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सुं पु् †
प्रत्य० [प्रा० सुन्तो] दे० 'सों'।

सुंखड़
संज्ञा पुं० [देश०] साधुओं का एक संप्रदाय।

सुंगवंश
संज्ञा पुं० [सं० सुङ्गवंश] मौर्य वंश के अंतिम सम्राट् बृहद्रथ के प्रधान सेनापति पुष्यामित्र द्वारा प्रतिष्ठित एक प्राचीन राजवंश। विशेष—ईसा से १८४ वर्ष पूर्व पुष्यमित्र सुंग ने बृहद्रथ को मारकर मौर्य साम्राज्य पर अपना अधिकार जमाया। यह राजा वैदिक या ब्राह्मम धर्म का पक्का अनुयायी था। जिस समय पुष्यमित्र मगध के सिंहासन पर बैठा, उस समय साम्राज्य नर्मदा के किनारे तक था और उसके अंतर्गत आधुनिक बिहार, संयुक्त प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि थे। कलिंग के राजा खारवेल्ल तथा पंजाब और काबुल के यवन (यूनानी) राजा मिनांडर (बौद्ध मिलिंद) नेसूंग राज्य पर कई बार चढ़ाइयाँ की, पर वे हटा दिए गए। यवनों का जो प्रसिद्ध आक्रमण साकेत (अयोध्या) पर हुआ था, वह पुष्यामित्र के ही राजत्व काल में। पुष्यमित्र के समय का उसी के किसी सामंत या कर्मचारी का एक शिलालेख अभी हाल में अयोध्या में मिला है जो अशोक लिपि में होने पर भी संस्कृत में है। यह लेख नागरीप्रचारिणी पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है। इसी प्रकार के एक और पुराने लेख का पता मिला है, पर वह अभी प्राप्त नहीं हुआ है। इससे जान पड़ता है कि पुष्यामित्र कभी कभी साकेत (अयोध्या) में भी रहता था और वह उस समय एक समृद्धिशाली नगर था। पुष्यमित्र के पुत्र अग्निमित्र ने विदर्भ के राजा को परास्त करके दक्षिण में वरदा नदी तक अपने पिता के राज्य का विस्तार बढ़ाया। जैसा कालिदास के मालविकाग्निमित्र नाटक से प्रकट है, अग्निमित्र ने विदिशा को अपनी राजधानी बनाया था जो वेत्रवती और विदिशा नदी के संगम पर एक अत्यंत सुंदर पुरी थी। इस पुरी के खँडहर भिलसा (ग्वालियर राज्य में) से थोड़ी दूर पर दूर तक फैले हुए हैं। चक्रवर्ती सम्राट् बनने की कामना से पुष्यामित्र ने इसी समय बड़ी धूमधाम से अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया। इस यज्ञ के समय महाभाष्यकार पतंजलि जी विद्यमान थे। अश्वरक्षा का भार पुष्यामित्र के पौत्र (अग्निमित्र के पुत्र) वसुमित्र को सौंपा गया जिसने सिंधु नदी के किनारे यवनों को परास्त किया। पुष्यमित्र के समय में वैदिक या ब्राह्मण धर्म का फिर से उत्थान हुआ और बौद्ध धर्म दबने लगा। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार पुष्यमित्र ने बौद्धों पर बड़ा अत्या- चार किया और वे राज्य छोड़कर भागने लगे। ईसा से १४८ वर्ष पहले पुष्यमित्र की मृत्यु हुई और उसका पुत्र अग्निमित्र सिंहासन पर बैठा। उसके पीछे पुष्यमित्र का भाई सुज्येष्ठ और फिर अग्निमित्र का पुत्र वसुमित्र गद्दी पर बैठा। फिर धीरे धीरे इस वंश का प्रताप घटता गया और वसुदेव ने विश्वासघात करके कण्व नामक ब्राह्मण राजवंश की प्रतिष्ठा की।

सुँघनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुँघना] तंबाकू के पत्ते की खूब बारीक बुकनी जो सूँघी जाती है। हुलास। नस्य। मग्जरोशन। कि० प्र०—सूँघना।

सुँघाना
क्रि० स० [हिं० सूँघना का प्रेर० रूप] आघ्राण कराना। सूँघने की क्रिया कराना।

सुंठि
संज्ञा स्त्री० [सं० शुण्ठि] दे० 'शुंठि', 'सोंठ'।

सुंड
संज्ञा पुं० [सं० शुण्ड] 'शुंड', 'सूँड़'।

सुंडदंड
संज्ञा पुं० [सं० शुण्डदण्ड] दे० 'शुंडादंड'।

सुंडभुसुंड
संज्ञा पुं० [सं० शुण्डभुशुण्डि] हाथी जिसका अस्त्र सूँड है। उ०—चढ़ि चित्रित सुंडभुसुंड पैं, सोभित कंचन कुंड पै। नृप सजेउ चलत जदु शुंड पै, जिमि गज मृग सिर पुंड पैं।— गोपाल (शब्द०)।

सुंडस
संज्ञा पुं० [देश०] लदुए गधे की पीठ पर रखने की गद्दी।

सुंडा (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सूँड़] सूँड़। शुंड।

सुंडा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] लदुए गधै की पीठ पर रखने की गद्दी या गद्दा।

सुंडाल
संज्ञा पुं० [सं० शुण्डाल] हाथी। हस्ती। वह जो सूँड़वाला हो। उ०—सुंडाल चलत सुंडनि उठाइ। जिनकैं जँजीर झन- झनत पाइ।—सूदन (शब्द०)।

सुंडाली
संज्ञा स्त्री० [सं० शुण्डाल (= सूँड़वाला)] एक प्रकार की मछली।

सुंडीबेंत
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बेंत जो बंगाल, आसाम और खसिया की पहाड़ी पर पाया जाता है।

सुंद
संज्ञा पुं० [सं० सुन्द] १. एक वानर का नाम। २. एक राक्षस का नाम। ३. विष्णु। ४. संह्नाद का पुत्र। ५. एक असुर जो निसुंद (निकुंभ) का पुत्र और उपसुंद का भाई था। विशेष—सुंद और उपसुंद दोनों बड़े बलवान असुर थे। इन्होंने ब्रह्मा से यह वर प्राप्त किया था कि वे तब तक मर नहीं सकते जब तक दोनों भाई परस्पर एक दूसरे को न मारें। इस तरह इन्हें कोई हरा नहीं सकता था। इंद्र द्वारा भेजी गई तिलोत्तमा नाम की अप्सरा के लिये अंततः दोनों आपस में ही लड़कर मर गए थे।

सुंदरमन्य
संज्ञा पुं० [सं० सुन्दरम्मन्य] जो अपने को सुंदर मानता या समझता हो।

सुंदर (१)
वि० [सं० सुन्दर] [वि० स्त्री० सुंदरी] १. जो देखने में अच्छा लगे। प्रियदर्शन। रूपवान। शोभन। रुचिर। खूबसूरत। मनोहर। मनोज्ञ। २. अच्छा। भला। बढ़िया। श्रेष्ठ। शुभ। जैसे,—सुंदर मुहूर्त।

सुंदर (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्रकार का पेड़। २. कामदेव। ३. एक नाग का नाम। ४. लंका का एक पर्वत। ५. एक छंद।

सुंदरई पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुंदर + ई (प्रत्य०)] सौंदर्य। सुंदरता। उ०—रीझे स्याम देखि वा मुख पर छबि मुख सुंदरई।— सूर० (राधा०), १९७९।

सुंदरक
संज्ञा पुं० [सं० सुन्दरक] १. एक तीर्थ का नाम। २. एक ह्नद का नाम।

सुंदरकांड
संज्ञा पुं० [सं० सुन्दरकाण्ड] १. रामायण के पाँचवें कांड का नाम जो लंका के सुंदर पर्वत के नाम पर रखा गया है। २. सूंदर सुडौल कांड या पर्व (को०)।

सुंदरता
संज्ञा स्त्री० [सं० सुन्दरता] सुंदर होने का भाव। सौंदर्य। खूबसूरती। रूपलावण्य।—उ०—सुंदरता कहु सुंदर करई। छबिगृह दीपसिखा जनु बरई।—मानस, १।२३०।

सुंदरताई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सुन्दरता] दे० 'सुंदरता'। उ०—(क) हम भरि जन्म सुनहु सब भाईं। देखी नहि असि सुंदरताई।— राम०, पृ० ३९३। (ख) अंग बिलाकि त्रिलोक में ऐसी को नारि निहारिन नार नवाई। मूरतिवत शृंगार समीप शृंगार किए जानो सुंदरताई।—केशव (शब्द०)।

सुंदरत्व
संज्ञा पुं० [सं० सुन्दरत्व] सुंदरता। सौंदर्य।

सुंदरवती
संज्ञा स्त्री० [सं० सुन्दरवती] एक नदी का नाम।

सुंदरवन
संज्ञा पुं० [सं० सुन्दरवन] गंगा के डेल्टा में स्थित वन जहाँ की भूमि दलदली है।

सुंदराई पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुंदर + आई (प्रत्य०)] दे० 'सुंदरता'।

सुंदरापा
संज्ञा पुं० [सं० सुन्दर, हिं० सुंदर + आपा (प्रत्य०)] सुंदरता।

सुंदरी (१)
वि० स्त्री० [सं० सुन्दरी] रूपवती। खूबसूरत।

सुंदरी (२)
संज्ञा स्त्री० १. सुंदर स्त्री। २. हलदी। हरिद्रा। ३. एक प्रकार का बड़ा जंगली पेड़। विशेष—यह पेड़ सुंदर वन में बहुत होता है। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है और नाव, संदूक, मेज, कुरसी आदि सामान बनाने के काम में आती और इमारतों में भी लगती है। यह पेड़ खारे पानी के पास ही उग सकता है; मीठा पानी पाने से सूख जाता है। ४. त्रिपुरसुंदरी देवी। ५. एक योगिनी का नाम। ६. सवैया नामक छंद का एक भेद जिसमें आठ सगण और एक गुरु होता है। उ०—सब सों गहि पानि मिले रघुनंदन भेंटि कियो सबको सुखभागी। यहि औसर की हर सुंदरी मूरति राखि जपै हिय में अनुरागी। छंदः०, पृ० २४७। ७. बारह अक्षरों का एक वर्णवृत्त जिसमें एक नगण, दो भगण और एक रगण होता है। द्रुतविलंबित। ८, तेईस अक्षरों की एक वर्णवृत्ति जिसमें क्रमशः दो सगण, एक भगण, एक सगण, एक नगण, दो जगण और एक लघु तथा एक एक गुरु होता है। छंदप्रभाकर में इसे 'सुंदरि' कहा है। उ०—सस भा स तजो जों लगि सखि ! ढूँढ़ौं कुंजगली बिछुरी हरि सोँ।—छंदः०, पृ० २३७। ९. एक प्रकार की मछली। १०. माल्यवान राक्षस की पत्नी जो नर्मदा नामक गंधर्वी की कन्या थी। ११. श्वफल्क की कन्या का नाम (को०)। १२. वैश्वानर की एक दुहिता (को०)।

सुंदरी (३)
संज्ञा स्त्री० [?] सितार, इसराज आदि में लगे वे लोहे या पीतल के परदे जो विभिन्न स्वरों के स्थान होते हैं।

सुंदरीमंदिर
संज्ञा पुं० [सं० सुन्दरीमन्दिर] अंतःपुर। जनानखाना [को०]।

सुदरेश्वर
संज्ञा पुं० [सं० सुन्दरेश्वर] शिव जी की एक मूर्ति।

सुंदोपसुंद
संज्ञा पुं० [सं० सुन्दोपसुन्द] निसुंद (निकुभ) नामक दैत्य के दोनों पुत्र सुंद और उपसुद। विशेष दे० 'सुद'। यौ०—सूंदोपसुंद न्याय = एक न्याय। दे० 'न्याय' शब्द के अंतर्गत १०५ वाँ न्याय।

सुंदरौदन
संज्ञा पुं० [सं० सुन्दर + ओदन] अच्छा भात। अच्छी तरह पका हुआ चावल।

सुँधाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सोंधा + आई (प्रत्य०)] दे० 'सुँधावट'।

सुँधावट
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्ध, हिं० सोंधा + आवट (प्रत्य०)] सोंधे होने का भाव। साधापन। सोंधी महक।

सुँधिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० सोंधा + इया (प्रत्य०)] १. एक प्रकार की ज्वार। २. गुजरात में होनेवाली एक प्रकार की वनस्पति जो पशुओं के चारे के काम में आती है।

सुंपलुंठ
संज्ञा पुं० [सं० सुम्पलुण्ठ] कर्पूरक। कपूर कचरी।

सुंबा
संज्ञा पुं० [देश०] १. इस्पंज। २. दागी हुई तोप या बंदूक की गरम नली को ठंढा करने के लिये उसपर डाला हुआ गीला कपड़ा। पुचारा। (लश०)। ३. तोप की नली साफ करने का गज। (लश०) ४. लोहे का एक औजार जिससे लोहार लोहे में सूराख करते हैं।

सुंबी
संज्ञा स्त्री० [देश०] छेनी जिससे लोहे में छेद किया जाता है।

सुंबुल
संज्ञा पुं० [फा़० संबुल] १. एक सुगंधित घास। बालछड़। २. गेहूँ या जौ की बाल। ३. अलक। जुल्फ।

सुंबुला
संज्ञा पुं० [अ० सुंबलह्] १. गेहूँ की बाल। २. कन्या- राशि [को०]।

सुंभ (१) पु
संज्ञा पुं० [सं० शुम्भ] दे० 'शुंभ'।

सुंभ (२)
संज्ञा पुं० [सं० सुम्भ] दे० 'सुम'।

सुंभा
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'सुंबा'।

सुंभी
संज्ञा स्त्री० [देश०] लोहा छेदने का एक औजार जिसमें नोक नहीं होती।

सुंसारी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का लंबा काला कीड़ा जो अनाज के लिये हानिकारक होता है।

सु (१)
उप० [सं०] एक उपसर्ग जो संज्ञा के साथ लगकर विशेषण का काम देता है। जिस शब्द के साथ यह उपसर्ग लगता है, उसमें (१) अच्छा, बढ़िया, भला, श्रेष्ठ, जैसे, सुगंधित; (२) सुंदर मनोहर, जैसे; सुकेशी, सुमध्यमा; (३) खुब, सर्वथा, पूरी तरह, ठीक प्रकार से; जैसे, सुजीर्ण; (४) आसानी से, सुभीते से, तुरंत, जैसे,—सुकर, सुलभ; (५) अत्यधिक, बहुत अधिक, जैसे, सुदारुण सुदीर्घ आदि का भाव आ जाता है। जैसे— सुनाम, सुपंथ, सुशील, सुवास आदि।

सु (२)
वि० १. सुंदर। अच्छा। २. उत्तम। श्रेष्ठ। संमानयोग्य। ३. शुभ। भला।

सु (३)
संज्ञा पुं० १. उत्कर्ष। उन्नति। २. सुंदरता। खूबसूरती। हर्ष। आनंद। प्रसन्नता। ४. पूजा। ५. समृद्धि। ६. अनुमति। आज्ञा। ७. कष्ट। तकलीफ।

सु पु (४)
अव्य० [सं० सह] तृतीया, पंचमी और षष्ठी विभक्ति का चिह्न।

सु (५)
सर्व० [सं० सः] सो। वह।

सुअंग
वि० [सं० सुअङ्ग] सुडौल शरीरवाला। सुगठित बदनवाला। सुंदर [को०]।

सुअ पु
संज्ञा पुं० [सं० सुत, प्रा० सुअ] दे० 'सुअन'।

सुअक्ष
वि० [सं०] १. अच्छे सुंदर नेत्रोंवाला। २. दृढ़ांग। पुष्ट अंगोंवाला [को०]।

सुअटा †
संज्ञा पुं० [सं० शुक, प्रा० सुअ, हिं० सूआ + टा प्रत्य०] सुग्गा। शुक। तोता। उ०—सुअटा रहै खुरुक जिउ अबहिंकाल सो भाव। सत्रु अहै जो करिया कबहुँ सो बोरै नाव।— (शब्द०)।

सुअन पु
संज्ञा पुं० [सं० सुत, प्रा० सुअ] आत्मज। पुत्र। बेटा। लड़का। उ०—वहु दिन धौ कब आइहै ह्वैहै सुअन बिबाह। निज नयनन हम देखिहैं हे विधि यहु उत्साह।—स्वामी रामकृष्ण (शब्द०)।

सुअनजर्द पु
संज्ञा पुं० दे० [सुवर्ण, हिं० सोना + फा़० जर्द] दे० 'सोनजर्द'। उ०—कोई सुअनजर्द ज्यों केसर। कोइ सिंगारहार नागेसर।—जायसी (शब्द०)।

सुअना पु (१)
क्रि० अ० [सं० सवन (= प्रसव) अथवा हिं० उगना (= उत्पन्न होना) या हिं० सुअन] उत्पन्न होना। उगना। उदय होना। उ०—जैसो साँचो ग्यान प्रकाशत पाप दोष सब सुअत। धर्म विराग आदि सतगुन से तनमन के सुख सुअत।— देवस्वामी (शब्द०)।

सुअना (२)
संज्ञा पुं० [सं० शुक] दे० 'सुअटा'।

सुअर
संज्ञा पुं० [सं० शूकर]। दे० 'सूअर'।

सुअरदता † (१)
वि० [हिं० सुअर + दंता (= दाँतवाला)] सुअर के से दाँतोंवाला।

सुअरदंता (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का हाथी जिसके दाँत पृथ्वी की ओर झुके रहते हैं। ऐसा हाथी ऐबी समझा जाता है।

सुअर्गपताली †
संज्ञा पुं० [सं० स्वर्ग + पातालिका] वह बैल जिसका एक सींग स्वर्ग की ओर दूसरा पाताल की ओर अर्थात् एक आकाश की ओर और दूसरा जमीन की ओर रहता है।

सुअवसर
संज्ञा पुं० [सं०] अच्छा अवसर। अच्छा मौका।

सुआ
संज्ञा पुं० [सं० शुक] दे० 'सूआ'।

सुआउ पु
वि० [सं० सु + आयु] जिसकी आयु बड़ी हो। दीर्घायु। उ०—सुधन न सुमन सुआउ सो।—तुलसी (शब्द०)।

सुआद (१)
संज्ञा पुं० [हिं० अथवा सं० स्मरण या हिं० सु + फा़० याद] स्मरण। याद।

सुआद (२)
संज्ञा पुं० [सं० स्वाद] दे० 'स्वाद'।

सुआन पु
संज्ञा पुं० [सं० श्वन्] दे० 'श्वान'। उ०—सुआन पूछ जिउ भयो न सूधउ बहुत जतन मैं कीनेउ।—तेगबहा- दुर (शब्द०)।

