विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/सद

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सदंजन
संज्ञा पुं० [सं० सदञ्जन] पीतल से निकलनेवाला एक प्रकार का अंजन।

सदंम
वि० [सं० सदम्भ] १. दंभयुक्त। घमंडी। गर्वीला। २. सत् अर्थात् स्वच्छ जल से युक्त (को०)।

सदंश
संज्ञा पुं० [सं०] १. कर्कट। केकड़ा। २. वह जिसका दंश तीक्ष्ण हो [को०]।

सदंशक
संज्ञा पुं० [सं०] केकड़ा।

सदंशवदन
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का बगला [को०]।

सद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] गोष्ठी। सभा। जमावड़ा [को०]।

सद (१)
अव्य० [सं० सद्य?] तत्क्षण। तुरंत। तत्काल।

सद (२)
वि० १. ताजा। उ०— सद माखन साटौ दही घरंय़ो रहे मन मंद्। खाइ न बिन गोपाल की दुखित जसोदा नंद। पृ० रा०२।५५७। २. नया। नवीन। हाल का।

सद (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० सत्त्व] प्रकृति। आदत। टेव। उ०— मदन सदन के फिरन की सद न छुटै हरि राय। रुचै तितै विहरत फिरौ, कत बिहरत उर आय— बिहारी (शब्द०)।

सद (४)
संज्ञा पुं० [सं० सदस्] १. सभा। समिति। मंडली। २. एक छोटा मंडप जो यज्ञशाला में प्राचीन वंश के पूर्व बनाया जाता था।

सद (५)
संज्ञा पुं० [अ० सदा (=आवाज)] गड़रियों का एक प्रकार का गीत। (पंजाब)।

सद (६)
वि० [फ़ा०] शत। सौ [को०]। यौ०—सदआफरी = सौ सौ साधु्वाद। सदचाक। सदचिराग। सदया। सदबर्ग। सदशुक् = (भगवान् को) सौ सौ धन्यवाद।

सद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पेड़ का फल। २. एक एकाह यज्ञ (को०)।

सदई पु
अव्य० [सं० सदैव] सदैव। सदा। उ०—उथपे थपन उजार बसावन गई बहोर बिरद सदई है।—तुलसी (शब्द०)।

सदक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] भूसीसहित अनाज।

सदक (२)
संज्ञा पुं० [अ० सिद्क] दे० 'सिदिक'।

सदका
संज्ञा पुं० [अ० सद्कह] १. वह वस्तु जो ईश्वर के नाम पर दी जाय। दान। २. वह वस्तु जो किसी के सिर पर से उतार कर रास्ते में रखी जाय। उतारन। उतारा। क्रि० प्र०—उतारना।—करना। यौ०—सदके का कौआ = कुरूप और काला कलूटा आदमी। सदके की गुड़िया = अत्यंत भद्दी और कुरूप औरत। ३. निछावर। बलि। मुहा०—सदके जाऊँ = बलि जाऊँ। (मुसल०)।

सदक्ष
वि० [सं०] जिसमें अच्छे बुरे का ज्ञान हो। विवेकवाला। [को०]।

सदक्षिण
वि० [सं०] जिसे दक्षिणा या भेंट मिली हो। दक्षिणावाला [को०]।

सदचाक
वि० [फ़ा०] जो बहुत जगह से फटा हो। टुकड़े टुकड़े। तार तार [को०]।

सदचिराग
संज्ञा पुं० [फा़० सदचिराग] दीपाधार जो लकड़ी या प्रस्तर निर्मित हो और जिसपर बहुत दीप जलाए जा सकें।

सदन
संज्ञा पुं० [सं०] १. रहने का स्थान। घर। मकान। २. विराम। थिराना। स्थिरता। ३. शैथिल्य। थकावट। ४. एक प्रसिद्ध कसाई का नाम जो बड़ा भगवद्रुक्त हो गया है। ५. जल (को०)। ६. यज्ञभवन या यज्ञस्थल (को०)। ७. यमालय। यम का आवास (को०)। ८. म्लान होना। क्षीण होना (को०)।

सदना †
क्रि० अ० [सं० सदन (= थिराना)] १. छेद में से रसना। चूना। २. नाव के छेदों में से पानी आना।

सदनि
संज्ञा पुं० [सं०] पानी। जल [को०]।

सदनुग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] सत्पुरुषों पर अनुग्रह। भलेमानुसों पर कृपा करना [को०]।

सदपा
संज्ञा पुं० [फ़ा०] गौजर। कनखजूरा [को०]।

सदफ
संज्ञा स्त्री० [अ० सदफ़] सोप। शुक्ति [को०]। यौ०—सदफे सादिक = सच्ची सीपी। वह सीपी जिसमें मोती हो।

सदबर्ग
संज्ञा पुं० [फ़ा०] हजारा गेंदा।

सदमा
संज्ञा पुं० [अ० सद्मह्] १. आघात। धक्का। चौट। २. मानसिक आघात। रंज। दुःख। क्रि० प्र०—पहुँचना।—लगना।—उठाना। ३. पछतावा। पश्चात्ताप (को०)। ४. पीड़ा। दर्द (को०)। ५. बड़ी हानि। भारी नुकसान। क्रि० प्र०—उठाना। पहुँचना।

सदय
वि० [सं०] दयायुक्त। दयालु।

सदर (१)
वि० [अ० सद्र] १. खास। प्रधान। मुख्य। जैसे,—सदर अमीन। सदर दरवाजा। सदर मुकाम। २. वक्षस्थल। छाती (को०)।

सदर (२)
संज्ञा पुं० वह स्थान जहाँ कोई बड़ी कचहरी हो या बड़ा हाकिम रहता हो। केंद्रस्थल।

सदर (३)
वि० [सं०] भययुक्त। डरा हुआ।

सदर (४)
संज्ञा पुं० [देश०] सज नाम का वृक्ष। विशेष दे० 'सज'। (बुंदेल०)।

सदर आला
संज्ञा पुं० [अ० सद्र आला] अदालत का वह हाकिम जो जज के नीचे हो। छोटा जज।

सदर दरवाजा
संज्ञा पुं० [अ० सद्र + फ़ा० दरवाजा] खास दरवाजा। सामने का द्वार। फाटक।

सदरनशीन
संज्ञा पुं० [अ० सद्र + फ़ा० नशीन] किसी सभा का सभापति। मीर मजलिस।

सदर बाजार
संज्ञा पुं० [अ० सद्र + फ़ा्० बाजार] १. बड़ा बाजार। खास बाजार। २. छावनी का बाजार।

सदर बोर्ड
संज्ञा पुं० [अ० सद्र + अं० बोर्ड] माल की सबसे बड़ी अदालत।

सदरी
संज्ञा स्त्री० [अ०] बिना आस्तीन की एक प्रकार की कुरती या बंडी जो और कपड़ें के ऊपर पहनी जाती है। सीनाबंद। विशेष—इसका चलन अरब में बहुत अधिक है। मुसलमानी मत के साथ इसका प्रचार अफगानिस्तान, तुर्किस्तान और हिंदुस्तान में भी हुआ।

सदर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] १. असल बात। मुख्य विषय। साध्य विषय। २. धनाढय पुरुष।

सदर्थना पु
क्रि० स० [सं० सदर्थ या समर्थन] समर्थन करना। पुष्टि करना। तसदिक करना।

सदर्प
क्रि० वि० [सं०] १. दर्पयुक्त। घमंडी। २. दर्पपूर्वक। घमंड के साथ [को०]।

सदश
वि० [सं०] जिसमें पाड़ या किनारा हो। किनारेदार। हाशियेदार।

सदस्
संज्ञा पुं० [सं०] १. रहने का स्थान। मकान। घर। २. सभा। समाज। मंडली। ३. यज्ञशाला में एक छोटा मंडप जो प्राचीन वंश के पूर्व बनाया जाता था। ४. आकाश। व्योम (को०)।

सदसत् (१)
वि० [सं० सत् + असत्] १. सच और झूठ। २. अस्तित्व और अनस्तित्व। ३. भला बुरा। अच्छा और खराब।

सदसत् (२)
संज्ञा पुं० १. किसी वस्तु के होने और न होने का भाव। २. सच्ची और झूठी बात (को०)। २. अच्छाई बुराई।

सदसद्विवेक
संज्ञा पुं० [सं०] अच्छे और बुरे की पहचान। भले बुरे का ज्ञान।

सदसि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० १. 'सदस्'।

सदसि (२)
क्रि० वि० सदस् में। सभा या गोष्ठी में।

सदस्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. यज्ञ करनेवाला। याजक। २. किसी सभा या समाज में संमिलित व्यक्ति। सभासद। मेंबर।

सदस्यता
संज्ञा स्त्री० [सं० सदस्य + ता (प्रत्य०)] सदस्य होने का भाव [को०]। यौ०—सदस्यताशुल्क = सदस्य बनने का चंदा।

सदहा (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. यज्ञ करनेवाला। याजक। सभासद। किसी सभा या समाज में संमिलित व्यक्ति। मेंबर।

सदहा (२)
वि० [फ़ा०] सैकड़ों।

सदहा † (३)
संज्ञा पुं० [देश०] अनाज लादने की बड़ी बैलगाड़ी।

सदा (१)
अव्य० [सं०] १. नित्य। हमेशा। सर्वदा। २. निरंतर। यौ०—सदाकांता = एक नदी। सदाकालवह = सर्वदा गतिशील। सदा प्रवहमान। सदातोया = (१) वह नदी जिसमें निरंतर जल बना रहे। (२) सदानीरा। करतोया नदी। (३) एला- पर्णीं। सदापरीभूत = एक बोधिस्त्व का नाम। सदापर्ण = जिसमें हमेशा पत्ते बने रहें। सदाभ्रम = नित्य भ्रमणशील।

सदा (२)
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. गूँज। प्रतिध्वनि। २. ध्वनि। आवाज। शब्द। ३. पुकार। मुहा०—सदा देना या लगाना = फकीर का भीख पाने के लिये पुकारना। यौ०—सदाए गैब = आकाशवाणी। सदाए हक = सत्य की आवाज। इन्साफ की बात।

सदाकत
संज्ञा स्त्री० [अ० सदाक़त] सच्चाई। सत्यता। खरापन। यौ०—सदाकतपसंद, सदाकतपरस्त = जिसे सच्चाई पसंद हो। सत्याता पर दृढ़ रहनेवाला। सचाई या सत्यता पर दृढ़।

सदाकारी
वि० [सं० सदाकारिन्] जिसका आकार सत् अर्थात् भला हो [को०]।

सद्कुसुम
संज्ञा पुं० [सं०] धव। धातकी।

सदागति
संज्ञा पुं० [सं०] १. वायु। पवन। २. वात। (आयुर्वेद)। ३. सूर्य। ४. विभु। ब्रह्म। ५. चरम सुख। निर्वाण। मोक्ष (को०)। ५. वह जो सर्वदा गतिशील रहता हो।

सदागतिशत्रु
संज्ञा पुं० [सं०] एरंड। अंडी का पेड़।

सदागम
संज्ञा पुं० [सं०] १. सज्जन का आगमन। २. सत् शास्त्र। अच्छा सिद्धांत।

सदाचरण
संज्ञा पुं० [सं०] अच्छा चाल चलन। सात्विक व्यवहार।

सदाचार
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छा आचरण। सात्विक व्यवहार। सद्वृत्ति। २. शिष्ट व्यवहार। भलमनसाहत। ३. रीति। रवाज।

सदाचारी
संज्ञा पुं० [सं० सदाचारिन्] [स्त्री० सदाचारिणी] १. अच्छे आचरणवाला पुरुष। अच्छे चाल चलन का आदमी सद्वृत्तिशील। २. धर्मात्मा। पुण्यात्मा।

सदातन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

सदातन (२)
वि० सार्वकालिक। सदा या अनवरत रहनेवाला [को०]।

सदात्मा
वि० [सं० सदात्मन्] सत् स्वभाव का। नेक। भला [को०]।

सदादान (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह हाथी जिसे सदा मद बहता हो। २. ऐरावत। ३. गणेश। ४. सदा दान देने की प्रकृति। दानशीलता। ५. गंधद्वीप (को०)।

सदादान (२)
वि० सर्वदा दान देनेवाला [को०]।

सदानंद
संज्ञा पुं० [सं० सदानन्द] १. वह जो सदा आनंद में रहे। २. शिव। ३. परमेश्वर। ४. विष्णु। ५. सदा आनंद की स्थिति। सर्वदा रहनेवाला आनंद। ६. वह जो सदा आनंदप्रद हो। सदा आनंद देनेवाला।

सदानन
वि० [सं०] सुंदर मुखाकृतिवाला [को०]।

सदानर्त्त (१)
वि० [सं०] जो बराबर नाचता हो।

सदानर्त (२)
संज्ञा पुं० ममोला। खंजन।

सदानीरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. करतोया नदी। २. सदा प्रवाहित होनेवाली नदी (को०)।

सदानोपा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एलानी। एलापर्णी।

सदाप (१)
वि० [सं०] सत् अर्थात् स्वच्छ पानीवाला [को०]।

सदाप पु (२)
वि० [सं० सदर्प, प्रा० सदप्प > सदाप] सदर्प। गर्वयुक्त।

सदापुर
संज्ञा पुं० [सं०] केवटी मोथा। कैवर्त्त मुस्तक।

सदापुष्प (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. नारिकेल। नारियल। २. आक सफेद मदार। ३. कुंद का फूल।

सदापुष्प (२)
वि० सदा पुष्पयुक्त। हमेशा फूलनेवाला [को०]।

सदापुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आक। २. लाल आक। ३. कपास। ४. मल्लिका। एक प्रकार की चमेली।

सदाप्रसून (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. रोहितक वृक्ष। २. आक। मदार। ३. कुंद का पौधा।

सदाप्रसून (२)
वि० सदा पुष्प युक्त। हमेशा पुष्पित [को०]।

सदाफर †
वि० संज्ञा पुं० [सं० सदाफल] दे० 'सदाफल'। उ०— फरे सदाफर अउर जँभीरी।—जायसी (शब्द०)।

सदाफल (१)
वि० [सं०] जो सब दिन फले। सदा फलता रहनेवाला।

सदाफल (२)
संज्ञा पुं० १. गूलर। ऊमर। २. श्रीफल। बेल। ३. नारियल। ४. कटहल। ५. एक प्रकार का नीबू।

सदाफला, सदाफली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जपा पुष्प। गुड़हर। देवीफूल। २. एक प्रकार का बैगन।

सदाबरत †
संज्ञा पुं० [हिं० सदावर्त] दे० 'सदावर्त'।

सदाबर्त
संज्ञा पुं० [सं० सदाव्रत] १. नित्य भूखों और दीनो को भोजन बाँटने की क्रिया या नियम। रोज की खैरात। क्रि० प्र०—चलना।—बँटना। २. वह अन्न या भोजन जो नियम से नित्य गरीबों को बाँटा जाय। खैरात। क्रि० प्र०—बँटना।—बाँटना। ३. नित्य होनेवाला दान।

सदाबर्ती
संज्ञा पुं० [हिं०, सदावर्त] १. सदावर्त बाँटनेवाला। भूखों को नित्य अन्न बाँटनेवाला। २. बड़ा दानी। बहुत उदार।

सदाबहार (१)
वि० [हिं० सदा + फा़० बहार (= बसंत ऋतु, फूल पत्ती का समय)] १. जो सदा फूले। २. जो सदा हरा रहे जिसका पतझड़ न हो। जिसमें बराबर नए पत्ते निकलते और पुराने झड़ते रहें। विशेष—वृक्ष दो प्रकार के होते हैं। एक तो पतझड़वाले, अर्थात् जिनकी सब पत्तियाँ शिशिर ऋतु में झड़ जाती और बसंत में सब पत्तियाँ नई निकलती हैं। दूसरे सदाबहार अर्थात् वे जिनके पत्ते झड़ने की नियत ऋतु नहीं होती और जिनमें सद्रा हरी पत्तियाँ रहती हैं।

सदाबहार (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार के फूल का नाम।

सदाभद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गँभारी का पेड़।

सदाभव
वि० [सं०] हमेशा होनेवाला। निरतर। अनवरत (को०)।

सदाभव्य
वि० [सं०] जो सर्वदा विद्यमान या सावधान हो [को०]।

सदाभ्रम
वि० [सं०] सर्वदा भ्रमणशील [को०]।

सदामंड़लपत्रक
संज्ञा पुं० [सं० सदामण्डलपत्रक] सफेद गदह्पूरना। श्वेत पुनर्नवा।

सदामत्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार के यक्ष।

सदामत्त (२)
वि० १. जिसके गंडस्थल से सदा मद्स्राव होता हो (हाथी)। २. सर्वदा मस्त रहनेवाला [को०]।

सदामद (१)
वि० [सं०] १. हमेशा नशे में रहनेवाला। नित्यमत्त। २. हमेशा, मद बहानेवाला (हाथी)। ३. खुशी के मारे जो मतवाला हो गया हो। ४. घमंड से चूर रहनेवाला [को०]।

सदामद (२)
संज्ञा पुं० गणेश।

सदामर्ष
वि० [सं०] जो शांत या धीर न हो। उच्छृंखल। अमर्षयुक्त।

सदामांसी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मांसरोहिणी।

सदामुदित
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो सर्वदा मुदित रहता हो। २. एक प्रकार की सिद्धि [को०]।

सदायोगी (१)
संज्ञा पुं० [सं० सदायोगिन्] विष्णु।

सदायोगी (२)
वि० सर्वदा योगाभ्यास करनेवाला। जो हमेश योगाभ्यास करता हो [को०]।

सदार
वि० [सं०] सस्त्रीक। दारायुक्त।

सदारत
संज्ञा स्त्री० [अ०] सभापतित्व। अध्यक्षता। संदर का पंद। उ०—मुहम्मद कुतुब कूँ सदारत दिखाया।—दक्खिनी०, पृ० ७४।

सदारुह
संज्ञा पुं० [सं०] बेल। विल्व वृक्ष।

सदावरदायक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की समाधि [को०]।

सदावर्त, सदावर्ती
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'सदाबर्त', 'सदाबर्ती'।

सदाशय
वि० [सं०] जिसका भाव उदार और श्रेष्ठ हो। उच्च विचार का। अच्छी नीयत का। सज्जन। भलामानस।

सदाशयता
संज्ञा स्त्री० [सं० सदाशय + ता(प्रत्य०)] भलमनसाहत। सज्जनता। उ०—जाति जीवन हो निरामय, वह सदाशयता प्रखर दो।—अपरा, पृ० १९२।

सदाशिव
संज्ञा पुं० [सं०] १. सदा कल्याणकारी। सदा कृपालु। २. सदा शुभ और मंगल। ३. महादेव का एक नाम।

