर्णत।

सज्ञान (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसे ज्ञान हो। ज्ञानवाला मनुष्य। १. बुद्धिमान या चतुर पुरुष। सयाना। ३. उस अबस्था को पहुँचा हुआ पुरुष जिसमें वह विवेकयुक्त हो जाता है। प्रौढ़। बलिग।

सज्ञान (२)
वि०— १. ज्ञानयुक्त। २. चतुर। बुद्धिमान्। ३. सचेत। सावधान। होशियार।

सज्य
वि० [सं०] ज्या अर्थात् प्रत्यंचा से युक्त। (धनुष) जिसपर प्रत्यंचा चढ़ो हो [को०]।

सज्या †
संज्ञा स्त्री० [सं० शय्या] दे० 'शय्या'।

सज्योत्सना
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्योत्सनायुक्त रात। चाँदनी रात।

सझ
संज्ञा स्त्री० [सं० सज्जा] १. सजावट। २. तैयारी। (डिं०)।

सझर
संज्ञा स्त्री० [सं० सज्जा] सेना को सज्जित करने की क्रिया। फौज तैयार करना (डिं०)।

सझनी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का छोटा पक्षी जिसकी पीठ काली, छाती सफेद और चोंच लंबी होती है।

सझिदार †
संज्ञा पुं० [हिं० साझोदार] [स्त्री० सझिदारिन्] हिस्सेदार। साझीदार। शरोक।

सझिदारी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सझिदार + ई (प्रत्य०)] साझेदार होने का भाव। साझा। शिरकत। साझेदारी।

सझिया †
संज्ञा पुं० [हिं० साझा] १. भागीदार। हिस्सेदार। २. साझा। हिस्सा। भाग।

सट
संज्ञा पुं० [सं०] १. जटा। २. वह व्यक्ति जो ब्राह्मण पिता ओर भटिजातीय माता से उत्पन्न हो (को०)।

सटई ‡
संज्ञा स्त्री० [देश०] अनाज रखने का एक प्रकार का पात्र।

सटक
संज्ञा स्त्री० [अनु० सट से] १. सटकने की क्रिया। धीरे से चंपत होने या खिसकने का व्यापार। २. तंबाकू पीने का लंबा लचीला नैचा जो भीतर छल्लेदार तार देकर बनाया जाता है। विशेष—यह रबर की नली की भाँति लचोला और लपेटने य़ोग्य होता है। अधिक लंबे बाँस की निगाली रखने में अड़चन होती है, अतः लोग सटक का व्यवहार करते हैं। ३. पतली लचनेवाली छड़ी। उ०—चिलक चिकनई चटक सौं लफति सटक लौं आय। नारि सलौनी सांवरो नागिन लौं डसि जाय।—बिहारी (शब्द०)।

सटकना (१)
क्रि० अ० [अनु० सट से] धीरे से खिसक जाना। रफू- चक्कर होना। चल देना। चंपत होना। उ०—असुर यह घात तकि गयो रण ते सटकि बिपति ज्वर दियो तब शिव पठाई।—सूर (शब्द०)।

सटकना (२)
क्रि० स० बालों में से अनाज निकालने के लिये उसे कूटने की क्रिया। डाँठ कूटना या पीटना।

सटकाना
क्रि० स० [अनु० सट से] १. किसी को छड़ी, कोड़े आदि से मारना जिसमें 'सट' शब्द हो। जैसे,—दो कोड़े सटकाऊँगा, ठीक हो जाओगे। २. सड़ सड़ या सट सट शब्द करते हुए हुक्का पीना। जैसे,—क्या बैठे सटका रहे हो।

सटकार
संज्ञा स्त्री० [अनु० सट] १. सटकाने की क्रिया या भाव। २. फटकारने या झटकारने की क्रिया। ३. गौ आदि को हाँकने की क्रिया। हटकार। उ०—सारथी पाय रुख दए सटकार हय द्वारकापुरी जब निकट आई।—सूर (शब्द०)।

सटकारना
क्रि० स० [अनु० सट से] १. पतली लचीली छड़ी या कोड़े आदि से किसी को सट से मारना। सट सट मारना। २. झटकारना। फटकारना।

सटकारा
वि० [अनु०] चिकना और लंबा। (केश, बाल)। उ०— छुटे छुटावत जगत तै सटकारे सुकुमार। मन बाँधत बेनी बँधे नील छबीले बार।—स० सप्तक, पृ० १०५।

सटकारी
संज्ञा स्त्री० [सं० अनु०] लचनेवाली पतली छड़ी। साँटी।

सटक्का
संज्ञा पुं० [अनु० सट से] १. दे० 'सटका'। २. दौड़। झपट। जैसे,—एक सटक्के में तो तुम पर पहुँच जायँगे। मुहा०—सटक्का मारना = एक साँस से दौड़कर या बहुत जल्दी जल्दी जाना।

सटना
क्रि० अ० [सं० स + √ स्था] १. दो चीजों का इस प्रकार एक में मिलना जिसमें दोनों के एक पार्श्व एक दूसरे से लग जायँ। जैसे,—दीवार से अलमारी सटना। २. चिपकना। जैसे,— दप्ती पर कागज सटना। ३. संभोग होना। (बाजारू)। ४. लाठी या डंडे आदि से मार पीट होना। लाठी सोटा चलना। मार पीट होना। (बदमाश)। ५. साथ होना। मिलना। संयो० क्रि०—जाना।

सटपट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. सिपपिटाने की क्रिया। चकपकाहट। उ०—अरी खरी सटपट परी, बिधु आगे मग हेरि। संग लगे मधुपन लई भागत गली अँधेंरि।—बिहारी (शब्द०)। २. शील। संकोच। ३. संकट। दुविधा। असमंजस। क्रि० प्र०—में पड़ना।—में डालना।

सटपटाना (१)
क्रि० अ० [अनु०] १. सटपट की ध्वनि होना। २. दे० 'सिटपिटाना'। उ०—छुटै न लाज न लालचौ प्यौ लखि नैहर गेह। सटपटात लोचन खरे, भरे संकोच सनेह।—बिहारी (शब्द०)। ३. दब जाना। मंद या मौन होना। ४. चकपकाना।

सटपटाना (२)
क्रि० स० सटपट शब्द उत्पन्न करना।

सटरपटर
वि० क्रि० वि० [अनुध्व०] १. छोटा मोटा। तुच्छ। हलका। जैसे,—सटर पटर काम करने से न चलेगा। २. बहुत साधारण। बिलकुल मामूली।

सटर पटर (२)
संज्ञा स्त्री० १. उलझन का काम। बखेड़े का काम। २. व्यर्थ या तुच्छ काम। जैसे,—इसी सटर पटर में दिन बीत जाता है। क्रि० प्र०—करना।—लगाना।

सट सट
क्रि० वि० [अनु०] १. सट शब्द के साथ। सटापट। २. शीघ्र। बहुत जल्दी। तुरंत। जैसे,—वह सब काम सट सट निपटा डालता है।

सटांक
संज्ञा पुं० [सं० सटाङ्क] सिंह। शेर।

सटा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चूड़ा। शिखा। २. जटा। ३. घोड़े या शेर के कंधे पर के बाल। अयाल। केशर। ४. शूकर का बाल (को०)। ५. केशपाश। वेणी। जूड़ा़ (को०)। ६. द्युति। दीप्ति। चमक (लाक्ष०)। ७. बाहुल्य। बहुलता। बहु- संख्या (को०)।

सटाक
संज्ञा पुं० [अनु०] सट शब्द। 'सट' की आवाज।

सटाका † (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] १. दे० 'सटाकी'। २. दे० 'सटाक'।

सटाका † (२)
क्रि० वि० सट से। तुरंत। झटपट।

सटाकी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] चमड़े को वह रस्सी या पट्टी जो पैना के सिरे पर बाँधी जाती है। विशेष—पैना बाँस का एक पतला छोटा डंडा होता है जिससे हल जोतनेवाला या गाड़ी हाँकनेवाला बैल हाँकता है। इस पैना को कोड़े का आकार देने के लिये इसमें चमड़े को पतली पतली पट्टियाँ बाँधते हैं। इन्हीं पट्टीयों को सटाकी कहते हैं। सटाकी और डंडा दोनों मिलकर 'पैना' होता है।

सटान
संज्ञा स्त्री० [हिं० सटना + आन (प्रत्य०)] १. सटने की क्रिया या भाव। मिलान। २. दो वस्तुओं के सटने या मिलने का स्थान। जोड़।

सटाना
क्रि० स० [सं० स + √ स्या] १. दो चीजों की एक में संयुक्त करना। दो चीजों के पार्श्वो को आपस में मिलाना। मिलाना। जोड़ना। ३. लाठी, डंडे आदि से लड़ाई करना। मारपीट करना। (बदमाश)। ४. स्त्री और पुरुष का संयोग कराना। संभोग कराना। (बाजारू)।

सटाय
वि० [देश०] १. (दलालों की परिभाषा में) कम। न्यून। २. हलका। घटिया। खराब।

सटाल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सिंह। केसरी। शेर बबर।

सटाल (२)
जिसको गर्दन पर अयाल हो। २. पूर्ण। युक्त [को०]।

सटालु
संज्ञा पुं० [सं०] अपक्व फल। वह फल जो पका न हो [को०]।

सटि
संज्ञा स्त्री० [सं०] कचूर। शटी।

सटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] बन आदी। जंगली कचूर।

सटियल
वि० [सं० स्त्रस्त] जो रद्दी किस्म का हो। घटिया दरजे का।

सटिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० सटना] १. सोने या चाँदी की एक प्रकार की चूड़ी। २. चाँदी की एक प्रकार की कलम जिससे स्त्रियाँ माँग में सिंदूर देती हैं। ३. दे० 'साटी'। ४. अभिसंधि। गुप्त वार्ता या षडयंत्र करना।

सटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बनआदी। जंगली कचूर।

सटीक (१)
वि० [सं०] जिसमें मूल के साथ टीका भी हो। टीका सहित। व्याख्या सहित। जैसे,—सटीक रामायण।

सटीक (२)
वि० [हिं० ठीक या सं० सटीक] बिलकुल ठीक। जैसा चाहिए ठीक वैसा ही। जैसे,—यह तसबीर बन तो रही है, सटीक उतर जाय, तो बात है। संयो० क्रि०—पड़ना।—बैठना।

सटैला
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पक्षी।

सटोरिया
संज्ञा पुं० [हिं० सट्टा] सट्टे बाज। सट्टा खेलनेवाला।

सट्ट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दरवाजे की चौखटे में दोनों ओर की लकड़ियाँ। बाजू।

सट्ट (२)
संज्ञा पुं० [हिं० सट्टा] दे० 'सट्टा'।

सट्टक
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राकृत भाषा में प्रणीत छोटा रूपक। एक उपरूपक। जैसे,—राजशेखर कृत कर्पूर मंजरी है। २. जीरा मिला हुआ मट्ठा।

सट्टा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. वह इकरारनामा जो काश्तकारों में खेत के साझे आदि के संबंध में होता है। बटाई। २. वह इकरारनामा जो दो पक्षों में कोई निश्चित काम करने या कुछ शतें पूरी करने के लिये होता है। इकरारनामा। जैसे,—बाजेवालों को पेशगी रुपया दे दिया, पर उनसे सट्टा नहीं लिखाया।

सट्टा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० हाट या सट्टी] १. वह स्थान जहाँ लोग वस्तुएँ खरीदने बेचने के लिये एकत्र होते हैं। हाट। बाजार। २. बाजार की तेजी मंदी के अनुमान के आधार पर अधिक लाभ को दृष्टि से की हुई खरीदफरोख्त जो एक प्रकार का द्यूत माना जाता है। दे० 'सट्टेबाज'। यौ०—सट्टा बाजार = वह बाजार जहाँ सट्टे का काम होता है। सट्टेबाज।

सट्टा (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक प्रकार का पक्षी। २. बाजा।

सट्टा बट्टा
संज्ञा पुं० [हिं० सटना + अनु० बट्टा] १. मेल मिलाप। हेल मेल। २. सिद्धि के लिये की हुई धूर्ततापूर्ण युक्ति। चालबाजी। मूहा०—सट्टा बट्टा लड़ाना = अपना कार्य सिद्ध करने के लिये किसी प्रकार की युक्ति करना।

सट्टी
संज्ञा स्त्री० [हिं० हाट या हट्टी] वह बाजार जिसमें एक ही मेल की बहुत सी चीजें लोग दूर दूर से लाकर बेचते हों। हाट। जैसे,—तरकारी की स्ट्टी; पान की सट्टी। मुहा०—सट्टी मचाना = ऐसा शोर करना जैसा सट्टी में होता है। बहुत से लोगों का मिलकर जोर जोर से बोलना। जैसे,— पंडितजी के दरजे में तो लड़कों ने सट्टी मचा रखी है। सट्टी लगाना = बहुत सी चीजें इधर उधर फैला देना। जैसे,—तुमने यहाँ किताबों की सट्टी लगा रखी है।