सुआना †
क्रि० सं० [हिं० सूना का प्रेर० रूप] उत्पन्न कराना। पैदा कराना। सूने में प्रवृत्त करना।

सुआमी पु
संज्ञा पुं० [सं० स्वामी] दे० 'स्वामी'। उ०—भुगत मुकति का कारन सुआमी मूढ़ ताहि बिसराव। जन नानक कोटन मैं कोऊ भजन राम को पावै।—तेगबहादुर (शब्द०)।

सुआर पु ‡
संज्ञा पुं० [सं० सूपकार] रसोइया। भोजन बनानेवाला। पाककार। उ०—(क) परुसन लगे सुआर सुजाना।—मानस १,३२९। (ख) परुसन लगे सुआर बिबुध जन जेवहिं। देहिं गोरि बरनारि मोद मन भेवहिं।—तुलसी (शब्द०)।

सुआरव पु
वि० [सं० सु + आरव (= शब्द, आवाज)] उत्तम शब्द करनेवाला। मीठे स्वर से बोलने या बजनेवाला। उ०—नाना सुआरव जंतरी नट चेटकी ज्वारी जिते। तेली तमोली रजक सूची चित्रकारक पुर तिते।] रमाश्वमेध (शब्द०)।

सुआसन
संज्ञा पुं० [सं०] बैठने का सुंदर आसन या पीढ़ा।

सुआसिन †
संज्ञा स्त्री० [सं० सुवासिनी] दे० 'सुआसिनी'।

सुआसिनी †पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सुवासिनी ?] स्त्री, विशेषतः आस पास में रहनेवाली औरत। उ०—(क) विप्र वधू सनमानि सुआसिनि जब पुरजन बहिराइ। सनमाने अवनीस असीसत ईसुर में समनाइ।—तुलसी (शब्द०)। (ख) देव पितर गुर विप्र पूजि नृप दिए दान रचि जानी। मुनि बनिता पुरनारि सुआसिनि सहस भाँति सनपाइ अघाइ असीसत निकसत जाचक जग भए दानी।—तुलसी (शब्द०)।

सुआसिनी पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुहागिन] वह स्त्री जिसका पति जीवित हो। सौभाग्यवती स्त्री।

सुआहित
संज्ञा पुं० [सं० सु + आहत ?] तलवार के ३२ हाथों में से एक हाथ। उ०—तिमि सव्य जानु विजानु संकोचित सुआहित चित्र को। धृत लवन कुद्रव छिप्र सव्येतर तथा उत्तरत को।—रघुराज (शब्द०)।

सुइया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सूआ] एक प्रकार की चिड़िया।

सुई
संज्ञा स्त्री० [सं० सूची] दे० 'सूई'।

सुकंकवत्
संज्ञा पुं० [सं० सुकङ्कवत्] एक पर्वत का नाम जो मार्कंडेय पुराण के अनुसार मेरु के दक्षिण में है।

सुकंटका
संज्ञा स्त्री० [सं० सुकण्टका] १. घृतकुमारी। घीकुआर। गुआरपाठा। २. पिंडखजूर।

सुकंठ (१)
वि० [सं० सुकण्ठ] १. जिसका कंठ सुंदर हो। २. जिसका स्वर मीठा हो। सुरीला। उ०—द्वारे ठाढ़े हैं द्विज बावन। चारौं वेद पढ़त मुख आगर अति सुकंठ सुर गावन। सूर०, ८।१३।

सुकंठ (२)
संज्ञा पुं० रामचंद्र के सखा, सुग्रीव। उ० - बालि से बीर विदारि सुकंठ थप्यौ हरषे सुर बाजन बाजे। पल में दल्यौ दासरथी दसकंधर लंक विभीषण राज बिराजे।—तुलसी (शब्द०)।

सुकंठी
संज्ञा स्त्री० [सं० सुकण्ठी] मादा कोयल [को०]।

सुकंडु
संज्ञा पुं० [सं० सुकण्डु] कडु रोग। खाज। खुजली [को०]।

सुकंद
संज्ञा पुं० [सं० सुकन्द] १. कसेरू। २. पलांडु। प्याज (को०)। ३. आलू, कचालू, शकरकंद आदि कंद (को०)।

सुकंदक
संज्ञा पुं० [सं० सुकन्दक] १. बाराहीकंद। भिर्वोली कंद। गेंठी। २. प्याज। ३. महाभारत के अनुसार एक प्राचीन देश का नाम। ४. इस देश का निवासी।

सुकंदकरण
संज्ञा पुं० [सं० सुकन्दकरण] प्याज। श्वेत पलांडु।

सुकंदन
संज्ञा पुं० [सं० सुकन्दन] १. बैजयंती तुलसी। २. बर्वरक। बबई तुलसी।

सुकंदा
संज्ञा स्त्री० [सं० सुकन्दा] १. लक्षणकंद। पुत्रदा। २. बंध्या कर्कोटकी। बाँझककोड़ा।

सुकंदी
संज्ञा पुं० [सं० सुकन्दिन्] सूरन। जमीकंद।

सुक (१)
संज्ञा पुं० [सं० शुक] १. तोता। शुक। करी। सुग्गा। २. व्यासपुत्र। शुकदेव मुनि। ३. एक राक्षस जो रावण का दूत था।

सुक (२)
संज्ञा पुं० [सं० सुकटु] शिरीष वृक्ष। सिरस का पेड़।

सुकक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] अंगिरा वंश में उत्पन्न एक ऋषि जो ऋग्वेद के कई मंत्रों के द्रष्टा थे।

सुकचण †
संज्ञा पुं० [सं० सङ्कुचन] लज्जा। संकोच (डिं०)।

सुकचाना पु
क्रि० अ० [हिं० सकुच] दे० 'सकुचाना'।

सुकटि
वि० [सं०] अच्छी कमरवाली। जिसकी कमर सुंदर हो।

सुकटु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] शिरीष वृक्ष। सिरस का पेड़।

सुकटु (२)
वि० अत्यंत कटु। बहुत कड़ुआ।

सुकड़ना
क्रि० अ० [सं० सङकुचन] दे० 'सिकुड़ना'।

सुकदेव
संज्ञा पुं० [सं० शुकदेव] व्यास जी के पुत्र। दे० 'शुकदेव'।

सुकना † (१)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान जो भादों महीने के अंत और आश्विन के आरंभ में होता है।

सुकना पु (२)
क्रि० अ० [सं० शुष्क, प्रा० सुक्क + हिं० ना (प्रत्य०)] शुष्क होना। सूखना। उ०—चलत पवन पावक समान परसत सुताप मन। सुकत सरोवर मचत कीच तलफंत मीन तन।— पृ० रा०, ६१।१७।

सुकनासा पु
वि० [सं० शुक + नासिका] जिसकी नाक शुक पक्षी के ठोर के समान हो। सुंदर नाकवाला।

सुकन्यक
वि० [सं०] जिसकी कन्या सुंदर हो [को०]।

सुकन्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शर्याति राजा की कन्या और च्यवन ऋषि की पत्नी। २. शोभन कन्या। सुंदरी कन्या (को०)।

सुकन्याक
वि० [सं०] दे० 'सुकन्यक' [को०]।

सुकपर्दा
वि० [सं०] (वह स्त्री) जिसने उत्तमता से केश बाँधे हों। जिसने उत्तमता से चोटी की हो।

सुकपिच्छक
संज्ञा पुं० [डिं०] गंधक।

सुकबि पु
संज्ञा पुं० [सं० सुकवि] उत्तम काव्यकर्ता कवि। श्रेष्ठ कवि। उ०—या छबि की पटतर दीबे कों सुकबि कहा टकटोहै।—सूर०, १०।१५८।

सुकमार †
वि० [सं० सुकुमार] दे० 'सुकुमार'।

सुकमारता †
संज्ञा स्त्री० [सं० सुकुमारता] दे० 'सुकुमारता'।

सुकर (१)
वि० [सं०] १. जो अनायास किय जा सके। सहज में होनेवाला। सुसाध्य। २. जिसका प्रबंध या व्यवस्था आसानी से की जा सके (को०)।

सुकर (२)
संज्ञा पुं० १. सरलता से वश में होनेवाला घोड़ा। सीधा घोड़ा। २. दान। उदारता। परोपकारिता [को०]।

सुकरता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुकर का भाव। सहज में होने का भाव। सुकरत्व। सौकर्य। २. सुंदरता। उ०—जहाँ क्रिया की सुकरता बरणत काज विरोध। तहाँ कहत व्याधात हैं औरो बुद्धि विबोध।—मतिराम (शब्द०)।

सुकरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुशील गाय। अच्छी और सीधी गौ।

सुकरात
संज्ञा पुं० [अ०] यूनान का एक प्रसिद्ध दार्शनिक जिसका शिष्य प्लेटो (अफलातून) था।

सुकराना
संज्ञा पुं० [फा़० शुक्रानह्] दे० 'शुक्राना'। उ०—अरुन अन्यारे जे भरे अति ही मदन मजेज। देखे तुव दृग वारबै रब सुकराना भेज।—रतनहजारा (शब्द०)।

सुकरित पु
वि० [सं० सुकृत] शुभ। सत्। अच्छा। भला। उ०— सुकरित मारग चालना बुरा न कबहुँ होइ। अम्रित खात परानियाँ मुआ न सुनिबा कोइ।—दादू (शब्द०)।

सुकरीहार
संज्ञा पुं० [सुकरी ? + हिं० हार] गले में पहनने का एक प्रकार का हार।

सुकर्णक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] हस्तीकंद। हाथीकंद।

सुकर्णक (२)
वि० जिसके कान सुंदर हों। अच्छे कानोंवाला।

सुकर्णिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूषाकर्णी। मूसाकानी नाम की लता। २. महाबला।

सुकर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] इंद्रवारुणी। इंद्रायन।

सुकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छा काम। सत्कर्म। २. देवताओं की एक श्रेणी या कोटि।

सुकर्मा (१)
संज्ञा पुं० [सं० सुकर्मन्] १. विष्कंभ आदि सत्ताईस योगों में से सातवाँ योग। विशेष—ज्योतिष में यह योग सब प्रकार के कार्यों के लिये शुभ माना गया है और कहा गया है कि जो बालक इस योग में जन्म लेता है, वह परोपकारी, कलाकुशल, यशस्वी, सत्कर्म करनेवाला और सदा प्रसन्न रहनेवाला होता है। २. उत्तम कर्म करनेवाला मनुष्य। ३. विश्वकर्मा। ४. विश्वामित्र।

सुकर्मा (२)
वि० १. सत्कार्य करनेवाला। सुकर्मी। पुण्यात्मा। २. सक्रिय। कार्यकुशल [को०]।

सुकर्मी
वि० [सं० सुकर्मिन्] १. अच्छा काम करनेवाला। २. धार्मिक। पुण्यवान्। ३. सदाचारी।

सुकल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो अपनी संपत्ति का उपयोग दान और भोग में करता है। दाता और भोला। २. मधुर, पर अस्फुट शब्द करनेवाला।

सुकल (२)
संज्ञा पुं० [सं० शुक्ल] दे० 'शुक्ल'। उ०—दिन दिन बढ़ै बढ़ाइ अनंदा। जैसे सुकल पच्छ को चंदा।—लाल कवि (शब्द०)। यौ०—सुकलपच्छ = दे० 'शुक्ल पक्ष'। उ०—नौमी तिथि मधु- मास पुनीता। सुकलपच्छ अभिजित हरि प्रीता।—मानस, १।१९१।

सुकल (३)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का आम जो सावन के अंत में होता है।

सुकलिल
वि० [सं०] भली भाँति भरा हुआ [को०]।

सुकल्प
वि० [सं०] अत्यंत गुणी या योग्य। अत्यंत कुशल या निष्णात [को०]।

सुकल्पित
वि० [सं०] संनद्ध या सुसज्जित। शस्त्रसज्ज [को०]।

सुकल्य
वि० [सं०] पूर्ण स्वस्थ। उत्तम [को०]।

सुकबाना पु
क्रि० अ० [?] अचंभे में आना। आश्चर्यान्वित होना। उ०—परदे बाला वर लसै, घेरु दाब नहिं पाय। गिरवानहु असि तीन तकि रीझहुगे सुकवाय।—रामसहाय (शब्द०)।

सुकवि
संज्ञा पुं० [सं०] अच्छा कवि। सत्कवि। उत्तम कव्यकर्ता।

सुकष्ट
वि० [सं०] १. अति कष्टकर। २. (रोग आदि) जो कष्ट- साध्य हो (को०)।

सुकांड (१)
संज्ञा पुं० [सं० सुकाण्ड] करेले की लता।

सुकांड (२)
वि० सुंदर तना, कांड या डालवाला।

सुकांडिका
संज्ञा स्त्री० [सं० सुकाण्डिका] करेले की लता।

सुकांडी (१)
संज्ञा पुं० [सं० सुकाण्डिन्] भ्रमर। भौंरा।

सुकांडी (२)
वि० १. सुंदर कांड या डालवाला। २. सुंदर ढंग से संयुक्त या जुड़ा हुआ (को०)।

सुकांत
वि० [सं० सुकान्त] अत्यंत सुंदर। अति सुंदर [को०]।

सुकाज
संज्ञा पुं० [सं० सु + हिं० काज] उत्तम कार्य। अच्छा काम। सुकार्य।

सुकातिज
संज्ञा पुं० [सं० शुक्तिज] मोती। (डिं०)।

सुकाना पु
क्रि० स० [सं० शुष्क प्रा० सुक्क, पु० हिं० सुकना] दे० 'सुखाना'।

सुकानी
संज्ञा पुं० [अ० सुक्कानी] माँझी। दे० 'सुखानी'। (डिं०)।

सुकाम
वि० [सं०] उत्तम कामनावाला [को०]।

सुकामद
वि० [सं०] कामना पूर्ण करनेवाला [को०]।

सुकामव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] वह व्रत जो किसी उत्तम कामना से किया जाता है। काम्यव्रत।

सुकामा
संज्ञा स्त्री० [सं०] त्रायमाणा लता। त्रायमान।

सुकार (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सुकारा] १. सहज साध्य। सहज में होनेवाला। २. सहज में वश में आनेवाला (घोड़ा या गाय आदि)। ३. सहज में प्राप्त होनेवाला।

सुकार (२)
संज्ञा पुं० १. अच्छे स्वभाव का घोड़ा। २. कुंकुम शालि।

सुकाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुसमय। उत्तम समय। २. वह समय जो अन्न आदि का उपज के विचार से अच्छा हो। अकाल का उलटा।

सुकालिन
संज्ञा पुं० [सं०] पितरों का एक गण। मनु के अनुसार ये शूद्रों के पितर माने जाते हैं।

सुकाली
संज्ञा पुं० [सं० सुकालिन्] दे० 'सुकालिन'।

सुकालुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] भटकटैया।

सुकावना पु
क्रि० स० [सं० शुष्क, हिं० सुखाना] दे० 'सुखाना'। उ०—भूमि भार दीवे को कि सुर ढाँप लीवे को, समुद्र कीच कीवे को कि पान कै सुकावनो।—हनुमन्नाटक (शब्द०)।

सुकाशन
वि० [सं०] अत्यंत दीप्तिमान्। बहुत प्रकाशमान्। बहुत चमकीला।

सुकाष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] १. जलावन की लकड़ी। २. अच्छी लकड़ी।

सुकाष्ठक
संज्ञा पुं० [सं०] १. देवदारु। २. वृक्ष आदि जिसमें काष्ठ अच्छा हो।

सुकाष्ठा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कुटकी। २. काष्ठ कदली। वन- कदली। कठकेला।

सुकिज पु
संज्ञा पुं० [सं०] शुभ कर्म। उत्तम कार्य। उ०—सोचत हानि मानि मन गुनि गुनि गए निघटि फल सकल सुकिज को।—तुलसी (शब्द०)।

सुकिया पु
संज्ञा स्त्री० [सं० स्वकीया] वह स्त्री जो अपने ही पति में अनुराग रखती हो। स्वकीया नायिका। उ०—ता नायक की नायिका ग्रंथनि तीनि बखान। सुकिया परकीया अवर सामान्या सुप्रमान।—केशव (शब्द०)।

सुकी
संज्ञा स्त्री० [सं० शुक] तोते की मादा। सुग्गी। सारिका। तोती। उ०—कूजत हैं कलहंस कपोत सुकी सुक सोर करै सुनि ताहू। नेकहू क्यो न लला सकुचौ जिय जागत है गुरु लोग लजाहू।—देव (शब्द०)।

सुकीउ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० स्वकीया] अपने ही पति में अनुराग रखनेवाली स्त्री। स्वकीया नायिका। उ०—याही के निहोरे झूँठे साँचे राम मारे बाली लोग कहत तीय लै दई सुकीउ है। सुन्यो जाको नाँव मेरो देश देश गाँव सब शाखामृग राउर विमू- रति सुग्रीउ है।—हनुमन्नाटक (शब्द०)।

सुकीरति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सुकीर्ति] सुकीर्ति। सुयश। उ०—राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा।— मानस, १।१४।

सुकीर्ति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] उत्तम कीर्ति। सुयश।

सुकीर्ति (२)
वि० उत्तम कीर्तियुक्त। यशस्वी।

सुकुंडल, सुकुतल
संज्ञा पुं० [सं० सुकुण्डल सुकुन्तल] धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम।

सुकुंद
संज्ञा पुं० [सं० सुकुन्द] राल। धूना।

सुकुंदक
संज्ञा पुं० [सं० सुकुन्दक] प्याज।

सुकुंदन
संज्ञा पुं० [सं० सुकुन्दन] बर्बरी। बबई तुलसी।

सुकुआर
वि० [सं० सुकुमार, वि० सुकुआरी] सुकुमार। उ०— इह न होइ जैसे माखन चोरी। तब वह मुख पहचानि मानि सुख देती जान हानि हुति छोरी। उन दिननि सुकुआर हते हरि हौं जानत अपनो मन मोरी।—सूर (शब्द०)।

सुकुट्ट, सुकुट्य
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक प्राचीन जनपद का नाम।

सुकुड़ना
क्रि० अ० [सं० संङ्कुचन] दे० 'सिकुड़ना'।

सुकुति † पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शुक्ति] सीप। शुक्ति। उ०—पूरनपरमानंद वही अहिवदन हलाहल। कदलीगत घनसार सुकुति महँ मुक्ता कोलाहल।—सुधाकर (शब्द०)।