सदाश्रित
वि० [सं०] जो सर्वदा दूसरे के आश्रय में रहता हो। परावलंबी [को०]।

सदासुहागिन (१)
वि० स्त्री० [हिं० सदा + सुहागिन] जो सदा सौभाग्यवती रहे। तजो कमी पतिहीन न हो।

सदासुहागिन (२)
संज्ञा स्त्री० १. वेश्याः रंडी। (विनोद)। २. सिंदूर- पुष्पी का पौधा। ३. एक प्रकार की छोटी चिड़िया। ४. एक प्रकार के मुसलमान फकीर जो स्ञीयों के वेश में घूमते हैं।

सदिच्छा
संज्ञा स्त्री० [सं० सद् + इच्छा] सद् विचार। अच्छी इच्छा उ०—इसलिये उनकी सारी सदिच्छा सपना बनकर ही रह जाती है।—इति आलो०, पृ० ५५।

सदिया
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सादह् (= कोरा)] लाल पक्षी का एक भेद जीसका शरीर भूरे रंग का होता है। बिना चित्ती की मृनियाँ।

सदियाना †
संज्ञा पुं० [फ़ा० शादियानह्] दे० 'शादियाना'। उ०— लागे मंगल होन लगे बाजन सादियाना।पलटू०, पृ० ८२।

सदी (१)
संज्ञा स्त्री० [अ०; फ़ा०] १. सौ वर्षों का समूह। शताब्दी। २. किसी विशेष सौ वर्ष के बीच का काल। जैसे,—१६वीं सदी। ३. सैकड़ा। जैसे,—५) फी सदी सूद।

सदी (२)
संज्ञा स्त्री० [अ० सद्इ] स्तन। पयोधर। कुच [को०]।

सदीव पु
अव्य० [सं० सदैव] दे० 'सदैव'। उ०—मच्छाँर जल जीव जिम, सबजी तराँ सदीव। अदताराँ धन जीव इंम, जस दाताराँ जीव।—बाँकी ग्रं०, भा० ३, पृ० ५०।

सदुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] सत् उक्ति। अच्छी लगनेवाली बात। भले शब्द [को०]।

सदुद्य
वि० [सं०] सत्य बोलनेवाला [को०]।

सदुपदेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छा उपदेश। उत्तम शिक्षा। २. अच्छी सलाह।

सदुपयोग
संज्ञा पुं० [सं०] किसी वस्तु का सत्कार्य में उपयोग। सत्कार्य में लगाना। अच्छे कार्य में प्रयुक्त करना।

सदुर्दिन
संज्ञा पुं० [सं०] मेघाच्छन्न या बादलों से घिरा हुआ दिन [को०]।

सदूर पु
संज्ञा पुं० [सं० शार्दूल] शार्दूल। सिंह। उ०—बिरह हस्ति तन सालै घाय करै चित चूर। बेगि आइ पिउ वाजहु गाजहु होइ सदूर।—जायसी (शब्द०)।

सद्दक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की मिठाई। (सुश्रुत)।

सद्दक्ष
वि० [सं०] दे० 'सदृश'।

सद्दश
वि० [सं०] १. जो देखने में एक ही सा हो। एक रूप रंग का। समान। अनुरूप। २. तुल्य। वरावर। ३. उपयुक्त। मुनासिव। योग्य। यौ०—सदृशक्षम = समान क्षमतावाला। सदृशविनिमय = तुल्य वस्तुओं के ज्ञान में भ्रम। समान वस्तु की पहिचान करने में भ्रम होना। सदृशवृत्ति = समान वृत्ति का। समान आचरण, व्यवहार या जीविकावाला। सदृशस्त्ती = समान जाति की पत्नीवाला। सदृशस्पंदन = लगातार या किसी निश्चित समय पर होनेवाला स्पंदन।

सद्दशता
संज्ञा स्त्री० [सं०] अनुरूपता। समानता। तुल्यता।

सदेविक
वि० [सं०] देवी के साथ। पत्नी के साथ। महिषी के साथ [को०]।

सदेश (१)
वि० [सं०] १. किसी एक ही देश या स्थान का। २. पड़ोसी। प्रतिवेशी। ३. देशवाला। देशयुक्त। जिसके पास देश हो।

सदेश (२)
संज्ञा पुं० प्रतिवेश। पड़ोस।

सदेह
क्रि० वि० [सं०] १. इसी शरीर से। बिना शरीर त्याग किए। जैसे,—त्रिशंकु सदेह स्वर्ग जाना चाहते थे। २. मूर्तिमान। सशरीर। ड०—सब श्रुंगार सदेह मनो रति मन्मथ मोहै।— केशव (शब्द०)।

सदैकरस
वि० [सं०] १. जो सदा एक रस हो। २. सर्वदा। एक आंकाक्षा या इच्छायुक्त।

सदैव
अव्य० [सं०] सदा ही। सर्वदा। हमेशा।

सदोगत
वि० सं० सदस् + गत] जो सभा या समिति में उपस्थित हो [को०]।

सदोगृह
संज्ञा पुं० [सं० सदस् + गृह] सभाभवन। सभाकक्ष। सभागृह [को०]।

सदोष
वि० [सं०] १. दोषयुक्त। जिसमें ऐब हो। २. अपराधी। दोषी। ३. जिसपर आपत्ति या एतराज किया जा सके (को०)। ४. रात्रि से संबद्ध। रात्रियुक्त।

सदोषक
वि० [सं०] दोषयुक्त। जिसमें ऐब हो [को०]।

सदगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उत्तम गति। अच्छी अवस्था। भली हालत। २. मरण के उपरांत उत्तम लोक की प्राप्ति। ३. अच्छी चाल चलन।

सदगव
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तम कोटि का साँड़ [को०]।

सद्गुण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] अच्छा गुण। अच्छी सिफत। सज्जनता। उ०—जिमि सदगुण सज्जन पहँ आवा।—तुलसी (शब्द०)।

सदगुण (२)
वि० सत् गुणों से युक्त। सज्जनता युक्त [को०]।

सदगुणी
संज्ञा पुं० [सं० सद्गुणिन्] अच्छे गुणवाला।

सद्गुरु
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छा गुरु। उत्तम शिक्षक या आचार्य। २. वह धर्मशिक्षक या मंत्रदाता जिसके उपदेश से संसार के बंधनों से छुटकारी और ईश्वर की प्राप्ति हो।

सद्ग्रंथ
संज्ञा पुं० [सं० सत् + ग्रन्य] अच्छा ग्रंथ। सन्मार्ग बतानेवाला पुस्तक या ग्रंथ। उ०—जिमि पाषंड विवाद ते लुप्त होहिं सद्ग्रंथ।—तुलसी (शब्द०)।

सद्द पु; † (१)
संज्ञा पुं० [सं० शब्द, प्रा० सद्द] १. शब्द। ध्वनि।

सद्द (२)
अव्य० [सं० सद्य] तुरंत। फौरन। तत्काल।

सद्दी ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं०] सादा। सुफेद। (पतंगसादी)

सद्धन
संज्ञा पुं० [सं०] सत्कार्य द्वारा उपाजित द्रव्य। अच्छी कमाई का धन [को०]।

सद्धर्म
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्तम धर्म (बौद्ध या जैन धर्म के लिये प्रयुक्त)। २. अच्छा नियम या न्याय [को०]।

सद्धी
वि० [सं० सत् + धी] सद्बुद्धि युक्त। बुद्धिमान् [को०]।

सदब्राह्मण
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तम कोटि का या सात्विक ब्राह्मण। कुलीन ब्राह्मण [को०]।

सद्भाग्य
संज्ञा पुं० [सं०] अच्छी किस्मत। उत्तम भांग्य [को०]।

सद्भाव
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छा भाव। प्रेम और हित का भाव। शुभचिंतना की वृत्ति। २. मेलजोल। मैत्रि। ३. निष्कपट भाव। सच्चा भाव। अच्छी नीयत। ४. होने का भाव अस्तित्व। हस्ती। ५. वस्तुस्थिति। वास्तविकता (को०)। ६. भद्रता। साधुता (को०)। ७. प्राप्ति (को०)।

सद्भावश्री
संज्ञा पुं० [सं०] १. सद्भाव की श्री, शोभा या गौरव। २. एक देवी का नाम (को०)।

सद्भूत
वि० [सं०] १. जो अस्तित्व या सत्तायुक्त हो। असद्भूत का विपरीतार्थक। २. जो वस्तुतः सत्य या सत् हो।

सद्भृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] भला नौकर। उत्तम सेवक।

सद्म
संज्ञा पुं० [सं० सद्मन्] १. घर। मकान। रहने का स्थान। २. बैठनेवाला। ३. दर्शक। ४. संग्राम। युद्ध। ५. पृथ्वी और आकाश। ६. रुकने या ठहरने की जगह (को०)। ७. देवस्थान। मंदिर। देवालय (को०)। ८. वेदी (को०)। ९. जल (को०)। १०. पीठ। आसन (को०)।

सद्मा
वि० [सं० सद्मन्] १. बैठनेवाला। २. निवास करने या रहनेवाला [को०]।

सद्मनी
संज्ञा स्त्री० [सं० सद्म] १. हथेली। बड़ा मकान। २. प्रसाद। महल।

सद्य (१)
अव्य० [सं०] १. आज ही। २. इसी समय। अभी। ३. तुरंत। शीघ्र। झट। तत्काल। ४. कुछ ही समय पूर्व (को०)।

सद्य (२)
संज्ञा पुं० शिव का एक नाम। सद्योजात।

सद्यः
अव्य० [सं० संद्यस्] दे० 'सद्य'। यौ०—सद्यःकृत = तुरंत किया हुआ। सद्यःकृत = जो तत्काल काटा गया हो। सद्यःकृत्तोत = जो अभी काता और बुना गया हो। सद्यःक्रित = (१) एक एकाह यज्ञ। (२) जो तुरंत खरीदा गया हो। सद्यःपर्युषित = जो एक दिन पूर्व का हो। वासी। सद्यःपाती = शीघ्र गिरनेवाला। सद्यःप्रक्षालक = वह जो तुरंत काम में लाने के हेतु अन्न आदि को साफ करे। सद्यःप्रज्ञाकर = तुरंत प्रज्ञा या बुद्धि देनेवाला। शीघ्र ज्ञान देनेवाला। सद्यःप्राणकर = तुरंत शक्ति प्रदान करनेवाला। सद्यः प्राणहर = शीघ्र प्राण या शक्ति का नाश करनेवाला। सद्यःफल = शीघ्र फलदायक। सद्यःशक्तिकर = तुरंत शक्ति देनेवाला। सद्यःशुद्धि = दे० 'सद्यःशौच'। सद्यःशोथ = तुरंत शोथ या सूजन करनेवाला। सद्यःशौच = तुरंत की हुई शुद्धि या शुचिता। सद्यःश्राद्धी = जिसने अभी अभी श्राद्ध कर्म किया हो। सद्यःस्नात = जिसने अभी अभी स्नान किया हो। सद्यःस्नेहन = शीघ्रस्नेह युक्त या स्निग्ध करना।

सद्यः पाक (१)
वि० [सं०] जिसका फल तुरंत मिले। जिसके परिणाम में विलंब न हो।

सद्यापाक (२)
संज्ञा पुं० रात के चौथे पहर का स्वप्न (जो लोगों के विश्वास के अनुसार ठीक घटा करता है)।

सद्यःप्रसूत
वि० [सं०] तुरंत का उत्पन्न।

सद्यःप्रसूता
वि० स्त्री० [सं०] जिसे अभी बच्चा हुआ हो।

सद्यःशोथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कपिकच्छु। केवाँच। विशेष—केवाँच छू जाने से तुरंत खुजली और सूजन होती है।

सद्यशि्च्छन्न
वि० [सं०] जो तुरंत काटा गया हो। अभी अभी काटकर छिन्न किया हुआ।

सद्यस्क, सद्यस्तन
वि० [सं०] १. नवीन। ताजा। टटका। २. उसी समय का [को०]।

सद्युक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] अच्छी युक्ति या तरकीब। भला तरीका। भली युक्ति [को०]।

सद्योजात (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सद्योजाता] तुरंत का उत्पन्न।

सद्योजात (२)
संज्ञा पुं० १. शिव का एक स्वरूप या मूर्ति। २. तुरंत का उत्पन्न बछड़ा।

सद्योबल
वि० [सं०] शीघ्र शक्ति देनेवाला। यौ०—सद्योबलकर = दे० 'सद्योबल'।

सद्योभावी (१)
वि० [सं० सद्योभाविन्] तुरंत का उत्पन्न। सद्योजात।

सद्योभावी (२)
संज्ञा पुं० तुरंत का उत्पन्न बछड़ा [को०]।

सद्योमन्यु
वि० [सं०] जिससे तुरंत क्रोध उत्पन्न हो। शीघ्र क्रोध पैदा करनेवाला [को०]।

सद्योमृत
वि० [सं० सद्यस् + अमृत] तुरंत अमृत के समान फलदायक।

सद्योमृत
वि० [सं०] तत्काल का मरा हुआ [को०]।

सद्योव्रण
संज्ञा पुं० [सं०] वह धाव जो तुरंत लगा हो। अभी अभी लगी चोट। ताजा घाव [को०]।

सद्योहत
वि० [सं०] जो तुरंत या अभी अभी मारा गया हो।

सद्र
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'सदर'।

सद्रव्य
वि० [सं० सद्द्रव्य] १. स्वर्णाभ। स्वर्णिम। सुनहला। २. द्रव्ययुक्त। धनयुक्त।

सद्रि
संज्ञा पुं० [सं०] १. मेष। मेढ़ा। २. पहाड़। ३. हाथी [को०]।

सद्रु
वि० [सं०] १. आराम करने या बैठनेवाला। २. गमनोद्यत। जानेवाला [को०]।

सद्वंद्व
वि० [सं० सद्वन्द्व] संघर्षप्रिय। झगड़ा करनेवाला [को०]।

सद्वंश
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्तम जाति का बाँस। २. अच्छा कुल या खानदान [को०]।यौ०—सद्वंशजात = सत्कुलोत्पन्न। खानदानी।

सद्वती
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुलस्त्य की कन्या और अग्नि की स्त्री।

सद्वत्सल
वि० [सं०] सत्पुरुषों के प्रति कृपालु या अनुग्रहयुक्त [को०]।

सद्वसथ
संज्ञा पुं० [सं०] गाँव। ग्राम [को०]।

सद्वस्तु
संज्ञा पुं० [सं०] १. वस्तु या कथानक जो सत् एवम् रोचक हो। २. सत्कार्य। अच्छा काम। ३. सत् पदार्थ या वस्तु [को०]।

सद्वाजी
संज्ञा पुं० [सं० सद्वाजिन्] शुभ लक्षणोंवाला अश्व जो सवारी के लिये उत्तम हो [को०]।

सद्वादिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'सद्वादित्व' [को०]।

सद्वादित्व
संज्ञा पुं० [सं०] सद्वादी होने का भाव।

सद्वादी
वि० [सं० सद्वादिन्] [वि० स्त्री० सद्वादिनी] सच बोलनेवाला। सत्यवादी [को०]।

सद्वार्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुसमाचार। शुभ सूचना। अच्छी खबर। २. वार्तलाप जो शोभन हो। अच्छी बात। भली बात [को०]।

सद्विगर्हित
वि० [सं०] जो सज्जनों द्वारा बिगर्हित हो। सत्पुरुषो द्वारा निदित [को०]।

सद्विद्य
वि० [सं०] पूर्ण शिक्षाप्राप्त। जिसने अच्छी और पूरी शिक्षा प्राप्त की हो [को०]।

सदवृत्त (१)
वि० [सं०] १. सदाचारी। शिष्ट। २. सुंदर वर्तुलाकार। सुंदर घेरेदार। जिसका घेरा सुंदर और वर्तुल हो। जैसे,— स्तनमंडल का।

सदवृत्त (२)
संज्ञा पुं० १. शोभन आचार। सदाचार। २. दोषरहित वृत्त या वर्तुल आकार।

सद्वृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] अच्छा चालचलन। उत्तम व्यवहार।

सधन (१)
वि० [सं०] १. धनयुक्त। २. धनी। धनवान् [को०]।

सधन (२)
संज्ञा पुं० वह धन जो सामान्य या संमिलित हो।

सधना
क्रि० अ० [हिं० साधना] १. सिद्ध होना। पूरा होना। सरना। काम होना। जैसे,—काम सधना। २. काम चलना। मतलब निकलना। ३. अभ्यस्त होना। हाथ बैठना। मँजना। मश्क होना। जैसे,—अभी हाथ सधा नही है, इसी से देर लगती है। ४. प्रयोजन सिद्धि के अनुकूल होना। गों पर चढ़ना। जैसे,—बिना कुछ रुपया दिए वह आदमी नहीं सधेगा। ५. लक्ष्य ठीक होना। निशाना ठीक होना। ६. घोड़े आदि का शिक्षित होना। निकलना। ७. संभलना। ८. †समाप्त होना। खत्म होना। खर्च होना। ९. ठीक नपना। नापा जाना। जैसे,—अँगरखा सधना।

सधर पु
संज्ञा पुं० [सं० अधर का अनु०] ऊपर का ओठ। ओष्ठ।

सधर्म, सधर्मक
वि० [सं०] १. समान गुण, धर्म, स्वभाव या क्रियावाला। एक ही प्रकार का। २. तुल्य। समान। ३. समान संप्रदाय या जाति का (को०)। ४. समान कर्तव्योंवाला (को०)। यौ०—सधर्मचारिणी = पत्नी। भार्या।

सधर्मा
वि० [सं० सधर्मन्] समानधर्मा। समान गुण एवं धर्मवाला। दै० 'सधर्म' [को०]

सधर्मिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सधर्मचारिणी। पत्नी। भार्या [को०]।

सधर्मी
वि० [सं० सधर्मिन्] [स्त्री० सधर्मिणी] समानधर्मा। दे० 'सधर्मा' [को०]।

सधवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पति जीवित हो। जो विधवा न हो। सुहागिन। सौभाग्यवती।

सधाना
क्रि० स० [हि० सधना का प्रेर० रुप] साधने का काम दूसरे से कराना। दूसरे की साधने में प्रवृत्त करना।

सधावर
संज्ञा पुं० [हि० सधवा या सं० सप्त, प्रा० सद्ध ? अथवा देशज] वह उपहार जो गर्भवती स्त्री को गर्भ के सातवें महीने दिया जाता है।

सधि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] पावक। अग्नि [को०]।

सधि (२)
संज्ञा पुं० [सं० सधिस्] साँड़। वृषभ [को०]।

सधी
वि० [सं०] धी अर्थात् बुद्धियुक्त। बुद्धिमान् [को०]।

सघूम
वि० [सं०] घूँए से आच्छादित। घूमयुक्त [को०]।

सधूमक
वि० [सं०] १. धम्रयुक्त। २. धूँए जैसा [को०]।

सधूमवर्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अग्नि की सात जिह्नाओं में से एक जिह्ना।