सट्टेबाज
संज्ञा पुं० [हिं० सट्टा + फ़ा० बाज (प्रत्य०)] वह आदमी जो अधिक लाभ की द्दष्टि से बाजार में क्रय विक्रय करे। सट्टा खेलनेवाला। विशेष—यह व्यापारियों का एक प्रकार का जुआ हे। कभी कभी लाभ के स्थान पर व्यापारी इसमें अपना सर्वस्व गँवा देता है।

सट्टेबाजी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सट्टेबाज + ई (प्रत्य०)] सट्टेबाज का काम। सट्टा खेलने का काम।

सट्वा
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का पक्षी। २. प्राचीन काल का एक प्रकार का बाजा।

सठ (१)
संज्ञा पुं० [सं० षष्टि, प्रा० सठि्ट, दे० हिं० साठ] साठ की संख्या। दे० 'साठ (२)'।

सठ (२)
संज्ञा पुं० [सं० शठ] दे० 'शठ'।

सठई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सठ+ ई (प्रत्य०)] शठ होने का भाव। सठता।

सठता
संज्ञा स्त्री० [सं० शठ, हिं० सठ + ता (प्रत्य०)] १. शठ होने का भाव। शठ का धर्म। शठता। २. मूर्खता। बेवकूफी। उ०— जानी राम न कहि सके भरत लखन सिय प्रीति। सो सुनि समुझि तुलसी कहत हठ ता की रीति।—तुलसी (शब्द०)।

सठि
संज्ञा स्त्री० [सं०] कचूर [को०]।

सठियाना
क्रि० अ० [हिं० साठ + इयाना (प्रत्य०)] १. साठ वर्ष की अवस्था को प्राप्त होना। साठ बरस का होना। २. वृद्धा- वस्था के कारण बुद्धि तथा विवेकशक्ति का कम हो जाना। विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग व्यक्ति और बुद्धि दोनों के लिये होता है। जैसे,—(क) उनकी बात छोड दो; वे तो सठिया गए हैं। (ख) तुम्हारी तो अक्ल सठिया गई है। संयो० क्रि०—जाना।

सठुरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीठी या साँठी] गेहूँ या जो आदि के डंठलों का वह गँठीला अंश जिसका भूसा नहीं होता और जो ओसाकर अलग कर दिया जाता है। गठुरी। कूँटा। कूँटी।

सठेरा
सज्ञा पुं० [हिं० साँठा] सन का वह डंठल जो सन निकल जाने पर बच रहता है। संठा। सरई। सलई।

सठोरा
संज्ञा पुं० [हिं० सोंठ + ओरा (प्रत्य०)] दे० 'सोंठौरा'।

सठ्ठो
संज्ञा पुं० [डिं०] ऊँट। क्रमेलक।

सड़ (१)
संज्ञा पुं० स्त्री० [अनु०] दे० 'सड़ाक'।

सड़ † (२)
संज्ञा पुं० [सं० सप्त] सात। सात की संख्या। समस्त शब्दों में पूर्व पद के रूप में प्रयुक्त। जैसे, सड़सठ।

सड़क
संज्ञा स्त्री० [अ० शरक] १. आने जाने का चौड़ा रास्ता। राजमार्ग। राजपथ। २. रास्ता। मार्ग।

सड़क्का
संज्ञा पुं० [हिं० सटक्का] दे० 'सटक्का'।

सड़न
संज्ञा स्त्री० [हिं० सड़ना] सड़ने की क्रिया या भाव। गलन।

सड़ना
क्रि० अ० [सं० सरण] १. किसी पदार्थ में ऐसा विकार होना जिससे उसके संयोजक तत्व या अंग बिलकुल अलग अलग हो जायँ, उसमें से दुर्गंध आने लगे और वह काम के योग्य न रह जाय। जैसे,—उँगली सड़ना, फल सड़ना। २. किसी पदार्थ में खमीर उठना या आना। संयो० क्रि०—जाना। ३. दुर्दशा में पड़ा रहना। बहुत बुरी हालत में रहना। जैसे— रियासतों में लोग बरसों तक जेलखाने में यों ही सड़ते हैं।

सड़सठ (१)
संज्ञा पुं० [हिं० सड़ (सात का रूप) + साठ] साठ और सात की संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है—६७।

सड़सठ (२)
वि० जो गिनती में साठ से सात अधिक हो।

सड़सठवाँ
वि० [हिं० सड़सठ + वाँ (प्रत्य०)] गिनती में सड़सठ के स्थान पर पड़नेवाला।

सड़सी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सँड़सी] दे० 'सँड़सी'।

सड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० सड़ना] वह औषध जो गौओं की बच्चा होने के समय पिलाते हैं। प्रायः यह औषध सड़ाकर बनाते हैं, इसी से इसे सड़ा कहते हैं।

सड़ाइँद
संज्ञा स्त्री० [हिं० सड़ना + गंध] दे० 'सड़ायँध'।

सड़ाक
संज्ञा पुं०, स्त्री० [अनु 'सड़' से] १. कोड़े आदि की फटकार की आवाज जो प्रायः सड़ के समान होती है। २. शीघ्रता। जल्दी। जैसे,—सड़ाक से चले जाओ और चले आओ।

सड़ान
संज्ञा स्त्री० [हिं० सड़ना] सड़ने का व्यापार या क्रिया। सड़ना।

सड़ाना
क्रि० स० [हिं० सड़ना का सक० रूप] १. सड़ना का सकर्मक रूप। किसी वस्तु को सड़ने में प्रवृत करना। किसी पदार्थ में ऐंसा विकार उत्पन्न करना कि उसके अवयव गलने लगें और उसमें से दुर्गंध आने लगे। जैसे,—(क) सब आम तुमने रखे रखे सड़ा डाले। (ख) महुए की सड़ाकर शराब बनाई जाती है। २. किसी वस्तु को बुरी दशा में रखना अथवा उसका उपयोग न करना, न करने देना। संयो० क्रि०—डालना।—देना।

सड़ायँध
संज्ञा स्त्री० [हिं० सड़ना + गंध] सड़ी हुई चीज की गंध।

सड़ाव
संज्ञा पुं० [हिं० सड़ना + आव (प्रत्य०)] सड़ने की क्रिया या भाव। सड़ना।

सड़ासड़
अव्य० [अनु० 'सड़' से] सड़ शब्द के साथ। जिसमें सड़सड़ शब्द हो। जैसे,—चोर पर सड़ासड़ कोड़े पड़ने लगे।

सडियल
वि० [हिं० सड़ना + इयल (प्रत्य०)] १. सड़ा हुआ। गला हुआ। २. निकम्मा। रद्दी। खराब। ३. नीच। तुच्छ। जैसे,— सड़ियल आदमी। सड़ियल एक्का, सड़ियल तसवीर।

सढ़
संज्ञा पुं० [देश०] वैश्यों की एक जाति।

सण
संज्ञा पुं० [सं० शण] दे० 'सन'।

सणगार पु †
संज्ञा पुं० [सं० श्रृङ्गार] शृंगार। सजावट। (डिं०)।

सणतूल
संज्ञा पुं० [सं०] सन का रेशा। शणतंतु।

सणसूत्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शणसूत्र'।

सणि
संज्ञा स्त्री० [सं०] गाय के श्वास की गंध [को०]।

सतंद्र
वि० [सं० सतन्द्र] तंद्रायुक्त। क्लांत। थका हुआ [को०]।

सत् (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्म। २. वह जो वस्तुतः विद्यमान हो। अस्तित्व। सत्ता (को०)। ३. सचाई। वास्तविकता (को०)। ४. भद्र पुरुष। सद्गुणी व्यक्ति (को०)। ५. जल (वेद)। ६. कारण (को०)।

सत् (२)
वि० १. सत्य। २. साधु। सज्जन। ३. धीर। ४. नित्य। स्थायी। ५. विद्वान्। पंडित। ६. मान्य। पूज्य। ७. प्रशस्त।८. शुद्ध। पवित्र। ९. श्रेष्ठ। उत्तम। अच्छा। भला। १०. वर्तमान। विद्यमान (को०)। ११. ठीक। उचित (को०)। १२. मनोहर। सुंदर (को०)। १३. दृढ़। स्थिर (को०)।

सत (१)
वि० [हिं०] दे० 'सत्'।

सत (२)
संज्ञा पुं० [सं० सत्] सत्यतापूर्ण धर्म। मुहा०—सत पर चढ़ना = पति के मृत शरीर के साथ सती होना। सत पर रहना = पतिव्रता रहना। सती रहना।

सत (३)
वि० [सं० शत] दे० 'शत'।

सत (४)
संज्ञा पुं० [सं० सत्व] १. किसी पदार्थ का मूल तत्व। सार भाग। जैसे,—मुलेठी का सत। २. जीवनी शक्ति। ताकत। जैसे,— चार दिन के बुखार में शरीक का सारा सत निकल गया।

सत (५)
वि० [सं० सप्त] १. 'सात' (संख्या) का संक्षिप्त रूप जिसका व्यवहार यौगिक शब्द बनाने में होता है। जैसे,—सतमंजिला।

सतकार पु
संज्ञा पुं० [सं० सत्कार] दे० 'सत्कार'।

सतकारना पु
क्रि० स० [सं० सत्कार + हिं० ना (प्रत्य०)] सत्कार करना। आदर करना। सम्मान करना। इज्जत करना। उ०—(क) गुरु को जेठो बंधु विचारयो। करि प्रणाम अतिशय सतकारयो। (ख) राजा कियो ताहि परनामा। सादर सतकारयो मति धामा।—रघुराज (शब्द०)।

सतकोन
वि० [हिं० सात + कोना] जिसमें सात कोने हों। सात कोनों वाला।

सतगँठिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० सात + गाँठ] एक प्रकार की वनस्पति जिसकी तरकारी बनाई जाती है।

सतगुरु
संज्ञा पुं० [हिं० सत (= सच्चा) + गुरु या सं० सद्गुरु] १. अच्छा गुरु। २. परमात्मा परमेश्वर।

सतजीत
संज्ञा पुं० [सं० सत्यजित्] दे० 'सत्यजित्'।

सतजुग
संज्ञा पुं० [सं० सत्ययुग] दे० 'सत्ययुग'।

सतत
अव्य० [सं०] निरंतर। सदा। सर्वदा। हमेशा। बराबर।

सततक
वि० [सं०] (ज्वर) जो दिन भर में दो बार चढ़ता हो [को०]।

सततग
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो सदा चलता रहता हो। २. पवन। वायु। हवा।

सततगति
संज्ञा पुं० [सं०] वायु। हवा।

सततज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] वह ज्वर जो दिन में दो बार आवे; या कभी दिन में एक बार और फिर रात को भी एक बार आवे। द्विकालिक विषम ज्वर।

सततदुर्गत
वि० [सं०] निरंतर बुरी अवस्थावाला। जो सदा कष्ट में रहे [को०]।

सततधृति
वि० [सं०] निरंतर धैर्यशील रहनेवाला। जो सर्वदा द्दढ़ संकल्प युक्त हो [को०]।

सततपरिग्रह
अ० [सं०] निरंतर [को०]।

सततयायी
वि० [सं० सततयायिन्] १. निरंतर गतिशील। २. निरंतर क्षयालु या क्षयशील [को०]।

सततयुक्त
वि० [सं०] सदा तत्पर। सतत अनुरक्त या परायण [को०]।

सतत समिताभियुक्त
संज्ञा पुं० [सं०] एक बोधिस्त्व का नाम।

सतत स्पंदन
वि० [सं० सततस्पन्दन] नित्य स्पंदनशील।

सतताभियोग
संज्ञा पुं० [सं०] किसी न किसी कार्य में सदैव लगा रहना [को०]।

सतति
वि० स्त्री० [सं०] जो सदा चला करे या विच्छिन्न न हो।

सतत्व
संज्ञा पुं० [सं०] स्वभाव। प्रकृति।

सतदंत
संज्ञा पुं० [हिं० सात + दाँत] [वि० सतदंता] वह पशु जिसके सात दाँत हो गए हों। विशेष—प्रायः पशुओं को पूरे दाँत निकल आने के पूर्व उनके दाँतों की संख्या के अनुसार पुकारते हैं। जैसे, दुदंता, चौदंता, सतदंता आदि शब्द क्रमशः दो, चार और सात दाँतोंवाले बछड़े के लिये प्रयुक्त होते हैं।