सुकुमार (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सुकुमारी] १. जिसके अंग बहुत कोमल हों। अति कोमल। नाजुक। २. सौंदर्ययुक्त। तरुण (को०)।

सुकुमार (२)
संज्ञा पुं० १. कोमलांग बालक। नाजुक लड़का। २. ऊख। ईख। ३. वनचंपा। ४. अपामार्ग। लटजीरा। ५. साँवाँ धान। ६. कँगनी। ७. एक दैत्य का नाम। ८. एक नाग का नाम। ९. काव्य का एक गुण। विशेष—जो काव्य कोमल अक्षरों या शब्दों से युक्त होता है, वह सुकुमार-गुण-विशिष्ट कहलाता है। १०. तंबाकू का पत्ता। ११. वैद्यक में एक प्रकार का मोदक। विशेष—यह मोदक निसोथ, चीनी, शहद, इलायची और काली मिर्च के योग से बनता है और विरेचक तथा रक्तपित्त और वायु रोगों का नाशक माना जाता है।

सुकुमारक
संज्ञा पुं० [सं०] १. तंबाकू का पत्ता। २. तेजपत्र। तेजपत्ता। ३. साँवा धान। ४. सुंदर बालक। ५. कान का एक विशेष अंश (को०)। ६. दे० 'सुकुवार'—२। ७. जांबवान् के एक पुत्र का नाम।

सुकुमारता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुकुमार होने का भाव या धर्म। कोमलता। सौकुमार्य। नजाकत।

सुकुमारत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सुकुमारता'।

सुकुमारवन
संज्ञा पुं० [सं०] एक कल्पित वन जो भागवत के अनुसार मेरु के नीचे हैं। कहते हैं इसमें भगवान् शंकर भगवती पार्वती के साथ क्रीड़ा किया करते हैं।

सुकुमारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जूही। २. नवमल्लिका। ३. कदली। केला। ४. स्पृक्का। ५. एक नदी का नाम (को०)। ६. मालती।

सुकुमारिक
वि० [सं०] जिसकी कन्या सुंदर हो [को०]।

सुकुमारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] केले का पेड़।

सुकुमारी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नवमल्लिका। चमेली। २. शंखिनी नाम की ओषधि। ३. वनमल्लिका। ४. एक प्रकार की फली। जैसे—मूँग आदि की। ५. बड़ा करेला। ६. ऊख। ७. कदली वृक्ष। केले का पेड़। ८. त्रिसंधि नामक फूलदार पेड़। ९. स्पूक्का नामक गंधद्रव्य। १०. सुकुमार कन्या। ११. लड़की। बेटी।

सुकुमारी (२)
वि० कोमल अंगोंवाली। कोमलांगी।

सुकुरना पु †
क्रि० अ० [सं० सङ्कु चन] दे० 'सिकुड़ना'। उ०— मुकुर बिलोको लाल रहे क्यों धुकुरफुकुर है। सरमाने हो कहा रहे क्यों अंग सुकुर कै।—अंबिकादत्त व्यास (शब्द०)।

सुकुर्कुर
संज्ञा पुं० [सं०] बालकों का एक प्रकार का रोग जिसकी गणना बालग्रहों में होती है।

सुकुल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्तम कुल। २. वह जो उत्तम कुल में उत्पन्न हो। कुलीन। ३. कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की एक उपजाति।

सुकुल (२)
संज्ञा पुं० [सं० शुक्ल] दे० 'शुक्ल'।

सुकुल (३)
वि० शुक्ल। शुभ्र श्वेत।

सुकुलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुकुल का भाव। कुलीनता।

सुकुलज
वि० [सं०] सत्कुल या उत्तम कुल में उत्पन्न [को०]।

सुकुलजन्मा
संज्ञा पुं० [सं० सुकुलजन्मन्] दे० 'सुकुलज'।

सुकुलबेद
संज्ञा पुं० [सं० शुक्ल + हिं० बेत] एक प्रकार का वृक्ष।

सुकुलोन
वि० [सं०] सत्कुलजात। उत्तम कुलोत्पन्न।

सुकुवाँर, सुकुवार
वि० [सं० सुकुमार] दे० 'सुकृमार'। उ०— औचक ही घर माँझ साँझ ही अगिनि लागी बड़ी अनुरागी रहि गई सोउ डारिए। कहै आयो नाथ सब कीजिये जू अंगीकार हँसे सुकुवार हरि मोहि को निहारिए।—भक्तमाल (शब्द०)।

सुकुसुमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्कंद की एक मातृका का नाम।

सुकूत
संज्ञा पुं० [अ०] १. मौन। चुप्पी। खामोशी। २. सन्नाटा। निर्जनता [को०]।

सुकून
संज्ञा पुं० [अ०] १. सन्नाटा। २. शांति। अमन। ३. बीमारी में कमी। ४. ठहराव। विराम। ५. आराम। ६. संतोष। ७. धैर्य। ८. जी ठंढा होना। ९. अक्षर का हलंत होना [को०]।

सुकूनत
संज्ञा स्त्री० [अ०] निवास। ठहराव।

सुकूनती
वि० [अ०] निवासयोग्य। रहने योग्य [को०]।

सुकूर्कुर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सुकुर्कुर'।

सुकृतू (१)
वि० [सं०] १. उत्तम और शुभ कार्य करनेवाला। २. धार्मिक पुण्यवान्। ३. बुद्धिमान्। विद्वान् (को०)। ४. भाग्यशाली (को०)। ५. यज्ञादि करनेवाला (को०)।

सुकृत् (२)
संज्ञा पुं० १. कुशल व्यक्ति। चतुर कार्यकर्ता। २. त्वष्ट्रा का नाम [को०]।

सुकृत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुण्य। सत्कार्य। भला काम। २. दान। ३. पुरस्कार। ४. दया। मेहरबानी। ५. भाग्य। सौभाग्य (को०)।

सुकृत (२)
वि० १. भाग्यवान्। किस्मतवर। २. धर्मशील। पुण्यवान्। ३. जो उत्तम रूप से किया गया हो। ४. शुभ। कल्याणकर। ५. जिसके साथ कृपा का व्यवहार किया गया हो (को०)।

सुकृतकर्म (१)
संज्ञा पुं० [सं० सुकृतकर्मन्] पुण्य कर्म। सत्कार्य। शुभ कार्य।

सुकृतकर्म (२)
वि० पुण्यात्मा। धर्मात्मा।

सुकृतभाक्
वि० [सं० सुकृतभाज्] सुकृत का भाजन। गुणी।

सुकृतव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का व्रत जो प्रायः द्वादशी के दिन किया जाता है।

सुकृतात्मा
वि० [सं० सुकृतात्मन्] वह जो सुकृत करता हो। धर्मात्मा। पुण्यात्मा।

सुकृतार्थ
वि० [सं०] जिसकी कामना पूर्ण हो गई हो। पूर्णकाम। सफलमनोरथ [को०]।

सुकृ़ति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शुभ कार्य। अच्छा काम। पुण्य। सत्कर्म। २. अनुकंपा। कृपा। दया (को०)। ३. तपस्या का अभ्यास (को०)। ४. मांगल्य। शुभ। शिव (को०)।

सुकृति (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मनु स्वारोचिष का पुत्र। २. दसवें मन्वंतर के सात ऋषियों में से एक। ३. पृथु का एक पुत्र [को०]।

सुकृतित्व
संज्ञा पुं० [सं०] सुकृत का भाव या धर्म।

सुकृती (१)
वि० [सं० सुकृतिन्] १. धार्मिक। पुण्यवान। सत्कर्म करनेवाला। उ०—तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसन राम प्रसादा।—मानस, २।२४९। २. भाग्यवान। तकदीरवर। ३. बुद्धिमान। अक्लमंद। ४. उदार। भलाई करनेवाला। परोपकारी (को०)।

सुकृती (२)
संज्ञा पुं० दसवें मन्वतर के एक ऋषि का नाम।

सुकृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्तम कार्य। पुण्य। धर्मकार्य। २. एक प्राचीन ऋषि का नाम।

सुकेत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] आदित्य। सूर्य।

सुकेत (२)
वि० उदारहृदय। दयालु [को०]।

सुकेतन
संज्ञा पुं० [सं०] भागवत के अनुसार सुनीथ राजा के पुत्र का नाम। कहीं कहीं इनका नाम 'निकेतन' भी मिलता है।

सुकेतु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. चित्रकेतु राजा का नाम। २. ताड़का राक्षसी के पिता का नाम। ३. सगर के पुत्र का नाम। ४. नंदिवर्धन का पुत्र। ५. केतुमंत के पुत्र का नाम। ६. सुनीथ राजा के पुत्र का पुत्र। ७. वह जो मनुष्यों और पक्षियों की बोली समझता हो।

सुकेतु (२)
वि० उत्तम केशोंवाला।

सुकेश (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सुकेशि'।

सुकेश (२)
वि० [वि० स्त्री० सुकेशा] उत्तम केशोंवाला। जिसके बाल सुंदर हों।

सुकेशा
वि० स्त्री० [सं०] सुंदर केशवाली।

सुकेशर
संज्ञा पुं० [सं०] १. बीजपूर का वृक्ष। बिजौरा नीबू का पेड़। २. केशरी। सिंह। ३. दो छंदों के नाम [को०]।

सुकेशि
संज्ञा पुं० [सं०] विद्युत् केश राक्षस का पुत्र तथा माल्यवान, सुमाली और माली नामक राक्षसों का पिता। विशेष—कहत हैं, जब इसका जन्म हुआ था, तब इसकी माता इसे मंडर पर्वत पर छोड़कर अपने पति के साथ विहार करने चली गई थी। उस समय पार्वती के कहने पर महादेव जी ने इसे चिरजीवी होने और आकाश में गमन करने का वरदान दिया था। पीछे से इसने एक गंधर्व कन्या के साथ विवाह किया था, जिससे उक्त तीनों पुत्र हुए थे। इन्हीं पुत्रों से राक्षसों का वंश चला था।

सुकेशी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उत्तम केशोंवाली स्त्री। वह स्त्री जिसके बाल बहुत सुंदर हों। २. महाभारत के अनुसार एक अप्सरा का नाम।

सुकेशी (२)
संज्ञा पुं० [सं० सुकेशिन्] [वि० स्त्री० सुकेशिनी] वह जिसके बाल बहुत सुंदर हों।

सुकेसर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सिंह। शेर। २. दे० 'सुकेशर'।

सुकोली
संज्ञा स्त्री० [सं०] क्षीर काकोली नामक कंद। पयस्का। पयस्विनी।

सुकोशक
संज्ञा पुं० [सं०] एक वृक्ष। दे० कोशम।

सुकोशला
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्राचीन नगरी का नाम।

सुकोशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कोशातकी। तुरई। तरोई।

सुक्कड़ि
संज्ञा पुं० [सं० श्रीखण्ड, प्रा० सिरिखंड, गुज० सुखड] एक प्रकार का सूखा चंदन। विशेष—वैद्यक में यह चंदन मूत्रकृच्छ्र, पित्तरक्त और दाह को दूर करनेवाला तथा शीतल और सुगंधिदायक बताया गया है।

सुक्कान (१)
संज्ञा पुं० [अ०?] पतवार (जहाज की)। (लश०)। मुहा०—सुक्कान पकड़ना या मारना = जहाज चलाना। (लश०)।

सुक्कान (२)
संज्ञा पुं० [अ० साकिन का बहु व०] निवासी लोग। रहनेवाले लोग।

सुक्कानी
संज्ञा पुं० [अ० मल्लाह] माझी। (लश०)।

सुक्ख पु
संज्ञा पुं० [सं० सुख] दे० 'सुख। उ०—जे जन भीजै रामरस विकसित कबहुँ न रुक्ख। अनुभव भाव न दरसै ते नर सुक्ख न दुक्ख।—कबीर (शब्द०)।

सुक्त
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल की एक प्रकार की काँजी जो पानी में घी या तेल, नमक और कंद या फल आदि गलाकर बनाई जाती थी। विशेष—वैद्यक में इसे रक्तपित्त और कफनाशक, बहुत उष्ण, तीक्ष्ण, रुचिकर, दीपन, और कृमिनाशक माना है।

सुक्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] इमली।

सुक्ति (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन पर्वत का नाम।

सुक्ति (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० शुक्ति] दे० 'शुक्ति'।

सुक्र (१)
संज्ञा पुं० [सं० शुक्र] दे० 'शुक्र'।

सुक्र (२)
संज्ञा पुं० अग्नि। (डिं०)।

सुक्रतु (१)
वि० [सं०] उत्तम कर्म करनेवाला। सत्कर्म करनेवाला।

सुक्रतु (२)
संज्ञा पुं० १. अग्नि। २. शिव। ३. इंद्र। ४. मित्रावरुण। ५. सूर्य। ६. चंद्र। सोम [को०]।

सुक्रतूया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शुभ कर्म करने की इच्छा। २. प्रज्ञा। बुद्धि (को०)। ३. दक्षता। पाटव (को०)।

सुक्रय
संज्ञा पुं० [सं०] अच्छी खरीद। अच्छा या लाभकर सौदा [को०]।

सुक्रित पु
संज्ञा पुं० [सं० सुकृत] दे० 'सुकृत'। उ०—कहहिं सुमति सब कोय सुक्तित सत जनम क जागै। तौ तुरतहिं सिलि जायँ सात रिखि सों सत भागै।- सुधाकर (शब्द०)।

सुक्रीडा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अप्सरा का नाम।

सुक्ल पु
वि० [सं० शुक्ल] दे० 'शुक्ल'। उ०—उनइस तेंतालीस को संवत माघ सुमास। सुक्ल पंचमी को भयो सुकवि लेख परकास।—अंबिकादत्त व्यास (शब्द०)।

सुक्षत्र (१)
वि० [सं०] १. अत्यंत धनशाली। २. सुराज्यशाली। ३. शक्तिशाली। बलवान्। दृढ़।

सुक्षत्र (२)
संज्ञा पुं० निरमित्र के पुत्र का नाम।

सुक्षद
संज्ञा पुं० [सं०] सुंदर यज्ञशाला। बढ़िया यज्ञमंडप।

सुक्षम पु †
वि० [सं० सूक्ष्म] दे० 'सूक्ष्म'। उ०—कारण सुक्षम तीन देह धरि भक्ति हत तृण तोरी। धर्मनि निरखि परखि गुरु मूरति जाहि के काज बनो री।—कबीर (शब्द०)।

सुक्षिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुंदर निवास स्थान। २. वह जो सुंदर स्थान में रहता हो। ३. वह जिसे यथेष्ट पुत्र पौत्रादि हों। धन धान्य श्रौर संतान आदि से सुखी।

सुक्षेत्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मार्कंडेय पुराण के अनुसार दसवें मनु के पुत्र का नाम। २. वह घर जिसके दक्षिण, पश्चिम और उत्तर की ओर दीवारें या मकान आदि हों। पूर्व ओर से खुला हुआ मकान जो बहुत शुभ माना जाता है।

सुक्षेत्र (२)
वि० [सं०] उत्तम क्षेत्र या कुक्षि से उत्पन्न [को०]।

सुक्षेम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] अतिशय समृद्धि। अत्यंत सुख शांति [को०]।

सुक्षेम (२)
संज्ञा पुं० [सं० सुक्षेमन्] जल [को०]।

सुखंकर
वि० [सं० सुखङ्कर] सुखकर। सुकर। सहज।

सुखंकरी
संज्ञा स्त्री० [सं० सुखङ्करी] जीवंती। डोडी। विशेष दे० 'जीवंती'।

सुखंघुण
संज्ञा पुं० [सं० सुखङ्घुण] शिव का अस्त्र। शिवषट्वांग।

सुखंडरा
संज्ञा पुं० [देश०] वैश्यों की एक जाति।

सुखंडी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सूखना + ड़ी (प्रत्य०)] एक प्रकार का रोग जिसमें शरीर सूखकर काँटा हो जाता है। यह रोग बच्चों को बहुत होता है।

सुखंडी (२)
वि० बहुत दुबला पतला।

सुखंद पु
वि० [सं० सुखद] सुखदायी। आनंददायक। उ०—धनगन बेली बनबदन सुमन सुरति मकरंद। सुंदर नायक श्रीरवन दच्छिन पवन सुखंद।—रामसहाय (शब्द०)।

सुख (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मन की वह उत्तम तथा प्रिय अनुभूति जिसके द्वारा अनुभव करनेवाले का विशेष समाधान और संतोष होता है और जिसके बराबर बने रहने की वह कामना करता है। वह अनुकूल और प्रिय बेदना जिसकी सबको अभिलाषा रहती है। दुःख का उलटा। आराम। जैसे,—(क) वे अपने बाल बच्चों में बड़े सुख से रहते हैं । (ख) जहाँ तक हो सके सबको सुख पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिए। विशेष—कुछ लोग सुख को हर्ष का पर्यायवाची समझते हैं, पर दोनों में अंतर है। कोई उत्तम समाचार सुनने अथवा कोई उत्तम पदार्थ प्राप्त करने पर मन में सहसा जो वृत्ति उत्पन्न होती है, वह हर्ष है। परंतु सुख इस प्रकार आकस्मिक नहींहोता, और हर्ष की अपेक्षा अधिक स्थायी होता है। अनेक प्रकार की चिंताओं, कष्टों आदि से निरंतर बचे रहने पर और अनेक प्रकार की वासनाओं आदि की तृप्ति होने पर मन में जो प्रिय अनुभूति होती है, वह सुख है। हमारे यहाँ कुछ लोगों ने सुख को मन का और कुछ लोगों ने आत्मा का धर्म माना है। न्याय और वैशेषिक के अनुसार सुख आत्मा का एक गुण है। यह सुख दो प्रकाक का कहा गया है—(१) नित्य सुख जो परमात्मा के विशेष सुख के अंतर्गंत है और (२) जन्य सुख जो जीवात्मा के विशेष सुख के अंतर्गंत है। यह धन या मित्र की प्राप्ति, आरोग्य और भोग आदि से उत्पन्न होता है। सांख्य और पातंजल के मत से सुख प्रकृति का धर्म है और इसकी उत्पत्ति सत्य से होती है। गीता में सुख तीन प्रकार का कहा गया है— (१) सात्विक जो ज्ञान, वैराग्य और ध्यान आदि के द्वारा प्राप्त होता है। (२) राजसिक जो विषय तथा इंद्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है। (जैसे संगीत सुनने, सुंदर रूप देखने, स्वादिष्ट भोजन करने और संभोग आदि से होता है।) और (३) तामस जो आलस्य और उन्माद आदि के कारण उत्पन्न होता है। पर्या०—प्रीति। मोद। आमोद। प्रमोद। आनंद। हर्ष। सौख्य। क्रि० प्र०—देना।—पाना।—भोगना।—मिलना। मुहा०—सुख मानना = परिस्थिति आदि की अनुकूलता के कारण ठीक अवस्था में रहना। जैसे,—यह पेड़ सभी प्रकार की जमीनों में सुख मानता है। सुख लूटना = यथेष्ट सुख का भोग करना। मौज करना। आनंद करना। सुख की नींद सोना = निश्चिंत होकर आनंद से सोना या रहना। खूब मजे में समय बिताना। २. एक प्रकार का वृत्त जिसके प्रत्येक चरण में ८. सगण और २. लघु होते हैं। ३. आरोग्य। तंदुरुस्ती। ४. स्वर्ग। ५. जल। पानी। ६. वृद्धि नाम की अष्टवर्गीय ओषधि। ७. समृद्धि (को०)। ८. आसानी। सुभीता। सहूलियत (को०)। ९. कल्याण। शुभ। १०. अभ्युन्नति। वृद्धि। बढ़ती।