सधूम्र
वि० [सं०] १. धुँधला। २. धुँएसे आच्छादित। ३. धूम्र वर्ण का। काला। श्यामवर्ण का [को०]। यौ०—सधूम्रवर्णा = अग्नि की एक जिह्वा। सधूमवर्णा।

सधोर ‡
संज्ञा पुं० [हि० सधावर] दे० 'सधावर'।

सधौर ‡
संज्ञा पुं० [हि० सधावर] दे० 'सधावर'।

सध्रीच
संज्ञा पुं० [सं० सध्रयञ्च] [स्त्री० सध्रीची (= पत्नी। सखी)] पति। सखा। स्वामी [को०]।

सध्रीची
संज्ञा स्त्री० [सं० सध्रीचीन (= समान उद्देश्यवाला)] सखी (डिं०)।

सध्रीचीन
वि० [सं०] [स्त्री० सध्रीचीना] १. साथ साथ रहनेवाला। साथी। २. समान उद्देश्यवाला [को०]।

सध्वंस
संज्ञा [सं०] दे० 'कणव' 'कणव'।

सनंक †
संज्ञा पुं० [अनु० सन् सन्] सन्नाटा। स्तब्धता। नीरवता।

सनंद
संज्ञा पुं० [सं० सन्न्द] दे० 'सनंदन'।

सनंदन
संज्ञा पुं० [सं० सनन्दन] ब्रह्मा के चार मानस पुत्रों में से एक मानसपुत्र। विशेष—ये कपिल के भी पूर्व सांख्य मत के प्रवर्तक कहे गए हैं। यौ०—सनक सनंदन।

सन्
संज्ञा पुं० [अ०] १. वर्ष। साल। संवत्सर। २. कोई विशेष वर्ष। संवत्। जैसे,—सन इसवी, सन् हिजरी।

सन (१)
संज्ञा पुं० [सं० शण] बोया जानेवाला एक प्रसिद्ध पौधा जिसकी छाल के रेशे से मजबूत रस्सियाँ आदि बनती है।विशेष—यह तीन साढ़े तीन हाथ ऊँचा होता है और इसका कांड सीधी छड़ी की तरह दूर तक ऊपर जाता है। फूल पीले रंग के होते हैं। कुआरी फसल के साथ यह खेतों में बोया जाता है और भादों कुआर में तैयार होता है। रेशेदार छिलका अलग करने के लिये इसके डंठल पानी में डालकर सड़ाए जाते हैं।

सन पु † (२)
प्रत्य० [सं० सुन्तो या सङ्ग] अवधी में करणकारक का चिह्न। से। साथ।

सन (३)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] वेग से निकल जाने का शब्द। जैसे,—तीर सन से निकल गया।

सन (४)
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मा के चार मानस पुत्रों में से एक मानस- पुत्र। २. हाथी का कान फड़फड़ाना (को०)। ३. समर्पण। भेंट (को०)। ४. भोजन। आहार (को०)। ५. लाभ। प्राप्ति (को०)। ६. घंटापाटलि वृक्ष।

सन (५)
वि० [अनु० सुन] १.सन्नाटे में आया हुआ। स्तव्ध। ठक। २. मौन। चुप। मुहा०—जी सन होना = चित्त स्तब्ध होना। घबरा जाना।

सनई
संज्ञा स्त्री० [हि० सन] छोटी जाति का सन।

सनक (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शङ्क (=खटका)] १. किसी बात की धुन। मन की झोंक। वेग के साथ मन की प्रवृत्ति। मुहा०—सनक चढ़ना या सवार होना = धुन होना। २. उन्माद की सी वृत्ति। खब्त। जुनून। मुहा०—सनक आना = पागल होना। खब्ती होना। सनक जाना = पागल होना। सनकना। सनक लेना = पागलों का सा काम करना।

सनक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा के चार मानस पुत्रों में से एक। विशेष—ये परम ज्ञानी और विष्णु के समासद माने गए हैं। शेष के नाम हैं—सन, सनत्कुमार और सनंदन।

सनकना (१)
क्रि० अ० [हि० सनक + ना (प्रत्य०)] पागल हो जाना। पगलाना। झक्की हो जाना।

सनकना (२)
क्रि० अ० [अनु० सनसन] वेग से हवा में जाना या फेंका जाना। जैसे,—तीर सनकना, गोले सनकना।

सनकाना
क्रि० स० [हि० सनकना का प्रेर०] किसी की सनकने में प्रवृत्त करना।

सनकारना पु †
क्रि० स० [हि० सैन + करना] १. संकेत करना। इशारा करना। २. इशारे से बुलाना। ३. किसी काम के लिये इशारा करना। उ०—तुलसी सभीतपाल सुमिरे कृपालु राम समय सुकरना सराहि सनकार दी।—तुलसी (शब्द०)। संयो० क्रि०—देना।

सनकियाना (१)
क्रि० सं० [सं० सङ्केतन, हिं० सन] इशारा करना। संकेत करना।

सनकियाना (२)
क्रि० अ० [हि० सनक] दे० 'सनकना'।

सनकियाना (३)
क्रि० स० दे० 'सनकाना'।

सनकुरंगी
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बड़ा पेड़। विशेष—इसके हीर की लकड़ी बहुत मजबूत और स्याही लिए लाल होती है। इसकी कुर्सियाँ आदि बनती हैं। यह वृक्ष तिनेवली और ट्रावनकोर में अधिक पाया जाता है।

सनट्टा
संज्ञा पुं० [देश०] विलायती मेंहदी नाम का पौधा जो बागों में बाढ़ के रुप में लगाया जाता है। विशेष दे० 'विलायती मेंहदी'।

सनत्
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा।

सनत्कुमार
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मा के चार मानस पुत्रों में से एक। वैधात्र। विशेष—ये सबसे पहले प्रजापति कहे गए हैं। २. बारह सार्वभौमों या चक्रवर्तियों में से एक। (जैन)। ३. जैनों के अनुसार तीसरे स्वर्ग का नाम। ४. वह संत जिसकी अवस्था हमेशा एक सी रहे। सर्वदा बाल्य या युवावस्था में रहनेवाला तपस्वी (को०)।

सनत्सुजात
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक मानसपुत्र।

सनत्ता
सज्ञा पुं० [हि० सन] वह वृक्ष जिसपर रेशम के कीड़े पाले जाते हैं। जैसे,—शहतूत, बेर।

सनद
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. तकियागाह। आश्रय। सहारा। २. भरोसा करने की वस्तु। ३. प्रमाण। सबूत। दलील। ४. प्रमाणपत्र। सर्टिफिकेट। ५. आदर्श। नमुना। (को०)। ६. उदाहरण। मिसाल (को०)।

सनदयाफत्ता
वि० [अ० सनद + फ़ा० याफ़्तह] १. जिसे किसी बात की सनद मिली हो। प्रमाणपत्र प्राप्त। २. किसी परीक्षा में उत्तीर्ण।

सनदी (१)
वि० [अ० सनद] प्रमाणयुक्त। प्रमाणिक।

सनदी पु (२)
संज्ञा स्त्री० हालचाल। वृत्तांत। समाचार।

सनना
क्रि० अ० [सं० सन्धम् (पिघल कर मिलना)] १. जल के योग से किसी चूर्ण के कणों का एक में मिलना या लगना। गीला होकर लेई के रुप में मिलना। जैसे,—आटा सनना। २. गीली वस्तु के साथ मिलना। आप्लावित होना। ओतप्रोत होना। जैसे,—कपड़ा कीचड़ में सन गया। ३. लिप्त होना। पगना। एक में मिलना। लीन होना। उ०—बोलत बैन सनेह सने।—सूर (शब्द०)। संयों० क्रि०—जाना।

सननी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सनना] पानी में भिगा्या हुआ भृसा या सूखा चारा जो चौपायों को दिया जाता है। सानी।

सनमंध पु
संज्ञा पुं० [सं० सम्ब्न्ध] दे० 'संबंध'। उ०—मात पिता जोर्यौ सनमंधा। कै कछु आपुहि कीयौ धंधा।—सूंदर ग्रं०, भा०१, पृ० ३२३।

सनम
संज्ञा पुं० [अ०] १. बुत। प्रतिमा। मूर्ति (को०)। २. प्रिय। प्रियतम। प्यारा। यौ०—सनमकदा, सनखाना = बुतखाना। मंदिर। सनमपरस्त = बुतपरस्त। मूर्तिपूजक। सनमपरस्ती = बुतपरस्तो। मूर्तिपूजा।

सनमान पु०
संज्ञा पुं० [सं० सम्मान] दे० 'सम्मान'। उ०—केहि करनी जन जानि के सनमान किया रे। केहि अध अवगुन आपनो करि डारि दिया रे।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४७१।

सनमानना पु०
क्रि० स० [सं० सम्मान + हिं० ना (प्रत्य०)] खातिर करना। आदर करना। सत्कार करना। उ०—नृप सुनि आगे आइ पूजि सनमानेउ।—तुलसी (शब्द०)।

सनमुख पु
अव्य० [वि० सम्मुख] दे० 'सम्मुख'। उ०—सनमुख आएउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना।—मानस, १।३०३।

सनय
वि० [सं०] १. प्राचीन। पुराना। २. नीतियुक्त [को०]।

सनसन
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'सनसनाहट'।

सनसनाना
क्रि० अ० [अनु० सन सन] १. हवा में झोंके से निकलने या जाने का शब्द होना। २. खौलते हुए पानी का शब्द होना। ३. हवा बहने का शब्द होना।

सनसनाहट
संज्ञा पुं० [हि० सनसनाना] १. हवा बहने का शब्द। २. हवा में किसी वस्तु के वेग से निकलने का शब्द। ३. खौलते हुए पानी का शब्द। ४. सनसनी।

सनसनी
संज्ञा स्त्री० [अनु० सन सन] १. संवेदन सूत्रों में एक प्रकार का स्पंदन। झनझनाहट। झुनझुनी। जैसे,—दवा पीते ही शरीर में सनसनी सी मालूम हुई। २. अत्यंत भय, आश्चर्य आदि के कारण उत्पन्न स्तब्धता। ठक रह जाने का भाव। ३. उद्वेग। घबराहट। खलबली। क्षोभ। क्रि० प्र०—फैलाना। ४. दे० 'सनसनाहट'। ५. सन्नाटा। नीरवता।

सनसूत्र
संज्ञा पुं० [सं०] शण सूत्र। सन की डोरी या रस्सी [को०]।

सनहकी
संज्ञा स्त्री० [अ० सनहक] मिट्टी का एक बरतन जो बहुधा मुसलमान काम में लाते हैं।

सनहाना
संज्ञा पुं० [देश०] वह नाँद या बड़ा बरतन जिसमें भरे हुए खटाई मिले जल में धोने के पूर्व बरतन फूलने के लिये डाले जाते हैं।

सना (१)
अव्य० [सं०] हमेशा। सर्वदा। नित्य [को०]।

सना (२)
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. स्तुति। स्तवन। वंदना। २. तारीफ। प्रशंसा। श्लाधा [को०]।

सना (३)
संज्ञा पुं० [अ० सनह्] वत्सर। वर्ष। सन् [को०]।

सना (४)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] दे० 'सनाय'।

सनाढय
संज्ञा पुं० [सं० सन (= दक्षिणा) + आढय (=संपन्न)] ब्राह्मणों की एक शाखा जो गौड़ों के अंतर्गत कही जाती है।

सनात्
अव्य० [सं०] सर्वदा। हमेशा [को०]।

सनातन (१)
संज्ञा पु० [सं०] १. प्राचीन काल। अत्यंत पुराना समय। अनादि काल। जैसे,—यह बात सनातन से चली आती है। २. प्राचीन परंपरा। बहुत दिनों से चला आता हुआ क्रम। ३. ब्रह्मा। ४. विष्णु। ५. शिव (को०)। ६. वह जिसे सब श्राद्धों में भोजन कराना कर्तव्य हो। ७. ब्रह्मा के एक मानसपुत्र। ८. एक प्राचीन ऋषि [को०]।

सनातन (२)
वि० १. अत्यंत प्राचीन। बहुत पुराना। जिसके आदि का पता न हो। अनादि काल का। २. जो बहुत दिनों से चला आता हो। परंपरागत। जैसे,—सनातन रीति, सनातन धर्म। ३. नित्य। सदा रहनेवाला। शाश्वत। ४. द्दढ़। निश्चल। अचल (को०)।

सनातनतम
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का एक नाम [को०]।

सनातनधर्म
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राचीन धर्म। २. परंपरागत धर्म। ३. वर्तमान हिंदू धर्म का वह स्वरुप जो परंपरा से चला आता हुआ माना जाता है और जिसमें पुराण तंत्र, बहुदेबोपासना, प्रतिमापूजन, तीर्थ माहात्म्य आदि सब समान रुप से माननीय हैं। साधारण जनता के बीच प्रचलित हिंदू धर्म।

सनातनपुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु भगवान्। उ०—पुरुष सनाता की बधू क्यों न चंवला होय।—रहीम (शब्द०)।

सनातनी (१)
वि०,संज्ञा पुं० [सं० सनातन + ई (प्रत्य०)] १. जो बहुत दिनों से चला आता हो। जिसकी परंपरा बहुत पुरानी हो। २. सनातन धर्म का अनुयायी।

सनातनी (२)
स्त्री० [सं०] १. लक्ष्मी। २. दुर्गा। ३. पार्वती। ४. सरस्वती [को०]।

सनाथ
वि० [सं०] [स्त्री० सनाथा] १. जिसकी रक्षा करनेवाला कोई स्वामी हो। जिसके उपर कोई मददगार या सरपरस्त हो। उ०—हौं सनाथ ह्मै हौं सही जौ लघुतहि न भितैही।— तुलसी (शब्द०)। २. प्रभु या पतियुक्त। ३. कब्जा किया हुआ। अधिकृत [को०]। ४. संपन्न। सहित। युक्त (को०)। ५. जो जमाकोर्ण हो। जैसे,—सभा आदि (को०)। ६. कृतार्थ। कृतकृत्य। उ०—प्राइ रामपद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहि सनाथा।—मानस ४।२२। ७. सफल। मुहा०—सनाथ करना = शरण में लेना। आश्रय देना। सहायक होना।

सनाथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पति जीवित हो। पति- युक्ता स्त्री। सधवा स्त्री। सपतिका नारी [को०]।

सनाभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. सहोदर या सगा भाई। २. नजदीकी रिश्तेदार। सगा संबंधी [को०]।

सनाभि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सहोदर भाई। २. सन्निकट संबंधी जो सात पीढ़ी के अंदर हो (को०)। ३. संबंधी। रिश्तेदार (को०)। ४. एक ही पूर्वज से उत्पन्न पुरुष। सपिंड पुरुष।

सनाभि (२)
वि० १. समान केंद्र से संपृक्त या जुड़ा हुआ। जैसे,—रथचक्र का आरा। २. नाभियुक्त। ३. सदृश। तुल्य। समान। ४. सगा या सहोदर। ५. एक पूर्वज से उत्पन्न। सपिंड [को०]।

सनाभ्य
संज्ञा पुं० [सं०] एक ही कुल का पुरुष। सात पीढ़ियों के भीतर एक ही वंश का मनुष्य। सपिंड व्यक्ति।

सनाम, सनामक
वि० [सं०] एक ही या समान नाम का [को०]।

सनामा
वि० [सं० सनकामन्] [वि० स्त्री० सनाम्नी] दे० 'सनाम', 'सनामक' [को०]।

सनाय
संज्ञा स्त्री० [अ० सना] एक पौधा जिसकी पत्तियाँ दस्तावर होती हैं। स्वर्णपत्नी। सोनामुखी। विशेष—इस पौधे की अधिकतर जातियाँ अरब, मिस्र, यूनान, इटली आदि पश्चिम के देशों में होतो है। केवल एक जाति का पौधा भारतवर्ष के सिंध, पंजाब, मदरास आदि प्रांतों में थोड़ा बहुत होता है। इसकी पत्तियाँ इमली की तरह एक सींके के दोनों ओर लगती हैं। एक सींके में ५ से ८ जोड़े तक पत्तियाँ लगती हैं जो देखने में पीलापन लिए हरे रंग की होती हैं। इसमें चिपटी लंबी फलियाँ लगती हैं जो सिरे पर गोल होती हैं। इसकी पत्तियों का जुलाब हकीम ओर वैद्य दोनों साधारणतः दिया करते हैं। इसकी फलियों में भी रेचन गुण होता है, पर पत्तियों से कम। वैद्यक में सनाय रेचक तथा मंदाग्नि, विषम ज्वर, अजीर्ण, प्लीहा, यकृत्, पांडु रोग आदि को दुर करनेवाली कही गई है।

सनाल
वि० [सं०] नाल या डंठल से युक्त। जैसे,—सनाल कमल। उ०—सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि समोत देत जयमाला।—मानस, १।२६४।

सनाली
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जो स्त्रियों की दलाली करती हो। कुटनी। दूती [को०]।

सनासन
संज्ञा पुं० [हि० सन्मन] दे० 'सनसन'।

सनाह पु
संज्ञा पुं० [सं० सन्नाह] कबच। बकतर। उ०—उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे।—तुलसी (शब्द०)।

सनि पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० शनि] दे० 'शनि'।

सनि (२)
संज्ञा पुं०, स्त्री० [सं०] १. दान। भेंट। २. अर्चन। पूजन। ४. विनय। निवेदन। ५. दिशा [को०]। यौ०—सनिकाम = कुछ पाने के लिये इच्छुक। सनिवन्य = भिक्षा या याचना से प्राप्त।

सनिकार
वि० [सं०] निकारयुक्त। अपमानित। तिरस्कृत। अपमान- जनक [को०]।

सनिग्रह
वि० [सं०] दस्ता चया मूठ से युक्त [को०]।

सनित (१)
वि० [हि० सनना] मिश्रित। सना या साना हुआ। मिला हुआ [को०]।

सनित (२)
वि० [सं०] १. अंगीकृत। स्वीकृत। २. जो प्राप्त हो। पाया हुआ। लब्ध [को०]।

सनिद्र
वि० [सं०] सुप्त। निद्राभिभूत [को०]।

सनियम
वि० [सं०] १. नियम, धर्मानुष्ठान से युक्त। नियमवाला। २. नियमित। नियमपूर्वक [को०]।

सनिया †
संज्ञा पुं० [सं० शण] रेशमी धोती या वस्त्र।

सनिर्घृण
वि० [सं०] जिसमें दया न हो। निष्ठुर [को०]।

सनिर्विशेष
वि० [सं०] निरपेक्ष। उदासीन [को०]।

सनिर्वेद
वि० [सं०] अन्यमनस्क। निर्वेदयुक्त। खिन्न [को०]।

सनिष्ठिव, सनिष्ठीव, सनिष्ठेव (१)
वि० [सं०] जिसमें थूक मिला हो।

सनिष्ठिव, सनिष्ठीव, सनिष्ठेव (२)
संज्ञा पुं० वह शब्द या कथन जिसके उच्चारण में मुँह से थूक के छीटें उड़ते हों।

सनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आदरयुक्त प्रार्थना या निवेदन। २. दिशा। ३. गौरी का एक नाम (को०)। ४. हाथी का कान फटफटाना। ५. कांति। दीप्ति।

सनीचर
संज्ञा पुं० [सं० शनैश्चर] दे० 'शनैश्चर'।

सनीचरी
संज्ञा पुं० [हि० सनीचर + ई (प्रत्य०)] शनि की दशा, जिसमें दुःख, व्याधि आदि की अधिकता होती है। मुहा०—मीन की सनीचरी = मीन राशि पर शनि की स्थिति की दशा जिसका फल राजा और प्रजा दोनों का नाश माना जाता है। उ०—एक तौ कराल कलिकाल सूल मूल ता में कोढ़ में की खाज सी सनीचरी है मीन की।—तुलसी (शब्द०)।

सनीड़ (१)
अव्य० [सं० सनीड] १. पड़ोस में। बगल में। २. समीप। निकट।

सनीड़ (२)
संज्ञा पुं० नैकटय। प्रतिवेशिता। समीपता [को०]।

सनीड़ (३)
वि० १. पड़ोसी। बगल का। २. पास का। समीप का। ३. एक ही नीड़ में रहनेवाला [को०]।

सनील
वि० [सं०] दे० 'सनीड़'।

सनेमि
वि० [सं०] १.पूर्ण। पूरा। २. नेमियुक्त। परिधियुक्त। जिसमें मंडल हो [को०]।

सनेस, सनेसा †
संज्ञा पुं० [सं० सन्देश] दे० 'संदेश'।

सनेह पु
संज्ञा पुं० [सं० स्नेह] दे० 'स्नेह'।

सनेहिया पु
संज्ञा पुं० [हिं० सनेह + इया (प्रत्य०)] दे० 'सनेही'।

सनेही (१)
वि० [सं० चस्नेही, स्नेहिन्] स्नेह या प्रेम करनेवाला। प्रेमी।

सनेही (२)
संज्ञा पुं० चाहनेवाला। प्रियतम। प्यारा।

सनैसनै पु
अव्य० [सं० शनै?शनै?] दे० 'शनै? शनै?'।

सनोबर
संज्ञा पुं० [अ०] चीड़ का पेड़।

सन्न (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. चिरौजी का पेड़। पियाल वृक्ष। २. परिमाण में स्वल्पता। कमी। अल्पता (को०)। ३. नाश। ध्वंस। विनाश (को०)।

सन्न (२)
वि० [सं० शून्य, हिं० सुन्न] १. संज्ञाशून्य। संवेदनारहित। बिना चेतना का सा। स्तब्ध। जड़। जैसे,—यह भीषण संवाद सुनते ही वह सन्न रह गया। २. भौचक। ठक। स्तंभित। ३. एकबारगी खामोश। सहसा मौन। एकदम चुप। ४. डर से चुप। भय से नीरव। जैसे,—उसके डाँटते ही वह सन्न हो गया। क्रि० प्र०—करना। —होना। मुहा०—सत्र मारना = सन्नाटा खींचना। एकबारगी चुप हो जाना।

सन्न (३)
वि० [सं०] १. जो सिकुड़ गया हो। संकुचित। २. समाप्त। नष्ट। मृत। ३. दुर्बल। क्षीण। ४. सुस्त। विषराण। विषाद- युक्त। ६. जिसमें कोई हरकत न हो। गतिहीन। मंद। ७.झुका हुआ। अवनत। म्लान। ८. निकटस्थ। समीपर्वती। सटा हुआ। ९. बैठा हुआ। आसीन। १०. गत। प्रस्थित। ११. धीमा। मंद। जैसे,—स्वर [को०]। यौ०—सन्नकंठ = गद्गद कंठवाला। रुँधे गलेवाला। सन्न- जिह्व = जो चुप हो। मौन। सन्नधी = उत्साहरहित। विषण्ण। सन्नभाव = त्याक्ताश। म्लान। उद्विग्न। सन्न- मुसल = कार्य में अप्रयुक्त या रखा हुआ मूसल। सन्नवाक्, सन्नवाच् = मंद स्वर में बोलनेवाला। जो धीमी आवाज में बोलता हो। सन्नशरीर = श्लयदेह। थका हुआ। सन्नहर्ष = आनंदरहित। उत्साहहीन। विषणण।

सन्नक (१)
वि० [सं०] जो लंबा न हो। नाटा। बौना [को०]।

सन्नक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] पियाल वृक्ष। चिरौजी का पेड़।

सन्नकद्रु, सन्नकद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] चिरौजी का पेड़ [को०]।

सन्नत (१)
वि० [सं०] १. झुका हुआ। २. नीचे गया हुआ। ३. खिन्न। उदास [को०]। यौ०—सन्नतभ्रू = जिसकी भौंहें झुकी हों। टेढी़ भौहोंवाला।

सन्नत (२)
संज्ञा पुं० राम की सेना का एक बंदर।

सन्नतर
वि० [सं०] अत्यंत धीमा। अत्यंत मंद या मंद्र। जैसे,— स्वर [को०]।

सन्नति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. झुकाव। २. नम्रता, विनय। ३. किसी ओर प्रवृत्ति। मन का झुकाव। ४. कृपाद्दष्टि। मेहरबानी। ५. दक्ष की पुत्री और क्रतु की स्त्री का नाम। ६. ध्वनि। आवाज। ७. एक प्रकार का यज्ञ (को०)।

सन्नद्ध
वि० [सं०] १. बँधा हुआ। कसा या जकड़ा हुआ। २. कवच आदि बाँधकर तैयार। ३. तैयार। आमादा। उद्यत। ४. लगा हुआ। जुड़ा हुआ। मिला हुआ। ५. पास का। समीप का। ६. हिंसक। घातक (को०)। ७. फूटने या खिलने की ओर अभिमुख। विकासीन्मुख (को०)। ८. आनंदयुक्त। मोहक (को०)। ९. युक्त। संपन्न (को०)। यौ०—सन्नद्धकवच = जिसने कवच या जिरहबख्तर धारण किया हो। कवची। सन्नद्धयोध = पूर्णत; सज्जित या तैयार योद्धाओं से युक्त।

सन्नय
संज्ञा पुं० [सं०] १. समूह। झुंड। संख्या। परिमाण। तादाद। २. पिछला हिस्सा। पिछला अंश। ३. सेना का पिछला भाग [को०]।

सन्नयन
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक साथ करना। समीप लाना। २. संबंद्ध करने की क्रिया [को०]।

सन्नहन
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक साथ अच्छी तरह बाँधना। नढ़ना। पिरोना। २. तैयार होना। तत्पर होना। सन्नद्ध होना। ३. रस्सी। जेंवर। ४. युद्धोपकरण लड़ाई के हथियार आदि से युक्त होना। ५. उद्योग या प्रयत्न करना। ६. कसान। कसाव या खिंचाव। ७. तैयारी [को०]।

सन्नाटा (१)
संज्ञा पुं० [सं० शून्य, हिर० सुन्न + आटा (प्रत्य०)] १. चारों ओर किसी प्रकार का शब्द न सुनाई पड़ने की अवस्था। निःशब्दता। नीरवता। निस्तब्धता। जैसे,—मेला उठ जाने पर वहाँ सन्नाटा हो गया। क्रि० प्र०—करना। —छाना। —फैलाना।—होना। २. किसी प्राणी के न होने का भाव। निर्जनता। निरालापन। एकांतता। जैसे,—वहाँ सन्नाटे में पुकारने से भी कोई न सुनेगा। ३. अत्यंत भय या आश्चर्य के कारण उत्पन्न मौन और निश्चेष्टता। ठक रह जाने का भाव। स्तब्धता। मुहा०—सन्नाटे में आना = ठक रह जाना। स्तंभित हो जाना। कुछ कहते सुनते न बनना। मुहा०—सन्नाटा खिंचना या मारना = एकबारगी चुप हो जाना। एकदम मौन हो जाना। ५. चहल पहल का अभाव। विनोद या मनोरंजन का न होना। उदासी। मुहा०—सन्नाटा बीतना = उदासी में समय काटना। ६. काम धंधे से गुलजार न रहना। जैसे,—अब तो कारखाने में सन्नाटा रहता है।

सन्नाटा (२)
वि० १. जहाँ किसी प्रकार का शब्द आदि न सुनाई पड़ता हो। नीरव। स्तब्ध। २. निर्जन। निराला। जैसे,—सन्नाटा मैदान।

सन्नाटा (३)
संज्ञा पुं० [अनु० सनसन] १. हवा के जोर से चलने की आवाज। वायु के बहने का शब्द। जैसे,—आज तो बड़े सन्नाटे की हवा है। मुहा०—सन्नाटे का = सन सन शब्द के साथ बहता हुआ। २. हवा चीरते हुए तेजी से निकल जाने का शब्द। वेग से वायु में गमन करने का शब्द। मुहा०—सन्नाटे के साथ या सन्नाटे से = वेग से। झोंके से। बड़ी तेजी से। जैसे,—तीर सन्नाटे से निकल गया।

सन्नादन
संज्ञा पुं० [सं०] राम की सेना का एक यूथप बंदर।

सन्नाम
संज्ञा पुं० [सं० सन्नामन्] सत् नाम। अच्छा नाम। सुनाम [को०]।

सन्नाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. कवच। बकतर। उ०—पिधउ दिढ़ सन्नाह वाह उप्परि पक्खर दइ।—इतिहास, पृ० २८। २. उद्योग। प्रयत्न। ३. स्वयं को शस्त्रास्त्र से सुसज्जित करना (को०)। ४. युद्ध जेसी सज्जा (को०)। ५. सामग्री। सामान। उपकरण (को०)।

सन्नाह्य
संज्ञा पुं० [सं०] युद्ध के योग्य एक विशेष प्रकार का हाथी।

सन्नि
संज्ञा स्त्री० [सं०] खिन्नता। विषण्णता। निराशा [को०]।

सन्निकट
अव्य० [सं०] समीप। पास। निकट।

सन्निकर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० सन्निकृष्ट] १. संबंध। लगाव। २. नाता। रिश्ता। ३. समीप्य। समीपता। ४. इंद्रियों का विषयों के साथ संबंध (न्याय)। विशेष—यहि ज्ञान का कारण है और लौकिक तथा अलौकिक दो प्रकार का कहा गया है।४. पात्र। आधार। आश्रय। ५. निकट खींचना। समीप लाना (को०)। ६. नूतन विषय या विचार (को०)।

सन्निकर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० सन्निकर्ष [को०]।

सन्निकाश
वि० [सं०] उसी रुप रंग का। सदृश। समान।

सन्निकोणँ
वि० [सं०] पूरी तौर से। छितराया हुआ। पूर्णत; फैला हुआ [को०]।

सन्निकृष्ट (१)
वि० [सं०] १. समीपवाला। नजदीक का। २. जो पास खिंच आया हो। समीप खींचा हुआ [को०]।

सन्निकृष्ट (२)
संज्ञा पुं० पड़ोस।

सन्निचय
संज्ञा पुं० [सं०] १. बटोरना। एकत्र करना। ढेर करना। २. भंड़ार। राशि [को०]।

सन्निचित
वि० [सं०] १. राशीभूत। एकत्रित। २. अवरुद्ध। अवष्टं- भित। रुका हुआ। जैसे,—सन्निचित मल। (सुश्रुत))।

सन्निताल
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत में एक प्रकार का ताल [को०]।

सन्निध
संज्ञा पुं० [सं०] १. समीप्य। २. आमने सामने की स्थिति।

सन्निधाता
संज्ञा पुं० [सं० सन्निधातृ] १. आकर्षण करने या पास लानेवाला। २. जो एकत्र या जमा करता हो। ३. वह जो अपनी निगरानी में रखे। पास रखनेवाला। ४. न्यायपीठ के समक्ष लोगों को सविवरण उपस्थित करनेवाला अधिकारी। ५. वह जो चोरी का माल रखता हो (को०)।

सन्निधान
संज्ञा पुं० [सं०] १. आमने सामने की स्थिति। २. निकटता। समीपता। ३. रखना। धरना। ४. स्थापित करना। ५. किसी वस्तु के रखने का स्थान। ६. वह स्थान जहाँ धन एकत्र किया जाय। निधि। ७. दृष्टिगोचरता (को०)। ८. ग्रहण करना। भार लेना (को०)। ९. संमिश्रण (को०)। १०. इंद्रियों का विषय (को०)।

सन्निधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. समीपता निकटता। २. आमने सामने की स्थिति। ३. पड़ोस। दे० 'सन्निधान'।

सन्निपात
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक साथ गिरना या पड़ना। २. जुटना। भिड़ना। टकराना। ३. संयोग। मेल। मिश्रण। ४. इकट्ठा होना। एक साथ जुटना। ५. कफ, वात और पित्त तीनों का एक साथ बिगड़ना। त्रिदोष। सरसाम। विशेष—यह वास्तव में कोई अलग रोग नहीं है, बल्कि एक विशेष अवस्था है जो ज्वर या और किसी व्याधि के बिगड़ने पर होती है। यह कई प्रकार का होता है। सबसे साधारण रुप वह है जिसमें रोगी का चित भ्रांत हो जाता है, वह अंड- बंड बकने लगता है तथा उछलता कूदता है। आयुर्वेद में १३ प्रकार के सन्निपात कहे गए हैं—संधिग, अंतक, रुग्दाह, चित्त- भ्रम, शीतांग, तंद्रिक, कंठकुब्ज, कर्णक, भग्ननेत्र, रक्तष्ठीव, प्रलाप, जिह्वक, और अभिन्यास। ६. एक साथ कई बातों का घटना या ठीक उतरना। ७. समाहार। समूह। ८. आना। पहुँचना (को०)। ९. संगीत में एक प्रकार का ताल (को०)। १०. मैथुन। संभोग (को०)। ११. युद्ध। लड़ाई (को०)। १२. ग्रहों का विशेष योग (को०)।

सन्निपातक
संज्ञा पुं० [सं०] त्रिदोष विशेष। दे० 'सन्निपात'—५ [को०]।

सन्निपातित
वि० [सं०] १. च्युत। निःसृत। २. समवेत। इकट्ठा। एकत्र [को०]।

सन्निपाती
वि० [सं० सन्निपातिन्] सामवायिक [को०]।

सन्निबध
संज्ञा पुं० [सं० सन्निबन्ध] १. एक में बाँधना। जकड़ना। २. लगाव। संबंध। ३. प्रभाव। तासीर। ४. फल। परिणाम।

सन्निबद्ध
वि० [सं०] १. एक में बँधा हुआ। जकड़ा हुआ। २. लगा। हुआ। अड़ा हुआ। फँसा हुआ। ३. सहारे पर टिका हुआ। आश्रित। ४. व्यवस्थित (को०)।

सन्निबर्हण
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिरोध। प्रतिबंध [को०]।

सन्निभ
वि० [सं०] सदृश। समान। मिलता जुलता।

सन्निभृत
वि० [सं०] १. अच्छी तरह छिपाया हुआ। गुप्त। २. समझ बूझकर बोलनेवाला। ३. चत्तुर। शिष्ट (को०)।

सन्निमग्न
वि० [सं०] १. खूब डूबा हुआ। २. सोया हुआ।

सन्निमित
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छा सगुन। २. जिसका कारण सत् या अच्छा हो। ३. भले लोगों का हित [को०]।

सन्नियता
वि० [सं० सन्नयन्तृ] शासन करनेवाला। नियामक। व्यवस्थापक [को०]।

सन्नियोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छा योग। संयोग। संबंध। २. नियुक्ति। ३. लगाव। ४. फरमान। आज्ञा। आदेश [को०]।

सन्निरुद्ध
वि० [सं०] १. रोका हुआ। ठहराया हुआ। अड़ाया हुआ। २. दबाया हुआ। दमन किया हुआ। ३. एक साथ रखा या बटोरा हुआ। जैसे,—ठसाठस भरा हुआ। कसा हुआ।

सन्निरोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. रोक। रुकावट। बाधा। २. दमन। निवारण। ३. निग्रह। बंधन। कारागृह (को०)। ४. तंगी। संकोच। ५. तंग रास्ता। सँकरी गली।

सन्निवाय
संज्ञा पुं० [सं०] संहति। संघात [को०]।

सन्निवास
संज्ञा पुं० [सं०] १. भले लोगों के साथ रहना। साथ रहना। २. निवास। बसति। नीड [को०]।

सन्निविष्ट
वि० [सं०] १. एक साथ बैठा या मिला हुआ। २. जमा हुआ। धरा हुआ। ३. स्थापित। प्रतिष्ठित। ४. लगा हुआ। जड़ा हुआ। ५. अँटा हुआ। आया हुआ। ६. समाया हुआ। लीन। ७. पास का। लगा हुआ। ८. जिसने शीविर या पड़ाव डाला हो (को०)।

सन्निवृत्त
वि० [सं०] १. जो लौट आया हो। प्रत्यावर्तित। २. ठहरा या रुका हुआ। ३. जो अलग हट गया हो। पराङमुख [को०]।

सन्निवृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लौट आना। पलटना। प्रत्यावर्तन। २. ठहरना। रुकना। ३. अलग हटना। दूर होना। ४. रोकने की क्रिया [को०]।

सन्निवेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक साथ बैठना। २. जमना। स्थित होना। बैठना। ३. रखना। धरना। ठहरना। ४. लगाना। जड़ना। बैठाना। ५. अँटना। भीतर आना। समाना। ६.स्थिति। आधार। रखने की जगह। ७. आसन। बैठकी। ८. रहने की जगह। निवास। घर। ९. पुर या ग्राम के लोगों के एकत्र होने का स्थान। अथाई। चौपाल। १०. एकत्र होना। जुटना। ११. समूह। समाज। १२. योजना। व्यवस्था। १३. रचना। १४. गढ़न। गठन। बनावट। आकृति। १५. स्तंभ, मूर्ति आदि की स्थापना। १६. गहरी पैठ। १७. उत्कट भक्ति (को०)। १८. संचय। समुच्चय (को०)। १९. डेरा डालना। शिविर स्थापित करना।

सन्निवेशन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० सन्निवेशित, सन्निवेशी, सन्निवेश्य, सन्निविष्ट] १. एक साथ बैठना। २. बैठना। जमना। ३. रखना। धरना। ४. बैठाना। लगाना। जड़ना। ५. टिकाना। ठहराना। अड़ाना। ६. स्थापित करना। जैसे,— प्रतिमा या स्तंभ का सन्निवेशन। ७. वास। निवास। ८. विधान। व्यवस्था।