सतदल पु
संज्ञा पुं० [सं० शतदल] १. कमल। २. सौ दलों या पँखुडियोंवाला कमल।

सतध्रत
संज्ञा पुं० [सं० शतधृत] ब्रह्मा। (डिं०)। यौ०—सतध्रत सुत = नारदमुनि।

सतन
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का लाल चंदन जिसकी गंध भूमि या मिट्टी के समान होती है [को०]।

सतनजा
संज्ञा पुं० [हिं० सात + अनाज] सात भिन्न प्रकार के अन्नों का मेल। बह मिश्रण जिसमें सात भिन्न भिन्न प्रकार के अनाज हों।

सतनी †
संज्ञा स्त्री० [सं० सप्तपर्ण] १. सप्तपर्ण वृक्ष। सतिवन। छतिवन। २. एक प्रकार का बहुत ऊँचा वृक्ष। विशेष—इस वृक्ष की छाल का रंग कालापन लिए होता है। और लकड़ी संदूक आदि बनाने के काम में आती हैं। यह बंगाल, दक्षिण भारत और हिमालय में अधिकता से पाया जाता है।

सतनु
वि० [सं०] जिसे तन हो। शरीरवाला।

सतपतिया (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सतपुतिया] दे० 'सतपुतिया'।

सतपतिया (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सात + पति] १. वह स्त्री जिसने सात पति किए हों। २. पुंश्र्वली। छिनाल।

सतपदी
संज्ञा स्त्री० [सं० सप्तपदी] दे० 'सप्तपदी'।

सतपरव †
संज्ञा पुं० [सं० शतपर्वा] १. शतपर्वा। बाँस। २. ऊख। गन्ना।

सतपात
संज्ञा पुं० [सं० शतपत्र, प्रा० सतपत्त] शतपत्र। कमल।

सतपुतिया
संज्ञा स्त्री० [सं० सप्तपुत्रिका] एक प्रकार की तोरई जो प्रायः सब प्रांतों में होती है। विशेष—इसके बोने का समय बर्षा ऋतु है। इसकी लता भूमी पर फैलती है या मँढ़े पर चढ़ाई जाती है। इसके फल साधारण तोरई से कुछ छोटे होते हैं और पाँच, सात या कभी कभी इससे भी अधिक संख्या में एक साथ गुच्छों में लगते हैं।

सतपुरिया
संज्ञा स्त्री० [हिं०] एक प्रकार की जंगली मधुमक्खी।

सतफेरा पु
संज्ञा पुं० [हिं० सात + फेरा] विवाह के समय होनेवाला सप्तपदी नामक कर्म। विशेष दे० 'सप्तपदी'। उ०—फिरहि दोउ सतफेर गुने के। सातहिं फेर गाँठ सो एके।—जायसी (शब्द०)।

सतबरवा
संज्ञा पुं० [सं० शतपर्व (= बाँस)] एक प्रकार का वृक्ष जो नैपाल में होता और जिससे नैपाली कागज बनाया जाता है।

सतभइया
संज्ञा स्त्री० [हिं० सात + भाई] एक प्रकार की मैना (पक्षी) जिसे पेंगिया मैना भी कहते हैं। विशेष—इसकी लंबाई प्रायः एक बालिश्त होती है। इसका रंग पीलापन लिए भूरा होता है। इसके पैर और पंजे पीले होते है। ऋतुभेदानुसार यह रंग बदलती है। यह झुंड़ में रहती है और छोटे, घने वृक्षों या झड़ियों में घोंसला बनाती है। यह एक बार में प्रायः तीन अंडे देती है। यह बहुत शोर करती है। कहते हैं कि कोयल प्रायः अपने अंडे इसी के घोसले में रखती है।

सतभाव पु
संज्ञा पुं० [सं० सद्भाव] १. सद्भाव। अच्छा भाव। २. सरलता। सीधापन। ३. सच्चापन। सचाई।

सतभौरी
संज्ञा स्त्री० [सं० सप्त भ्रमण] हिंदुओं में विवाह के समय की एक रीति। इसमें वर और बधू को अग्नि की सात बार प्रदक्षिणा करनी पड़ती है। इसे 'भौरी पड़ना' भी कहते हैं।

सतमख
संज्ञा पुं० [सं० शतमख] जिसने १०० यज्ञ किए हों। शतक्रतु। इंद्र (डिं०)।

सतमसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मार्कडेय पुराण के अनुसार एक नदी का नाम।

सतमस्क
वि० [सं०] अंधकारयुक्त। तमसाच्छत्र [को०]।

सतमासा
संज्ञा पुं० [हिं० सात + मास] १. सात मास पर उत्पतन्न शिशु। वह बच्चा जो गर्भ से सातवें महीने उत्पन्न हुआ हो। (ऐसा बच्चा प्रायः बहुत रोगी और दुबला होता है और जल्दी जीता नहीं)। २. वह रसम जो शिशु के गर्भ में आने पर सातवें महीने की जाती है।

सतमूली
संज्ञा स्त्री० [सं० शतमूली] सतावर। शतावरी।

सतयुग
संज्ञा पुं० [सं० सत्ययुग] दे० 'सत्ययुग'।

सतरंग
वि० [हिं० सतरंगा] दे० 'सतरंगा'।

सतरंगा (१)
वि० [हिं० सात + रंग] जिसमें सात रंग हो। सात रंगों वाला। जैसे—सतरंगा साफा; सतरंगी साड़ी।

संतरंगा (२)
संज्ञा पुं० इंद्रधनुष जिसमें सात रंग होते हैं।

सतरंज
संज्ञा स्त्री० [अ० शतरंज या सं० चतुरङ्ग] दे० 'शतरंज'। उ०—सतरंज को सो राज काठ को सब समाज महाराज बाजी रची प्रथमन हति।—तुलसी (शब्द०)।

सतरंजी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० शतरंजी] दे० 'शतरंजी'।

सतर (१)
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. लकीर। रेखा। क्रि० प्र०—खींचना।

२. पंक्ति। अवली। कतार।

सतर (२)
वि० १. टेढ़ा। वक्र। उ०—रमन कह्मो हँसि रमनि सो रति विपरीत बिलास। चितई करि लोचन सतर सगरब सलज सहास।—बिहारी (शब्द०)। २. कुपित। क्रुद्ध। उ०—(क) कान्हहू पर सतर भौहें महरि मनहि विचारु।—तुलसी ग्रं० पृ० ४३५। (ख) सुनहु श्याम तुमहूँ सरि नाहीं ऐसे गएबिलाइ। हम सों सतर होत सूरज प्रभु कमल देहु अब जाइ।—सूर (शब्द०)।

सतर (३)
संज्ञा स्त्री० पुं० [अ०] १. मनुष्य का वह अंग जो ढका रखा जाता है और जिसके न ढके रहने पर उसे लज्जा आती है। गुह्य इंद्रिय। मुहा०—बेसतर करना = (१) नंगा करना। विवस्त्र करना। (२) बेइज्जत करना। २. ओट। आड़। परदा। ३. छिपाना। गोपन करना। यौ०—सतरपोश = जिससे तन ढाँका जाय। सतरपोशी = शरीर ढाँकना तन ढाँकना।

सतरकी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सत्रह] वह क्रिया जो किसी की मृत्यु के पश्चात् सत्रहवें दिन की जाती है। सत्रहीं।

सतरह †
वि० संज्ञा पुं० [हिं० सत्तरह] दे० 'सत्तरह'।

सतराना
क्रि० अ० [हिं० सतर या सं० संतर्जन] १. क्रोध करना। कोप करना। उ०—हम ही पर सतरात कन्हाई।—सूर (शब्द०)। २. कुढ़ना। चिढ़ना। बिगड़ना। उ०—(क) जु ज्यों उझकि झाँपति बदन, झुकति बिहँसि सतराइ। तु त्यों गुलाल मुठी झुठी झझकावतु पिय जाइ।—बिहारी (शब्द०)। (ख) चंद दुति मंद भई, फंद में फँसी हों आय, द्वंद नंद ठानैगी रे, जोरे जुग पानि दै। सासु सतरैहै, जैठ पतिनी रिसैहै, बंक बचन सुनैहै, छाँड़ि गर की भुजानि दै।—देव (शब्द०)। क्रि० प्र०—जाना। उ०—लेहु अब लेहु, तब कोऊ न सिखायो मान्यो, कोई सतराइ जाइ जाहि जाहि रोकिए।— तुलसी (शब्द०)।

सतराहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० सतराना + हट (प्रत्य०)] कोप। गुस्सा। नाराजगी।

सतरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० सर्पदंष्ट्रा] सर्पदंष्ट्रा नामक ओषधि।

सतरौहाँ †
वि० हिं० [सतराना + औंहा(प्रत्य०)] [वि० स्त्री० सतरौहीं] १. कुपित। क्रोधयुक्त। २. कोपसूचक। रिसाया हुआ सा। उ०— सकुचि न रहिए स्याम सुनि ये सतरौहैं बैन। देत रचौहैं चित कहे नेह नचौहैं नैन।—बिहारी (शब्द०)।

सतर्क
वि० [सं०] १. तर्कयुक्त। युक्ति से पुष्ट। दलील के साथ। २. जो विवेकशील हो (को०)। ३. सावधान। होशियार। सचेत। खबरदार।

सतर्कता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सतर्क होने का भाव। सावधानी। होशियारी।

सतर्पना पु
क्रि० सं० [सं० सन्तर्पण] भली भाँति तृप्त करना। संतुष्ट करना।

सतर्ष
वि० [सं०] तृषित। प्यासा।

सतल
वि० [सं०] १. तल या आधारयुक्त। २. पेंदेवाला। जिसमें पेंदा हो [को०]।

सतलज
संज्ञा स्त्री० [सं० शतद्रु] पंजाब की नदियों में से एक। शतद्रु नदी।

सतलड़ा
वि० [हिं० सात + लड़] [वि० स्त्री सतलड़ी] जिसमें सात लड़ हों। जैसे,—सतलड़ा हार।

सतलड़ी, सतलरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सात + लड़ी] गले में पहनने की सात लड़ियों की माला या हार।

सतवंती
वि० स्त्री० [हिं० सत्य + वंती (प्रत्य०)] सतवाली। सती। पतिव्रता।

सतवर्ग
संज्ञा पुं० [फ़ा० सदवर्ग] दे० 'सदवर्ग'।

सतसंग
संज्ञा पुं० [सं० सत्सङ्ग] दे० 'सत्संग'। उ०—बिनु सतसंग विवेक न होई।—मानस, १।३।

सतसंगति
संज्ञा स्त्री० [सं० सत्सङ्गति] दे० 'सत्संग'। उ०—सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधातु सुहाई।— मानस, १।३।

सतसंगी
वि० [सं० सत्सङ्गिन्] दे० 'सत्संगी'।

सतसइया पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सप्तशतिका] दे० 'सतसई'। उ०— सतसइया के दोहरे ज्यों नावक के तीर। देखने में छोटे लगें धाव करें गंभीर।

सतसई
संज्ञा स्त्री० [सं० सप्तशती, प्रा० सत्तसई] १. वह ग्रंथ जिसमें सात सौ पद्य हों। सात सौ पद्यों का समूह या संग्रह। सप्तशती। विशेष—हिंदी साहित्य में 'सतसई' शब्द से प्रायः सात सौ दोहे ही समझे जाते हैं। जैसे,—बिहारी की सतसई।

सतसट पु †
वि० [सं० सप्तषष्ठि, हिं० सड़सठ] दे० 'सडसठ'।

सतसल
संज्ञा पुं० [देश०] शीशम का पेड़।

सतह
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. किसी वस्तु का ऊपरी भाग। बाहर या ऊपर का फौलाव। तल। जैसे,—मेज की सतह; समुंदर की सतह। मुहा०—सतह चौरस या बराबर करना = समतल करना। उभार और गहराई अथवा खुरदुरापन निकालना। २. रेखागणित के अनुसार वह विस्तार जिसमें लंबाई और चौड़ाई हो, पर मोटाई न हो। ३. जमीन की फर्श या छत।

सतहत्तर (१)
वि० [सं० सप्तसप्तति, पा० सप्तसत्तति, प्रा० सत्तहत्तरि] सत्तर और सात। जो गिनती में तीन कम अस्सी हो।

सतहत्तर (२)
संज्ञा पुं० सत्तर से सात अधिक की संख्या या अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है—७७।

सतहत्तरवाँ
वि० [हिं० सतहत्तर + वाँ (प्रत्य०)] जिसका स्थान सतहत्त पर हो। जो क्रम में सतहत्त के स्थान पर पड़ता हो।

सतांग पु
संज्ञा पुं० [सं० शताङ्ग] रथ। यान। उ०—कोउ तुरंग चढ़ि कोऊ मतंग चढ़ि कोउ सतांग चढ़ि आए। अति उछाह नर- नाह भरे सब संपति बिपुल लुटाए।—रघुराज (शब्द०)।