सुख (२)
वि० [सं०] १. स्वाभाविक। सहज। उ०—जाके सुख मुखबास ते वासित होत दिगंत।—केशव (शब्द०)। २. सुख देनेवाला। सुखद। ३. प्रसन्न। खुश (को०)। ४. रुचिकर। मधुर (को०)। ५. सद्गुणी। पुण्यात्मा (को०)। ६. योग्य। उपयुक्त (को०)।

सुख (३)
क्रि० वि० १. स्वाभाविक रीति से। साधारण रीति से। उ०— कहुँ द्विज गण मिलि सुख श्रुति पढ़ही।—केशव (शब्द०)। २. शांतिपूर्वक। यथेच्छ्या। सुखपूर्वक। आराम से। ३. प्रसन्नता या हर्ष के साथ (को०)। ४. सरलता से। आसानी से (को०)।

सुखआसन पु
संज्ञा पुं० [सं० सुख + आसन] सुखपाल। पालकी। डोली। उ०—चढ़ि सुखआसन नृपति सिधायो। तहाँ कहार एक दुख पायो।—सूर (शब्द०)।

सुखकंद
वि० [सं० सुख + कन्द] सुखमूल। सुख देनेवाला। आनंद देनेवाला। उ०—अहो पवित्र प्रभाव यह रूप नयन सुखकंद। रामायन रचि मुनि दियो बानिहिं परम अनंद।—सीताराम (शब्द०)।

सुखकंदन पु
वि० [सं० सुख + कन्दन] दे० 'सुखकंद'। उ०—श्री वृषभानु सुता दुलही दिन जोरी बनी बिधना सुखकंदन। रस- खानि न आवत मो पै कह्यो कछु दोउ फँदे छबि प्रेम के कंदन।—रसखान (शब्द०)।

सुखकंदर पु
वि० [सं० सुख + कन्दरा] सुख का घर। सुख का आकर। उ०—सुंदर नंद महर के मंदिर प्रगटयो पूत सकल सुखकंदर।—सूर (शब्द०)।

सुखक पु †
वि० [सं० शुष्क; हिं० सूखा] सूखा। शुष्क। उ०— सुखक वृक्ष एक जक्त उपाया। समुझि न परी विषय कछु माया।—कबीर (शब्द०)।

सुखकर
वि० [सं०] १. सुख देनेवाला। सुखद। २. जो सहज मैं सुख से किया जाय। सुकर। ३. सुखद या हलके हाथवाला। उ०—परम निपुण सुखकर वर नापित लीन्ह्यो तुरत बुलाई। क्रम सों चारि कुमारन को नृप दिय मुंडन करवाई।—रघु- राज (शब्द०)।

सुखकरण
वि० [सं० सुख + करण] सुख उत्पन्न करनेवाला। आनंद देनेवाला। उ०—सब सुखकरण हरण दुख भारी। जपैं जाहि शिव शैलकुमारी।—विश्राम (शब्द०)।

सुखकरन पु
वि० [सं० सुख + करण] दे० 'सुखकरण'। उ०—सुखकरन सब ते परम करवर वेनु वरकर धरत हैं। सुर मधुर तान बँधान तें प्रभु मनहुँ को मन हरत है।—गिरधरदास (शब्द०)।

सुखकार, सुखकारक
वि० [सं०] सुखदायक। सुख देनेवाला। आनंददायक।

सुखकारी
वि० [सं० सुखकारिन्] सुख देनेवाला। आनंददायक।

सुखकृत्
वि० [सं०] १. जो सुख या आराम से किया जाय। सुकर। सहज। २. सुख करनेवाला। सुखद (को०)।

सुखक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुख से किया जानेवाला काम। सहज काम। २. वह काम जिसे करने से सुख हो। आराम देनेवाला काम। ३. आराम या सुख देना।

सुखगंध
वि० [सं० सुखगन्ध] जिसकी गंध आनंद देनेवाली हो। सुगंधित।

सुखग
वि० [सं०] सुख से जानेवाला। आराम से चलने या गमन करनेवाला।

सुखगम
वि० [सं०] १. सरल। सुगम। सहज। २. दे० 'सुखगम्य'।

सुखगम्य
वि० [सं०] सुख से जाने योग्य। आराम से जाने योग्य। २. जिसमें सुखपूर्वक गमन किया जा सके।

सुखग्राह्य
वि० [सं०] १. सुख से ग्रहण करने योग्य। जो सहज में लिया जा सके। २. सुखबोध्य। सुबोध।

सुखघात्य
वि० [सं०] जिसका घात या हनन सरलता से किया जा सके।

सुखचर
वि० [सं०] सुख से चलनेवाला। आराम से चलनेवाला।

सुखचार
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तम घोड़ा। बढ़िया घोड़ा।

सुखच्छाय
वि० [सं०] शीतल छाया देनेवाला। सुखद छायावाला।

सुखच्छेद्य
वि० [सं०] सरलता से छेदने या काटने योग्य।

सुखजनक
वि० [सं०] सुखदायक। आनंददायक। सुखद।

सुखजननि पु, सुखजननी
वि० [सं०] सुख उपजानेवाली। सुख देनेवाली। उ०—मदन जीविका सुखजननि मनमोहनी विलास। निपट कृपाणी कपट की रति शोभा मुखवास।—केशव (शब्द०)।

सुखजात
वि० [सं०] १. सुखी। प्रसन्न २. जो सुख से जात या उत्पन्न हो।

सुखज्ञ
वि० [सं० सुख + ज्ञ] सुख का जाननेवाला। सुख का ज्ञाता। उ०—जागरत भाखि सुप्त सुखमाभिलाख जे सुखज्ञ सुखभाषी ह्वै तुरीयमय माने हैं। गुणत्रय भेद के अवस्था त्रय खेदहू के लच्छन के लच्छ ते बिलच्छन बखाने हैं।—चरणचंद्रिका (शब्द०)।

सुखड़ैना
संज्ञा पुं० [हिं० सूखना + ड़ैना (प्रत्य०)] बैलों का एक प्रकार का रोग जो उनका तालू खुल या फूट जाने से होता है। इसमें बैल खाना पीना छोड़ देता है जिससे वह बहुत दुबला हो जाता है।

सुखढरन पु
वि० [सं० सुख + हिं० ढलना] सुख देनेवाला। सुख- दायक। उ०—सज्जन सुखढरन भक्तजन कंठाभरन।—सर- स्वती (शब्द०)।

सुखतला, सुखतल्ला
संज्ञा पुं० [हिं० सुखतला] चमड़े का वह टुकड़ा जो जूते के भीतर चिपकाया जाता है जिससे तलवे को आराम मिले।

सुखता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुख का भाव या धर्म। सुखत्व।

सुखत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सुखता'।

सुखथर पु †
संज्ञा पुं० [सं० सुख + स्थल] सुख का स्थल। सुख देनेवाला स्थान। उ०—निपट भिन्न वा सब सो जो पहले हो सुखथर। विविध त्रास सो पूरित हैं वे भूमि भयंकर।—श्रीधर पाठक (शब्द०)।

सुखद (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सुखदा] सुख देनेवाला। आनंद देनेवाला। सुखदायी। आरामदेह।

सुखद (२)
संज्ञा पुं० १. विष्णु का स्थान। विष्णु का आसन। २. विष्णु। ३. संगीत में एक प्रकार का ताल।

सुखदगीत
वि० [सं० सुखद + गीत] [वि० स्त्री० सुखदगीता] जिसकी बहुत अधिक प्रशंसा हो। प्रशंसनीय। उ०—जनक सुखदगीता पुत्रिका पाय सीता।—केशव (शब्द०)।

सुखदनियाँ पु
वि० [सं० सुखदानी] दे० 'सुखदायी'। उ०—सुंदर स्याम सरोजबरन तन सब अँग सुभग सकल सुखदनियाँ।— तुलसी (शब्द०)।

सुखदा (१)
वि० स्त्री० [सं०] सुख देनेवाली। आनंद प्रदान करनेवाली। सुखदायिनी।

सुखदा (२)
संज्ञा स्त्री० १. गंगा का एक नाम। २. अप्सरा। ३. शमी वृक्ष। ४. एक प्रकार का छंद।

सुखदाइन पु
वि [सं० सुखदायिनी] दे० 'सुखदायिनी'। उ०— आइ हुती अन्हवावन नाइनि, सोंधो लिए कर सूधे सुभाइनि। कंचुकि छोरि उतै उपटैबे को ईंगुर से अँग की सुखदाइनि।— दे० (शब्द०)।

सुखदाई पु
वि० [सं० सुखदायिन्] दे० 'सुखदायी'।

सुखदात पु
वि० [सं० सुखदातृ] दे० 'सुखदाता'। उ०—जो सब देव को देव अहै, द्विजभक्ति में जाकी घनी निपुणाई। दासन को सिगरो सुखदात प्रशांत स्वरूप मनोहरताई।—रघुराज (शब्द०)।

सुखदाता
वि० [सं० सुखदातृ] सुख देनेवाला। आनंद देनेवाला। आराम देनेवाला। सुखद। उ०—सुखदाता मातापिता सेवक सरन सधार। उपवन बैठे चंद जहँ द्वै पंचास पधार।—पृ० रा०,६।३२।

सुखदान पु
वि० [सं० सुख + देना] [स्त्री० सुखदानी] सुख देनेवाला। आनंद देनेवाला। उ०—(क) खेलति है गुड़ियान को खेल लए सँग मै सजनी सुखदान री।—सुंदरीसर्वस्व (शब्द०)। (ख) जब तुम फूलन के दिवस आवत है सुखदान। फूली अंग समाति नहिं उत्सव करति महान।—लक्ष्मणसिंह (शब्द०)।

सुखदानी (१)
वि० स्त्री० [हिं० सुखदान] सुख देनेवाली। आनंद देनेवाली।

सुखदानी (२)
संज्ञा स्त्री० एक प्रकार का वृत्त जिसके प्रत्येक चरण में ८. सगण और १. गुरु होता है। इसे सुंदरी, मल्ली और चंद्रकला भी कहते हैं।

सुखदाय
वि० [सं० सुखदायक] दे० 'सुखदायक'।

सुखदायक (१)
वि० [सं०] सुख देनेवाला। आराम देनेवाला। सुखद।

सुखदायक (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का छंद।

सुखदायिनी (१)
वि० स्त्री० [सं०] सुख देनेवाली। सुखदा।

सुखदायिनी (२)
संज्ञा स्त्री० मांसरोहिणी नाम की लता। रोहिणी।

सुखदायी
वि० [सं० सुखदायिन्] [वि० स्त्री० सुखदायिनी] सुख देनेवाला। आनंद देनेवाला। सुखद।

सुखदायी पु
वि० [सं० सुखदायक] दे० 'सुखदायी'। उ०—देखि श्याम मन हरष बढ़ायो। तेसिय शरद चाँदिनी निर्मल तैसोइ रास रंग उपजायो। तैसिय कनकबरन सब सुंदरि यह सोभा पर मन ललचायो। तैसी हंससुता पवित्र तट तैसोइ कल्पवृक्ष सुखदायो।—सूर (शब्द०)।

सखदाव पु
दे० [सं० सुखदायक] दे० 'सुखदायी'। उ०—जल दल चंदन चक्रदर घंट शिला हरि ताव। अष्ट वस्तु मिलि होत है चरणामृत सुखदाव।—विश्राम (शब्द०)।

सुखदास
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान जो अगहन महीने में तैयार होता है और जिसका चावल बरसों तक रह सकता है।

सुखदुःख
संज्ञा पुं० [सं०] आराम और कष्ट। सुख और दुःख का जोड़ा। द्वंद्व। २. भले और बुरे समय का क्रम। भाग्य और अभाग्य। मुहा०—सुखदुःख का साथी = भले और बुरे में बराबर साथ देनेवाला।

सुखद्दश्य
वि० [सं०] जिसे देखने को जी चाहे। सुंदर [को०]।

सुखदेनी पु
वि० [सं० सुखदायिनी] दे० 'सुखदायिनी'। उ०—राजत रोमन की तन राजिव है रसबीज नदी सुखदेनी। आगे भई प्रतिबिंबित पाछे बिलंबित जो मृगनैनी कि बेनी।—सुंदरी- सर्वस्व (शब्द०)।

सुखदैन पु
वि० [हिं० सुख + देना] दे० 'सुखदायी', 'सुखदान'। उ०—जियके मन मंजु मनोरथ आनि कहै हनुमान जगे पै जगे। सुखदैन सरोज कली से भले उभरै ये उरोज लगे पै लगै।— सुंदरीसर्वस्व (शब्द०)।

सुखदैनी पु
वि० [सं० सुखदायिनी] सुख देनेवाली। आनंद देनेवाली। सुखद। उ०—भाल गुही गुन लाल लटैं लपटी लर मोतिन की सुखदैनी।—केशव

सुखदोहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह गाय जो सुखपूर्वक दूही जाय [को०]।

सुखदोह्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह गाय जिसकी दुहने में किसी प्रकार का कष्ट न हो। बहुत सहज में दूही जा सकनेवाली गौ।

सुखधाम
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुख का घर। आनंदसदन। उ०— सो सुखधाम राम अस नामा।—मानस, १। २. वह जो स्वयं सुखमय हो; या जो बहुत अधिक सुख देनेवाला हो। ३. वैकुंठ। स्वर्ग।

सूखन
संज्ञा पुं० [अ० सुख़न] दे० 'सखुन'। (सुखन शब्द के मुहा० और यौ० के लिये दे० 'सखुन' शब्द के मुहा० और यौ०)।

सुखना पु
क्रि० अ० [हिं० सूखना] दे० 'सूखना'।

सुखनीय
वि० [सं०] सुखद। आनंदप्रद [को०]।

सुखपर
वि० [सं०] १. सुखी। खुश। प्रसन्न। २. सुख चाहनेवाला। आरामतलब।

सुखपाल
संज्ञा पुं० [सं० सुख + पाल (की)] एक प्रकार की पालकी जिसका ऊपरी भाग शिवाले के शिखर का सा होता है। उ०—(क) सुखपाल और चंडोलों पर और रथों पर जितनी रानियाँ और महारानी लक्ष्मीवास पीछे चली आती थीं।— शिवप्रसाद (शब्द०)। (ख) घोड़न के रथ दोइ दिए जरबाफ मढ़ी सुखपाल सुहाई।—रघुनाथ (शब्द०)। (ग) हम सुखपाल लिए खड़े हाजिर लगन कहार। पहुँचायौ मन मजिल तक तुहिं लै प्रान अधार।—रतनहजारा (शब्द०)।

सुखपूर्वक
क्रि० वि० [सं०] सुख से। आनंद से। आराम के साथ। मजे में। जैसे,—आप यदि उनके यहाँ पहुँच जायँगे तो बहुत सुखपूर्वक रहेंगे।

सुखपेय
वि० [सं०] जिसके पीने में सुख हो। जिसकी पान करने से आनंद मिले। सुपेय।

सुखप्रणाद
वि० [सं०] सुखद ध्वनि या नादवाला [को०]।

सुखप्रतीक्ष
वि० [सं०] सुख की प्रतीक्षा करने, राह देखने या आशा करनेवाला [को०]।

सुखप्रद
वि० [सं०] सुख देनेवाला। सुखदायक। सुखद।

सुखप्रबोधक
वि० [सं०] सुबोध। सरलता से बोध होनेवाला।

सुखप्रविचार
वि० [सं०] सरलता से ग्रहण करने योग्य [को०]।

सुखप्रवेय
वि० [सं०] जिसे आसानी से कंपित किया जा सके। (वृक्ष आदि) जो आसानी से हिल सके।

सुखप्रश्न
संज्ञा पुं० [सं०] कुशलक्षेम की जिज्ञासा। कुशल समाचार पूछना [को०]।

सुखप्रसव, सुखप्रसवन
संज्ञा पुं० [सं०] बिना कष्ट के होनेवाला प्रसव [को०]।

सुखप्रसवा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुख से प्रसव करनेवाली गौ, स्त्री आदि। आराम से जननेवाली स्त्री।

सुखप्रसवा (२)
वि० स्त्री० सुखपूर्वक जनन करनेवाली (गाय, स्त्री)।

सुखप्राप्त
वि० [सं०] १. जिसे सुख प्राप्त हो। २. जो सुख से लभ्य हो।

सुखप्राप्य
वि० [सं०] सुख से प्राप्त करने योग्य। सरलता से मिल जानेवाला [को०]।

सुखबंधन
वि० [सं० सुखबन्धन] सुखों से आबद्ध। विलासी [को०]।

सुखबदध
वि० [सं०] सुंदर [को०]।

सुखबोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. आनंद की अनुभूति। २. सहज ज्ञान। सुगम ज्ञान [को०]।

सूखभंज
संज्ञा पुं० [सं० सुखभञ्ज] सफेद मिर्च।

सुखभक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] सफेद सहिंजन। श्वेत शिग्रु।