सन्निवेशित
वि० [सं०] १. बैठाया हुआ। जमाया हुआ। २. ठहराया हुआ। रखा हुआ। ३. स्थापित। प्रतिष्ठित। ४. अँटाया हुआ। भीतर डाला हुआ। ५. सौंपा हुआ (को०)।

सन्निसर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] सत् स्वभाव। विनयशीलता। उदा- रता [को०]।

सन्निहित (१)
वि० [सं०] १. एक साथ या पास रखा हुआ। २. समीपस्थ। निकटस्थ। ३. रखा हुआ। धरा हुआ। ४. ठहराया हुआ। टिकाया हुआ। अड़ाया हुआ। ५. जो कुछ करने पर हो। उद्यत। तैयार। ६. उपस्थित। विद्यमान (को०)।

सन्निहित (२)
संज्ञा पुं० १. समीप्य। २. एक प्रकार की अग्नि [को०]।

सन्निहितापाय
वि० जिसका विनाश निकट ही हो। क्षणभंगुर [को०]।

सन्नी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मन] सन की जाति का एक प्रकार का छोटा पौधा। विशेष—वह पौधा प्रायः सारे भारत और बरमा में पाया जाता है। इसके डंठलों से भी एक प्रकार का मजबुत रेशा निकलता है; पर लोग उसका व्यवहार कम करते हैं। यह देखने में बहुत सुंदर होता है; अतः कहीं कहीं लोग इसे बागों में शोभा के लिये भी लगाते हैं।

सन्नोदन
संज्ञा पुं० [सं०] १. पशु आदि को चलाना। हाँकना। २. प्रेरित करना। उभारना। उसकाना।

सन्मंगल
संज्ञा पुं० [सं० सन्मङ्गल] भला काम [को०]।

सन्मणि
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तम कोटि का रत्न [को०]।

सन्मति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'सम्मति' [को०]।

सन्मातुर
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो साध्वी स्त्री का पुत्र हो। सती स्त्री का पुत्र [को०]।

सन्मात्र (१)
वि० [सं०] जिसका अस्तित्व मात्र स्वीकार्य हो [को०]।

सन्मात्र (२)
संज्ञा पुं० [सं०] आत्मा का एक नाम [को०]।

सन्मान
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सम्मान'।

सन्मानना पु
क्रि० स० [हिं० सन्मानना] दे० 'सनमानना'।

सन्मार्ग
संज्ञा पुं० [सं०] सत् मार्ग। अच्छा गार्ग। यौ०—सन्मार्गगामी = सुमार्ग पर चलनेवाला। सन्मार्गयोधी = धर्म या नियम के अनुसार लड़नेवाला योद्धा। सन्मार्गर्स्थ = सत्यमार्ग पर स्थित। सन्मार्गगामी।

सन्मार्गलोकन
संज्ञा पुं० [सं०] सत्पथ पर चलना। सुमार्ग पर चलना।

सन्मार्गी
वि० [सं० सन्मार्गिन्] सुपथ पर चलनेवाला। सत् पथ पर गमन करनेवाला।

सन्मुख
अव्य० [सं० सम्मुख] दे० 'सम्मुख'।

सन्यासन
संज्ञा पुं० [सं० संन्यसन, सन्यसन] [वि० संन्यस्त] १. फेंकना। छोड़ना। अलग करना। हटाना। दूर करना। २. सांसारिक विषयों का त्याग। दुनिया का जंजाल छोड़ना। ३. रखना। धरना। ४. बैठाना। जमाना। स्थापित करना। ५. खड़ा करना। ६. जमा करना (को०)। ७. सौंपना (को०)।

सन्यस्त
वि० [सं० संन्यस्त, सन्न्यस्त] १. फेंका हुआ। अलग किया हुआ। २. रखा हुआ। धरा हुआ। ३. बैठाया हुआ। जमाया हुआ। ४. सौंपा हुआ (को०)।

सन्यास
संज्ञा पुं० [सं० संन्यास, सन्न्यास] १. छोड़ना। दूर करना। त्याग। २. सांसारिक प्रपंचों के त्याग की वृत्ति। दुनिया के जंजाल से अलग होने की अवस्था। वैराग्य। ३. चतुर्थ आश्रम। यति धर्म। विशेष—यह प्राचीन भारतीय आर्यों या हिंदुओं के जीवन की चार अवस्थाओं में से अंतिम है जो पुत्र आदि के सयाने हो जाने पर ग्रहण की जाती थी। इसमें मुनुष्य गृहस्थी छोड़कर जंगल या एकांत स्थान में ब्रह्मचिंतन या परलोकसाधन में प्रवृत्त रहते थे और भिक्षा द्वारा निर्वाह करते थे। इसमें किसी आचार्य से दीक्षा लेकर सिर मुँड़ाते और दंड ग्रहण करते थे। संन्यास दो प्रकार का कहा गया है—एक सक्रम अर्थात् जो ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य और वानप्रस्थ आश्रम के उपरांत ग्रहण किया जाय; दूसरा अक्रम जो बीच में ही वैराग्य उत्पन्न होनेपर धारण किया जाय। बहुत दिनों तक 'संन्यास' कलिवर्ज्य माना जाता था; पर शंकराचार्य ने बौद्ध भिक्षुओं ओर जैन यतियों को अपने अपने धर्म का प्रचार बढ़ाते देख कलिकाल में फिर संन्यास चलाया और गिरि, पुरी, भारती आदि दस प्रकार के संन्यासियों की प्रतिष्ठा की जो दशनामी कहे जाते हैं। क्रि० प्र०—ग्रहण करना।—लेना। ४. सहसा शरीर का त्याग। एकबारगी मरण। ५. एकदम थक जाना। चरम शैथिल्य। ६. धरोहर। थाती। ७. वादा। इकरार। ८. बाजी। होड़। खेल में शर्त लगाना। ९. जटामासी।

सन्यासी
संज्ञा पुं० [सं० संन्यासिन्, सन्न्यासिन्] [स्त्री० संन्यासिनी, संन्यासिन] १. वह पुरुष जिसने संन्यास धारण किया हो। चतुर्थ आश्रमी। २. विरागी। त्यागी। यति। ३. वह जो त्याग देता है (को०)। ४. भोजन का त्याग करनेवाला (को०)।

सपंक पु
वि० [सं० स + पङ्क] १. कीचड़ से भरा हुआ। २. मुसीबत से भरा हुआ। उ०—मन मानि अतंका करि सत संका सिंधु सपंका तरितरिगे।—पद्माकर ग्र० पृ०१९।

सपई
संज्ञा स्त्री० [हिं० साँप] १. एक प्रकार का लंबा कीड़ा जो मनुष्यों और पशुओं की आँतों में उत्पन्न होता है। पेट का केचुवा। २. बेला नामक फल।

सपक्ष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] अनुकुल पक्ष। मुवाफिक राय।

सपक्ष (२)
वि० १. जो भपने पक्ष में हो। तरफदार। २. समर्थक। पोषक। ३. पक्षयुक्त। डैनों वाला (को०)। ४. पक्षवाला। दलवाला (को०)। ५. पंखदार (बाण)। उ०—चले बान सपक्ष जनु उरगा।—मानस, ६।९३। ५. सदृश। समान (को०)। ६. एक जाति, वर्ग या श्रेणी का। ७. जिसमें साध्य या अनुमान का पक्ष हो (को०)।

सपक्ष (३)
संज्ञा पुं० १. तरफदार। मित्र। सहायक। २. न्याय में वह बात या दृष्टांत जिसमें साध्य अवश्य हो। जैसे,—जहां धूआँ होता है, वहाँ आग रहती है। जेसे,—रसोईघर का दृष्टांत सपक्ष है। ३. सजातीय। रिश्तेदार (को०)।

सपक्षक
वि० [सं०] पक्षयुक्त। पंखोंवाला [को०]।

सपक्षी
वि० [सं० सपक्ष] दे० 'सपक्ष'।

सपच्छ पु
वि० [सं० सपक्ष, प्रा० सपच्छ] दे० 'सपक्ष'।

सपटा †
संज्ञा पुं० [देश०] १. सफेद कचनार। २. एक प्रकार का टाट। ३. मूँज की बनी एक प्रकार की पेटारी।

सपट्टी
संज्ञा स्त्री० [सं०] द्वार के चौखट की दोनों खड़ी लकडियाँ। बाजू।

सपड़ना ‡
क्रि० अ० [हिं० सपरना] दे० 'सपरना'।

सपड़ाना ‡
क्रि० स० [हिं० सपराना] दे० 'सपराना'।

सपत पु
अव्य० [सं० सपदि] दे० 'सपदि'।

सपताक
वि० [सं०] पताका सहित। झंडेवाला [को०]।

सपत्न (१)
संज्ञा पुं० [सं०] अरि। बैरी। विरोधी। शत्रु। यौ०—सपत्नजित्। सप्त्नदूषण, सपत्नबलनाशन = शत्रु का संहार करनेवाला। सपत्नवृद्धि = बैरियों की वृद्धि। सपत्नश्री = वैरी की विजय। सपत्नसूदन = शत्रुहंता। शत्रुसूदन।

सपत्न (२)
वि० शत्रुता रखनेवाला। दुश्मन। वैरी। शत्रु [को०]।

सपत्नजित्
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रु को जीतनेवाला। २. सुदत्ता के गर्भ से उत्पन्न कृष्ण के एक पुत्र का नाम।

सपत्नता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैर। शत्रुता।

सपत्नारि
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का ठोस बाँस जिसके डंडे या छड़ियाँ बनती हैं।

सपत्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक ही पति की दूसरी स्त्री। जो अपने पति की दूसरी स्त्री हो। सौत। सौतिन।

सपत्नीक
वि० [सं०] स्त्री के सहित। जोरु के साथ। जैसे,—आप सपत्नीक तीर्थ करने जायँगे।

सपत्न
वि० [सं०] पत्तों या पंखों के सहित [को०]।

सपत्राकरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. ऐसा बाण मारना कि उसके पख तक भीतर घुस जायँ। २. बहुत पीड़ित करना [को०]।

सपत्राकृत
वि० [सं०] १. जिसे ऐसा तीर लगा हो कि उसके पंख तक भीतर घुस गए हो। २. आहत। घायल [को०]।

सपत्राकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] अत्यंत कष्ट या पीड़ा। दारुण व्यथा [को०]।

सपथ
संज्ञा पुं० [सं० शपथ] दे० 'शपथ (४)'। उ०—भामिनि राम सपथ सत मोही।—मानस, २।२६।

सपदि
अव्य० [सं०] उसी समय। तुरंत। शीघ्र। जल्द। उ०—(क) सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई।—मानस, ६।८४। (ख) सठ स्वपक्ष तब हृदय बिसाला। सपदि होहि पक्षी चंडाला।—मानस, ७।११२।

सपन †
संज्ञा पुं० [हिं० सपना] दे० 'सपना'। उ०—सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोचविमोचन।— मानस, २।२२५।

सपना (१)
संज्ञा पुं० [सं० स्वप्न] १. वह दृश्य जो निद्रा की दशा में दिखाई पड़े। नींद में अनुभव होनेवाली बात। २. निद्रा की दशा में दृश्य देखना। मुहा०—सपना होना = देखने को भी न मिलना। दुर्लभ हो जाना।

सपना पु (२)
क्रि० अ० [सं० सर्पण, प्रा० सप्पण] चलना। गतिशील होना। उ०—लय षग्ग रमक्किय प्रेत दिसं, बर बीर सु मंडिय चित्त रस। अविलंध करी सकरं विपनं, रिपु थान सपंत सु भै न मनं।—पृ० रा०, १।५३०।

सपरदा, सपरदाई
संज्ञा पुं० [सं० सम्प्रदायी] गानेवाली तवायफ के साथ (तबला, सारंगी आदि) बजानेवाला। भँड़वा। समाजी। साजिंदा।

सपरना
क्रि० अ० [सं० सम्पादन, प्रा० संपाडन] १. किसी काम का पूरा होना। समाप्त होना। निबटना। २. काम का किया जा सकना। हो सकना। जैसे,—यह काम हमसे नहीं सपरेगा। मुहा०—सपर जाना = मर जाना। ३. तैयारी करना। तैयार होना।

सपरब
वि० [सं० सपर्व] गाँठयुक्त। पोरदार। उ०—बेनु हरित मनिमय सब कीने। सरल सपरब परहिं नहिं चीने।—मानस, १।२८०।

सपरस पु
वि० [हिं० स (=सह) + परस (=स्पर्श)] छूत से युक्त। स्पृश्य। स्पर्श करने योग्य। 'अपरस' का विलोम। उ०—अपरस ठौर तहाँ सपरस जाइ कैसे, बासना न धोवै तौं लौ तन के पखारें कहा।—घनानंद, पृ० १९८।

सपराना
क्रि० स० [हिं० सपरना] १. काम पूरा करना। निबटाना। खतम करना। २. पूरा कर सकना। कर सकना। ३. † नहलाना। स्नान कराना।

सपरिकर
वि० [सं०] १. अनुचर वर्ग के साथ। २. ठाठ बाट के साथ। जुलूस के साथ।

सपरिक्रम
वि० [सं०] दे० 'सपरिकर' [को०]।

सपरिच्छद
वि० [सं०] १. अनुचर वर्ग के साथ। २. तैयारी के साथ। ठाठ बाट के साथ। जुलूस के साथ।

सपरिजन
वि० [सं०] दे० 'सपरिकर'। उ०—बहुरि सपरिजन भरत कहु रिषि अस आयेसु दीन्ह।—मानस, २।२१३।

सपरिवृंहण
वि० [सं०] परिशिष्ट से युक्त (वेद)।

सपरिवार
वि० [सं०] कुटुंबियों या आत्मीयों के सहित [को०]।

सपरिवाह
वि० [सं०] १. जो पूरा भरा हो। लबरेज। २. सतह से ऊपर बहता हुआ [को०]।

सपरिव्यय
वि० [सं०] विविध प्रकार की सामग्री, मसाले आदि के योग से तैयार किया गया। जैसे,—खाद्य पदार्थ [को०]।

सपरिहार
वि० [सं०] १. परिहार या अपवाद युक्त। २. शालीनता या भीरुता से युक्त [को०]।

सपर्ण
वि० [सं०] पत्युक्त। पत्तियोंवाला [को०]।

सपर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पूजा। आराधना। उपासना। २. सत्कार। सेवा टहल (को०)।

सपशु
वि० [सं०] १. पशुयुक्त। जानवरों के सहित। २. जो पशुवलि से संबंधित हो [को०]।

सपाट
वि० [सं० स + पट्ट, हिं० पाटा (=पीढ़ा)] १. बराबर। हमवार। समतल। २. जिसकी सतह पर कोई उभरी या जमी हुई वस्तु न हो। चिकना।

सपाटा
संज्ञा पुं० [सं० सर्पण (=सरकना)] १. चलने, दौड़ने या उड़ने का वेग। झोंक। तेजी। जैसे,—सपाटे के साथ दौड़ना। २. तीव्र गति। दौड़। झपट। झपटा। क्रि० प्र०—भरना।—मारना।—लगाना। यौ०—सैर सपाटा = घूमना फिरना।

सपाद
वि० [सं०] १. चरण सहित। २. चतुर्थांश युक्त। ३. चतुर्थांश और अधिक के साथ। जिसमें एक का चौथाई और मिला हो। जैसे, सवा दो, सवा तीन, सवा चार। यौ०—सपादपीठ = पादपीठ के साथ। पादपीठिका से युक्त। पैर रखने की छोटी चौकी से युक्त। सपादमत्स्य = एक प्रकार का मत्स्य। सपादलक्ष = सवा लाख। एक लाख। एक लाख पचीस हजार।

सपादुक
वि० [सं०] जो पादुका, खड़ाऊँ या चट्टी पहने हो [को०]।

सपाल
वि० [सं०] १. पशुपालक से रक्षित या युक्त। जिसके साथ पशुपालक हो। २. राजा से युक्त [को०]।

सपिंड
संज्ञा पुं० [सं० सपिण्ड] एक ही कुल का पुरुष जो एक ही पितरों को पिंडदान करता हो। एक ही खानदान का। विशेष—छह् पीढ़ी उपर और छह् पीढी़ नीचे तक के लोग सपिंड की गणना में आते है। इनके अतिरिक्त माता, नाना और पड़नाना आदि, कन्या, कन्या का पुत्र और पौत्र आदि तथा पिता माता के भाई बहिन आदि बहुत से आते हैं।

सपिंडन
संज्ञा पुं० [सं० सपिणडन] दे० 'सपिंडीकरण' [को०]।

सपिंडी
संज्ञा स्त्री० [सं० सपिणडी] मृतक के निमित्त वह कर्म जिसमें वह और पितरों या परिवार के मृत प्राणियों के साथ पिंडदान द्वारा मिलाया जाता है।

सपिंडीकरण
संज्ञा पुं० [सं० सपिणडीकरण] १. समान पितरों के संमान में किया जानेवाला विशेष श्राद्ध का अनुष्ठान। यह श्राद्ध पहिले मृतक की मृत्यु तिथि के एक वर्ष बाद किया जाता था किंतु आजकल १२वें दिन ही किया जाने लगा है। २. किसी व्यक्ति को सपिंड का अधिकार देना [को०]।

सपीड
वि० [सं०] पोड़ा या वेदनायुक्त [को०]।

सपीतक्
संज्ञा पुं० [सं०] घीया तुरई। नेनुवा।

सपीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] बहुतों के एक साथ बैठकर पीने या खाने की क्रिया। सहपान या सहभोज [को०]।

सपीतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] लंबी घीया या कद्दू।

सपुर पु
वि० [सं०] पुरवासियों के साथ। उ०—देखि सपुर परिवार जनक हिय हारेउ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५३।

सपुलक
वि० [सं०] पुलक या हर्ष के साथ।

सपूत
संज्ञा पुं० [सं० सत्पुत्र, प्रा० सपुत्त, सउत्त] वह पुत्र जो अपने कर्तव्य का पालन करे। अच्छा पुत्र। उ०—सूर सुजान सपूत सुलच्छन गनियत गुन गरुआई।—तुलसी (शब्द०)।

सपूती
संज्ञा स्त्री० [हिं० सपूत + ई (प्रत्य०)] १. सपूत होने का भाव। लायकी। २. योग्य पुत्र उत्पन्न करनेवाली माता।

सपेत, सपेद पु †
वि० [फ़ा० सफै़द, मि० सं० श्वेत] सफेद। श्वेत। धवल।

सपेती पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सफेदी] दे० 'सफेदी'।

सपेरा
संज्ञा पुं० [हिं० सँपेरा] दे० 'सँपेरा'।

सपेला
संज्ञा पुं० [हिं० साँप + ऐला (प्रत्य०)] साँप का छोटा बच्चा। उ०—जिमि कोउ करै गरुड़ सौं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला।—मानस, ३।५०।