सतानंद
संज्ञा पुं० [सं० सतानन्द] गौतम ऋषि के पुत्र जो राजा जनक के पुरोहित थे। उ०—सतानंद तब आएसु दीन्हा। सोता गमन समोपहिं कीन्हा।—मानस, १।२६३।

सताना
क्रि० स० [सं० संतापन, प्रा० संतावन] १. संताप देना। कष्ट पहुँचाना। दुःख देना। पीड़ित करना। उ०—(क) कह्मौ सुरन्ह तुम ऋषिहि सतायो। तातें कर रहि गयो उचायो।—सूर (शब्द०)। (ख) गई कालिंदी बिरह सताई। चलि पराग अरइल बिच आई।—जायसी (शब्द०)। २. तंग करना। हैरान करना। ३. किसी के पीछे पड़ना।

सतार
संज्ञा पुं० [सं०] जैनों के अनुसार ग्यारहवे स्वर्ग का नाम।

सतारुक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का कुष्ठ या कोढ जिसमें शरीर पर लाल और काली फुंसियाँ निकलती है।

सतारू
संज्ञा पुं० [सं० सतारुक] दे० 'सतारुक'।

सतालू
संज्ञा पुं० [सं० साप्तालुक; मि० फा़० शफ़्तालू] एक पेड़ जिसके गोल फल खाए जाते हैं। शक्तालू। आड़ू। विशेष—यह पेड़ मझोले कद का होता है और भारत के ठंढे प्रदेशों में पाया जाता है। इसके पते लंबे, नुकीले और कुछ श्यामता लिए गहरे रंग के होते है। पतझड़ के पीछे नए पत्ते निकलने के पहले इसमें लाल रंग के फूल लगते हैं। फल गूलर की तरह गोल और पकने पर हरे और लाल रंग के होते हैं। जिनके ऊपर बहुत महीन सफेद रोईँयाँ होती हैं। ये फल खाने में बड़े मीठे होते हैं। इसके बीज कड़े छिलके के और बादाम की तरह के होते है। इसकी लकड़ी मजबूत और ललाई लिए होती है तथा उसमें से एक प्रकार की हलकी सुगंध भी निकलती है।

सतावना पु
क्रि० सं० [प्रा० संतावण, हिं० सताना] दे० 'सताना'।

सतावर
संज्ञा स्त्री० [सं० शतावरी] एक झाड़दार बैल जिसकी जड़ और बीज औषध के काम में आते हैं। शतमूली। नारायणी। विशेष—यह बेल भारत के प्रायः सभी प्रांतों में होती है। इसकी टहनियों पर छोटे छोटे महीन काँटे होते हैं। पत्तियाँ सोए की पत्तियों की सी होती हैं और उनमें एक प्रकार की क्षारयुक्त गंध होती है। फूल इसके सफेद होते हैं और गुच्छे में लगते हैं। फल जंगली बेर के समान होते हैं ओर पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं। प्रत्येक फल में एक या दो बीज होते हैं। इसकी जड़ बहुत पुष्टिकारक और वीर्यवर्धक मानी जाती है। स्त्रियों का दूध बढ़ने के लिये भी यह दी जाती है। वैद्यक में इसका गुण शीतल, मधुर, अग्निदीपक, बल कारक और वीर्यवर्द्धक माना गया है। ग्रहणी और अतिसार में भी इसका क्वाथ देते हैं।

सतासी (१)
वि० [सं० सप्तशीति, प्रा० सत्तासी] अस्सी और सात। जो गिनती में अस्सी से सात अधिक हो।

सतासी (२)
संज्ञा पुं० सात ऊपर अस्सी की संख्या या अंक जो इस प्रकार लिखा जाजा है,—८७।

सतासीवाँ
वि० [सं० सप्ताशितितम, हिं० सतासी + वाँ (प्रत्य०)] जिसका स्थान अस्सी से सात अधिक की संख्या पर हो। जो क्रम में सतासी पर पड़ता हो।

सति पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० सत्य, प्रा० सत्ति] दे० 'सत्य' या ' सत'।

सति (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उपहार। भेंट। दान। २. अंत। नाश [को०]।

सतिभाउ पु
संज्ञा पुं० [सं० सत्यभाव या सद्भाव] दे० 'सद्भाव'। उ०—(क) दानिसिरोमनि कृपानिधि नाथ कहौं सतिभाउ।— मानस, १।१४९। (ख) कहति परस्पर वचन जसोमति लखि नहि सकति कपट सतिभाऊ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४३४।

सतिवन
संज्ञा पुं० [सं० सप्तपर्ण, प्रा० सत्तवञ] एक सदावहार बड़ा पेड़ जिसको छाल आदि दवा के काम में आती है। सप्तपर्णों। छतिवन। विशेष—इसका पेड़ ४०-५० हाथ ऊँचा होता है और भारत के प्रायः सभी स्थानों में पाया जाता है। भारतवर्ष के बाहर आस्ट्रेलिया और अमेरिका के कुछ स्थानों में भी यह मिलता है। यह बहुत जल्दी बढ़ता है। पत्ते सेमर के पत्तों के समान और एक सींके में सात सात लगते हैं। इसकी लकड़ी मुलायम और सफेद होती और सजावट के सामान बनाने के काम आती। फूल हरापन लिए सफेद होता है। फूलों के झड़ जाने पर हाथ भर के लगभग लंबी पलती रोईदार फलियाँ लगती हैं। य़ह वसंत ऋतु में फूलता और वैशाख- जेठ में फलता हैं। फूलों में एक प्रकार की मदायन गंध होती है; इसी से कवियों ने कहीं कहीं इस गंध की उपमा गजमद से दी है। आयुर्वेंद के अनुसार इसकी छाल त्रिदोष- नाशक, अग्निदीपक, ज्वरघ्न और बलदायक होती है। ज्वर दूर करने में इसकी छाल का काढ़ा कुनैन के समान ही होता है। ज्वर के पीछे को कमजोरी भी इससे दूर होती है।

सती (१)
वि० स्त्री० [सं०] अपने पति को छोड़ और किसी पुरुष का ध्यान मन में न लानेवाली। साध्वी। पतिव्रता।

सती (२)
संज्ञा स्त्री० १. दक्ष प्रजापति की कन्या जो भव या शिव को व्याही गई थी। २. पतिव्रता स्त्री। ३. वह स्त्री जो अपने। पति के शव के साथ चिता में जले। सहगामिनी स्त्री। मुहा०—सती होना = (१) मरे हुए पति के शरीर के साथ चिता में जल मरना। सहगमन करना। (१) किसी के पीछे मर मिटना। ४. मादा। मादापशु। ५. गंधयुक्त मृत्तिका। सोंधी मिट्टी। ६. एक छंद जिसके प्रत्येक चरण में एक नगण और एक गुरु होता है। ७. विश्वामित्र की स्त्री का नाम। ८. अंगिरा की स्त्री का नाम। ९. सन्यासिनी (को०)। १०. दुर्गा या पार्वती का एक नाम (को०)।

सती पु (३)
संज्ञा पुं० [हिं० सत (= सत्य) + ई (प्रत्य०)] सत्यान्वेषी। सत्य का अनुगमन करनेवाला। उ०—

सतीक
संज्ञा पुं० [सं०] जल। पानी [को०]।

सतोचौरा
संज्ञा पुं० [सं० सती + हिं० चौरा] वह वेदी या छोटा चबूतरा जो किसी स्त्री के सती होने के स्थान पर उसके स्मारक में बनाया जाता है।

सतीत्व
संज्ञा पुं० [सं०] सती होने का भाव। पतिव्रत्य। मुहा०—सतीत्व बिगाड़ना या नष्ट करना = किसी स्त्री से बला- त्कार करना।

सतीत्वहरण
संज्ञा पुं० [सं०] परस्त्री के साथ बलात्कार। सतीत्व बिगाड़ना।

सतीदोषोन्माद
संज्ञा पुं० [सं०] स्त्रों का वह उन्माद रोग जिसका प्रकोप किसी सतीचौरे को अपवित्र आदि करने के कारण माना जाता है।

सतीन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रक्रा का मटर। २. अपराजिता। ३. बाँस (को०)। ४. जल पानी (को०)।

सतीन (२)
वि० यथार्थ। वास्तविक [को०]।

सतीनक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का मटर [को०]।

सतोपन
संज्ञा पुं० [सं० सती + हिं० पन (प्रत्य०)] सती रहने का भाव। पातिव्रत्य। सतीत्व।

सतीपुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] साध्वी स्ञी का पुत्र।

सती प्रथा
संज्ञा स्त्री० [सं० सती + प्रथा] पति के मरण के उपरांत पत्नी की उसके साथ सहगमन या जल जाना। विशेष—अंगरेजी शासन काल में सार्ड विलियम बेंटिक ने कानून बनाकर इस प्रथा को बंद कर दिया। इस प्रथा के विरुद्ध आंदोलन के मुख्य प्रेरक राजा राम मोहन राय कहे जाते है।

सतीर्थ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक ही आचार्य से पढ़नेवाला। सह- पाठी। ब्रह्मचारी। २. शिव का एक नाम (को०)।

सतीर्थ (२)
वि० तीर्थवाला। तीर्थयुक्त [को०]।

सतीर्थ्य
संज्ञा पुं० [सं०] सहपाठी। ब्रह्मचारी।

सतील
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाँस। वंश। तृणराज। २. अपराजिता। ३. वायु। ४. एक प्रकार का मटर (को०)।

सतीलक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का मटर [को०]।

सतीला
संज्ञा स्त्री० [सं०] अपराजिता। विष्णुक्रांता। कोयल लता।

सतीव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] पतिव्रत [को०]।

सतीव्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] पतिव्रता स्त्री [को०]।

सतुआ †
संज्ञा पुं० [सं० सक्तुक, सत्तुआ] भ्रष्ट यवादि चूर्ण। भुने हुए जौ और चने का चूर्ण जो पानी डालकर खाया जाता है। सत्तू।

सतुआन †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सतुआ] दे० सतुआ 'संक्रांति'।

सतुआ संक्रांति
संज्ञा स्त्री० [हिं० सतुआ + संक्रांति] मेष की संक्रांति जो प्रायः वैशाख में पड़ती है। इस दिन लोग जल से भरा घड़ा, पंखा और सत्तू दान करते और खाते हैं।

सतुआसोंठ
संज्ञा स्त्री० [हिं० सतुआ + सोंठ] सोंठ की एक जाति।

सतुष
वि० [सं०] जिसमें तुष अर्थात् छिलका हो। (अन्न) जो भूसी से युक्त हो [को०]।

सतून
संज्ञा पुं० [फा़०; मि० सं० स्थूण] स्तंभ। खंभा।

सतूना
संज्ञा पुं० [फ़ा० सतून(= खंभा)] बाज की एक झपट जिसमें वह पहले शिकार के ठीक ऊपर उड़ जाता है, और फिर एकबारगी नीचे की ओर उसपर टूट पड़ता है। उ०—काग आपनी चतुरई तब तक लेहु चलाइ। जब लगी सिर पर देइ नहीं लगर सतूना आइ।—रसनिधि (शब्द०)।

सतृट्
वि० [सं० सतृष्] दे० 'सतृष'।

सतृष
वि० [सं०] १. तृष्णा से युक्त। प्यासवाला। प्यासा। २. चाहनेवाला। इच्छुक।

सतृष्ण
वि० [सं०] दे० 'सतृष'।

सतेज
वि० [सं० सतेजस्]दे० 'सतेजा'।

सतेजा
वि० [सं० सतेजस्] तेजयुक्त, जिसमें तेज हो। दीप्तिमान्। प्रभायुक्त [को०]।

सतेर
संज्ञा पुं० [सं०] भूसी। भुस। तुष।

सतेरक
संज्ञा पुं० [सं०] ऋतु। मौसिम।

सतेरो
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मधुमक्खी।

सतेस
संज्ञा स्त्री० [सं० स + तरस् (= वेग)] शीघ्रता। फुर्ती। तेजी।

सतोखना पु †
क्रि० स० [सं० सन्तोषण] १. संतुष्ट करना। प्रसन्न करना। २. संतोष दिलाना। सगझाना। ढारस देना।

सतोगुण
संज्ञा पुं० [अं० सत्वगुण] दे० 'सत्वगुण'।

सतोगुणी
संज्ञा पुं० [हिं० सतोगुण + ई (प्रत्य०)] सत्वगुणवाला। उत्तम प्रकृति का। सात्विक।