सुखभक्षिकाकार
संज्ञा पुं० [सं०] कांदबिक। हलवाई [को०]।

सुखभाक्, सुखभाग्
वि [सं० सुखभागिन्] प्रसन्न [को०]।

सुखभागी
वि० [सं० सुखभागिन्] दे० 'सुखभाग्'।

सुखभुक्
वि० [सं० सुखभुज्] १. प्रसन्न। सुखी। हर्षित। २. भाग्य- शाली [को०]।

सुखभेद्य
वि० [सं०] जो सरलता से तोड़ा या भेदा जा सके। कोमल। भंगुर [को०]।

सुखभोग
संज्ञा पुं० [सं०] सुख का उपभोग। आनंदभोग [को०]।

सुखभोगी
वि० [सं० सुखभोगिन्] सुख भोगनेवाला [को०]।

सुखभोग्य
संज्ञा पुं० [सं०] जिसका भोग सुखपूर्वक हो सके [को०]।

सुखमद
वि० [सं०] जिसका मद सुखद हो [को०]।

सुखमन पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० सुषुम्ना] सुषुम्ना नाम की नाड़ी। मध्यनाड़ी। विशेष दे० 'सुषुम्ना'। उ०—कहाँ पिंगला सुखमन नारी। सूनि समाधि लागि गइ तारी।—जायसी (शब्द०)।

सुखमा
संज्ञा स्त्री० [सं० सुषमा] १. शोभा। छवि। उ०—तिय मुख सुखमा सो दृंगनि बाँध्यो प्रेम अधार। रही अलक ह्वै लगी मनु बटुरी पुतरी तार।—मुबारक (शब्द०)। २. एक प्रकार का वृत्त जिसमें एक तगण, एक यगण, एक मगण और एक गुरु होता है। इसे वामा भी कहते हैं।

सुखमानी
वि० [सं० सुखमानिन्] सुख माननेवाला। हर अवस्था में सुखी रहनेवाला।

सुखमुख
संज्ञा पुं० [सं०] यक्ष।

सुखमूल पु
वि० [सं०] सुखराशि। उ०—सुखमूल दूलह देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।—मानस, १।३२४।

सुखमोद
संज्ञा पुं० [सं०] लाल सहिंजन। शोभांजन वृक्ष।

सुखमोदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] शल्लकी का वृक्ष। सलई।

सुखयिता
वि० [सं० सुखयितृ] सुख देनेवाला। इर्षप्रद [को०]।

सुखरात्रि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दिवाली का रात। कार्तिक महीने की अमावस्या की रात। २. सुहागरात (को०)। ३. लक्ष्मी [को०]।

सुखरात्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] लक्ष्मी [को०]।

सुखराशि
वि० [सं०] जो सुख की पुंजीकृत राशि हो। जो सर्वथा सुखमय हो।

सुखरास पु
वि० [सं० सुख+राशि] जो सर्वथा सुखमय हो। जो सुख की राशि हो। उ०—मंदिर के द्वार रूप सुंदर निहारी करै लग्यो शित गात सकलात दई दास है। सोचे संग जाइबे की रीति को प्रमान बहै वैसे सब जानो माधवदास सुखरास है।— भक्तमाल (शब्द०)।

सुखरासी
वि० [सं० सुख+राशि] दे० 'सुखरास'। उ०—पूरन काम राम सुखरासी।—मानस, ३। २४।

सुखरूप
वि० [सं०] मनोहर रूप, आकृतिवाला [को०]।

सुखलक्ष्य
वि० [सं०] आसानी से लक्षित होनेवाला। सुख से पहचान में आनेवाला [को०]।

सुखलभ्य
वि० [सं०] जो सुखपूर्वक लभ्य हो। सुलभ।

सुखलिप्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुख की लालसा। सुखाकांक्षा।

सुखलाना
क्रि० स० [हिं० सूखना का प्रे० रूप] दे० 'सुखाना'।

सुखवंत
वि० [सं० सुखवत्] १. सुखी। प्रसन्न। खुश। २. सुखदायक। आनंद देनेवाला। उ०—इसके कुंद कली से दंत। बचन तोतले हैं सुखवंत।—संगीत शा० (शब्द०)।

सुखवत्
वि० [सं०] सुखयुक्त। सुखी। प्रसन्न।

सुखवती
वि० स्त्री० [सं०] सुख से युक्त। सुखी (स्त्री)।

सुखवत्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुख का भाव या धर्म। सुख। आनंद।

सुखवन † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० सुखना] वह फसल जो सूखने के लिये धूप में डाली जाती है। २. वह कमी जो किसी चीज में उसके सूखने के कारण होती है।

सुखवन (२)
संज्ञा पुं० [हिं० सूखना] वह बालू जिसे लिखे हुए अक्षरों आदि पर डालकर उनकी स्याही सुखाते हैं। उ०—किलक ऊख ह्वै जाइ मसी हू होत सुधा सी। खाजा के परतन की सी छबि पत्र प्रकासी। सुखवन की बारूहू तहाँ चीनी सी ढरकी। सुकवि करें किमि कविता मधुरे बधू अपर की।—अंबिका- दत्त (शब्द०)।

सुखवर्चक
संज्ञा पुं० [सं०] सज्जी मिट्टी। सर्जिका क्षार।

सुखवर्चस
संज्ञा पुं० [सं०] सज्जी मिट्टी।

सुखवह
वि० [सं०] जो सुखपूर्वक या आसानी से वहन किया जाय।

सुखवा †
संज्ञा [सं० सुख] सुख। आनंद। मोद। उ०—सुखवा सकल बलबिरवा के घर, दुख नैहर गवन नाहिं देत।—रा० कृ० वर्मा (शब्द०)।

सुखवाद
संज्ञा पुं० [सं०] भौतिक सुख को ही सर्वोपरि माननेवाला मत।

सुखवादी
वि० संज्ञा पुं० [सं० सुख+वादिन्] (वह) जो इंद्रियसुख को ही सब कुछ समझता या मानता हो। (वह) जो भोग विलास आदि को ही जीवन का मुख्य उद्देश्य समझता हो। विलासी।

सुखवान्
वि० [सं० सुखवत्] सुखी।

सुखवार
वि० [सं० सुख+हिं० वार (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० सुखवारी] सुखी। प्रसन्न। खुश। उ०—जहाँ दीन, घरहीन परी ठिठुरत बहु नारी। रही कदाचित कबहुँ गाम में सो सुखवारी। रोय चुकी पै निपदोषिन की सुनि सुनि ख्वारी।—श्रीधर पाठक (शब्द०)।

सुखवास
संज्ञा पु० [सं०] १. तरबूज। शीर्णवृत। २. वह स्थान जहाँ का निवास सुखकर हो। आनंद का स्थान। सुख की जगह।

सुखविहार
वि० [सं०] सुखपूर्वक विहार करनेवाला। आनंद की जिंदगी बसर करनेवाला।

सुखवेदन
संज्ञा पुं० [सं०] सुखानुभव। आनंदानुभूति [को०]।

सुखशयन
संज्ञा सं० [पुं०] सुखपूर्वक सोना।

सुखशयित
वि० [सं०] जो सुख या आराम से सोया हो।

सुखशय्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुख की नींद। २. सुखदायक शय्या।

सुखशांति
संज्ञा स्त्री० [सं० सुखशान्ति] अमन चैन।

सुखशायी
वि० [सं० सुखशायिन्] सुखपूर्वक सोया हुआ। जो आराम से सोया हो।

सुखश्रव, सुखश्राव्य
वि० [सं०] कानों को मधुर लगनेवाला। श्रुति- मधुर। सुरीला [को०]।

सुखश्रति
वि० [सं०] दे० 'सुखश्रव'।

सुखसंग
संज्ञा पुं० [सं० सुखसङ्ग] सुख के प्रति आसक्ति।

सुखसंगी
वि० [सं० सुखसंङ्गिन्] सुख का साथी। सुख के समय साथ देने या रहनेवाला [को०]।

सुखसंदूह्या
संज्ञा स्त्री० [सं० सुखसन्दूह्या] वह गाय जो सुख से दूही जाय। जिस गाय को दूहने में किसी प्रकार की कठिनाई न हो।

सुखसंदोह
संज्ञा पुं० [सं०] सुख की राशी। सुख का मूल। उ०— सुखसंदोह मोहपर ग्यान गिरा गोतित।—राम० पृ० ११९।

सुखसंदोह्या
संज्ञा स्त्री० [सं० सुखसन्दोह्या] दे० 'सुखसंदूह्या'।

सुखसंपद, सुखसंपत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० सुखसम्पद, सुखसम्पत्ति] सुख और धन दौलत।

सुखसंयोग
संज्ञा पुं० [सं०] लोकोत्तर आनंद की प्राप्ति [को०]।

सुखसलिल
संज्ञा पुं० [सं०] उष्ण जल। गरम पानी। विशेष—पानी गरम करने से उसमें कोई दोष नहीं रह जाता। वैद्यक में ऐसा जल बहुत उपकारी बताया गया है, और इसी लिये इसे 'सुखसिलल' कहा गया है।

सुखसागर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुख के सागर। आनंद के समुद्र। २. हिंदी का एक ग्रंथ जो भागवत के दशम स्कंध का अनुवाद है। इसके अनुवादक मुंशी सदासुखलाल थे।

सुखसाध्य
वि० [सं०] जिसका साधन सुकर हो। जिसके साधन में कोई कठिनाई न हो। सुख या सहज मों होनेवाला। सुकर। सहज। २. (रोग आदि) जो सरलता से अच्छा हो सके।

सुखसार
संज्ञा पुं० [सं० सुख+सार] मुक्ति। मोक्ष। उ०—केशव तिन सौं यों कह्यौ क्यों पाऊँ सुखसारु।—केशव (शब्द०)।

सुखसुप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुख की नींद।

सुखसेव्य
वि० [सं०] १. सुख से सेवन या भोग करने योग्य। २. सुलभ [को०]।

सुख पर्श
वि० [सं०] १. छूने में सुखकर। २. तृप्तिकर [को०]।

सुखस्वप्न
संज्ञा पुं० [सं०] सुखमय जीवन की कल्पना [को०]।

सुखहस्त
वि० [सं०] जिसके हाथ कोमल एवं मृदु हों। मुलायम हाथोंवाला [को०]।

सुखांत
संज्ञा पुं० [सं० सुखान्त] १. वह जिसका अंत सुखमय हो। सुखद परिणामवाला। जिसका परिणाम सुखकर हो। २. मित्रता- पूर्ण। मैत्रीयुक्त [को०]। ३. सुख का नाश या विघात करनेवाला (को०)। ४. पाश्चात्य नाटकों के दो भेदों में से एक। वह नाटक जिसके अंत में कोई सुखपूर्ण घटमा (जैसे संयोग, अभीष्टसिद्धि, राज्यप्राप्ति आदि) हो। दुःखांत (ट्रैजेडी) का उलटा। कॉमेडी।

सुखांबु
संज्ञा पुं० [सं० सुखाम्बु] गरम जल। उष्ण जल।

सुखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वरुण की पुरी का नाम। २. दयालुता। पुष्य (को०)। ३. संगीत की एक मूर्छना। ४. शिव की नौ शक्तियों में से एक शक्ति (को०)। ५. मुक्ति प्राप्त करने की साधना। मोक्षप्राप्ति की चेष्टा या उपाय (दर्शन)।

सुखाकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुख का आकर या निधि। २. बौद्धों के एक लोक का नाम [को०]।

सुखागत
संज्ञा पुं० [सं०] स्वागत [को०]।

सुखाजात
संज्ञा पुं० [सं०] शिव।

सुखात्मा
संज्ञा पुं० [सं० सुखात्मन्] ईश्वर। ब्रह्म।

सुखाधार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्ग।

सुखाधार (२)
वि० जो सुख का आधार हो। जिसपर सुख अवलंबित हो। जैले—हमारे तो आप ही सुखाधार हैं।

सुखाधिष्ठान
संज्ञा पुं० [सं०] सुख का स्थान।

सुखाना (१)
क्रि० स० [हिं० सूखना का प्रे० रूप] १. किसी गोली या नम चीज को धूप या हवा में अथवा आँच पर इस प्रकार रखना या ऐसी ही और कोई क्रिया करना जिससे उसकी आर्द्रता या नमी दूर हो या पानी सूख जाय। जैसे,—धोती सुखाना, दाल सुखाना, मिर्च सुखाना, जल सुखाना। २. कोई ऐसी क्रिया करना जिससे आर्द्रता दूर हो। जैसे,—इस चिंता ने तो मेरा सारा खून सुखा दिया।

सुखाना (२) †
क्रि० अ० दे० 'सूखना'।

सुखानी
संज्ञा पुं० [अ० सुक्कानी] माँझी। मल्लाह। (लश०)।

सुखानुभव
संज्ञा पुं० [सं०] सुख का अनुभव या अनुभूति [को०]।

सुखाय
वि० [सं०] जो सुखपूर्वक प्राप्त या लभ्य हो [को०]।

सुखाप्लव
वि० [सं०] जहाँ सुखपूर्वक स्नान किया जाय। निःशंक, आराम से नहाने योग्य [को०]।

सुखायत, सुखायन
संज्ञा पुं० [सं०] सहज में वश में आनेवाला घोड़ा सीखा और सधा हुआ घोड़ा।

सुखापन्न
वि० [सं०] सुखयुक्त। सुखी।

सुखारी †पु
वि० [सं० सुख+हिं० आरा (प्रत्य०)] १. जिसे यथेष्ट सुख हो। सुखी। आनदित। प्रसन्न। उ०—(क) इहि विधान निसि रहहिं सुखारे। करहिं कूँच उठि बड़े सकारे।—गिरधर- दास (शब्द०)। (ख) नित ये मंगल मोद अवध सब बिधि सब लोग सुखारे।—तुलसी (शब्द०)। २. सुख देनेवाला। सुखद। उ०—जे भगवान प्रधान अजान समान दरिद्रन ते जन सारा। हेतु विचार हिये जग के भग त्यागि लखूँ निज रूप सुखारा।— (शब्द०)।

सुखारि
वि० [सं०] उत्तम हवि भक्षश करनेवाले (देवता आदि)।

सुखारी
वि० [सं० सुख+हिं० आरी] दे० 'सुखारी'। उ०—(क) राम संग सिय रहति सुखारी।—मानस, २।१४०। (ख) मुयो असुर सुर भए सुखारी।—सूर (शब्द०)। (ग) चौरासी लख के अधकारी। भक्त भए सुनि नाद सुखारी।— गिरधरदास (शब्द०)।

सुखारो पु
वि० [सुख+हि० आरो] दे० 'सुखारा'।

सुखारोह
वि० [सं०] सुखपूर्वक आरोहण करने या चढ़ने योग्य।

सुखार्थी
वि० [सं० सुखार्थिन्] [वि० स्त्री० सुखार्थिनी] सुख चाहनेवाला। सुख की इच्छा करनेवाला। सुखकामी।

सुखाला
वि० [सं० सुख+हि० आला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० सुखाली] सुखदायक। आनंददायक। उ०—लगै सुखाली साँझ दिवस की तरुनाई से ताप नसै।—सरस्वती (शब्द०)।

सुखालुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की जीवंती। डोडी। विशेष दे० 'जीवंती'।

सुखालोक
वि० [सं०] मनोहर। सुंदर [को०]।

सुखावत्
वि० [सं० सुखवत्] दे० 'सुखवत्'।

सुखावती
संज्ञा स्त्री० [सं०] बौद्धों के अनुसार एक स्वर्ग का नाम।

सुखावतादेव
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्धदेव जो सुखावती नामक स्वर्ग के अधिष्ठाता माने जाते हैं। बौद्ध।

सुखवतीश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुद्धदेव। २. बौद्धों के एक देवता।

सुखावल
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार नृचक्षु राजा के एक पुत्र का नाम।

सुखावह
वि० [सं०] सुख देनेवाला। आराम देनेवाला। सुखद।

सुखाश (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुखपूर्वक खाना। २. वह जो खाने में बहुत अच्छा जान पड़े। ३. तरबूज। ४. वरुण देवता का एक नाम।

सुखाश (२)
वि० जिसे सुख की आशा हो।

सुखाशक
संज्ञा पुं० [सं०] तरबूज।

सुखाशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुख की आशा। आराम की उम्मीद।

सुखाश्रय
वि० [सं०] जिसपर सुख अवलंबित हो। सुखाधार।

सुखासक्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

सुखासक्त (२)
वि० सुख के प्रति आसक्तियुक्त। सुख में डूबा हुआ।

सुखासन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह आसन जिसपर बैठने से सुख हो। सुखद आसन। २. पद्मासन (को०)। ३. नाव पर बैठने का उत्तम आसन। ४. एक प्रकार की पालकी या डोली। सुखपाल। उ०—कहेउ बनावन पालकी सजन सुखासन जान।—मानस, २।१८६।

सुखासिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. स्वास्थ्य। तंदुरुस्ती। २. आराम। सुख। चैन।

सुखास्वाद (१)
वि० [सं०] १. मधुर स्वाद का। मीठा। २. आनंद- दायक। रुचिकर [को०]।

सुखास्वाद (२)
संज्ञा पुं० १. मधुर गंध। प्रिय गंध। २. आनंदानुभूति। सुखानुभूति [को०]।

सुखासीन
वि० [सं०] आराम से बैठा हुआ [को०]।

सुखिआ पु
वि० [सं० सुख+हिं० इया (प्रत्य०)] दे० 'सुखिया'। उ०—कहु नानक सोई नर सुखिआ राम नाम गुन गावै। अऊर सकल जगु माया मोहिआ निरभै पद नहि पावै।—तेगबहादुर (शब्द०)।

सुखित (१)पु
वि० [हिं० सूखना] सुखा हुआ। शुष्क। उ०—पंथ थकित मद मुकित मुखित सरसिंदुर जोवन। काकोदर करकोश उदर तर केहरि सोवत।—केशव (शब्द०)।

सुखित (२)
वि० [सं०] सुखी। आनंदित। प्रसन्न। खुश। उ०—(क) औरनि के औगुननि तजि कविजन राव होत हैं सुखित तेरो किर्तिवर न्हाय कै।—मतिराम (शब्द०)। (ख) दृग थिर, कौहें अधखुले देह थकौहैं ढार। सुरत सुखित सी देखियत, दुखित गरभ के भार।—बिहारी (शब्द०)।

सुखित (३)
संज्ञा पुं० आनंद। प्रसन्नता। सुख। हर्ष [को०]।

सुखिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुखी होने का भाव। सुख। आनंद।

सुखित्व
संज्ञा पुं० [सं०] सुखी होने का भाव। मुख। सुखिता। आनंद। प्रसन्नता।

सुखिया
वि० [हिं० सुख+इया (प्रत्य०)] जिसे सब प्रकार का सुख हो। सुखी। प्रसन्न। उ०—लखि के सुंदर वस्तु अरु मधुर गीत सुनि कोइ। सुखिया जनहू के हिये उत्कंठा एहि होइ।—लक्ष्मण सिंह (शब्द०)।

सुखिर
संज्ञा पुं० [देश०] साँप के रहने का बिल। बाँबी। उ०— याकी असि साँपिनि कढ़त म्यान सुखिर सों लहलही श्याम महा चपल निहारी है।—गुमान (शब्द०)।