सपोत
वि० [सं०] जिसके पास नाव हो। पोत युक्त [को०]।

सपोला
संज्ञा पुं० [हिं० साँप + ओला (प्रत्य०)] साँप का छोटा बच्चा।

सपौष्णमैत्र
वि० [सं०] रेवती सौर अनुराधा नक्षत्र से युक्त [को०]।

सप्त
वि० [सं०] गिनती में सात। यौ०—सप्तकोण = सात कोणों वाला। सप्तगंग = एक स्थान- विशेष जहाँ गंगा सात धाराओं में बहती है। सप्तगोदावरी = एक नदी। सप्तज्वाल = सप्तार्चि। अग्नि। सप्ततंति, सप्ततंत्र = सात तारों से युक्त। सप्तदीधिति = अग्नि। सप्त द्वारा- वकीर्ण = सात द्वारों—पाँच इंद्रियाँ, मन और बुद्धि से युक्त। सप्तधातुक = सात धातुओं वाला। सप्तदिन, सप्तदिवस = सप्ताह। सप्तपद = सात पदों का। सप्तपुरुष = जो सात पोरसा लंबा हो। सप्तबोध्यंग कुसुमाढ्य = एक बुद्ध का नाम। सप्तभुमिक,सप्तभूमिमय, सप्तमौम = सात मंजिलों वाला। सप्त- मरीचि = सात मरीचि या किरणों वाला। सप्तार्चि। अग्नि। सप्तमहाभाग = विष्णु। सप्तमास्य = सतवाँसा। सप्त यम = सात स्तरों वाला। सप्तरात्र = सात रात्रि का काल। सप्ताह। सप्तरात्रक = जो सात रात तक चले। साप्ताह्णिक। सप्तवर्ग = सात का समाहार। सप्तवर्ष = सात वर्ष का। सप्तविदारु = एक वृक्ष का नाम। सप्तविध = सात प्रकार का। सप्तसमाधि- परिष्कारकः, सप्तसमाधिपरिष्कारदायक = बुद्ध का एक नाम।

सप्तऋषि
संज्ञा पुं० [सं० सप्तार्षि] दे० 'सप्तर्षि'।

सप्तक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सात वस्तुओं का समूह। २. संगीत में सात स्वरों का समुह।

सप्तक (२)
वि० [वि० स्त्री० सप्तका, सप्तकी] १. सात से युक्त। २. जों छह् के बाद हो। सात। ३. सप्तम। सातवाँ [को०]।

सप्तकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्त्रियों का कमरबंद।

सप्तकृत्
संज्ञा पुं० [सं०] विश्वेदेवा में से एक।

सप्तगुण
वि० [सं०] सात बार और। सतगुना।

सप्तग्रही
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक ही राशि में सात ग्रहों का योग या एकत्र होना।

सप्तचत्वारिंश
वि० [सं०] सैतालीसवाँ।

सप्तचत्वारिंशत्
वि० [सं०] सैतालीस।

सप्तचछद
संज्ञा पुं० [सं०] सपत्पर्ण वृक्ष। छतिवन।

सप्तजिह्ण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि, जिसकी सात जिह्मएँ मानी गई हैं।

सप्तजिह्न (२)
वि० सात जिह्नावाला। जिसे सात जीभ हों [को०]।

सप्तति
वि० [सं०] सत्तर।

सप्ततितम
वि० [सं०] सत्तरवाँ।

सप्तत्रिंश
वि० [सं०] सैतीसवाँ।

सप्तत्रिंशत्
वि० [सं०] सैतीस।

सप्तदश (१)
वि० [सं०] सत्तरहवाँ।

सप्तदश (२)
वि० [सं० सप्तदशन्] सत्तरह।

सप्तदशक
वि० [सं०] सत्रह से युक्त। जिसमें सत्रह हों [को०]।

सप्तदशम
वि० [सं०] सत्तरहवाँ।

सप्तद्वीप
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार पृथ्वी के सात बड़े और मुख्य विभाग। विशेष—सात द्वीप ये हैं—जंबू द्वीप, कुश द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मलि द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप और पुष्कर द्वीप। २. पृथ्वी, जो सात द्वीपों से युक्त है।

सप्तधा
वि० [सं०] १. सात भागों में। २. सात गुना [को०]।

सप्तधातु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] आयुर्वेंद के अनुसार शरीर के सात संयोजक द्रव्य अर्थात् रक्त, पित्त, मांस, वसा, मज्जा, अस्थि और शुक्र।

सप्तधातु (१)
वि० सात धातुओं से बना हुआ। जैसे,—शरीर।

सप्तधातु (२)
संज्ञा पुं० चंद्रमा के घोड़ों में से एक नाम।

सप्तधान्य
संज्ञा पुं० [सं०] जौ, धान, उरद आदि सात अन्नों का मेल जो पूजा में काम आता है।

सप्तनली
संज्ञा स्त्री० [सं०] बहेलियों का चिड़िया फँसाने का एक उपकरण। कंपा [को०]।

सप्तनवति
संज्ञा स्त्री० [सं०] सत्तानबे की संखया—१७।

सप्तनाड़िका
संज्ञा स्त्री० [सं० सप्तनाडिका] सिंघाड़ा।

सप्तनाड़ी चक्र
संज्ञा पुं० [सं० सप्तनाडीचक्र] फलित ज्योतिष में सात टेढी़ रेखाओं का एक चक्र जिसमें सब नक्षत्रों के नाम भरे रहते हैं और जिसके द्वारा वर्षा का आगम बताया जाता है।

सप्तनामा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आदित्यभक्ता। हुलहुल नाम का पौधा।

सप्तपंचाश
वि० [सं० सतप्मञ्वाशा] सत्तावनवाँ।

सप्तपंचाशत्
वि० [सं० सप्तपञवाशत्] सत्तावन।

सप्तपत्र (१)
वि० [सं०] १. जिसमें सात पत्ते या दल हों। २. जिसके वाहन सात घोड़े हों।

सप्तपत्र (२)
संज्ञा पुं० १. मोतिया। मोगरा बेला। २. सप्तपर्ण वृक्ष। छतिवन। ३. सूर्य।

सप्तपदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विवाह की एक रीति जिसमें वर और वधू अग्नि के चारों ओर सात परिक्रमाएँ करते हैं और जिससे विवाह पक्का हो जाता है। भाँवर। भँवरी। २. किसी बात को अग्नि की साक्षी देकर पक्का करना।

सप्तपदी पूजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] विवाह के अवसर पर होनेवाला एक पूजन। विशेष—इसमें एक लोढ़ा वर और वधू के आगे रखकर वर को उसे पूजने को कहा जाता है, पर वह उसे पैर से हटा देता है।

सप्तपराक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का तप।

सप्तपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. छतिवन का पेड़। २. एक प्रकार की मिठाई।

सप्तपर्ण (२)
वि० जिसमें सात दल या पत्ते हों [को०]।

सप्तपर्णक
संज्ञा पुं० [सं०] छतिवन वृक्ष [को०]।

सप्तपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लज्जालु। लज्जावंती लता। २. एक मिठाई। ३. छतिवन का फूल (को०)।

सप्तपलाश
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सप्तपर्ण'।

सप्तपाताल
संज्ञा पुं० [सं०] पृथ्वी के नीचे के सात लोक जिनके नाम ये हैं—अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल।

सप्तपुत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] तुरई की तरह की सतपुतिया नाम की तरकारी।

सप्तपुरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सात पवित्र नगर या तीर्थ जो मोक्षदायक कहे गए हैं। विशेष—अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवं- तिका (उज्जयिनी) और द्वारका ये सात पवित्र पुरियाँ हैं।

सप्तप्रकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] राज्य के सात अंग जो ये हैं—राजा, मंत्री, सामंत, देश, कोश, गढ़ और सेना।

सप्तबाह्य
संज्ञा पुं० [सं०] बाह्लीक देश। बलख।

सप्तमंगिनय
संज्ञा पुं० [सं० सप्तभङिगनय] दे० 'सप्तभंगी'—१।

सप्तभंगी
संज्ञा स्त्री० [सं० सप्तभङ्गी] १. जैन न्याय या तर्क के सात अवयव जिन पर स्याद्वाद की प्रतिष्ठा हैं। विशेष—ये सातो अवयव या सूत्र स्यात् शब्द से आरंभ होते हैं। यथा—स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादस्तिचास्ति, स्यादवक्तव्य, स्यादस्तिचावक्तव्य, स्वान्नास्तिचावक्तव्य, स्यादस्तिचना- स्तिचावक्तव्य । २. सप्तभंगी को माननेवाला। स्याद्वावाद का अनुयायी जैन। यौ०—सप्तभंगीनय = दे० 'सप्तभंगिनय'।

सप्तभद्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. सिरिस। शिरीष वृक्ष। २. नेवारी। नव- मल्लिका। ३. गुंजा। चिरभटी।

सप्तभुवन
संज्ञा पुं० [सं०] ऊपर के सात लोक। विशेष दे० 'लोक'।

सप्तभूम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] मकान के सात खंड या मरतिब।

सप्तभूम (२)
वि० सात खंडों का। सतमंजिला।

सप्तभूमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रसातल। २. दे० 'सप्तभूम'।

सप्तमंत्र
संज्ञा [सं० सप्तमन्त्र] अग्नि। सप्तार्चि [को०]।

सप्तम
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सप्तमी] सातवाँ।

सप्तमातृका
संज्ञा स्त्री० [सं०] सात माताएँ या शक्तियाँ जिनका पूजन विवाह आदि शुभ अवसरों के पहले होता हैं। विशेष—इनके नाम ये हैं—ब्राह्मी या ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, बाराही, ऐंद्री या इंद्राणी और चामुंडा।

सप्तमी (१)
वि० स्त्री० [सं०] सातवाँ।

सप्तमी (२)
संज्ञा स्त्री० १. किसी पक्ष की सातवीं तिथि। २. किसी पक्ष का सातवाँ दिन। ३. अधिकरण कारक की विभक्ति का नाम (व्याकरण)।

सप्तमुष्टिक
संज्ञा पुं० [सं०] ज्वर की एक औषधि जो कई द्रव्यों के योग से बनती है।

सप्तमृत्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] शांति पूजन में काम आनेवाली सात स्थानों की मिट्टी। विशेष—राजद्वार की, गजशाला की तथा इसी प्रकार और स्थानों की मिट्टी मँगाई जाती है।

सप्तरक्त
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर के सात अवयव जिनका रंग लाल होता है। यथा—हथेली, तलवा, जीभ, आँख या पलक का निचला भाग, तालू और ओठ।

सप्तराव
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़ के एक पुत्र का नाम।

सप्तरशिक
संज्ञा पुं० [सं०] गणित की एक क्रिया जिसमें सात राशियाँ होती हैं।

सप्तरुचि
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो सात रोचि या किरणों से युक्त हो। २. अग्नि का एक नाम।

सप्तर्षि
संज्ञा पुं० [सं०] १. सात ऋषियों का समूह या मंडल। विशेष—शतपथ ब्राहाण के अनुसार सात ऋषियों के नाम ये हैं— गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र यमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप और अत्रि। महाभारत के अनुसार—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य और वसिष्ठ। २. उत्तर दिशा में स्थित सात तारों का समूह जो ध्रुव के चारो ओर फिरता दिखाई पड़ता है।

सप्तर्षिज
संज्ञा पुं० [सं०] बृहस्पति।

सप्तला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सातला। २. नवमल्लिका। चमेली। ३. रीठा। ४. गुंजा। घुँघची। चिरमिटी।

सप्तलोक
संज्ञा पुं० [सं०] सात लोक जिनके नाम हैं—भूर्लोक, भुव- र्लोक, स्वर्लोंक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक। यौ०—सप्तलोकमय = विष्णु।

सप्तवरूथ
वि० [सं०] जिस की सात आदमी रक्षा करते हों। (रथ) जो सात रक्षकों से युक्त हो [को०]।

सप्तवादी
संज्ञा पुं० [सं० सप्तवादिम्] सप्तभंगी न्याय या स्याद्वाद का अनुयायी। जैन।

सप्तविंश
वि० [सं०] सत्ताईसवाँ।

सप्तविंशति (१)
वि० [सं०] सत्ताइस।

सप्तविंशति (२)
संज्ञा स्त्री० सत्ताइस की संख्या या अंक।

सप्तविंशतिम
वि० [सं०] सताइसवाँ।

सप्तशत
वि० [सं०] सात सौ।

सप्तशतो (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सात सौ का समूह। २. सात सौ पद्यो का समूह। सतसई। जैसे,—दुर्गा सप्तशती, आर्या सप्तशती।

सप्तशतो (२)
संज्ञा पुं० बंगाल में ब्राह्माणों की एक जाति।

सप्तशलाक
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष में सात शलाकाओं का वह चक्र जिससे विवाह के शुभाशुभ का ज्ञान करते हैं।

सप्तशिवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] नागवल्ली।

सप्तशीर्ष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का एक नाम।

सप्तशीर्ष (२)
वि० जिसके सात सिर या चोटियाँ हों [को०]।

सप्तषष्ठ
वि० [सं०] सड़सठवाँ।

सप्तषष्ठि
वि० [सं०] सड़सठ।

सप्तसप्तत
वि० [सं०] सतहत्तरवाँ।

सप्तसप्तति
वि० [सं०] सतहत्तर।

सप्तसप्ति (१)
वि० [सं०] जिसके रथ में सात घोड़े हों।

सप्तसप्ति (२)
संज्ञा पुं० सूर्य।

सप्तसमुद्रांत
वि० [सं० सप्तसमुद्रान्त] जो सात समुद्रों तक विस्तीर्ण हो।

सप्तसागर
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक शिवलिंग। २. लवण, इक्षु, दधि, क्षीर, मधु, मदिरा और घृत के सात समुद्र।

सप्तसागर दान
संज्ञा पुं० [सं०] एक दान जिसमें सात पात्रों में घी, दूध, मधु, दही आदि रखकर ब्राह्मण को देते हैं।

सप्तसागरक
संज्ञा पुं० [सं०] एक दान। सप्तसागर दान [को०]।

सप्तसागरमेखला
वि० [सं०] जिसकी मेखला सात समुद्र हो। सप्त- समुद्रांत विस्तीर्ण। उ०—भूमि सप्तसागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।—मानस, ७।२२।

सप्तसिरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] तांबूल। पान।

सप्तसू
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसके सात बच्चे हों [को०]।

सप्तस्पर्द्धा
संज्ञा स्त्री० [सं०] रामायण में वर्णित एक नदी का नाम।

सप्तस्वर
संज्ञा पुं० [सं०] संदीत के सात स्वर—स, ऋ, ग, म, प, ध, नि।

सप्तांग (१)
वि० [सं० सप्ताङ्ग] सात अंगों से युक्त। सात अंगोंवाला।

सप्तांग (२)
संज्ञा पुं० दे० 'सप्तप्रकृति' [को०]।

सप्तांशु
संज्ञा पुं० [सं०] जो सात किरणों से युक्त हो—अग्नि। सप्तार्चि।

सप्तांशुपुंगव
संज्ञा पुं० [सं० सप्तांशुपुङ्गव] शनिग्रह।

सप्तात्मा
संज्ञा पुं० [सं० सप्तात्मन्] ब्रह्म [को०]।

सप्ताबरन पु
संज्ञा पुं० [सं० सप्तावरण] जल, पवन, अग्नि, आकाश, अहंकार, महत्तत्व और प्रकृति नामक आत्मा के सात आवरण। उ०—सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगे गति मोरि।—मानस, ७।७९।

सप्तार्चि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अग्नि। सप्तांशु। २. शनि। ३. चित्रक वृक्ष। चीता।

सप्तार्चि (२)
वि० १. जो देखने में सुंदर न हो। कुरूप। बेडौल। भद्दा। २. सात जिह्वा या अर्चिष् से युक्त [को०]।

सप्तार्णव
संज्ञा पुं० [सं०] १. सातों समुद्र। २. वह जो सात समुद्रों से आवेष्टित हो।

सप्तालु
संज्ञा पुं० [सं०] सतालू। शफतालू।

सप्ताशोति
वि० [सं०] सत्तासी।

सप्ताश्र
संज्ञा पुं० [सं०] सात भुजाओं वाला क्षेत्र [को०]।

सप्ताश्व
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य (जिनके रथ में सात घोड़े हैं)। यौ०—सप्ताश्ववाहन = सूर्य।

सप्तास्त्र
वि० [सं०] जिसके सात कोण या भूजाएँ हों [को०]।

सप्ताह
संज्ञा पुं० [सं०] १. सात दिनों का काल। हफ्ता। २. कोई यज्ञ या पुण्य कर्म जो सात दिनों में समाप्त हो। ३. भागवत की कथा जो सात ही दिनों में सब पढ़ी या सुनी जाय। (इसका बहुत शुभ फल माना जाता है)। क्रि० प्र०—बाँचना।—सुनना।

सप्ताह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सातला नामक पौधा जो दवा आदि के काम आता है। सप्तला [को०]।

सप्पन
संज्ञा पुं० [देश०] बक्कम का पेड़।

सप्रज
वि० [सं०] प्रजायुक्त। बाल बच्चोंवाला [को०]।

सप्रज्ञ
वि० [सं०] प्रज्ञा या बुद्धिवाला [को०]।

सप्रणय
वि० [सं०] प्रणययुक्त। स्नेहयुक्त। स्नेही। मित्रता- पूर्ण [को०]।

सप्रतिभ
वि० [सं०] दूरदर्शी। प्रतिभावान्। विवेकी।

सप्रतिभय
वि० [सं०] जिसका कोई अनुमान न हो। सहसा आ पड़नेवाला। खतरनाक [को०]।

सप्रतीवाय
वि० [सं०] मिश्रणयुक्त [को०]।

सप्रतीश
वि० [सं०] आदरणीय। संभ्रांत [को०]।

सप्रत्यय
वि० [सं०] १. विश्वास रखनेवाला। विश्वासयुक्त। २. निश्चित। विश्वस्त [को०]।

सप्रपंच
वि० [सं० सप्रपञ्च] अनेक प्रकार के इधर उधर के प्रपंचों से युक्त।

सप्रभ
वि० [सं०] १. चमकदार। कांतियुक्त। २. समान कांति या आभावाला [को०]।

सप्रमाण
वि० [सं०] १. प्रमाण सहित। सबूत के साथ। २. प्रामा- णिक। ठीक।

सप्रमाद
वि० [सं०] अनवधानता युक्त। असावधान।

सप्रयास
क्रि० वि० [सं० स + प्रयास] चेष्टापूर्वक। कोशिश के साथ। उ०—प्राकृतिक दान वे, सप्रयास या अनायास आते हैं सब, सब में है श्रेष्ठ, धन्य मानव।—अनामिका, पृ० २३।