सतोद
वि० [सं०] करकने या शल्य की तरह चुभनेवाली वेदना से युक्त [को०]।

सतोदर
संज्ञा पुं० [सं० शतोदर] दे० 'शतोदर'।

सतौला †
संज्ञा पुं० [हिं० सात + औला (प्रत्य०)] प्रसूता स्त्री का वह विधिपूर्वक स्नान जो प्रसव के सातवें दिन होता है।

सतौसर
संज्ञा पुं० [सं० सप्तसृक्] सात लड़ी का हार। सतलड़ा हार।

सत्कथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] उत्तम कथा या मनोरंजक वार्ता। अच्छी बात चीत [को०]।

सत्कदंब
संज्ञा पुं० [सं० सत्कदम्ब] एक प्रकार का कदंब।

सत्करण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० सत्करणीय; सत्कृत] १. सत्कार करना। आदर करना। २. मृतक की अंतिम क्रिया करना। क्रिया कर्म करना।

सत्करणीय
वि० [सं०] सत्कार करने योग्य। आदरणीय। पूज्य।

सत्कर्तव्य
वि० [सं०] १. सत्कार के योग्य। २. जिसका सत्कार करना हो।

सत्कर्त्ता (१)
वि०, संज्ञा पुं० [सं० सत्कर्त्तृ] [स्त्री० सत्कर्ती] १. अच्छा काम करनेवाला। सत्कर्म करनेवाला। २. हित करनेवाला। ३. आदर सत्कार करनेवाला।

सत्कर्त्ता (२)
संज्ञा पुं० विष्णु का एक नाम [को०]।

सत्कर्म
संज्ञा पुं० [सं० सत्कर्मन्] [वि० सत्कर्मा] १. अच्छा कर्म। अच्छा काम। २. धर्म या उपकार का काम। पुण्य। ३. अच्छा संस्कार। ४. सत्कार। ५. अभिवादन (को०)। ६. शुद्धि। प्राय- श्चित। संस्कार (को०)। ६. अंत्येष्टि कर्म (को०)।

सत्कला
संज्ञा पुं० [सं०] उत्कृष्ट या ललित कला [को०]।

सत्कवि
संज्ञा पुं० [सं०] सुकवि। श्रेष्ठ या उत्कृष्ट कोटि का कवि [को०]।

सत्कांचनार
संज्ञा पुं० [सं० सत्काञ्वनार] रक्त कांचन वृक्ष। लाल कचनार [को०]।

सत्कांड
संज्ञा पुं० [सं० सत्काण्ड] १. चील। २. बाज। श्येन [को०]।

सत्काय द्दष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] बौद्ध मतानुसार मृत्यु के उपरांत आत्मा, लिंग, शरीर आदि के बने रहने का मिथ्या सिद्धांत।

सत्कार
संज्ञा पुं० [सं०] १. आए हुए के प्रति अच्छा व्यवहार। आदर। संमान। खातिरदारी। २. अतिथ्य। मेहमानदारी। ३. पर्व। उत्सव। ४. देखभाल। ख्याल (को०)। ५. दावत। भोज (को०)।

सत्कार्य (१)
वि० [सं०] १. सत्कार करने योन्य। २. जिसका सत्कार करना हो। ३. जिस (मृतक) का क्रिया कर्म करना हो।

सकार्य (२)
संज्ञा पुं० १. उत्तम कार्य। अच्छा काम। २. कारण में कार्य की स्थिति या सत्ता का होना [को०]।

सत्कार्यवाद
संज्ञा पुं० [सं०] साख्य का यह दार्शनिक सिद्धांत कि बिना कारण के कार्य को उत्पत्ति नहीं हो सकती, अर्थात् इस जगत को उत्पत्ति शून्य से नही हो सकती, किसी मूल सता से है। किसी कारण में कार्य की सत्ता का सिद्धांत। यह सिद्धांत बौद्धों के शून्यवाद का विरोधी है।

सत्किष्कु
संज्ञा पुं० [सं०] लंबाई की एक प्राचीन नाप जो सवा गज के लगभग होती थी।

सत्कीर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] उत्तम कीर्ति। यश। नेकनामी।

सत्कुल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तम कुल। अच्छा या बड़ा खानदान।

सत्कुल (२)
वि० अच्छे कुल का। खानदानी।

सत्कुलीन
वि० [सं०] सत्कुल में उत्पन्न। जो अच्छे कुल का हो। खानदानी [को०]।

सत्कृत
वि० [सं०] १. अच्छी तरह किया हुआ। २. जिसका आदर सत्कार किया गया हो। आदृत। ३. अलंकृत। सजाया हुआ। बनाया हुआ।

सत्कृत (२)
संज्ञा पुं० १. सत्कार। संमान। आदर। २. सत्कर्म। अच्छा काम। पुण्य। ३. शिव (को०)। ४. आतिथ्य (को०)।

सत्कृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आदर सत्कार। २. सद्गुण। सदाचार। ३. पुण्य। अच्छा कर्म [को०]।

सत्क्रिय
वि० [सं०] सत् कार्य करनेवाला [को०]।

सत्क्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सत्कर्म। पुण्य। धर्म का काम। २. सत्कार। आदर। अच्छा व्यवहार। खातिदरारी। ३. आयो- जन। तैयारी। सजावट। ४. शिष्टाचार। आभिवादन (को०)। ५. शुद्धि संस्कार (को०)। ६. मृतक संस्कार। अंत्येष्टि क्रिया (को०)।

सत्त (१)
संज्ञा पुं० [सं० सत्व, प्रा० सत्त] १. किसी पदार्थ का सार भाग। असली जुज। रस। जैसे,—गेहूँ का सत्त, मुलेठी का सत्त। २. तत्व। काम की वस्तु। जैसे,—अब तो उसमें कुछ भी सत्त बाकी नहीं रह गया।

सत्त ‡ (२)
संज्ञा पुं० [सं० सत्य, प्रा० सत्त] १. सत्य। सच बात। २. सतीत्व। पतिव्रत्य।

सत्तम
वि० [सं०] १. अत्यंत सुंदर। सर्वोत्तम। २. सर्वश्रेष्ठ। सर्वजन- पूज्य [को०]।

सत्तर (१)
वि० [सं० सप्तति, प्रा० सतरि] साठ और दस। जो गिनती में साठ से दस अधिक हो।

सत्तर (२)
संज्ञा पुं० साठ से दस अधिक की संख्या या अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है—७०।

सत्तरवाँ †
वि० [हिं० सत्तर + वाँ (प्रत्य०)] [स्त्री० सत्तरवीँ] जो क्रम में सत्तर के स्थान पर हो।

सत्तरह (१)
वि० [सं० सप्तदश, प्रा० सत्तरह] दस और सात। जो गिनती में दस से सात अधिक हो।

सत्तरह (२)
संज्ञा पुं० १. दस से सात की अधिक संख्या या अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है-१७। २. पाँसे के खेल में एक दाँव जिसमें दो छक्के और एक पंजा तीनों एक साथ पड़ते हैं।

सत्तरहवाँ
वि० [हिं० सत्तरह + वाँ (प्रत्य०)] [स्त्री० सत्तरहवीं] जो क्रम में सत्तरह के स्थान पर पड़े।

सत्तलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] आस्तरण। दरी। बिछौना। कालीन। गलीचा [को०]।

सत्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. होने का भाव। अस्तित्व। हस्ती। होना भाव। २. शक्ति, दम। ३. वास्तविकता। यथार्थता (को०)। ४. जाति का एक भेद (को०)। ५. उत्तमता। श्रेष्ठता (को०)। ६. अधिकार। प्रभुत्व। हुकूमत। (मराठी से गृहीत)। मुहा०—सत्ता चलाना = अधिकार जताना। हुकूमत करना। उ०—जो लोग असभ्य है, जंगली है उनपर सत्ता चलाने (हुकूमत करने) में अनिबंध शासन अच्छा होता है।—महावीर—प्रसाद द्विवेदी (शब्द०)।

सत्ता (२)
संज्ञा पुं० [सं० सप्तक, या हिं० सात] ताश या गंजीफे का वह पत्ता जिसमें सात बूटियाँ हो।

सत्ताइस, सत्ताईस (१)
वि० [सं० सप्तविंशति, प्रा० सत्ताईसा] सात और बीस। जो गिनती में बीस से सात अधिक हो।

सत्ताइस, सत्ताईस (२)
संज्ञा पुं० बीस से सात अधिक की संख्या या अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है,—२७।

सत्ताइसवाँ
वि० [हिं० सताइस + वाँ (प्रत्य०)] जो क्रम में सत्ताइस के स्थान पर पड़ता हो।

सत्ताधारी
संज्ञा पुं० [सं० सत्ताधारिन्] अधिकारी। अफसर हाकिम।

सत्तानबे (१)
वि० [सं० सप्तनवति, प्रा० सत्तानवइ] नब्बे और सात। जो गिनती में सौ से तीन कम हो।

सत्तानबे (२)
संज्ञा पुं० सौ से तीन कम की संख्या या अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है,—९७।

सततानबेवाँ
वि० [हि० सत्तनबे + वाँ (प्रत्य०) ] जो क्रम में सत्तानबे के स्थान पर पड़ता हो।

सत्तार
संज्ञा पुं० [अ०] १. परदा डालनेवाला। दोष ढाँकनेवाला। २. ईश्वर [को०]।

सत्तावन (१)
वि० [सं० सप्तपञ्वाशत, प्रा० सत्तावन्ना] पाचस और सात। जो गिनती में तीन कम साठ हो।

सत्तावन (२)
संज्ञा पुं० तीन कम साठ की संख्या या अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है,—५७।

सत्तावनवाँ
वि० [हिं० सत्तावन + वाँ (प्रत्य०)] जो क्रम में सत्तावन के स्थान पर पड़ा हो।

सत्ताशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] पाश्चात्य दर्शन की वह शाखा जिसमें मूल या पारमार्थक सत्ता का विवेचन हो।

सत्तासामान्यत्व
संज्ञा पुं० [सं०] अनेक रूपों के भीतर एक सामान्य द्रव्य का अस्तित्व। जैसे,—कुंडल, कंकण आदि अनेक गहनों में, 'सोना' नामक द्रव्य सामान्य रूप से पाया जाता है। विशेष—इस तथ्य का उपयोग वेदांतो या दार्शनिक अनेक नाम- रूपात्मक जगत् की तह में किसी एक अनिर्वचनीय और अव्यक्त सत्ता का प्रतिपादन करने में करते हैं।

सत्तासी (१)
वि० [सं० सप्ताशीति, प्रा० सत्तासी] अस्सी और सात। जो तीन कम नब्बे हो।

सत्तासी (२)
संज्ञा पुं० तीन कम नब्बे की संख्या या अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है,—८७।

सत्तासीवाँ
वि० [हिं० सत्तासी + वाँ (प्रत्य०)] जो क्रम में तीन कम नब्बे के स्थान पर हो।

सत्ति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति] शक्ति। सामर्थ्य।

सत्ति (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बैठने की क्रिया। उपवेशन। २. प्रारंभ। शुरुआत [को०]।

सत्तू
संज्ञा पुं० [सं० सक्तुक, प्रा० सत्तुअ] भुने हुए जौ और चने या और किसी अन्न का चूर्ण या आटा जो पानी में घोलकर खाया जाता है। मुहा०—सत्तू बाँधकर पीछे पड़ना = (१) तैयारी के साथ किसी को तंग करने में लगना। सब काम धंधा छोड़कर किसी के विरुद्ध प्रयत्न करना। (२) पूर्ण तैयारी के साथ किसी काम में लगना । सब काम धंधा छोड़कर प्रवृत्त होना।

सत्पति
संज्ञा पुं० [सं०] १. भले लोगों या वीरों का स्वामी। २. इंद्र। देवराज। शक्र [को०]।

सत्पत्न
संज्ञा पुं० [सं०] कमल का नवीन पत्ता [को०]।

सत्पथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्तम मार्ग। २. सदाचार। अच्छी चाल। ३. उत्तम संप्रदाय या सिद्धांत। अच्छा पंथ।

सत्पथीन
वि० [सं०] सत्पथ या सुमार्ग पर चलने वाला [को०]।

सत्परिग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] सत् या योग्य व्यक्ति से दान ग्रहण करना [को०]।

सत्पशु
संज्ञा पुं० [सं०] देवताओं के बलि योग्य अच्छा पशु। वह पशु जो देव बलि देने के याग्य हो।

सत्पात्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. दान आदि देने के योग्य उत्तम व्यक्ति। २. श्रेष्ठ और सदाचारी व्यक्ति। योग्य मनुष्य। ३. कन्या देने के योग्य उत्तम पुरुष। अच्छा वर।

सत्पात्नवर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] योग्य व्यक्ति के प्रति उदारता का व्यव- हार [को०]।

सत्पाञवर्षी
वि० [सं० सत्पात्नवर्षिन्] पाञता का विचार करके दान आदि देनेवाला [को०]।