सुखी (१)
वि० [सं० सुखिन्] सुख से युक्त। जिसे किसी प्रकार का कष्ट न हो, सब प्रकार का सुख हो। आनंदित। खुश। जैसे,—जो लोग सुखी हैं, वे दीन दुखियों का हाल क्या जानें।

सुखी (२)
संज्ञा पुं० यति। संत [को०]।

सुखीन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पक्षी जिसकी पीठ लाल, छाती और गर्दन सफेद तथा चोंच चिपटी होती है।

सुखीनल
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणनुसार राजा नुचक्षु के एक पुत्र का नाम।

सुखेतर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सुख से भिन्न अर्थात् दुःख। क्लेश। कष्ट।

सुखेतर (२)
वि० सुखरहित। सुखहीन। अभागा [को०]।

सुखेन (१)
संज्ञा पुं० [सं० सुषेण] दे० 'सुषेण'। उ०—सुग्रीव विभी- षण जांबवत। अंगद केदार सुखेन संत।—सूर (शब्द०)। (ख) वरुन सुखेन सरत परजन्यहु। मारुत हनुमानहि उत- पन्यहु।—पद्माकर (शब्द०)।

सुखेन (२)
क्रि० वि० [सं०] सुखपूर्वक। सहर्ष। उ०—जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।—मानस, २।५७।

सुखेलक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वृत्त जिसके प्रत्येक चरण में न, ज भ, ज, र, आता है। इसे 'प्रभद्रिका' और 'प्रभद्रक' भी कहते हैं।

सुखेष्ट, सुखेष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] शिव। महादेव।

सुखैधित
वि० [सं०] सुख में पला हुआ [को०]।

सुखैना पु †
वि० [सं० सुख+अयन] सुख देनेवाला। सुखदायक। उ०—तो शंभुइ भावै मुनिजन ध्यावै कागभुशुंडि सुखैना। विश्राम। (शब्द०)।

सुखैषी
वि० [सं० सुखैषिन्] [वि० स्त्री० सुखैषिणी] सुख का अभि- लाषी। सुख चाहनेवाला [को०]।

सुखोचित
वि० [सं०] १. सुख के उपयुक्त या योग्य। २. जो सुख आराम आदि का आदी हो। सुख का अभ्यस्त।

सुखोत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] १. पति। स्वामी। २. प्रसन्नता। आनंद (को०)।

सुखोदक
संज्ञा पुं० [सं०] गरम जल। सुखसलिल।

सुखोदय
संज्ञा पुं० [सं०] सुख का उदय या आगम। सुख की प्राप्ति। २. एक प्रकार का मादक पेय। ३. पुराणनुसार एक वर्ष या भूखंड [को०]।

सुखोदर्क
वि० [सं०] सुखद परिणामवाला [को०]।

सुखोद्भवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हरीतकी। २. छोटा आँवला [को०]।

सुखोद्य
वि० [सं०] सुख से उच्चारण योग्य। जिसके उच्चारण में कोई कठिनाई न हो (शब्द, नाम, आदि)।

सुखोपविष्ट
वि० [सं०] सुख से बैठा हुआ। चैन से बैठनेवाला [को०]।

सुखोपाय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुख की प्राप्ति का उपाय। २. सुगम साधन या उपाय [को०]।

सुखोपाय (२)
वि० [सं०] सुलभ। सहज। प्राप्य [को०]।

सुखोर्जिक
संज्ञा पुं० [सं०] सज्जी मिट्टी। सर्जिकाक्षार।

सुखोष्ण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] थोड़ा गरम जल। कुनकुना जल।

सुखोष्ण (२)
वि० थोड़ा गरम। कुनकुना [को०]।

सुख्ख पु
संज्ञा पुं० [सं० सुख] दे० 'सुख'।

सुख्य
वि० [सं०] १. सुखकर। सुखद। सुखदायक। २. सुख संबधी। सुख का [को०]।

सुख्यात
वि० [सं०] प्रसिद्ध। मशहूर। यशस्वी।

सुख्याति
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रसिद्धि। शोहरत। कीर्ति। यश। बड़ाई।

सुगंध (१)
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्ध] १. अच्छी और प्रिय महक। सुवास। सौरभ। खुशबु। विशेष दे० 'गंध'। क्रि० प्र०—आना।—उड़ना।—निकलना।—फैलना। विशेष—यह शब्द संस्कृत में पुंलिंग हैं पर हिंदी में इस अर्थ में स्त्रीलिंग ही बोलते हैं। २. वह पदार्थ जिससे अच्छी महक निकलती हो। क्रि० प्र०—मलना।—लगाना । ३. गंधतृश। गंधेड घास। रसघास। अगिया घास। ४. श्रीखंड। चंदन। ६. गंधराज। ७. नीला कमल। ८. राल। धूना। ९. काला जीरा। १०. गठैला। ग्रंथिपर्ण। गठिवन। ११. एलुआ। एलवालुक। १२. बृहद् गंधतृण। १३. भतृण।। १४. चना। १५. भूपलाश। १६. लाल सहिंजन। रक्तशिग्रु। १७. शालिधान्य। बासमती चावल। १८. सरुआ। मरुवक। १९. माधवीलता। २०. कसेरू। २१. सफेद ज्वार। २२. शिलारस। २३. तुंबुरू। २४. केवड़ा। श्वेतकेतकी। २५. रूसा घास जिससे तेल निकलता है। २६. एक प्रकार का कीड़ा। २७. गंधक (को०)। २८. व्यापारी (को०)। २९. एक पर्वत का नाम (को०)। ३०. एक तीर्थ (को०)।

सुगंध (२)
वि० सुगंधित। सुवासित। महकदार। खुशबूदार। उ०—(क) शीतल मंद सुगंध समीर से मन की कली मानों फूल सी खिल जाती थी। —शिवप्रसाद (शब्द०)। (ख) अंजलिगत शुभ सुमन, जिमि सम सुगंध कर दोउ। —मानस, १।३।

सुगंधक
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धक] १. द्रोणपुष्पी। गूमा। गोमा। २. २. रक्तशालिधान्य। साठी धान्य। ३. धरणी कंद। कंदालु। ४. गंधतुलसी। रक्त तुलसी। ५. गंधक। ६. वृहद् गंधतृण। ७. नारंगी। ८. अलाबु। कटुतुंबी (को०)। ९. कर्कोटक। ककोड़ा।

सुगंधकेसर
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धकेसर] लाल सहिंजन। रक्तशिग्रु।

सुराधकोकिला
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्ध कोकिला] एक प्रकार का गंधद्रव्य। गंधकोकिला। विशेष—भावप्रकाश में इसका गुण गंधमालती के समान अर्थात् तीक्ष्ण, उष्ण और कफनाशक बताया गया है।

सुगंधगंधक
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धगन्धक] गंधक।

सुगंधगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धगन्धा] दारु हलदी। दारुंहरिद्रा।

सुगधगण
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धगण] सुगंधिच द्रव्यों का एक गण या वर्ग। विशेष—सुगंधगण वर्ग में कपूर, कस्तूरी, लता कस्तूरी, गंधमार्जा- रवीर्य, चोरक, श्रीखंडचंदन, पीलाचंदन, शिलाजातु, लाल चंदन, अगर, काला अगर, देवदारु, पतंग, सरल, तगर, पद्माक, गूगल,सरल का गोंद, राल, कुंदुरु, शिलारस, लोबान, लौंग, जावित्री, जायफल, छोटी इलायंची, बड़ी इलायची, दालचीनी, तेजपत्र, नागकेसर, सुगंधबाला, खस, बालछड़, केसर, गोरोचन, नख, सुगंध, वीरन, नित्रवाला, जटामाँसी, नागरमोथा, मुलेठी, आँवा हलवी, कचूर, कपूरकचरी आदि सुगंधित पदार्थ कहे गए हैं।

सुगंधचंद्री
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धचन्द्री] गंधेज घास। गँधारण। गंधपलाशी। कपूर कचरी।

सुगंधतृण
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धतृण] गंधतृण। रूसा घास।

सुगधतैलनिर्यास
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धतैल निर्यास] एक गंधद्रव्य। जवादि [को०]।

सुगंधत्रय
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धत्रय] चंदन, बला और नागकेसर इन तीनों का समूह।

सुगंधत्रिफला
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धत्रिफला] जायफल, लौंग और इलायची अथवा जायफल, सुपारी तथा लौंग इन तीनों का समूह।

सुगंधन
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धन] जीरा।

सुगंधनाकुली
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धनाकुली] एक प्रकार की रासना।

सुगंधपत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धपत्रा] १. सतावर। शतावरी। शतमूली। २. कठजामुन। क्षुद्रजंबू। ३. बनभंटा। कटाई। बृहती। ४. छोटी धमासा। क्षुद्र दुरालभा। ५. अपराजिता। ६. लाल अपराजिता। रक्तापराजिता। ७. जीरा। बरियारा। बला। ९. विधारा। वृद्धदारु। १०. रुद्रजटा। रुद्रलता। ईश्वरी।

सुगंधपत्री
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धपत्री] १. जावित्री। २. रुद्रजटा।

सुगंधप्रियंगु
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धप्रियङ्गु] फूलफेन। फूलप्रियंगु। गंधप्रियंगु। विशेष—वैद्यक में इसे कसैला, कटु, शीतल और वीर्यजनक तथा वमन, दाह, रक्तविकार, ज्वर, प्रमेह, मेद, रोग आदि को नाश करनेवाला बताया है।

सुगंधफल
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धफल] कंकोल। कक्कोल।

सुगंधबाला
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्ध+हिं० बाला] क्षुप जाति की एक प्रकार की वनौषधि। विशेष—यह पश्चिमोत्तर प्रदेश, सिंध, पश्चिमी प्रायद्वीप, लंका आदि में अधिकता से होती है। सुगंधि के लिये लोग इसे बगीचों में भी लगाते हैं। इसका पौधा सीधा, गाँठ और रोएँदार होता है तथा पत्ते ककही के पत्तों के समान २११-३ इंच के घेरे में गोलाकार, कटे किनारेवाले तथा ३ से ५ नोकवाले होते हैं। पत्र- दंड़ लंबा होता हैं और शाखाओं के अंत में लंबे सीकों पर गुलाबी रंग के फूल होते हैं। बीजकोष कुछ लंबाई लिए गोलाकार होता है। वैद्यक में इसका गुण शीतल, रूखा, हलका, दीपक तथा केथों को सुंदर करनेवाला और कफ पित्त, हुल्लास, ज्वर, अतिसार, रक्तस्राव, रक्तपित्त, रक्तविकार, खुजली और दाह को नाश करनेवाला बताया गया है। पर्या०—बालक। वारिद। ह्नीवेर। कुंतल। केश्य। वारितोय।

सुगंधभूतृण
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धभूतृण] रूसा घास। अगिया घास। दे० 'भूतृण'।

सुगंधमय
वि० [सं० सुगन्धमय] जो सुगंध से भरा हो। सुगंधित। सुवासित। खुशबूदार।

सुगंधमुख
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धमुख] एक बोधिसत्व का नाम [को०]।

सुगंधमुख्या
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धमुख्या] कस्तूरी। कस्तूरिका मृगनाभि।

सुगंधमूत्रपतन
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धमूत्रपतन] एक प्रकार का बिलाव जिसका मूत्र गंधयुक्त होता है। मुश्कबिलाव। सुगंध मार्जार।

सुगंधमूल
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धमूल] हरफारेवड़ी। लवलीफल। विशेष—वैद्यक में इसे रुधिरविकार, बवासीर, कफपित्तनाशक तथा हृदय को हितकारी बताया गया है। पर्या०—पांडु। कोमलवल्कला। घना। स्निग्धा।

सुगंधमूला
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धमूला] १. स्थलकमल। स्थलपद्म। २. रासना। रासन। ३. आँवला। ४. गंधपलाशौ। कपूर- कचरी। ५. हरफारेवडी। लवलीवृक्ष।

सुगंधमूली
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धमूली] गंधपलाशी। गंधशरी। कपूरकचरी।

सुगधभूषिका
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धमूषिका] छछूँदर।

सुगंधरा
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्ध+हिं० रा] एक प्रकार का फूल।

सुगंधरौहिष
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धरौहिष] रोहिष घास। गंधेज घास। मिरचिया गंध। अगियाघास।

सुगंधवल्कल
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धवल्कल] दालचीनी। गुड़त्वक्।

सुगंधवैरजात्य
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धवैरजात्य] गंधेजघास। रोहिष घास। हरद्वारी कुशा।

सुगंधशालि †
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धशालि] एक प्रकार का बढ़िया शालिधान। बासमती चावल। विशेष—वैद्यक में यह चावल बलकारक तथा कफ, पित्त और ज्वरनाशक बताया गया है।

सुगंधषट्क
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धषट्क] छह सुगंधि द्रव्य, यथा जाय- फल, कंकोल (शीतलचीनी), लौंग, इलायची, कपूर और सुपारी।

सुगंधसार
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धसार] सागोन। शालवृक्ष।

सुगधा
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धा] १. रामन। रासना। २. काला जीरा। कृष्ण जीरक। ३. गंधपलाशी। गंधशटी। कपूरकचरी। ४. रुद्रजटा। शंकरजटा। ५. शेखपुष्पी। सौंफ। ६. बाँझ ककोड़ा। बनककोड़ा। बंध्याकर्कोटकी। ७. नेवारी। नवमल्लिका। ८. पीली जूही। स्वर्णमूषिका। ९. नकुलकंद। नाकुली। १०. अस- बरग। स्पृक्का। ११. गंगापत्री। १२. सलई। शल्लकी वृक्ष। १३. माधवीलता। अतिमुक्तक। १४. काली अनंतमूल। १६. बिजौरा नीबू। मानुलुंगा। १७. तुलसी। १८. गंधकोकिला। १९. निर्गुंडी। नील सिंधुवार। २०. एलुआ। एलवालुक। २१. वनमल्लिका। सेवती। २२.बकुची। सोमराजी। २३०. २२ पीठस्थानों में से एक पीठस्थान में स्थित देवी का नाम। देवीभागवत के अनुसार इस देवी का स्थान माधववन में है।

सुगंधाढ्य
वि० [सं० सुगन्धाढ्य] सुगंधित। सुवासित। सुगंधयुक्त। खुशबूदार।

सुगंधाढ्या
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धाढ्या] १. त्रिपुरमाली। त्रिपुर- मल्लिका। वृत्तमल्लिका। २. बासमती चावल। सुगंधित शालिधान्य।

सुगंधार
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धार] शिव [को०]।

सुगंधि (१)
सं० पुं० [सं० सुगन्धि] १. अच्छी महक। सौरभ। सुगंध। सुवास। खुशबू। विशेष—यद्यपि यह शब्द संस्कृत में पुल्लिंग है, तथापि हिंदी में इस अर्थ में स्त्रीलिंग ही बोला जाता है। २. परमात्मा। ३. आम। ४. कसेरू। ५. गंधतृण। अगिया घास। ६. पीपलामूल। पिप्पलीमूल। ७. धनिया। ८. मोथा। मुस्तक। ९. एलुवा। एलवालुक। १०. फूट। कचरिया। गोरखककड़ी। भकुर। गुरुभीहुँ। चिर्मिटा। ११. बबई। बर्बरिका। बन- तुलसी। १२. बरबर चंदन। बर्वर चंदन। १३. तुंबरू। तुंबुरू। १४. अनंतमूल १५. सिंह (को०)।

सुगंधि (२)
वि० सुगंधियुक्त। सुवासित। सुगंधित। २. पुण्यात्मा। पवित्र- हृदय। धर्मपरायण (को०)।

सुगंधिक (१)
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धिक] १. गाँडर की जड़। खस। वीरन। उशीर। २. कुँई। कुमुदिनी। लाल कमल। ३. पुष्कर- मूल। पुहकरमूल। ४. गौरसुवर्ण शाक। दे० 'गौरसुवर्ण'। ५. कालाजीरा। कृष्णजीरक। ६. मोथा। मुस्तक। ७. एलुआ। एलवालुक। ८. माचीपत्र। सुरपर्ण। ९. शिलारस। सिल्हक। १०. बासमती चावल। महाशालि। ११. कैथ। कपित्थ। १२. गंधक। गंधपाषाण। १३. सुलतान तंपक। पुन्नाग। १४. श्वेत कमल। श्वेत पद्म (को०)। १५. सिंह। केसरी (को०)।

सुगंधिक (२)
वि० सुगंधयुक्त। खुशबूदार [को०]।

सुगंधिका
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धिका] १. कस्तूरी। मृगनाभि। २. केवड़ा। पीली केतकी। ३. सफेद अनंतमूल। श्वेत सारिवा। ४. कृषण निर्गुंडी। ५. सिंहिनी। केसरी।

सुगंधिकुसुम
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धिकुसुम] १. पीला कनेर। पीत करवीर २. असबरग। स्पृक्का। ३. वह फूल जिसमें किसी प्रकार की सुगंध हो। सुगंधित फूल।

सुगंधिकुसुमा
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धिकुसुमा] असवर्ग। पृक्का [को०]।

सुगंधिकृत
संज्ञा पु० [सं० सुगन्धिकृत] शिलारस। सिल्हक।

सुगंधित
वि० [सं० सुगन्धित] जिसमें अच्छी गंध हो। सुगंधयुक्त। खुशबूदार। सुवासित।

सुगंधिता
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धिता] सुगंधि। अच्छी महक। खुशबू।

सुगंधितेजन
संज्ञा पुं० [सं०] रूसा या गंधेज नाम की घास। अगिया घास। रोहिष तृण।

सुगंधित्रिफला †
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धित्रिफला] जायफल, सुपारी और लौंग इन तीनों का समूह।

सुगंधिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धिनी] १. आरामशीतला नाम का शाक जिसे सुनंदिनी भी कहते हैं। २. पीली केतकी।

सुगंधिपुष्प
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धिपुष्प] १. धाराकदंब। केलिकदंब। २. वह फूल जिसमें सुगांधि हो। खुशबूदार फूल।

सुगंधिफल
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धिफल] शीतलचीनी। कबाब- चीनी। कंकोल।

सुगंधिमाता
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धिमातृ] पृथिवी।

सुगंधिमुस्तक
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धिमुस्तक] मोथा नामक घास की एक जाति [को०]।

सुगंधिमूत्रपतन
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धिमूत्रपतन] दे० 'सुगंधमूत्रपतन'। गंधमार्जार।

सुगंधिमूल
संज्ञा पुं० [सं० सुगन्धिमूल] १. खश। उशीर। २. मूलिका। मूली (को०)।

सुगंधिमूषिका
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धिमूषिका] छछूंदर।