सप्रवाद
वि० [सं०] प्रवादयुक्त। जिसका प्रवाद हो।

सप्रश्रय
वि० [सं०] सविनय। अत्यंत आदरपूर्वक। अत्यंत विनय के साथ [को०]।

सप्रसव
वि० [सं०] एक ही मूल से संबद्ध [को०]।

सप्रसवा
वि० [सं०] १. गर्भवाली। सगर्भा। गर्भिणी। २. जिसे बच्चे हों। सवत्सा [को०]।

सप्लाई
संज्ञा स्त्री० [अं०] (व्यवहार या उपयोग के लिये कोई वस्तु) उपस्थित करना। पहुँचाना। मुहैया करना। जैसे,—वे ७ नं० घुड़सवार पलटन के घोड़ों के लिये घास दाना सप्लाई किया करते हैं। क्रि० प्र०—करना।—होना। २. प्राप्ति। पहुँच। पूर्ति। रसद। दानापानी। यौ०—सप्लाई अफसर = पूर्ति विभाग का अधिकारी । सप्लाई आफिस, सप्लाई डिपार्टमेंट, सप्लाई विभाग = पूर्ति या सप्लाई करने का महकमा। पूर्ति कार्यालय।

सप्लायर
संज्ञा पुं० [अं०] वह जो किसी को चीजें पहुँचाने का काम करता है। कोई वस्तु या माल पहुँचाने या मुहैया करनेवाला।

सप्लीमेंट
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह पत्र जो किसी समाचारपत्र में अधिक विषय देने के लिये अतिरिक्त रूप से लगाया जाय। अतिरिक्त पत्र। क्रोड़ पत्र। २. किसी वस्तु का अतिरिक्त अंश।

सफ (१)
संज्ञा पुं० [सं० शफ] दे० 'शफ'।

सफ (२)
संज्ञा स्त्री० [अ० सफ़] १. पंक्ति। कतार। क्रि० प्र०—बाँधना। २. लंबी चटाई। सीतल पाटी। ३. बिछावन। फर्श। बिस्तर। ४. रेखा। लकीर। ५. नमाज पढनेवालों की कतार (को०)। यौ०—सफदर = युद्ध में सैन्यपंक्ति को विदीर्ण करनेवाला। रणशूर। योद्धा। सफबंदी = कतार में करना। पंक्तिबद्ध करना। सफबस्ता = पंक्तिबद्ध। सफशिकन = कतार तोड़नेवाला। पंक्ति को छिन्नभिन्न करनेवाला। वीर।

सफगोल
संज्ञा पुं० [हिं० इसबगोल] दे० 'इसबगोल'।

सफतालू
संज्ञा पुं० [सं० सप्तालु, फ़ा० शफ़्तालू] एक पेड़ जिसके गोल फल खाए जाते हैं। सतालू। आड़ू। विशेष—यह हिंदुस्तान में ठंढी जगहों में होता है। पेड़ मझोले आकार का और लकड़ी लाल मजबूत और सुगंधित होती है। पत्ते लंबे नोकदार तथा कालापन लिए गहरे हरे रंग के होते हैं। पतझड़ के पीछे पत्तियाँ निकलने के पहले ही इसमें फूल लग जाते हैं जो गुलाबी रंग के होते हैं। फल पकने पर कुछ लाल और कुछ हरे रंग के होते हैं और उनके ऊपर महीन महीन रोइयाँ सी होती हैं। बीजों में बादाम की तरह का कड़ा छिलका होता है।

सफन पु (१)
वि० [हिं० स + अ० फ़न] गुण या हुनरवाला। होशि- यार। उ०—हाल हजूर बातून बासीन है सफन सर्वग है यार मेरा।—संत दरिया, पृ० ७२।

सफन (२)
संज्ञा पुं० [अ० सफ़न] १. मछली या मगर का खुरदरा चमड़ा। २. बसूला।

सफर (१)
संज्ञा पुं० [अ० सफ़र] १. प्रस्थान। यात्रा। रास्ते में चलना। २. हिजरी सन् का दूसरा मास (को०)। ३. रास्ते में चलने का समय या दशा। जैसे,—सफर में बहुत सामान नहीं रखना चाहिए। क्रि० प्र०—करना।—होना। यौ०—सफरखर्च = मार्ग व्यय। सफर जल = दे० 'बिही'। सफरनामा = यात्रा विवरण। भ्रमण वृत्तांत।

सफर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की छोटी चमकीली मछली। सफरी [को०]।

सफरदाई
संज्ञा पुं० [हिं० सपरदाई] दे० 'सपरदाई'।

सफरमैना
संज्ञा [अं० सैपर माइनर] सेना के वे सिपाही जो सुरंग लगाने तथा खाईं आदि खोदने को आगे चलते हैं।

सफरा
संज्ञा पुं० [अ० सफ़रा] पित्त।

सफरी (१)
संज्ञा पुं० [अ० सफ़री] सफर में का। सफर में काम आनेवाला। यात्रा के समय का। जैसे,—सफरी बिस्तर।

सफरी (२)
संज्ञा पुं० १. राह खर्च। रास्ते का सामान। २. यात्री। पर्यटक (को०)। ३. अमरूद। उ०—श्रीफल मधुर चिरौंजी आनी। सफरी चिरुआ अरु नय बानी।—सूर (शब्द०)।

सफरी (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० शफरी] एक प्रकार की मछली। सौरी मछली।

सफरोल
संज्ञा पुं० [अं० कैम्फर आयल] कपूर के लाल तेल से तैयार होनेवाली एक दवा या मसाला।

सफल
वि० [सं०] [स्त्री० सफला] १. जिसमें फल लगा हो। फल से जिसका कुछ परिणाम हो। जो व्यर्थ न जाय। सार्थक। युक्त। २. जैसे,—तुम्हारा परिश्रम सफल हो गया। ३. पूरा होना। जैसे,—मनोरय सफल होना। ४. कृतकार्य। कामयाब। जिसका प्रयोजन सिद्ध हुआ हो। क्रि० प्र०—करना।—होना। ५. अंडकोश युक्त। जो बधिया न हो।

सफलक
वि० [सं०] जिसके पास फलक या ढाल हो।

सफलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सफल होने का भाव। कामयाबी। सिद्धि। २. पूर्णता। ३. सार्थक होना। सार्थकता।

सफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी जो विशेष रूप से व्रत का दिन है।

सफलित
वि० [सं० सफल] सार्थक। सफलीभूत।

सफलीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. सफल करना। २. सिद्ध करना। पूर्ण करना।

सफलीभूत
वि० [सं०] जो सफल हुआ हो। जो सिद्ध या पूरा हुआ हो।

सफलोदय
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम [को०]।

सफलोदर्क
वि० [सं०] जिसमें सफलता की झलक दिखाई दे [को०]।

सफहा
संज्ञा पुं० [अ० सफ़हह्] १. रुख। तल। सतह। २. वरक। पृष्ठ। पन्ना।

सफा
वि० [अ० सफ़ा] १. साफ। स्वच्छ। निर्मल। २. पाक। पवित्र। उ०—कोई सफा न देखा दिल का।—काष्ठजिह्वा (शब्द०)। ३. जो खुरदुरा न हो। चिकना। बराबर। क्रि० प्र०—करना।—होना।

सफा
संज्ञा स्त्री० १. स्वच्छता। निर्मलता। २. चमक दमक [को०]।

सफाइन
संज्ञा पुं० [अ० सफ़ाइन, सफीना (= नौका) का बहुवचन] नौकाएँ [को०]।

सफाई
संज्ञा स्त्री० [अ० सफ़ा + ई (प्रत्य०)] १. सफा होने का भाव। स्वच्छता। निर्मलता। २. मैल, कूड़ा, करकट आदि हटाने की क्रिया। जैसे,—मकान की सफाई। ३. अर्थ या अभिप्राय प्रकट होने का गुण। ४. स्पष्टता। चित्त से दुर्भाव आदि का निकलना। मन में मैल न रहना। जैसे,—सामने बातचीत कर लो; दिलों की सफाई हो जाय। ५. कपट या कुटिलता का अभाव। दुराव का न होना। जैसे,—आज उन्होंने बड़ी सफाई से बात की। ६. दोषारोप का हटना। इलजाम का दूर होना। निर्दोंषिता। जैसे,—उसने अपनी सफाई के लिये बहुत कुछ कहा। ७. ऋण का परिशोध। कर्ज या हिसाब का चुकता होना। बेबाकी। ८. मामले का निबटारा।निर्णय। ९. खात्मा। समाप्ति (को०)। १०. ऊबड़खाबड़ न रहना। खुरदुरापन का अभाव (को०)। ११. बरबादी। विनाश। तबाही। १२. चिकनापन। स्निधता (को०)। मुहा०—सफाई कर देना = (१) साफ, बेबाक या स्वच्छ कर देना। (२) समाप्त या खत्म कर देना। (३) बरबाद कर देना। सफाई देना = निर्दोषिता प्रमाणित करना। कसूरवार न होने का सबूत देना।

सफाचट
वि० [हिं० सफा + चट] १. एकदम स्वच्छ। बिलकुल साफ। २. जिसपर कुछ जमा या लगा न रह गया हो। जो बिल्कुल चिकना हो। जैसे,—मैदान सफाचट होना। ३. जो जमा या लगा न रहने दिया जाय। जो निकाल, उखाड़ या दूर कर दिया जाय। जैसे,—बाल सफाचट होना। ४. जरा सा भी शेष न रहने देना (भोजन आदि)।

सफाया
संज्ञा पुं० [हिं०] १. खत्म होने की स्थिति। समाप्ति। २. विनाश। क्रि० प्र०—करना।—होना।

सफाहत
संज्ञा स्त्री० [अ० सफ़ाहत] कमीनापन। नीचता [को०]।

सफो
वि० [अ० सफ़ी] १. साफ। स्वच्छ। धवल। २. पवित्रात्मा। शुद्ध भावना से युक्त। ३. मित्र। सखा। दोस्त [को०]।

सफीना
संज्ञा पुं० [अ० सफ़ीनह्, अं० सब पेना] १. वही। किताब। नोटबुक। २. अदालती परवाना। इत्तलानामा। समन। ३. छोटी कश्ती। नाव। नौका (को०)।

सफीर (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० सफ़ीर] १. चिड़ियों की आवाज। २. वह सोटी जो पक्षियों को बुलाने के लिये दी जाती है। ३. सीटी।

सफीर (२)
संज्ञा पुं० एलची। राजदूत।

सफील (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० फ़सील] पक्फी चहारदीवारी। शहर- पनाह। परकोटा।

सफील (२)
संज्ञा स्त्री० [अ० सफ़ील] दे० 'सफीर'।

सफूफ
संज्ञा पुं० [अ० सफ़ूफ़] चूर्ण। बुकनी। फंकी।

सफेद
वि० [फ़ा० सुफ़ेद, मि० सं० श्वेत] १. जो चूने के रंग का हो। जिसपर कोई रंग न हो। धौला। श्वेत। चिट्टा। जैसे,— सफेद घोड़ा। २. जिसपर कुछ लिखा या चिह्न न हो। कोरा। सादा। जैसे,—सफेद कागज। यौ०—सफेद दाग = श्वेतकुष्ठ। सफेदरेश = बूढ़ा, जिसकी दाढ़ी पक गई हो। मुहा०—किसी का रंग सफेद पड़ जाना = विवर्णता होना। भय आदि से चेहरे का फीका पड़ जाना। स्याह सफेद = भला बुरा। इष्ट अनिष्ट। जैसे,—स्याह सफेद सब उसी के हाथ है।

सफेदधावी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सफ़ेद + धावी] एक प्रकार का बड़ा पेड़। चकड़ी। विशेष—यह वृक्ष हिमालय पर पाया जाता है। इसकी लकड़ी की कंघियाँ बनाई जाती हैं। इसके फूलों में सुगंध होती है। इसके पत्ते खाद के काम में आते हैं।

सफेदपलका
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुफैद + हिं० पलक] वह कबूतर जिसके पर कुछ सफेद और कुछ काले हों।

सफेदपोश
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुफेदपोश] १. साफ कपड़े पहननेवाला। २. शिक्षित और कुलीन। भलामानस। शिष्ट। ३. अमीर न होते हुए भी भले व्यक्ति की तरह रहनेवाला। ४. वह जो केवल सफेद कपड़े पहन कर शिष्टता का प्रदर्शन करता हो और जो वस्तुतः शिक्षित और भला आदमी न हो।

सफेदा
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुफ़ैदा] १. जस्ते का चूर्ण या भस्म जो दवा तथा लोहे, लकड़ी आदि पर रँगाई के काम में आता है। २. सफेद चमड़ा जो जूते आदि बनाने के काम में आता है। ३. आम का एक भेद जो जो लखनऊ के आसपास होता है। ४. खरबूजे का एक भेद। ५. पंजाब और काश्मीर में होनेवाला एक बहुत ऊँचा पेड़। विशेष—यह वृक्ष खंभे के तरह एकदम सीधा ऊपर जानेवाला पेड़ है जिसकी छाल का रंग सफेद होता है। इसकी लकड़ी सजावट के सामान बनाने के काम में आती है।

सफेदार
संज्ञा पुं० [देश०] सीसम का पेड़।

सफेदी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सुफ़ैदी] १. सफेद होने का भाव। श्वेतता। धवलता। मुहा०—सफेदी आना = बाल सफेद होना। बुढ़ापा आना। २. दीवार आदि पर सफेद रंग या चूने की पोताई। चूनाकारी। क्रि० प्र०—करना।—फेरना। ३. सूर्य निकलने के पहले का उज्ज्वल प्रकाश जो पूर्व दिशा में दिखाई पड़ता है। मुहा०—(सुबह की) सफेदी फैलना = प्रभात होना। सूर्य का प्रकाश विकीर्ण होना।

सफेन
वि० [सं०] भागदार। फेन युक्त। फेनिल।

सफेनपुंज
संज्ञा पुं० [सं० सफेनपुञ्ज] वह जो घने फेन से भरा हुआ या आच्छादित हो। जैसे, समुद्र [को०]।

सफ्क
संज्ञा पुं० [अ० सफ़्क] हिंसन। रक्तपात। हिंसा [को०]।

सफ्तालू
संज्ञा पुं० [हिं० सफतालू] दे० 'सफतालू'।

सफ्फाक
वि० [अ० सफ़्फ़ाक] १. निष्ठुर। बेरहम। २. हिंसक। ३. अत्याचारी [को०]।

सफ्फाकी
संज्ञा स्त्री० [अ० सफ़्फ़ाकी] १. निष्ठुरता। क्रूरता। बेरहमी। २. अत्याचार। जुल्म। ३. हिंसा। रक्तपात [को०]।

सबंध
वि० [सं० सबन्ध] जिसके लिये बंध या प्रतिभू, जमानत आदि दी गई हो [को०]।

सबंधक
वि० [सं० सबन्धक] दे० 'सबंध'।

सबंधु (१)
वि० [सं० सबन्धु] १. मित्रयुक्त। समित्र। २. एक ही कुल या वंश का। ३. सन्निकट संबंधी। नजदीकी रिश्तेदार [को०]।

सबंधु (२)
संज्ञा पुं० नातेदार। रिश्तेदार। सबंधी [को०]।

सब (१)
वि० [सं० सर्व, प्रा० सब्ब] १. जितने हों, वे कुल। समस्त। जैसे,—(क) इतना सुनते ही सब लोग वहाँ से चले गए। (ख) सब किताबें आलमारी में रख दो।मुहा०—सब मिलाकर = जितना हो, उतना सब। कुल। २. पूरा। सारा। समस्त।

सब (२)
वि० [अं०] छोटा। गौण। अप्रधान। विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग प्रायः यौगिक शब्दों के आरंभ में होता है। जैसे,—सबइंसपेक्टर, सबजज, सबओवरसियर, सब आफिस।

सबक
संज्ञा पुं० [फ़ा० सबक़] १. उतना अंश जितना एक बार में पढ़ाया जाय। पाठ। क्रि० प्र०—देना।—पढ़ना।—पढ़ाना।—लेना। २. शिक्षा। नसीहत। ३. अनुभव। तजुर्बा। क्रि० प्र०—देना।—पाना।—मिलना।—लेना।

सबकत
संज्ञा स्त्री० [अ० सबक़त] किसी विषय में औरों की अपेक्षा आगे बढ़ जाना। विशेषता प्राप्त करना। क्रि० प्र०—करना।—ले जाना।

सबच्छी पु
वि० [सं० सवत्सा] बछ्ड़ेवाली। बछड़े से युक्त। बछड़े के साथ। उ०—दीधो सोनो सोलहो, दीधी सुरह सबच्छी गाई।—वी० रासो, पृ० २५।

सबछ पु
वि० [सं० सवत्स, सबच्छ] बछड़ेवाली। बछड़ासहित। उ०—द्रै लख धेनु सबछ बहु दूधी। प्रथम प्रसूता सुंदर सूधी।—नंद० ग्रं०, पृ० २३४।

सबज
वि० [फ़ा० सब्ज़] दे० 'सब्ज'।

सबजज
संज्ञा पुं० [अं०] छोटा जज। सदराला। सिविल जज।

सबडिवीजन
संज्ञा पुं० [अं० सबडिवीजन] किसी जिले का वह छोटा भूभाग जिसके अंतर्गत बहुत से गाँव और कसबे हों। परगना। जैसे, चाँदपुर सब डिवीजन। विशेष—कई सब डिवीजनों का एक जिला होता है अर्थात् हर जिला कई सब डिवीजनों में बँटा हुआ होता है।

सबडिवीजनल
वि० [अं० सबडिवीजनल] सबडिवीजन का। उस भूभाग का जिसके अंतर्गत बहुत से गाँव और कसबे हों। सबडिवीजन संबंधी। जैसे,—सबडिवीजनल अफसर।

सबद पु †
संज्ञा पुं० [सं० शब्द] १. शब्द। आवाज। उ०—हुता जो सुन्नम सुन्न, नाँव ठाँव ना सुर सबद। तहाँ पाप नहिं पुन्न, महमद आपुहि आपु महँ।—जायसी (शब्द०)। २. [स्त्री० सबदी] किसी महात्मा की वाणी या भजन आदि। जैसे,—कबीरजी के सबद, दादूदयाल के सबद।

सबनमी पु
वि० [फ़ा० शबनम] जो शबनम की तरह एकदम श्वेत और महीन हो। उ०—धवल अटारी लखि खरी नवल बधू हरि दंग। सादी सारी सबनमी लसत गुलाबी रंग।—स० सप्तक, पृ० २३४।

सबब
संज्ञा पुं० [अ०] १. कारण। वजह। मूल कारण। हेतु। जैसे,— उनके नाराज होने का तो मुझे कोई सबब नहीं मालूम। २. द्वार। साधन। जैसे,—बिना किसी सबब के वहाँ पहूँचना कठिन है। ३. दलील। तर्क।