सत्पुञ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. योग्य पुत्र। २. वह पुत्र जो पितरों का विधिपूर्वक तर्पण आदि करे [को०]।

सत्पुत्र (२)
वि० [सं०] पुत्रवाला [को०]।

सत्पुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] भला आदमी। सदाचारी पुरुष।

सत्पुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छा पुष्प। उत्तम पुष्प। २. पूर्ण विकसित फूल [को०]।

सत्प्रतिग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] योग्य पात्र से दान ग्रहण करना [को०]।

सत्प्रतिपक्ष (१)
वि० [सं०] जिसका उचित खंड़न हो सके। जिसके विपक्ष में बहुत कुछ कहा जा सके।

सत्प्रतिपक्ष (२)
संज्ञा पुं० [सं०] हेत्वाभास के पाँच प्रकारों में से एक (यत्र साध्याभावसाधक हेत्वन्तरं स प्रतिपक्षः) वह हेतु जिसके विपक्ष में अन्य समकक्ष हेतु हो। जैसे शब्द नित्य है क्योंकि वह श्रव्य है, शब्द अनित्य है क्योंकि वह उत्पन्न है। यहाँ शब्द की नित्यता के हेतु 'श्रव्य' के समकक्ष उसकी अनित्यता का हेतु 'उत्पत्ति' है।

सत्प्रमुदिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सांख्य दर्शन के अनुसार आठ सिद्धियों में से एक सिद्धि [को०]।

सत्फल
संज्ञा पुं० [सं०] दाड़िम। अनार।

सत्यंकार
संज्ञा पुं० [सं० सत्यङ्कार] १. वचन को सत्य करना। २. वादा पूरा करना। २. वादा पूरा करने की जमानत के तौर पर कुछ पेशगी देना।

सत्यंभरा
संज्ञा स्त्री० [सं० सत्यम्भरा] एक नदी का नाम [को०]।

सत्य (१)
वि० [सं०] १. जो बात जैसी है, उसके संबंध में वैसा ही (कथन)। यथार्थ। ठीक। वास्तविक। सही। यथातथ्य। जैसे,— सत्य बात, सत्य वचन। २. असल। ३. ईमानदार। निष्कपट। विश्वस्त (को०)। ४. सद्गुणी। सच्चरित्र। ५. जो झूठा न हो। सच्चा (को०)।

सत्य (२)
क्रि० वि० सचमुच। ठीक ठीक।

सत्य (३)
संज्ञा पुं० १. वास्तविक बात। ठीक बात। यथार्थ तत्व। जैसे, —सत्य को कोई छिपा नहीं सकता। विशेष—बौद्ध धर्म में चार आर्य सत्य कहे गए हैं—दुःख सत्य (संसार दुःख रूप है यह सत्य बात), दुःख समुदय (दुःख के कारण), दुःखनिरोध (दुःख रोका जाता है) और मार्ग (निर्वाण का मार्ग)। बौद्ध दार्शनिक दो प्रकार का सत्य मानते हैं—संवृत्ति सत्य (जो बहुमत से माना गया हो) और परमार्थ सत्य (जो स्वतःसत्य हो)। २. उचित पक्ष। न्याय पक्ष। धर्म की बात। ईमान की बात। जैसे,—हम सत्य पर दृढ़ रहेंगे। ३. पारमार्थिक सत्ता। वह वस्तु जो सदा ज्यों की त्यों रहे, जिसमें किसी प्रकार का विकार या परिवर्तन न हो (वेदांत)। जैसे,—ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है। ४. ऊपर के सात लोकों में से सबसे ऊपर का लोक जहाँ ब्रह्मा अवस्थान करते हैं। ५. नवें कल्प का नाम। ६. अश्वत्थ वृक्ष। पीपल का पेड़। ७. विष्णु का एक नाम। ८. रामचंद्र का एक नाम। ९. नांदीमुख श्राद्ध के अधिष्ठाता देवता। १०. विश्वेदेवा में से एक। ११. शपथ। कसम। १२. प्रतिज्ञा। कौल। १३. चार युगों में से पहला युग। कृतयुग। १४. एक दिव्यास्त्र। १५. ईमानदारी। निष्कपटता (को०)। १६. भद्रता। सद्गुण। शुचिता (को०)। १७. जल। पानी (को०)। १८. विशुद्धता। खरापन (को०)। १९. एक ऋषि। २०. सात व्याह्मतियों में से एक (को०)। २१. ब्रह्म (को०)। २२. मोक्ष (को०)। यौ०—सत्यकृत्=उचित कार्य को करनेवाला। सत्यग्रंथी=जिसकी ग्रंथि सत्य हो। सच्ची और ठीक गाँठ बांधनेवाला। सत्यध्न= सत्य की हत्या करनेवाला। शपथ या प्रतिज्ञा भंग करनेवाला। सत्यनिष्ठ=सचाई पर दृढ़ रहनेवाला। सत्यमेव=अत्निमुनि के एक पुत्र का नाम। सत्यपाल=एक ऋषि। सत्यपूत=सत्य द्वारा शुद्ध। सत्यप्रतिश्रुत=बात का धनी। सत्यप्रितष्ठान=जिसकी नींव सत्य पर आद्दृत हो। सत्यबंध=जो सत्य से बँधा हुआ हो। सत्यवादी। सत्यभारत=महाभारतकार व्यासदेव का एक नाम। सत्यभेदी=बादा तोड़नेवाला। सत्ययौवन। सत्यरत=(१) सत्यबादी। (२) व्यास। सत्यरथ=विदर्भ के एक राजा। सत्यरुप=(१) वास्तविक स्वरुप वाला। (२) विश्वास योग्य। सत्यवाहन=जो सत्य का वहन करनेवाला हो। सत्यविक्रम= सच्चा वीर। सत्यवृत्त=अच्छे आचरणवाला। सत्यवृति=सदा- चार। सत्यशपथ=(१) जिसकी प्रतिज्ञा पूरी होकर रहे। (२) जिसका शाप झुठा न हो। सत्यसंरक्षण=सत्य की रक्षा करना। वचन का पालन। सत्यसार=जो पूर्णतः सत्य ही। सत्यस्वप्न=जिसका सपना सच्चा हो।

सत्यक
वि० [सं०] दे० 'सत्य'।

सत्यक
संज्ञा पुं० [सं०] १. अनुबंध या सौदे का पुष्टिकरण। २. कृष्ण का एक पुत्र जिसकी माता का नाम भद्रा था। यह केकयराज की कन्या थी। ३. मनु रैवतक का एक पुत्र [को०]।

सत्यकाम
वि० [सं०] सत्य का प्रेमी।

सत्यकीर्ति
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक अस्त्र जो मंत्रबल से चलाया जाता था। २. संधान के पूर्व अस्त्र को अभिमंत्रित करने का एक संत्र [को०]।

सत्यकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक बुद्ध का नाम। २. केकय देश के एक राजा का नाम। ३. अक्रूर के पुत्र का नाम।

सत्यक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] वादा। प्रतिज्ञा। शपथ। (बौद्ध)।

सत्यजित्
संज्ञा पुं० [सं०] १. वासुदेव का एक भतीजा। २. एक दानव। ३. एक यक्ष। ४. तीसरे मन्वंतर के इंद्र का नाम।

सत्यज्ञ
वि० [सं०] जिसे सत्य की जानकारी हो।

सत्यतपा
संज्ञा पुं० [सं० सत्यतपस्] बारहपुराण में वर्णित एक ऋषि का नाम जो पहले व्याध थे।

सत्यतः
अव्य० [सं० सत्यतस्] ठीक ठीक। वास्तव में। सचमुच।

सत्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सत्य होने का भाव। वास्तविकता। सचाई। २. नित्यता।

सत्यदर्शि (१)
वि० [सं० सत्यदर्शिन्] सत्य का पारखी। सत्य को पहचान लेनेवाला। सत्य और असत्य का विवेक करनेवाला [को०]।

सत्यदर्शी (२)
संज्ञा पुं० तेरहवें मन्वंतर के एक ऋषि का नाम [को०]।

सत्यद्दक्
वि० [सं० सत्यदृश्] दे० 'सत्यदर्शी'।

सत्यधन
वि० [सं०] जिसका सर्वस्व सत्य हो। जिसे सत्य सबसे प्रिय हो।

सत्यधर्म
संज्ञा पुं० [सं०] १. तेरहवें मनु के एक पुत्र का नाम। २. सत्य रुपी धर्म। शाश्वत सत्य। धर्म [को०]। यौ०—सत्यधर्म पथ=सत्यरुपी धर्म का मार्ग। शाश्वत सत्य का मार्ग। सत्यधर्म परायण=सत्यरुपी धर्म को माननेवाला। सत्य को माननेवाला, सत्य का पालन करनेवाला।

सत्यधृति
वि० [सं०] अत्यंत सत्यवादी। पूर्णतः सत्यवक्ता [को०]।

सत्यनारायण
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु भगवान् का एक नाम जिसके संबंध में एक कथा रची गई है। इस कथा का प्रचार आजकल बहुत है। विशेष— ऐसा पता लगता है कि अकबर के समय बंग देश में अकबर के नए मत 'दीन इलाही' के प्रचार के लिये पहले पहले यह कथा किसी पंडित से लिखाई गई थी और उसका रुप कुछ दूसरा ही था। जेसे, नारद और विष्णु का संवाद उसमें न था, और 'दंडी' के स्थान पर शाह या पीर नाम था। पीछे पंडितों ने उस कथा में आवश्यक परिवर्तन करके पौराणिक हिंदूधर्म के अनुकूल कर लिया और वह उसी परिवर्तित रुप में प्रचलीत हुई। बंग भाषा में भी सत्यपीर की कथा के नाम से यह कथा पाई गई है।

सत्यपर,सत्यपरायण
वि० [सं०] सत्य में प्रवृत्त। ईमानदार।

सत्यपारमिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] बौद्ध धर्मानुसार सत्य की प्राप्ति अथवा सिद्धि (को०)।

सत्यपुर
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णुलोक। २. सत्यरुपी नारायण का लोक [को०]।

सत्यपुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] ईश्वर। परमात्मा।

सत्यपूत
वि० [सं०] सत्य द्वारा परिष्कृत या पवित्र [को०]।

सत्यप्रतिज्ञ
वि० [सं०] प्रतिज्ञा को सत्य करनेवाला। वचन का सच्चा।

सत्यफल
संज्ञा पुं० [सं०] बिल्व। श्रीफल। बेल।

सत्यभामा
संज्ञा स्त्री० [सं०] श्रीकृष्ण की आठ पटरानियों में से एक जो सत्राजित की कन्या थी। इन्हीं के लिये कृष्ण पारिजात लाने गए थे और ईंद्र से लड़े थे।

सत्यमान
संज्ञा पुं० [सं०] ठीक नापजोख या नापतौल [को०]।

सत्यमूल
वि० [सं०] जिसका मूल सत्य हो। सत्य पर आद्धृत। उ०— सत्यमूल सब सुंकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मुनि गाए। मानस, २।२८।

सत्यमेधा
संज्ञा पुं० [सं० सत्यमेधस्] विष्णु [को०]।

सत्ययुग
संज्ञा पुं० [सं०] पौराणिक काल गणना के अनुसार चार युगों में से पहला युग। कृतयुग। विशेष—यह युग सबसे उत्तम माना जाता है। इस युग में पुण्य और सत्यता की अधिकता रहती है। यह १७,२८,००,० वर्ष का कहा गया है। इसका आरंभ वैशाख शुक्ल तृतीया रविवार से माना गया है।

सत्ययुगाद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैशाख शुक्ल तृतीया जिस दिन से सत्ययुग का आरंभ माना गया है।

सत्ययुगी
वि० [सं० सत्ययुग + हि० ई (प्रत्य०)] १. सत्ययुग का। सत्ययुग संबंधी। २. बहुत प्राचीन। ३. बहुत सीधा और सज्जन। सच्चरित्र। धर्मात्मा। कलियुगी का उलटा।

सत्ययौवन
संज्ञा पुं० [सं०] एक देव योनि। विद्याधर [को०]।

सत्यरथा
संज्ञा पुं० [सं०] त्रिशंकु की पत्नी का नाम [को०]।

सत्यलोक
संज्ञा पुं० [सं०] ऊपर के सात लोकों में से सबसे ऊपर का लोक जहाँ ब्रह्मा रहते हैं। उ०—सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान। — मानस, १।१३८।

सत्यवक्ता
वि० [सं० सत्यवक्तृ] सत्य बोलनेवाला। सत्यवादी।

सत्यवचन
संज्ञा पुं० [सं०] सच कहना। यथार्थ कथन। २. प्रतिज्ञा। कौल। बादा।

सत्यवचा (१)
संज्ञा पुं० [सं० सत्यवचस्] १. ऋषि। संत। २. भविष्य- द्रष्टा सिद्ध पुरुष।३. सचाई (को०)।