सुगंधी (१)
वि० [सं० सुगन्धिन्] जिसमें अच्छी गंध हो। सुवासित। सुगंध- युक्त। खुशबूदार।

सुगंधी (२)
संज्ञा पुं० एलुआ। एलवालुक।

सुगंधी (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगन्धि] अच्छी महक। खुशबू। सुगंधि।

सुग (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुख। २. गंधर्व। ३. सन्मार्ग। उत्तम मार्ग। ४. पुरीष। विष्ठा। मल [को०]।

सुग (२)
वि० १. सुंदर। ललित। चारु। २. अच्छी चाल या सुंदर गतिवाला। ३. सुबोध। सराल। ४. सुलभ। सुगम [को०]।

सुगठन
संज्ञा स्त्री० [हिं० सु+गठन] १. सुंदर गढ़न। उत्तम बना- वट। सुघड़ता। २. शरीर की सुंदर बनावट। अंगसौष्ठव।

सुगठित
वि० [हिं०] १. सुंदर गढ़न या बनावटवाला। २. गठा या कसा हुआ। ३. जिसके अंग सौष्ठवयुक्त हों।

सुगण्
वि० [सं०] १. गणनाकुशल। गणित में दक्ष। २. सरलता से गिनने योग्य [को०]।

सुगणक
वि० [सं०] अच्छा गणक या ज्योतिषी [को०]।

सुगणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्कंद की एक मातृका [को०]।

सुगत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुद्धदेव का एक नाम। २. बुद्ध भगवान् के धर्म को माननेवाला। बौद्ध।

सुगत (२)
वि० १. सद् गतिप्राप्त। २. सुंदर गति या चाल से युक्त। ३. सरल। आसान [को०]।

सुगतदेव
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्ध भगवान्।

सुगतशासन
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्धमत। बौद्धसिद्धांत [को०]।

सुगतायन, सुगतालय
संज्ञा पुं० [सं०] बिहार। बौद्धमंदिर।

सुगति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मरने के उपरांत होनेवाली उत्तम गति। मोक्ष। उ०—सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्ह रघुनाथ। नाम उधारे अमित खल वेद बिदित गुन गाथ।— तुलसी (शब्द०)। २. एक वृत्त जिसके प्रत्येक चरण में सातसात मात्राएँ और अंत में एक गुरु होता है। इसे शुभगति भी कहते हैं। ३. कल्याण। सुख (को०)। ४. सुरक्षित आश्रय या शरण (को०)।

सुगति (२)
वि० १. सुंदर गतिवाला [को०]। २. जिसकी स्थिति सुंदर हो।

सुगति (३)
संज्ञा पुं० एक अर्हत् का नाम।

सुगन
संज्ञा पुं० [देश०] छकड़े में गाड़ीवान के बैठने की जगह के सामने आड़ी लगी हुई दो लकड़ियाँ, जिनकी सहायता से बैल खोल लेने पर भी गाड़ी खड़ी रहती है।

सुगना (१)
संज्ञा पुं० [सं० शुक, हिं० सुग्गा] तोता। सुआ।

सुगना (२)
संज्ञा पुं० दे० 'सहिंजन'।

सुगभस्ति
वि० [सं०] १. दीप्तिमान्। प्रकाशमान। चमकीला। २. सूंदर गभस्तिवाला। कुशल हाथोंवाला।

सुगम (१)
वि० [सं०] १. जो सहद में जाने योग्य हो। जिसमें गमन करने में कठिनता न हो। २. जो सहज में जाना, किया या पाया जा सके। आसानी से होने या मिलनेवाला। सरल। सहज। आसान।

सूगम (२)
संज्ञा पुं० एक दानव का नाम [को०]।

सुगमता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुगम होने का भाव। सरलता। आसानी। जैसे,—यदि आप उनकी संमति मानेंगे, तो आपके कार्य में बहुत सुगमता हो जायगी।

सुगम्य
वि० [सं०] १. जिसमें सहज में प्रवेश हो सके। सरलता से जाने योग्य। जैसे,—जंगली और पहाड़ी प्रदेश, उतने सुगम्य नहीं होते, जितने खुले मैदान होते हैं। २. दे० 'सुगम'

सुगर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] शिंगरफ। हिंगुल।

सगर पु (२)
वि० १. चतुर। कुशल। २. सुंदर कंठ या गलेवाला। ३. सुडौल। सुघर।

सुगरूप
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की सवरी जो प्रायः रेतीले देशो में काम आती है।

सुगर्भक
संज्ञा पुं० [सं०] खीरा। त्रपुष।

सुगल पु
संज्ञा पुं० [सं० सु+हिं० गल (=गला)] बालि का भाई सुग्रीव। उ०—पुनि पावस महँ बसे प्रवर्षण वर्षावर्णन कीन्ह्यो। सरद सराहि सकोप सुगल पहँ लषन पठै जिमि दीन्ह्यो।—रघुराज (शब्द०)।

सुगवि
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णपुराण के अनुसार पुसुश्रुत के एक पुत्र का नाम।

सुगहन
वि० [सं०] अत्यंत गहन। घोर। निबिड़ या घना [को०]।

सुगहना
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'सुगहनावृत्ति'।

सुगहनावृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह घेरा या बाड़ जो यज्ञस्थल में अस्पृश्यों आदि को रोकने के लिये लगाई जाती है। कुंबा।

सुगात्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुंदर देहयष्टिवाली स्त्री [को०]।

सुगाध
वि० [सं०] १. (नदी) जिसमें सुख से स्नान किया जा सके; अथवा जिसे सहज से पार किया जा सके। २. जो कम गहरा हो। जिसकी थाह सहज में लग जाय। अगाध का उलटा (को०)।

सुगाना पु (१)
क्रि० अ० [सं० शोक] १. दुःखित होता। २. बिगड़ना। नाराज होना। उ०—आजुहि ते कहुँ जान न दैहौं मा तेरी कछु अकथ कहानी। सूर श्याम के सँग ना जैहौं जा कारण तू मोहिं सुगानी।—सूर (शब्द०)।

सुगाना (२)
क्रि० अ० [अ० शक] संदेह करना। शक करना। उ०— जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहिं सुगाइ मातु कुटिलाई।— तुलसी (शब्द०)।

सुगीत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक छंद। दे० 'सुगीतिका'। २. सुंदर गीत या गाना।

सुगीत (२)
वि० जो अच्छी तरह गाया गया हो।

सुगीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुंदर गायन। अच्छा गाना। २. आर्या छंद का एक भेद [को०]।

सुगीतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक छंद जिसकी प्रत्येक चरण में १५ + १० के विराम से २५ मात्राएँ और आदि में लघु और अंत में गुरु लघु होते हैं।

सुगीथ
संज्ञा पुं० [सं०] एक ऋषि का नाम [को०]।

सुगुंडा
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगुण्डा] गुंडासिनी तृण। गुंडाला। तृणरत्री।

सुगुप्त
वि० [सं०] अच्छी तरह गुप्त या छिपाया हुआ। सुरक्षित [को०]।

सुगुप्तभांड
वि० [सं० सुगुप्तभाण्ड] [वि० स्त्री० सुगुप्तभांडा] घर गृहस्थी के बरतनों की भली भाँति देखभाल करनेवाला [को०]।

सुगुप्तभांडता
संज्ञा स्त्री० [सं० सुगुप्तभाण्डता] घर गृहस्थी के बरतनों की अच्छी देखभाल [को०]।

सुगुप्तलेख
संज्ञा पुं० [सं०] १. गोपनीय पत्र। २. सांकेतिक भाषा या चिह्न में लिखा गया पत्र जिसे हर कोई न पढ़ सके (को०)।

सुगुप्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] किवाँच। कौंछ। कपिकच्छु। विशेष दे० 'कौंच'।

सुगुरा
संज्ञा पुं० [सं० सुगुरू] वह जिसने अच्छे गुरु से मंत्र लिया हो।

सुगृद्ध
वि० [सं०] लालसायुक्त। सतृष्ण [को०]।

सुगृह
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का बत्तख या हंस। २. सुंदर मकान। बढ़िया घर (को०)।

सुगृही (१)
वि० [सं० सुगृहिन्] सुंदर घरवाला। जिसका घर बढ़िया हो। २. सुंदर स्त्रीवाला। जिसकी पत्नी सुंदर हो।

सुगृही (२)
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार प्रतुद जाति का एक पक्षी। सुगुह।

सुगृहीत
वि० [सं०] १. अच्छी तरह गृहीत। भली भाँति समझा हुआ। २. समुचित ढंग से व्यवहृत। शुभ रीति से प्रयुक्त [को०]।

सुगृहीतनामा
वि० [सं० सुगृहतीनामन्] कल्याण की भावना से जिसका नाम लिया जाय। प्रातः स्मरणीय। २. अत्यंत आदरणीय [को०]।

सुगृहीतग्रास
संज्ञा पुं० [सं०] स्वादिष्ट भोजन को कौर।

सुगेष्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] किन्नरी [को०]।

सुगैया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुग्गा+ऐया (प्रत्य०)] अंगिया। चोली। उ०—मोहिं लखि सोवत बिथोरिगो सुबेनी बनी, तोरिगो हिये को हरा, छोरिगो सुगैया को।—रसकुसुमाकर (शब्द०)।

सुगौतम
संज्ञा पुं० [सं०] शाक्य मुनि। गौतम।

सुग्गा †
संज्ञा पुं० [सं० शुक] [स्त्री० सुग्गी] तोता। सुआ। शुक।

सुग्गापंखो
संज्ञा पुं० [हिं० सुग्गा+पंख] एक प्रकार का धान जो अगहन के महीने में होता है और जिसका चावल बरसों तक रह सकता है।

सुग्गासाँप
संज्ञा पुं० [हिं० सुग्गा+साँप] एक प्रकार का साँप।

सुग्रथि (१)
संज्ञा पुं० [सं० सुग्रन्थि] १. चोरक नाम गंधद्रव्य। २. पीपला- मूल। पिप्पलीमूल।

सुग्रंथि
वि० सुंदर गाँठ या पोरवाला [को०]।

सुग्रह (१)
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष के अनुसार शुभ या अच्छे ग्रह। जैसे,—बृहस्पति, शुक्र आदि।

सुग्रह (२)
वि० [सं०] १. जो सुखपूर्वक लभ्य हो। सुलभ। २. जिसकी मूँठ या हत्था उत्तम हो। ३. जो सीखने या समझने में मरल हो। सुगम। सुबोध [को०]।

सुग्रीव (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बालि का भाई, वानरों का राजा और श्रीरामचंद्र का सखा। विशेष—जिस समय श्रीरामचंद्र सीता को ढूँढ़ते हुए किष्किंधा पहुँचे थे, उस समय मतंग आश्रम में सुग्रीव से उनकी भेंट हुई थी। हनुमान जो ने श्रीरामचंद्र जी से सुग्रीव की मित्रता करा दी। बाली ने सुग्रीव को राज्य से भगा दिया था। उसके कहने से श्रीरामचंद्र ने बालि का बध किया, सुग्रीव को किष्किधा का राज्य दिलाया और बालि के पुत्र अंगद को युवराज बनाया। रावण को जीतने में सुग्रीव ने श्रीरामचंद्र की बहुत सहायती की थी। सुग्रीव सूर्य के पुत्र माने जाते हैं। विशेष दे० 'बालि'। २. विष्णु या कृष्ण के चार घोड़ों में से एक। ३. शुंभ और निशुंभ का दूत जो भगवती चडी के पास उन दोनों का विवाह सबंधी संदेसा लेकर गया था। ४. वर्तमान अवसर्पिणी के नवें अर्हत के पिता का नाम। ५. इंद्र। ६. शिव। ७. पाताल का एक नाग। ८. एक प्रकार का अस्त्र। ९. शंख। १०. राजहंस। ११. एक पर्वत का नाम। १२. एक प्रकार का मंडप। १३. नायक। १४. जलखंड। जलाशय (को०)।

सुग्रीव (२)
वि० जिसकी ग्रीवा सुंदर हो। सुंदर गरदनवाला।

सुग्रीवा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अप्सरा का नाम।

सुग्रीवी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दक्ष की एक पुत्री और कश्यप की पत्नी जो घोड़ों, ऊँटों तथा गधों की जननी कही जाती है।

सुग्रीवेश
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीरामचंद्र।

सुग्ल
वि० [सं०] अत्यंत थका हुआ। श्रांत [को०]।

सुघट
वि० [सं०] १. अच्छा बना हुआ। सुंदर। सुडौल। उ०— भृकुटि भ्रमर चंचल कपोल मृदु बोल् अमृतसम सुघट। ग्रीव रस सीव कंठ मुकता विघटत तम।—हनुमन्नाटक (शब्द०)। २. जो सहज में हो या बन सकता हो।

सुघटित
वि० [सं० सुघट+इत] जिसका निर्माण सुंदर हो। अच्छी तरह से बना हुआ। उ०—धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति। सियनिवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति।—तुलसी (शब्द०)।

सुघट्टित
वि० [सं०] दुरुस्त किया हुआ। समतल या हमवार किया हुआ।

सुघड़
वि० [सं० सुघट] १. सुंदर। सुडौल। उ० नील परेव कंठ के रंगा। वृष से कंध सुघड़ सब अंग।—उत्तररामचरित (शब्ज०)। २. निपुण। कुशल। दक्ष। प्रविण। जैसे,— सुघड़ाबाहु।

सुघड़ई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुघड़+ई (प्रत्य०)] १. सुंदरता। सुडौल- पन। अच्ची बनावट। उ०—विषय के भोगों में तृप्त हुए बिना ही उस (राजा) को, अधिक सुघड़ई के कारण विलासिनियों के भोगने योग्य को, वृथा ईर्ष्या करनेवाली जरा ने स्त्रीव्यवहार में असमर्थ होकर भी हरा दिया।—लक्षमण सिंह (शब्द०)। २. चतुरता। निपुणता। कुशलता। उ०—इसमें बड़ी बुद्धि और सुघड़ई का काम है।—ठाकुरप्रसाद (शब्द०)।

सुघड़ता
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुघड़+ता (प्रत्य०)] १. सुघड़ होने का भाव। सुंदरता। मनोहरता। २. निपुणता। कुशलता। दक्षता। सुघड़पन।

सुघड़पन
संज्ञा पुं० [हिं० सुघड़+पन (प्रत्य०)] १. सुघड़ होने का भाव। सुघड़ाई। सुंदरता। २. निपुणता। दक्षता। कुशलता।

सुघड़ाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुघड़] दे० 'सुघड़ई'।

सुघड़ापा
संज्ञा पुं० [हिं० सुघड़+आपा (प्रत्य०)] । सुघड़ाई। सुंदरता। सुडौलपन। २. दक्षता। निपुणता। कुशलता।

सुघड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० सुघटी] अच्छी घड़ी। शुभ समय।

सुघर
वि० [सं० सुघट] दे० 'सुघड़'। उ०—(क) संयुत सुमन सुबेलि सी सेली सी गुणग्राम। लसत हवेली सी सुघर निरखि नवेली बाम।—पद्माकर (शब्द०)। (ख) सुघर सौति बस पिय सुनत दुलहिनि दुगुन हुलास। लखी सखी तन दीठि करि सगरब सलज सहास।—अंबिकादत्त (शब्द०)।

सुघरई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुघड़+ई (प्रत्य०)] दे० 'सुघड़ई'।

सुघरता
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुघड़+ता (प्रत्य०)] दे० 'सुघड़ता'।

सुधरपन
संज्ञा पुं० [हिं० सुघड़+पन (प्रत्य०)] दे० 'सुघड़पन'। उ०—(क) छन में जैहे सुघरपनो पीरो परिहै तन। परकर परि कै सुकवि फेर फिरि आवत नहिं मन।—अंबिकादत्त (शब्द०)।

सुघराई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुघड़+आई (प्रत्य०)] १. दे० 'सुघड़ई'। उ०—(क) काम नाश करने के कारण जिन्हैं मोहै सुघराई। ऐसे शिव को किया चाहती है अपना पति सुखदाई।—महावीरप्रसाद(शब्द०)। (ख) सुघराई सुकाम विरंचि की है, तिय तेरे नितंबनि की छबि में।—सुंदरीसर्वस्व (शब्द०)। २. संपूर्ण जाति की एक रागिनी जिसके गाने का समय दिन में १० से १६ दंड तक है।

सुघराई कान्हड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० सुघराई+कान्हड़ा] संपुर्ण जाति का एक राग जिसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं।

सुघराई टोड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुघराई+टोड़ी] संपूर्ण जाति की एक रागिनी।

सुघरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सु+घड़ी] अच्छी घड़ी। शुभ समय। उ०—आनँद की सुघरी उघरी सिगरी मनवांछित काज भए हैं। व्यंगार्थ० (शब्द०)।

सुघरी (२)
वि० स्त्री० [हिं० सुघड़] सुंदर। सुडौल। उ०—(क) भाग सोहाग भरी सुघरी पति प्रेम प्रनाली कथा अपढैना।—सुदरी- सर्वस्व (शब्द०)। (ख) सुँदरि हौ सुघरी हौ सलौनी हौ सील- भरी रस रूप सनाई।—देव (शब्द०)।

सुघोष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. चौथे पांडव नकुल के शंख का नाम। २. एक बुद्ध का नाम। ३. एक प्रकार का यंत्र। ४. सुँदर घोष। मधुर ध्वनि।

सुघोष (२)
वि० १. जिसका स्वर सुँदर हो। अच्छे गले या आवाजवाला। २. तीव्र निनाद करनेवाला। ऊँची आवाजवाला।

सुघोषक
संज्ञा पुं० [सं०] एक बाजे का नाम [को०]।

सुचंग
संज्ञा पुं० [हिं०] घोड़ा।

सुचंचुका
संज्ञा स्त्री० [सं० सुचञ्चुका] बड़ा चंचुक शाक। महाचंचु। दीर्धपत्री।

सुचंदन
संज्ञा पुं० [सं० सुचन्दन] पतंग या बक्कम नाम की लकड़ी जिसका व्यवहार औषध और रंग आदि में होता है। रक्तसार। सुरंग।

सुचद्र
संज्ञा पुं० [सं० सुचन्द्र] १. एक देबगंधर्व का नाम। २. एक बोधिसत्व (को०)। ३. सिहिका के पुत्र का नाम। ४. इक्ष्वाकु- वंशी राजा हेमचंद्र का पुत्र और धूम्राश्व का पिता।

सुचंद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० सुचन्द्रा] बौद्धों के अनुसार एक प्रकार की समाधि।