सबमरीन
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार की नाव जो जल के अंदर चलती है और युद्ध के समय शत्रु के जहाजों को नष्ट करने के काम में आती है। गोताखोर जहाज। पनडुब्बी। विशेष—यह घंटों जल के अंदर रह सकती है और ऊपर से दिखाई नहीं देती। हवा, पानी लेने के लिये इसे ऊपर आना पड़ता है। यह 'टारपीडो' नामक भयंकर शस्त्र साथ लिए रहती है और घात लगते ही शत्रु के जहाज पर टारपीडो चलाती है। यदि टारपीडो ठिकाने पर लगा तो जहाज में बड़ा सा छेद हो जाता है।

सबर पु (१)
वि० [सं० सबल] ताकतवर। बली। सबल।

सबर (२)
संज्ञा पुं० [अ० सब्र] दे० 'सब्र'।

सबरा पु
संज्ञा पुं० [हिं० सब] सब। कुल। तमाम।

सबरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शबरी] दे० 'शबरी'।

सबरी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० शफरी = (कुदाल)] सेंध मारने में चोरों द्वारा प्रयुक्त लगभग हाथ भर लंबा एक औजार।

सबल (१)
वि० [सं०] १. जिसमें बहुत बल हो। बलवान्। बलशाली। ताकतवर। जैसे,—जो सबल होगा वह निर्बलों पर शासन करेगा। २. जिसके साथ सेना हो। फौजवाला।

सबल (२)
संज्ञा पुं० वशिष्ठ के एक पुत्र का नाम [को०]।

सबल (३)
संज्ञा पुं० [अ०] १. अन्न की बाल। अनाज की बाल। २. एक नेत्र रोग। मोतियाबिंद [को०]।

सबलि (१)
वि० [सं०] १. जिसपर राजकर लगता हो। २. बलिकर्म से संबद्ध [को०]।

सबलि (२)
संज्ञा पुं० (बलि चढ़ाने के लिये उपयुक्त) संध्या वेला। गोधूलि [को०]।

सबसिडियरी जेल
संज्ञा स्त्री० [अं०] हवालात।

सबा
संज्ञा स्त्री० [अ०] वह हवा जो प्रभात और प्रातः काल के समय पूर्व की और से चलती है। उ०—बराबरी का तेरी गुल ने जब खयाल किया। सबा ने मार थपेड़ा मुँह उसका लाल किया।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० ९७। यौ०—सबाखराम, सबादम = वह घोड़ा जो बहुत तेज भागता हो।

सबात
संज्ञा स्त्री० [अ०] स्थायी या दूढ़ होने का भाव। स्थायित्व। दृढ़ता [को०]।

सबाध
वि० [सं०] कष्ट पहुँचानेवाला। हानिकारक। पीड़क [को०]।

सबार (१)
संज्ञा पुं० [हिं० सबेरा] दे० 'सबेरा'।

सबार (२)
क्रि० वि० जल्दी। शीघ्र। उ०—होइ भगीरथ कर तहँ फेरा। जाहि सबार मरन कै बेरा।—जायसी (शब्द०)।

सबारै
संज्ञा पुं०, क्रि० वि० [हिं० सबेर] दे० 'सबार'।

सबार्डिनेट जज
संज्ञा पुं० [अं०] दीवानी अदालत का वह हाकिम जो जज के नीचे हो। छोटा जज। सदराला। सिविल जज।

सबाष्प
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सबाष्पा] १. जिसकी आँखों में आँसू हों। २. जिससें से भाप निकल रही हो [को०]।

सबाष्पक
वि० [सं०] १. अश्रुयुक्त (नेत्र)। २. जिसमें से भाप निकल रही हो [को०]।

सबिंदु (१)
वि० [सं० सबिन्दु] बुँदकीदार। बिंदुसहित। बिंदु से युक्त [को०]।

सबिंदु (२)
संज्ञा पुं० एक पर्वत का नाम [को०]।

सबी पु
संज्ञा स्त्री० [अ० शबीह] चित्र। तसबीर। उ०—लिखन बैठि जाकी सबी गहि गरब गरूर। भए न केते जगत के चतुर चितेरे कूर।—बिहारी र०, दो० ३४७।

सबीज
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सबीजा] १. बीजाक्षर से युक्त। उ०— लोग बियोग विषम विष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।—मानस, २।१८४। २. जिसमें बीआ हो। जैसे, सबीज फल (को०)। ३. कीटाणुयुक्त (को०)।

सबील
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. रास्ता। मार्ग। सड़क। २. उपाय। तरकीब। यत्न। जैसे,—वहाँ पहुँचने की कोई सबील निकालनी चाहिए। ३. वह स्थान जहाँपर पथिकों आदि को धर्मार्थ जल या शरबत पिलाया जाता है। पौसरा। क्रि० प्र०—पिलाना।—रखना।—लगाना।

सबीह (१)
वि० [अ०] १. खूब गोरा। अत्यंत गौर वर्ण का।

सबीह (२)
संज्ञा पुं० [अ० शबीह] दे० 'शबीह'।

सबीह पु (३)
वि० [सं० सभी; , प्रा० सबीह] भययुक्त। भयालु। भयान्वित।

सबू
संज्ञा पुं० [फ़ा० सुबू] मिट्टी का घड़ा। मटका। गगरी। यौ०—सबूसाज = कुंभकार। कुम्हार।

सबूत
संज्ञा पुं० [अ० सुबूत] दे० 'सुबूत'।

सबूर
वि० [अ०] माफ करनेवाला। क्षमाशील। २. धैर्ययुक्त। धीरज या सब्र करनेवाला [को०]।

सबूरा
संज्ञा पुं० [अ० सब्र] काट या चमड़े आदि का बना हुआ एक प्रकार का लंबा लिंगाकार खंड जिससे विधवा या पतिहीना स्त्रियाँ अपनी कामवासना तृप्त करती हैं। काष्ट या चर्मनिर्मित लिंग। (मुसल० स्त्रि०)।

सबूस
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] भूसी। तुष। चोकर [को०]।

सबूह, सबूही
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] सबेरे पी जानेवाली मदिरा। तड़के पी जानेवाली शराब [को०]।

सबेरा
संज्ञा पुं० [सं० सु + हिं० बेरा] सुंदर समय। प्रातःकाल। सूर्योदय का समय।

सब्ज (१)
वि० [फ़ा० सब्ज़] १. कच्चा और ताजा (फल, फूल आदि)। मुहा०—सब्ज बाग दिखलाना = अपना काम निकालने या फँसाने के लिये बड़ी बड़ी आशाएँ दिलाना। २. हरा। हरित। (रंग)। ३. शुभ। उत्तम। जैसे,—सब्जबख्त = भाग्यशाली। यौ०—सब्जपरी = (१) इंदर सभा की नायिका। (२) ताजापन या मस्ती देनेवाली, मदिरा। शराब (लाक्ष०)। सब्जपा = दे० 'सब्जकदम'। सब्जपुल = आसमान। सब्जपोश = हरी पोशाक पहने हुए। सब्जफोड़ा = एक प्रकार का कबूतर। सब्जबख्त। सब्जमुखी = कबूतर की एक जाति। सब्जरंग = (१) हरे रंग का। (२) सलोना। साँवला। सब्जरंगी = सलोनापन। सब्जवार = मुर्गी की एक जाति।

सब्जकदम
वि० [फ़ा० सब्ज़ + अ० क़दम] जिसके कहीं पहुँचते ही कोई अशुभ घटना हो। जिसके चरण अशुभ हों। विशेष—इस शब्द में 'सब्ज' का प्रयोग व्यंग्य रूप से होता है।

सब्जा
संज्ञा पुं० [फ़ा० सब्जह्] १. हरी घास और वनस्पति आदि। हरियाली। क्रि० प्र०—लहलहाना। २. भंग। भाँग। विजया। ३. पन्ना नामक रत्न। ४. स्त्रियों का कान में पहनने का एक प्रकार का गहना। ५. घोड़े का एक रंग जिसमें सफेदी के साथ कुछ कालापन भी मिला होता है। ६. वह घोड़ा जो इस रंग का हो। ७. एक जाति का आम। ८. खरबूजे की एक जाति।

सब्जी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सब्ज़ी] १. हरी घास और वनस्पति आदि। हरियाली। २. हरी तरकारी। ३. खाने के लिये तैयार की हुई तरकारी। ४. भंग। भाँग। विजया। यौ०—सब्जीखोर = शाकाहारी। सब्जीफरोश = हरी तरकारी बेचनेवाला। सब्जीमंडी = वह जगह जहाँ सब्जी और ताजे फल बिकते हों।

सब्जेक्ट
संज्ञा पुं० [अं०] १. प्रजा। रैयत। जैसे,—ब्रिटिश सब्जेक्ट। २. विषय। मजमून।

सब्जेक्ट कमिटी
संज्ञा स्त्री० [अं०] दे० 'विषय निर्वाचनी समिति'।

सब्त
संज्ञा पुं० [अ०] १. शनिवार। २. लेख [को०]।

सब्बाक
संज्ञा पुं० [अ०] सुनार। स्वर्णकार [को०]।

सब्र
संज्ञा पुं० [अ०] संतोष। घैर्य। क्रि० प्र०—आना।—करना।—रखना। मुहा०—सब्र करना = (१) धीरज धरना। ठहरना। रुकना। (२) जल्दबाजी या उतावली न करना। सब्र देना = धैर्य बँधाना। ढाँढ़स देना। सब्र की सिल छाती पर रखना = सबकुछ चुपचाप सह लेना। (किसी का) सब्र पड़ना = किसी के धैर्यपूर्वक सहन किए हुए कष्ट का प्रतिफल होना। जैसे,—तुमने उस गरीब का मकान ले लिया; तुमपर उसका सब्र पड़ा है जिससे तुम्हारा लड़का मर गया। सब्र कर बैटना या लेना = कोई हानि या अनिष्ट होने पर चुपचाप उसे सह लेना। सब्र समेटना = किसी का शाप लेना। ऐसा काम करना जिसमें किसी का शाप पड़े।

सब्रह्म, सब्रह्मक
वि० [सं०] १. ब्रह्मा से युक्त। ब्रह्मा के साथ। २. ब्रह्मलोक सहित [को०]।

सब्रह्मचर्य
संज्ञा पुं० [सं०] (एक ही गुरु से) साथ साथ पठना। सहाध्ययन [को०]।

सब्रह्मचारी
संज्ञा पुं० [सं० सब्रह्मचारिन्] १. वे ब्रह्मचारी जिन्होंने एक साथ एक गुरु से एक प्रकार की शिक्षा प्राप्त की हो। २. एक सभान दुःख से ग्रस्त व्यक्ति। ३. एक सदृश या एक जैसा आदमी। ४. वेदादि की एक ही शाखा का अध्ययन करनेवाले छात्र। ५. साथी। मित्र [को०]।

सभंग
वि० [सं० सभङ्ग] जिसमें टुकड़े या खंड हों [को०]। यौ०—सभंगश्लेष = श्लेष अलंकार का एक प्रकार, जिसमें शब्द को खंड करके दूसरा अर्थ निकाला जाता है। दे० 'श्लेष'।

सभक्ष
वि० [सं०] साथ खानेवाला। सहभोजी [को०]।

सभ्य
वि० [सं०] १. भययुक्त। उ०—सचिव सभय सिख देइ न कोई।—मानस, १। २. डर उत्पन्न करनेवाला। भयकारक खतरनाक (को०)।

सभर्तृका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पति जीवित हो। सधवा। सुहागिन्।

सभस्मा
वि० [सं० सभस्मन्] जिसने भस्म लगाया हो। भस्म युक्त। यौ०—सभास्माद्विज = शैव या पाशुपत मतावलंबी।

सभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह स्थान जहाँ बहुत से लोग मिलकर बैठे हों। परिषद्। गोष्ठी। समिति। मजलिस। जैसे,— विद्वानों की सभा में बैठा करो। २. वह स्थान जहाँ किसी एक विषय पर विचार करने के लिये बहुत से लोग एकत्र हों। ३. वह संस्था या समूह जो किसी विषय पर विचार करने अथवा कोई काम सिद्ध करने के लिये संघ- टित हुआ हो। ४. सामाजिक। सभासद। ५. जूआ। द्यूत। ६. घर। मकान। ७. समूह। झुंड। ८. प्राचीन वैदिक काल की एक संस्था जिसमें कुछ लोग एकत्र होकर सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर विचार करते थे। ९. न्यायपीठ। न्यायालय (को०)। १०. अतिथिशाल। धर्म- शाला। पथिकालय (को०)। ११. भोजनालय (को०)। यौ०—सभागत = जो सभा या न्यायपीठ में उपस्थित हो। सभाचातुरी, सभा—चातुर्य = सभा समाज में व्यवहार करने की पटुता। सभानायक = दे० 'सभापति'। सभापूजा = नाटक की प्रस्तावना में दर्शकों के प्रति संमान व्यक्त करना। सभाप्रवेशन = न्यायपीठ के समक्ष जाना। सभामंडन = सभागृह या सभाकक्ष को सजाना। सभामंडप = सभागृह। सभा का कक्ष। सभायोग्य = समाज या गोष्ठी के उपयुक्त। सभावशकर = सभा, समाज या गोष्ठी को प्रभावित या वशीभूत करनेवाला।

सभाकार
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो सभा करता हो। सभा करनेवाला। २. वह जो सभाकक्ष बनाता हो। सभागृह का बनानेवाला (को०)।

सभाग
वि० [सं०] १. हिस्सेदार। जिसका भाग या हिस्सा हो। २. सार्वजनीन। सर्वजनसुलभ। सामान्य। ३. सभा में जानेवाला [को०]।

सभागा पु
वि० [सं० स + भाग्य] [वि० स्त्री० सभागी] १. भाग्यवान्। खुशकिस्मत। तकदीरवर। उ०—ओहि छुह पवन बिरिछ जेहि लागा। सोइ मलयगिरि भएउ सभागा।—जायसी (शब्द०)। २. सुंदर। रूपवान्। उ०—आए गुपुत होइ देखन लागी। वह मूरति कस सती सभागी।—जायसी (शब्द०)।

सभागृह
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ किसी सभा या समिति का अधिवेशन होता हो। बहुत से लोगों के एक साथ बैठने का स्थान। मजलिस की जगह।

सभाचार
संज्ञा पुं० [सं०] १. सभा, गोष्ठी या समाज का रीति- रिवाज। समाज का आचार। २. धर्मसभा की पद्धति या नियम कायदा [को०]।

सभाजन
संज्ञा पुं० [सं०] अपने मित्रों, संबंधियों आदि के आने पर उनसे गले मिलना, उनका कुशल मंगल पूछना और स्वागत या शिष्टाचार करना। २. सेवा (को०)। ३. विनम्रता। शिष्टता (को०)।

सभाजित
वि० [सं०] १. आदृत। संमानित। प्रसन्न। तुष्ट। २. प्रशंसित। जिसकी प्रशस्ति की गई हो [को०]।

सभाज्य
वि० [सं०] आदरणीय। संमान करने योग्य [को०]।

सभानर
संज्ञा पुं० [सं०] १. हरिवंश के अनुसार कक्ष के एक पुत्र का नाम। २. भागवत के अनुसार अणु के एक पुत्र का नाम।

सभापति
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो सभा का प्रधान या नेता बनकर उसका कार्य चलाता हो। सभा का मुखिया। मीर मजलिस। २. वह जो जुए का अड्डा चलाता हो। द्यूतगृह का संचालक [को०]।

सभापरिषद
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बहुत से लोगों का एकत्र होकर साहित्य या राजनीति आदि से संबंध रखनेवाले किसी विषय पर विचार करना। २. वह स्थान जहाँ इस प्रकार के कार्य के लिये लोग एकत्र होते हैं। सभागृह। सभाभवन।

सभापर्व
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के एक पर्व का नाम।

सभापाल
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो सार्वजनिक भवन अथवा सभाभवन का रक्षक हो [को०]।

सभारता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भारयुक्तता। २. अधिकता। अधिक्य। पूर्णता। १. अभ्युदय। बृद्धि [को०]।

सभार्य, सभार्यक
वि० [सं०] भार्या के साथ। भार्यानुगत। सपत्नीक।

सभावन
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम [को०]।

सभावी
संज्ञा पुं० [सं० सभाविन्] वह जो द्यूतगृह का प्रधान हो। जूएखाने का मालिक।

सभासद
संज्ञा पुं० [सं० सभासद्] १. वह जो किसी सभा में संमि- लित हो और उसमें उपस्थित होनेवाले विषयों पर संमति देने का अधिकार रखता हो। सदस्य। सामाजिक। पार्षद। २. वह जो किसी सभा या जलसे का सहायक हो (को०)। ३. दे० 'असेसर' (को०)।

सभासाह
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसने वादविवाद या शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त की हो [को०]।

सभास्तार
संज्ञा पुं० [सं०] सभासद्। सदस्य।

सभिक, सभीक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो लोगों को जूआ खेलाता हो। जूएखाने का मालिक।

सभीत पु
वि० [सं० सभीति] दे० 'सभीति'। उ०—सचिव सभीत सकै नहि पूछी।—मानस, २।३२।

सभीति
वि० [सं०] भयग्रस्त। डरवाला। भययुक्त।

सभेय
संज्ञा पुं० [सं०] सभा का सदस्य। सभासद। सभ्य।

सभोचित
संज्ञा पुं० [सं०] पंडित। विद्वान्।

सभ्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जो किसी सभा में संमिलित हो और उसके विचारणीय विषयों पर अपनी संमति दे सकता हो। सभासद। सदस्य। वह जिसका व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन श्रेष्ठ हो। वह जिसका आचार व्यवहार और रहन सहन उत्तम हो। कुलीन व्यक्ति। वह जिसमें तहजीब हो। भला आदमी। ३. न्यायाधीश को सलाह देनेवाला जनप्रतिनिधि। दे० 'असेसर'। ४. द्यूतगृह का संचालक। ५. द्यूतगृह के संचालक का सेवक (को०)। ६. पाँच पवित्र अग्नियों में से एक (को०)।

सभ्य (२)
वि० १. सभा से सबंध रखनेवाला। २. सभा समाज के योग्य। ३. संस्कृत। परिष्कृत। शिष्ट। ४. सुशील। विनभ्र। ५. विश्वस्त। ईमानदार [को०]।

सभ्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सभ्य होने का भाव। सदस्यता। २. व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की वह अवस्था जिसमें लोगों का आचार व्यवहार बहुत सुधरकर उच्छा हो चुका हो। सुशिक्षित और सज्जन होने की अवस्था। ३. भलमनसाहत। शराफत। जैसे,—जरा सम्यता का व्यवहार करना सीखो। ४. किसी भी काल या यूग का सामाजिक जीवन या व्यवहार। संस्कृति। (अं० कल्चर)। जैसे—मोहनजोदड़ो सभ्यता, द्रविड़ सभ्यता।

सभ्येतर
वि० [सं०] सम्य से इतर या भिन्न। जो सभ्य न हो। असभ्य। गँवार। जंगली [को०]।

सभ्यत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सभ्यता' [को०]।