सत्यवचा (२)
वि० सच बोलनेवाला [को०]।

सत्यवती (१)
वि० स्त्री० [सं०] सच बोलनेवाली। २. सत्य या धर्म का पालन करनेवाली।

सत्यवती (२)
संज्ञा स्त्री० १. मत्स्यगंधा नामक धीवरकन्या जिसके गर्भ मे कुमारी अवस्था में ही पराशर के संयोग से कृष्ण द्वैपायन या व्यास की उत्पत्ति हुई थी। २. शमी वृक्ष। ३. गाधि की पुत्री और ऋचीक की पत्नी जिसके कौशिकी नदी हो जाने की कथा प्रसिद्ध है। ४. नारद की पत्नी का नाम (को०)।

सत्यवती सुत
संज्ञा पुं० [सं०] सत्यवती के पुत्र वेदव्यास।

सत्यवदन
संज्ञा पुं० [सं०] सच बोलना [को०]।

सत्यवद्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसकी बात या प्रतिज्ञा आदि सच्ची हो। २. सच्ची बात सचाई (को०)।

सत्यवसु
संज्ञा पुं० [सं०] विश्वेदेवा में से एक।

सत्यवाक्य
संज्ञा पुं० [सं०] सत्यवादिता। सत्य बोलना [को०]।

सत्यवाच्
संज्ञा पुं० [सं०] १. सत्य वचन। २. वादा। करार। प्रतिज्ञा। ३. एक प्रकार का मंत्रास्त्र। ४. काक। कौआ। ५. कश्यप मुनि का एक पुत्र (को०)। ६. सावर्णि मनु का एक पुत्र (को०)। ७. वह जो सत्य बोलता हो।

सत्यवाचक
वि० [सं०] सत्यवक्ता। सत्यवादी।

सत्यवाद
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० सत्यवादी] १. सत्य बोलना। सच कहना। २. धर्म पर दृढ़ रहना। ईमान पर रहना।

सत्यवादिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दाक्षायिणी का एक नाम। २. बोधि द्रुम की एक देवी। ३. वह स्त्री जो सत्य बोलती हो। सच बोलनेवालो स्त्री।

सत्यवादी
वि० [सं० सत्यवादिन्] [वि० स्त्री० सत्यवादिनी] १. सत्य कहनेवाला। सच बोलनेवाला। २. प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहनेवाला। वचन को पूरा करनेवाला। ३. धर्म पर दृढ़ रहनेवाला। धर्म कभी न छोड़नेवाला। जैसे, — राजा हरिश्चंद्र बड़े सत्यवादी थे। ४. निष्कपट [को०]।

सत्यवान् (१)
वि० [सं० सत्यवत] [वि० स्त्री० सत्यवती] १. सच बोलनेवाला। २. प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहनेवाला।

सत्यवान् (२)
संज्ञा पुं० शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र का नाम जिसकी पत्नी सावित्री के पातिव्रत्य के अलौकिक प्रभाव की कथा पुराणों में प्रसिद्ध है। विशेष— इनके पिता अंधे हो गए थे और गद्दी से उतार दिए गए थे। वे उदास होकर पुत्र और पत्नी सहित वन में रहते थे। मद्र देश के राजा घूमते उस वन में आए और उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह सत्यवान् के साथ कर दिया। पर सत्यवान् अल्पायु थे, इससे वे शीघ्र मर गए। सावित्री ने पतिव्रत्य के बल से अपने पति को जिला दिया। २.चाक्षुष मनु का एक पुत्र। ३. अस्त्र संचालन में प्रयुक्त एक मंत्र। अस्त्र मंत्र (को०)।

सत्यव्यवस्था
संज्ञा स्त्री० [सं०] सत्य की व्यवस्था, निरुपण या निश्चय [को०]।

सत्यव्रत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सत्य बोलने की प्रतिज्ञा या नियम। २. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम। ३. त्रेतायुग में सूर्यवंश के पचीसवें राजा जो त्रय्यारुण के पुत्र थे। आगे चलकर इन्हीं का नाम त्रिशंकु पड़ा (को०)। ४. महादेव (को०)।

सत्यव्रत (२)
वि० १. जिसने सत्य बोलने की प्रतिज्ञा की हो। सत्य का नियम पालन करनेवाला। २. ईमानदार। सच्चा (को०)।

सत्यशील
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सत्यशीला] सत्य का पालन करनेवाला। सच्चा।

सत्यश्रवसी
संज्ञा स्त्री० [सं०] उषा का एक रुप [को०]।

सत्यश्रावण
संज्ञा पुं० [सं०] शपथ ग्रहण [को०]।

सत्यसंकल्प
वि० [सं० सत्यसङ्कल्प] जो विचारे हुए कार्य को पूरा करे। दृढ़संकल्प। उ०— राम सत्यसंकल्प प्रभु सभा काल बस तोरि। — मानस, ६।४१।

सत्यसंकाश
वि० [सं० सत्यसङ्काश] सत्य जैसा। सत्य के समान। सत्यवता [को०]।

संत्यसंगर (१)
वि० [सं० सत्सङ्गर] दे० 'सत्यव्रत' या 'सत्य- संकल्प'[को०]।

सत्यसंगर (२)
संज्ञा पुं० कुबेर का एक नाम [को०]।

सत्यसंध (२)
वि० [सं० सत्यसन्ध]। [स्त्री० सत्यसंधा] सत्यप्रतिज्ञ। वचन को पूरा करनेवाला। उ०— सत्यसंध दृढ़व्रत रघुराई।— तुलसी [शब्द०]।

सत्यसंध (२)
संज्ञा पुं० १. रामचंद्र का एक नाम। २. भरत का एक नाम। ३. जनमेजय का एक नाम। ४. स्कंद का एक अनुचर। ५. धृतराष्ट्र का एक पुत्र।

सत्यसंध पु (३)
वि० [सं० सत्य + सन्धान] जिसका निशाना अचूक हो। जिसका लक्ष्य न चूके। उ०— सत्यसंध प्रभु बध करि येही। आनहु चर्म कहति बैदेही। — मानस, ३।२१।

सत्यसंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० सत्यसन्धा] द्रौपदी का एक नाम।

सत्यसंभव
संज्ञा पुं० [सं० सत्यसम्भव] वचन। वादा। प्रतिज्ञा [को०]।

सत्यसंहित
वि० [सं०] वचन का पक्का। जिसका कथन सत्य हो [को०]।

सत्यसाक्षी
संज्ञा पुं० [सं० सत्यसाक्षिन्] प्रत्यक्षदर्शी या विश्वस्त गवाह [को०]।

सत्यांग
वि० [सं० सत्याङ्ग] जिसके सभी अंग सत्य के बने हों [को०]।

सत्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सच्चाई। सत्यता। २. दुर्गा का एक नाम। ३. सीता का एक नाम। ४. व्यास की माता सत्यवती। ५. द्रौपदी का एक नाम (को०)। ६. कृष्ण की पत्नी सत्यभामा (को०)। ७. विष्णु की माता (को०)।

सत्याकृती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पेशगी रकम। अग्रिम धन। २. (इकरारनामा या मसौदे में) दर निर्धारण [को०]।

सत्याग्नि
संज्ञा पुं० [सं०] अगस्त्य मुनि।

सत्याग्रह
संज्ञा पुं० [सं० सत्य + आग्रह] [वि० सत्याग्रही] सत्य के लिये आग्रह या हठ। सत्य या न्याय पक्ष पर प्रतिज्ञापूर्वक अड़ना और उसकी सिद्धि के उद्योग में मार्ग में आनेवाली कठिनीईयों और कष्टों को धीरतापूर्वक सहना और किसी प्रकार का उपद्रव या बल प्रयोग न करना। क्रि० प्र०— करना।— होना।

सत्याग्रही
वि० [सं० सत्याग्रहिन्] सत्य या न्याय के लिये आग्रह करनेवाला। सत्याग्रह का सहारा लेनेवाला।

सत्यात्मक
वि० [सं०] वह जिसका तत्व सत्य हो।

सत्यात्मज
संज्ञा पुं० [सं०] १. सत्या या सत्यभामा का पुत्र। २. सत्य का पुत्र [को०]।

सत्यात्मा
वि० [सं० सत्यात्मन्] १. सत्यपरायण। सत्याचरण करनेवाला। २. सत्यवादी [को०]।

सत्यानंद
संज्ञा पुं० [सं० सत्यानन्द] वास्तविक आनंद [को०]।

सत्यानास
संज्ञा पुं० [सं० सत्ता + नाश] सर्वनाश। मटियामेट। ध्वंस। बरबादी।

सत्यानासी (१)
वि० [हि० सत्यनास + ई (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० सत्या- नाशिन] १. सत्याकनाश करनेवाला। चौपट करनेवाला। २. अभागा। बदकिस्मत।

सत्यानासी (२)
संज्ञा स्त्री० एक कँदीला पौधा जो प्रायः खंडहरों और उजाड़ स्थानों पर जमता है। घमोई। भड़भांड़। स्वर्णक्षीरी। पीतपुष्पा।विशेष— इसके बीच में गोभी के पौधे की तरह एक कांड उपर की गया होता है और चारों और नीलापन लिए हरे कटावदार पत्ते निकलते हैं जिनपर चारो ओर विषैले कांटे होते हैं। इस पौधे को काटने या दबाने से एक प्रकार का पीला दूध या रस निकलता है। इसका फूल पीला, कटोरे के आकार का और देखने में सुंदर पर गंधहीन होता है। फूल झड़ जाने पर गुच्छों में फल या बीजकोश लगते हैं जिनमें राई के से काले काले बीज भरे रहते हैं। इन बीजों से एक प्रकार का बहुत तीक्ष्ण तेल निकलता है जो खुजली पर लगाया जाता है। वैद्यक में सत्यानासी कड़वी, दस्तावर, शीतल तथा कृमि रोग, खुजली और विष को दूर करनेवाली मानी गई है।

सत्यानुरक्त
वि० [सं०] सत्य का प्रेमी। सचाई का भक्त [को०]।

सत्यानृत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सच और झुठ का मेल। सच और झूठ। २. वाणिज्य। व्यापार। दूकानदारी। ३. वह जो देखने में सत्य हो किंतु वास्तव में झूठ हो।

सत्यापन
संज्ञा पुं० [सं०] १. असलियत की जाँच। सत्य होने का निश्चय। २. सत्य का पालन अथवा सत्य कथन (को०)। ३. सौदे के दर का निर्धारण या निश्चयन (को०)।

सत्यापना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी सौदे या इकरार का पूरा होना। २. दे० 'सत्यापन' (को०)।

सत्याभिधान
वि० [सं०] सच बोलनेवाला [को०]।

सत्याभिसंध
वि० [सं० सत्याभिसन्ध] बादे का पक्का। जो अपना वचन पूरा करे [को०]।

सत्यालापी
वि० [सं० सत्याकलापिन्] दे० 'सत्याभिधान' [को०]।

सत्याश्रम
संज्ञा पुं० [सं०] संसारत्याग। संन्यास [को०]।

सत्याषाढ़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० सत्याषाढ़ी] कृष्ण यजुर्वेद की एक शाखा का नाम।

सत्येतर
संज्ञा पुं० [सं०] जो सत्य से पृथक् या भिन्न हो। जो सत्य न हो। असत्य [को०]।

सत्योत्कर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. सचाई में श्रेष्ठता या प्रमुखता। २. सच्ची श्रेष्ठता [को०]।

सत्योत्तर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सत्य बात का स्वीकार। २. अपराध आदि का स्वीकार। इकवाल। (स्मृति)।

सत्योद्य
वि० [सं०] सच बोलनेवाला। सच्चा [को०]।

सत्योपपावन
संज्ञा पुं० [सं०] शरदंडा नदी के पश्चिम तट पर स्थित एक पवित्र फलप्रद वृक्ष। (पुराण)।

सत्रंग
संज्ञा पुं० [सं० सत्रङ्ग] एक प्रकार का पौधा।

सत्र
संज्ञा पुं० [सं० सत्र] १. यज्ञ, हवन, दान आदि। २. एक सोमयाग जो १३ या १०० दिनो में पुरा होता या। ३. परिवेषण। गोपन। ४. वह स्थान जहाँ मनुष्य छिप सकता हो। ५. कोठरी। घर। मकान। ६. धोखा। भ्रांति। ७. धन। ८. तालाब। ९. जंगल। १०. वह स्थान जहाँ असहायों को भोजन बाँटा जाता है। छेत्र। सदावर्त। जैसे, — अन्न सत्र। ११. विकट स्थान या समय। विशेष—कौटिल्य ने लिखा है कि रेगिस्तान, संकटमय स्थान, दलदल, पहाड़ नदी, घाटी, ऊँची नीची भूमि, नाव, गौ, शकट, व्यह, धुंध तथा रात ये सब सत्र कहे जाते हैं। १२. उदारता। वदान्यता (को०)। १३. सद्गुण (को०)। १४. दो बड़े अवकाशों के बीच किसी संस्था का लगातार चलनेवाला कार्यकाल (को०)। १५. घमंड। अभिमान (को०)। १६. छद्द वेश (को०)। यौ०—सत्रगृह=यज्ञ करने या आक्षय लेने का स्थान। सत्रपरिवेषण=यज्ञ में भोजनदान। सत्रफल=सोमयाग का फल। सत्रफलद=यज्ञ या सत्र का फल देनेवाला। सत्रयाग=सोम- यज्ञ। सत्रवसति, सत्रशाला=दे० 'सत्रगृह'। सत्रसद्य=दे० 'सत्रागार'।

सत्रप
वि० [सं०] लाज संकोचवाला। विनयशील। लजालू [को०]।

सत्रह (१)
संज्ञा पुं० [हि० सत्तरह] १. सत्तरह की संख्या। २. पासे के खेल में एक दाँव जिसमें दो छक्के और एक पंजा साथ पड़ते हैं। उ०— ढारि पासा साधु संगति फेरि रसना सारि। दाँव अब के परय़ो पूरो कुमति पिछली हारि। राखि सत्रह सुनि अठारह चोर पाँचो मारि। — सीर (शब्द०)।

सत्रह (२)
वि० दे० 'सत्तरह'।

सत्रहीं
संज्ञा पुं० [हि० सत्तरह] मृत्यु के सत्रहवें दिन होनेवाला कृत्य।

सत्रा
अव्य० [सं०सत्त्रा] सहित। साथ [को०]।

सत्रागारा
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्रागार] सत्राशाला। यज्ञशाला [को०]।

सत्राजित
संज्ञा [सं०] एक यादव जिसकी कन्या सत्यभामा श्रीकृष्ण को व्याही थी। विशेष— इसने सूर्य की तपस्या करके दिव्य स्यमंतर मणि प्राप्त की था। उसके खो जाने पर इसने श्रीकृष्ण को चोरी लगाई। जब श्रीकृष्ण ने वह मणि ढूँढ़कर ला दी, तब सत्राजित बहुत लज्जित हुआ और उसने श्रीकृष्ण को अपनी कन्या सत्यभामा व्याह दी।

सत्राजिती
संज्ञा स्त्री० [सं०] सत्राजित की कन्या सत्यभामा का एक नाम।

सत्रापश्रय
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्रापश्रय] आश्रय या पनाह का स्थान। आश्रय का स्थान [को०]।

सत्रायण
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्रायण] यज्ञादि का वह सिलसिला जो अनवरत चलता रहे [को०]।

सत्राहा
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्राहन्] इंद्र [को०]।

सत्रि
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्रि] १. बहुत यज्ञ करनेवाला। २. हाथी। ३. मेघ। बादल।

सत्री
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्रिन्] १. यज्ञ करनेवाला। २. किसी दूसरे राजा के राज्य में अपने राजा या राज्य की ओर से रहनेवाला राजदूत। एलची। ३. यज्ञ का निरीक्षण करनेवाला पुरोहित। ब्रह्णा (को०)। ४. शिष्य। छात्र (को०)।

सत्रु पु
संज्ञा पुं० [सं० शत्र] दे० 'शत्रु'। उ०— शत्रु न काहू करि गनै मित्र गनै नहि काहि। तुलसी यह मत संत के बोलै समता माहि। — तुलसी ग्रं०, पृ०१०।

सत्रृघन, सत्रुहन पु ‡
संज्ञा पुं० [सं० शत्रुघ्न] दे० 'शत्रुघ्न'। उ०— (क) सुनि सत्रुघन मातु कुटिलाई। — मानस, २।१६३। (ख) जाके सुमिरत ते रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा।—मानस, १।१९७। (सत्रुसमन, सत्रुसाल, सत्रुसूदन, सत्रुहा आदि भी इनके नाम प्राप्त होते है)।

सत्व
संज्ञा पुं० [सं० सत्व] १. सत्ता। होने का भाव। अस्तित्व। हस्ती। २. सार। तत्व। मूल वस्तु। असलियत। ३. अंतः- प्रकृति। खासियत। विशेषता। ४. चित्त की प्रवृत्ति। ५. आत्म- तत्व। चैतन्य। वित्तत्व। ६. प्राण। जीव तत्व। ७. सांख्य के अनुसार प्रकृति के तीन गुणों में से एक जो सब में उत्तम है और जिसके लक्षण ज्ञान, शांति, शुद्धता आदि हैं। विशेष— इस गुण के कारण अच्छे कर्म में प्रवृत्ति, विवेक आदि का होना माना गया है। ८. प्राणी। जीवधारी। ९. गर्भ। हमल। १०. भूत। प्रेत। ११. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम। १२। दृढ़ता। धीरता। साहस। शक्ति। दम। १३. मूल तत्व। जैसे — पृथ्थी, वायु, अग्नि आदि (को०)। १४. भद्रता। सद्गुण। श्रेष्ठता (को०)। १५. वास्त- विकता। सचाई (को०)। १६. बुद्धिमत्ता। अच्छी समझ (को०)। १७. स्वाभाविक गुण या लक्षण (को०)। १८. संज्ञा। नाम (को०)। १९. लिंग शरीर (को०)। यौ०—सत्वकर्ता=जीवों की सृष्टि करनेवाला। सत्वपति = प्राणियों का स्वामी। सत्वलोक=प्राणिलोक। सत्वसंपन्न = (१) धीरजवाला। (२) जिसमें सत्वगुण हो।

सत्वक
संज्ञा पुं० [सं० सत्वक] मृत मनुष्य की जीवात्मा। प्रेत।

सत्वगुण
संज्ञा पुं० [सं० सत्वगुण] अच्छे कर्मों की ओर प्रवृत्त करनेवाला गुण। साधु और विवेकशील प्रकृति। विशेष दे० 'सत्व'।

सत्वगुणी
वि० [सं० सत्वगुणिन्] साधु और विवौकी। उनप प्रकृति का।

सत्वतनु
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्वतनु] विष्णु का एक नाम [को०]।

सत्वधातु
संज्ञा पुं० [सं० सत्वधानु] पशुश्रेणी। पशुमंडल [को०]।

सत्वधाम
संज्ञा पुं० [सं० सत्वधाम] विष्णु का एक नाम।

सत्वप्रधान
वि० [सं० सत्वप्रधान] जिसकी प्रकृति में सत्वगुण की अधिकता यो प्रधानता हो।

सत्वभारत
संज्ञा पुं० [सं० सत्वभारत] व्यास एक नाम।

सत्वमेजय
वि० [सं० सत्त्वसेजय] पशुओं, प्राणधारियों, जीवों को कँपानेवाला [को०]।

सत्वयोग
संज्ञा पुं० [सं० सत्वयोग] १. गरिमा। माहात्म्य। गौत्व। २. सजीवता [को०]।

सत्वर (१)
अव्य० [सं०] शीघ्र। जल्द। तुरंत। झटपट।

सत्वर (२)
वि० तेज। फुर्तीला। गतिशील [को०]।

सत्वलक्षण
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्वलक्षण] गर्भद्योतक चिह्न या लक्षण [को०]।

सत्वलक्षणा
वि० स्त्री० [सं० सत्त्वलक्षणा] जिसमे गर्भ के लक्षण हों। गर्भवती। हामिला।

सत्ववतो (१)
वि० [सं० सत्त्ववती] १. गर्भवती। २. सत्त्वगुणवाली।

सत्ववतो (२)
संज्ञा स्त्री० एक तांत्रिक देवी। (बौद्ध)।

सत्ववान्
वि० [सं० सत्तवत्] [स्त्री० सत्त्ववती] १. प्राणयुक्त। २. दृढ़तायुक्त। दृढ़। ३. धीर। साहसी।

सत्वविप्लव
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्त्वविप्लव] चेतना का अभाव। अचे- तनता [को०]।

सत्वविहित
वि० [सं० सत्त्वविहित] १. प्राकृतिक। २. सत्त्वगुण युक्त। पुणयात्मा। धार्मिक [को०]।

सत्वशाली
वि० [सं० सत्त्त्वशालिन्] [वि० स्त्री० सत्त्वशालिनी] दृढ़ता- युक्त। साहसी। धीर। दमवाला।

सत्वशील
वि० [सं० सत्त्त्वशील] सात्त्विक प्रकृति का। अच्छी प्रकृति का। सदाचारी। धर्मात्मा।

सत्वसंपन्न
वि० [सं० सत्त्त्वसम्पन्न] १. सतोगुण से युक्त। २. धीरता- युक्त। शांतचित्त।

सत्वसंप्लव
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्वसम्प्लव] १. बल या सामर्थ्य की हानि। २. प्रलय। विश्व का नाश।

सत्वसार
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्वसार] १. शक्ति का मूल या सार। २. अत्यत शक्तीशाली पुरुष [को०]।

सत्वस्थ (१)
वि० [सं० सत्त्वस्थ] अपनी प्रकृति में स्थित। २. दृढ़। अविचलित। धीर। ३. सशक्त। ४. प्राणयुक्त। ५. सत्त्वगुण से युक्त (को०)। ६. उत्तम। श्रेष्ठ (को०)।

सत्वस्थ (२)
संज्ञा पुं० योगी [को०]।

सत्वात्मा (१)
वि० [सं० सत्त्वात्मन्] जिसमें सत्त्व गुण हो [को०]।

सत्वात्मा (२)
संज्ञा पुं० लिंग शरीर [को०]।

सत्वाधिक
वि० [सं० सत्त्वाधीक] १. भला। जिसका स्वभाव अच्छा हो। २. हिम्मती। साहसवाला [को०]।

सत्वोद्रेक
संज्ञा पुं० [सं० सत्त्वोद्रेक] १. उत्तम प्रकृति की अधिकता या उमंग। २. साहस। उमंग। उत्साह।

सत्संग
संज्ञा पुं० [सं० सत्सङ्ग] साधुओं या सज्जनों के साथ उठना बैठना। अच्छा साथ। भली संगत। अच्छी सोहबत।

सत्संगति
संज्ञा स्त्री० [सं० सत्सङ्गति] दे० 'सत्संग'। उ०— सत्संगति महिमा नहिं गोई। — तुसली (शब्द०)।

सत्संगी
वि० [सं० सत्सङिगन्] [वि० स्त्री० सत्संगिनी] १. सत्संग करनेवाला। अच्छी सोहबत में रहनेवाला। २. मेल जोल रखनेवाला। लोगों के साथ बात चीत आदि का व्यवहार रखनेवाला। जैसे, — वे बड़े सत्संगी आदमी हैं।

सत्संसर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] भलेमानुसों का संग। सत्संग [को०]।

सत्सन्निधान
संज्ञा पुं० [सं०] सत्संग [को०]।

सत्समागम
संज्ञा पुं० [सं०] भले आदमियों का संसर्ग।

सत्सहाय (१)
वि० [सं०] जिसके मित्र या सहायक सद्पुरुष हों।

सत्सहाय (१)
संज्ञा पुं० सन्मित्र। अच्छा दोस्त [को०]।

सत्सार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. चित्रकार। चितेरा। २. कवि। ३. एक प्रकार का पौधा।

सत्सार (२)
वि० जिसका रस अच्छा हो। अच्छे रसवाला [को०]।

सथर पु
संज्ञा स्त्री० [सं० स्थल] पृथ्वी। भूमि।

सथरो †
संज्ञा स्त्री० [हि० साथरी] दे० 'साथरी'।

सथिया
संज्ञा पुं० [सं० स्वस्तिक, प्रा० सत्थिअ] १. एक प्रकार का मंगलसूचर या सिध्दिदायक चिह्न जो कलश, दीवार आदि पर बनाते हैं और जो समरोण पर काटती हुई दो रेखाओं के रुप में होता है।/?/। स्वस्तिक चिह्न। उ०— द्वारा बुहारत अष्ट सिध्दि। कौरेन सथिया चीतन नवनिधि। — सूर (शब्द०)। २. देवता आदि के पदतल का एक चिह्न। ३. फौड़े आदि की चीरफाड करनेवाला। जरहि।

सथूत्कार (१)
वि० [सं०] (व्यक्ति) बोलते समय जिसके मुख से थूक के छींटे उड़े [को०]।

सथूत्कार (२)
संज्ञा पुं० बातचीत करते समय मुँह से थूक के छीटे निकलना [को०]।