सुच पु
वि० [सं० शुचि] दे० 'शुचि'।

सुचक्षु (१)
संज्ञा पुं० [सं० सुचक्षुस्] १. गूलर। उर्दुबर। २. शिव का एक नाम। ३. विद्वान् व्यक्ति। पंडित।

सुचक्षु (२)
वि० जिसके नेत्र सुंदर हों। सुँदर आँखोंवाला।

सुचक्षु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक नदी का नाम।

सुचना
क्रि० स० [सं० सञ्चय] संचय करना। एकत्र करना। इकट्ठा करना। उ०—तरुवर फल नहिं खात है सरवर पियहिं न पानि। कहि रहीम परकाज हित संपति सुचहिं सुजान।—रहीम (शब्द०)।

सुचरित (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसका चरित्र शुद्ध हो। उत्तम आचरणवाला। नेकचलन। २. सच्चरित्रता। ३. गुण (को०)।

सुचरित (२)
वि० १. शुद्ध चरित्रवाला। २. अच्छी तरह किया हुआ।

सुचरिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'सुचरित्रा'।

सुचरित्र
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सुचरित'।

सुचरित्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पतिपरायणा स्त्री। साधवी। सती। २. धानी। धनियाँ (को०)।

सुचर्मा (१)
संज्ञा पुं० [सं० सुचर्मन्] भोजपत्र।

सुचर्मा (२)
वि० सुंदर चर्म, ढाल या छाल से युक्त [को०]।

सुचा (१)
वि० [सं० शुचि] दे० 'शुचि'। उ०—सोल सुचा ध्यान धोवती काया कलस प्रेम जल।—दादू (शब्द०)।

सुचा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० सूचना] ज्ञान। चेतना। सुध। उ०—रही जो मुइ नागिनि जस तुचा। जिउ पाएँ तन कै भइ सुचा।— जायसी (शब्द०)।

सुचाना
क्रि० स० [हिं० सोचना का प्रेर० रूप] १. किसी को सोचने या समझने में प्रवृत्त करना। सोचने का काम दूसरे से कराना। २. दिखलाना। ३. किसी का ध्यान किसी बात की ओर आकृष्ट कराना।

सुचार पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सु+हिं० चाल] सुचाल। अच्छी चाल। उ०—थाई भाव थिरु है विभाव अनुभावनि सों सातुकनि संतत ह्वै संचरि सुचार है—सूर (शब्द०)।

सुचार (२)
वि० [सं० सुचारु] सुचारु। सुंदर। मनोहर। उ०—अजहूँ लौं राजत नीरधि तट करत सांख्य विस्तार। सांख्यायन से बहुत महामुनि सेवन चरण सुचार।—सूर (शब्द०)।

सुचारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] यदुवंशी श्वफल्क की पुत्री जो अक्रूर की सास थी।

सुचारु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. रुक्मिणी के गर्भ से उत्पन्न श्रीकृष्ण का एक पुत्र। २. विश्वक्रसेन का पुत्र। ३. प्रतीर्थ। ४. बाहु का पुत्र।

सुचारु (२)
वि० अत्यंत सुंदर या सुरूपवान्। अतिशय मनोहर। बहुत खूबसूरत। जैसे,—वहाँ के सब कार्य बहुत ही सुचारु रूप से संपन्न हो गए। यौ०—सुचारुदशना=सुंदर दाँतोंवाली नारी। सुचारुरूप= स्वरूपवान। खूबसूरत। सुचारुस्वन=सुरीले कंठवाला। सुरीला।

सुचारुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुचारु होने का भाव। सुचारुत्व अत्यंत सुंदरता [को०]।

सुचारुत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सुचारुता'।

सुचाल
संज्ञा स्त्री० [सं० सु+हिं० चाल] उत्तम आचरण। अच्छी चाल। सदाचार। उ०—कह गिरिधर कविराय बड़न की यही बानी। चलिए चाल सुचाल राखिए अपनो पानी।— गिरिधर (शब्द०)।

सुचाली (१)
वि० [सं० सु+हिं० चाल+ई (प्रत्य०)] जिसके आचरण उत्तम हों। अच्छे चाल चलनवाला। सदाचारी। उ०—मातुमंदि सै साधु सुंचाली। उर अंस आनत कोटि कुचाली।— मानस, २।६०।

सुचाली (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] पृथ्वी।

सुचाव †
संज्ञा पुं० [हिं० सुचा] सुचाने की क्रिया या भाव। सोचाना। सुझाब।

सुचिंतन
संज्ञा पुं० [सं० सुचिन्तन] गंभीर चिंतन या सोच- विचार [को०)।

सुचिंतित
वि० [सं० सुचिन्तित] खूब सोचा विचारा हुआ। भली भाँति सोचा हुआ। उ०—सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ।— मानस, ३।३१।

सुचिंतितार्थ
संज्ञा पुं० [सं० सुचिन्तितार्थ] बौद्धों के अनुसार मार के पुत्र का नाम।

सुचि (१)
वि० [सं० शुचि] दे० 'शुचि'। उ०—(क) सहज सचिक्कन स्याम रुचि सुचि सुगंध सुकुमार। गनत न मन पथ अपथ लखि बिथुरे सुथरे बार।—बिहारी (शब्द०)। (ख) तुलसी कहत विचारि गुरु राम सरिस नहिं आन। जासु क्रिया सुचि होत रुचि विसद विवेक अमान।—तुलसी (शब्द०)।

सुचि (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० सूची] सूई। उ०—सुचि वेध ते नाको सकीर्न तहाँ परतीत को टाँडो लदावनो है।—हरिश्चंद्र (शब्द०)।

सुचिकरमा पु
वि० [सं० शुचिकर्मन्] दे० 'शुचिकर्मा'। उ०—चलेउ सुभेस नरेस छत्रधरमा सुचिकरमा। बिसुकरमा कृत सुरथ बैठि रव कंचन बरमा।—गोपाल (शब्द०)।

सुचित (१)
वि० [सं० सुचित्त] १. जो (किसी काम से) निवृत्त हो गया हो। उ०—(क) ऐसी आज्ञा कर यमराज जब सुचित भए, तब नारद मुनि ने फिर उनसे पूछा कि किस कारण से तुम इहाँ से भाग गए सो मुझसे कहो।—सदल मिश्र (शब्द०)। (ख) अतिथि साधु यति सबनि खवाई। मै हूँ सुचित भई पुनि खाई।—रघुराज (शब्द०)। २. निश्चिंत। चिंतारहित। बेफिक्र। ३. धान्य धन से युक्त। संपन्न। सुखी। ४. एकाग्र। स्थिर। सावधान। उ०—(क) सुचित सुनहु हरि सुजस कह बहुरि भई जो बात।—गिरिधरदास (शब्द०)। (ख) इहि विधान एकादशी करै सुचित चित होई।—गिरिधरदास (शब्द०)।

सुचित (२)
वि० [सं० शुचि] पवित्र। शुद्ध (क्व०)।

सुचितई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुचित+ई (प्रत्य०)] १. सुचित होने का भाव। निश्चिंतता। बेफिक्री। उ०—(क) इमि देव दुंदुभी हरषि बरसत फूल सुफल मनोरथ भो सुख सुचितई है।—तुलसी (शब्द०)। (ख) सुकवि सुचितई पैहै सब ह्वै हैं कबै मरन।—अंबिकादत्त (शब्व०)। २. एकाग्रता। स्थिरता। शांति। ३. छुट्टी। फुर्सत। उ०—ब्रजबासिनु कौ उचित धनु, जो धनु रुचित न कोई। सुचित न आयौ, सुचितई कहौ कहाँ तै होइ।—बिहारी र०, दो० ५६१।

सुचिता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शुचिता] शुद्धता। पवित्रता। शुचिता। उ०—मकरंदु जिनको संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई।— मानस १।३२४।

सुचिती †
वि० [हि० सुचित+ई (प्रत्य०)] १. जिसका चित्त किसी बात पर स्थिर हो। जो दुविधा में न हो। स्थिरचित्त। शांत। उ०—(क) सुचिती ह्वै औरे सबै ससिहि बिलौकैं आय। (ख) ससिहिं बिलौ कै आय सबै करि करि मन सुचिती।— अंबिकादत्त (शब्द०)।२. निश्चित। चिंतारहित। बेफिक्र। उ०—धाय सों जाय कौ धाय कह्यौ कहूँ धाय कै पूछिए करते ठई है। बैठि रही सुचिती सी कहा सुनि मेरी सबै सुधि भूलि गई है।—सुदरीसर्वस्व (शब्द०)।

सुचित्त
वि० [सं०] १. जिसका चित्त स्थिर हो। स्थिरचित्त। शांत। २. जो (किसी काम से) निवृत्त हो गया हो। जो छुट्टी पा गया हो। निश्चिंत। उ०—(क) ब्राह्मणों को नाना प्रकार के दान दे नित्य कर्म से सुचित हो।—लल्लू० (शब्द०)। (ख) कन्या तो पराय धन है ही, उसको पति के घर भेज दिया, सुचित हो गए।—संगीत शाकुंतक (शब्द०)। क्रि० प्र०—होना।

सुचित्तता
संज्ञा स्त्री० [सं०] निश्चिंतता। इत्मीनाम।

सुचित्ती †
संज्ञा स्त्री० [सं० सुचित्त] दे० 'सुचित्तता'।

सुचित्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक सर्प।

सुचित्र (२)
वि० [सं०] १. रंग बिरंगा। विभिन्न रंगों का। २. विभिन्न प्रकार का।

सुचित्रकर्म (१)
संज्ञा पुं० [सं०] मुर्गाबी। मत्स्यरंग पक्षी। २. चित्रसर्प। चितला साँप। ३. अजगर।

सुचित्रक (२)
वि० रंगबिरंगा। विभिन्न प्रकार का [को०]।

सुचित्रबीजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बायबिडंग। विडंग।

सुचित्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] चिर्भिटा या फूट नामक फल।

सुचिमंत
वि० [सं० शुचि+मत्] शुद्ध आचरणवाला। सदाचारी। शुद्धाचारी। पवित्र। उ०—सो सुकृती सुचिमंत सुसंत सुशील सयान सिरोमनि ख्वै। सुरतीरथता सुमनावन आवत पावन होत है तात न क्ष्वै।—तुलसी (शब्द०)।

सुचिर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बहुत अधिक समय। दीर्घकाल।

सुचिर (२)
वि० १. बहुत दिनों तक रहनेवाला। २. पुराना। प्राचीन।

सुचिरायु
संज्ञा पुं० [सं० सुचिरायुस्] देवता।

सुची
संज्ञा स्त्री० [सं० शची] दे० 'शची'। उ०—सोइ सुरपति जाके नारि सुची सी। निस दिन ही रँगराती, काम हेतु गौतम गहि गयऊ निगम देतु है साखी।—कबीर (शब्द०)।

सुचीरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'सुचारा'।

सुचीर्णध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] कुंभांडों के एक राजा का नाम (बौद्ध)।

सुचुक्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] इमली।

सुचुटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चिमटा। २. कैंची। ३. सँड़सी।

सुचेत
वि० [सं० सुचेतस्] चौकन्ना। सतर्क। होशियार। उ०— (क) कोई नशे में मस्त हो कोई सुचेत हों। दिलवर गले से लिपटा हो सरसों का खेत हो।—नजीर (शब्द०)। (ख) भाईतुम सुचेत रहो, केटो की दृष्टि बड़ी पैनी है।—तोताराम (शब्द०)।२. प्रज्ञावान्। बुद्धिमान (को०)। क्रि० प्र०—करना।—होना।—रहना।

सुचेतन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु। (डिं०)।

सुचेतन (२)
वि० दे० 'सुचेत'।

सुचेता (१)
वि० [सं० सुचेतस्] दे० 'सुचेत'। उ०—संदरता सौभाग्य निकेता। पंकज लोचव अहहिं सुचेता।—शं० दि० (शब्द०)।

सुचेता (२)
संज्ञा पुं० प्रचेता के एक पुत्र का नाम।

सुचेतीकृत
वि० [सं०] भली भाँति सावधान किया हुआ।

सुचेल
वि० [सं०] उत्तम वस्त्रयुक्त। दे० 'सुचेलक' [को०]।

सचेलक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सुंदर और महीन कपड़ा। पट।

सुचेलक (२)
वि० जिसका बस्त्र उत्तम हो।

सुचेष्टरूप
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्धदेव।

सुच्छंद पु †
वि० [सं० स्वच्छन्द] दे० 'स्वच्छंद'। उ०—बैठि इकंत होय सुच्छंदा। लहिए मर्छू परमानंदा।—निश्चल (शब्द०)।

सुच्छ पु †
वि० [सं० स्वच्छ, प्रा० सुअच्छ] उ०—(क) मुच्छ पर हत्थ तन सुच्छ अंबर धरे तुच्छ नहिं वीर रस रंग रत्ते।— सूदन (शब्द०)।(ख) कही मै तो नून तुच्छ बोले हमहू ते सुच्छ जाने कोऊ नाहि तुम्हैं मेरी मति भीजिए।—नाभादास (शब्द०)।

सुच्छत्र
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

सुच्छत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सतलज नदी।

सुच्छत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] शतद्रु या सतलज नदी का एक नाम।

सुच्छद
वि० [सं०] सुंदर पत्ती या आवरण से युक्त [को०]।

सुच्छम (१)
वि० [सं० सूक्ष्म] दे० 'सूक्ष्म'।

सुच्छम (२)
संज्ञा पुं० [?] घोड़ा। (डिं०)।

सुच्छाय
वि० [सं०] १. जिसकी छाया अच्छी हो। २. (रत्न आदि) जिसकी प्रभा सुंदर हो [को०]।

सुछंद पु
वि० [सं० स्वच्छन्द, प्रा० सुछंद] दे० 'स्वच्छंद'। उ०— निपट लागत अनम ज्यों जल चरहिं गमन सुछंद। न जरै जे नजरै रहै प्रीतम तुव मुखचंद।—रतनहजारा (शब्द०)।

सुजंगो †
संज्ञा पुं० [गढ़वाली] भाँग के वे पौधे जिनमें बीज होते हैं। विशेष—गढ़वाल में भाँग के बीजदार पौधों को सुजंगो या कलंगो कहते हैं।

सुजघ
वि० [सं० सुजङ्घ] सुंदर उरु या जाँघोंवाला [को०]।

सुजघन
वि० [सं०] १. जिसकी श्रीणी; नितंब या कटि सुंदर हो। २. जिसका अंत या परिणम भला हो [को०]।

सुजड़
संज्ञा पुं० [डिं०] तलवार।

सुजड़ी
संज्ञा स्त्री० [डिं०] कटारी।

सुजन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सज्जन। सत्पुरुष। भलामानस। भला आदमी। शरीफ। २. इंद्र के सारथी का नाम (को०)।

सुजन (२)
वि० १. भला। अच्छा। २. दयालु। परोपकारी [को०]।

सुजन (३)
संज्ञा पुं० [सं० स्वजन, प्रा० सुजन] परिवार के लोग। आत्मीय जन। उ०—(क) माँगत भीख फिरत घर घर ही सुजन कुटुंब वियोगी।—सूर (शब्द०)। (ख) हरषित सुजन सखा त्रिय बालक कृषण मिलन जिय भाए।—सूर (शब्द०)। (ग) रामराज नहिं कोऊ रोगी। नहि दुरभिक्ष न सुजन वियोगी।—पद्माकर (शब्द०)।

सुजनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुजन का भाब। सौजन्य। भद्रता। भलमनसाहत। नेकी (को०)। २. भले लोगों का समूह। ३. धैर्य। पराक्रम। साहस (को०)।

सुजनी
संज्ञा स्त्री० [फा़० सोजनी] एक प्रकार की बड़ी चादर जो कई परत की होती और बिछाने के काम आती है। ऊपर साफ कपड़े देकर इसकी महीन सिलाई की जाती है। यह बींच बीच में बहुत जगहों में सी (सिली) हुई रहती है। २. पलंग पर बिछाने की चादर [को०]।

सुजन्मा
वि० [सं० सुजन्मन्] १. जिसका उत्तम रूप से जन्म हुआ हो। उत्तम रूप से जन्मा हुआ। सुजातक। २. विवाहित स्त्री पुरुष का औरस पुत्र। ३. अच्छे कुल में उत्पन्न। उ०—सूतक घर के आस पास फैले हुए उस सुजन्मा के स्वाभाविक तेज से आधी रात के दीपक सहज ही मंदज्योति हो गए।— लक्ष्मणसिंह (शब्द०)।

सुजय
संज्ञा पुं० [सं०] १. भारी जीत। महान् विजय। २. वह देश, स्थान आदि जो सरलता से जीतने योग्य हो [को०]।

सुजल (१)
वि० सुंदर जल से युक्त।

सुजल (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कमल। पद्म। २. सुंदर और अच्छा जल। उ०—कीन्ह सुजल हित कूप विसेखा।—मानस, २।

सुजला
वि० स्त्री० [सं०] सुंदर जल से युक्त। जलप्राय। अनूप। सुजलाम् सुफलाम् सस्य श्यामलाम् मातरम्। वंदें मातरम्।—राष्ट्रगीत।

सुजल्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. उज्वलनीलमणि के अनुसार वह भाषण या कथन जो सहृदयता, उत्साह, उत्कंठा, ऋजुता, गांभीर्य, नम्रता, चापल्य तथा भावपूर्ण हो। २. उत्तम कथन। श्रेष्ठ भाषण।

सुजस
संज्ञा पुं० [सं० सुयश] दे० 'सुयश'। उ०—सुजस बखानत बाट चलहि बहु भाट गुनी गन। अमर राट सम सुरथ राजभट ठाट प्रबल तन—गिरधर (शब्द०)।

सुजाक
संज्ञा पुं० [फा़० सूजाक] दे० 'सूजाक'।

सुजागर
वि० [सं० सु (= भली भाँति) + जागर (= जागर = प्रका- शित होना)] जो देखने में बहुत सुंदर जान पड़े। प्रकाशमान। सुशोभित। उ०—मुरली मृदंगन अगाउनी भरत स्वर भाउती सुजागरै भरी है गुन आगरे।—देव (शब्द०)।

सुजात (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सुजाता] १. उत्तम रूप से जन्मा हुआ। जिसका जन्म उत्तम रूप से हुआ हो। २. विवाहित स्त्री पुरुषसे उत्पन्न। ३. अच्छे कुल में उत्पन्न। ४. सुंदर। ५. अत्यंत मधुर (को०)। ६. अच्छी तरह वर्धित या बढ़ा हुआ। लंबा (को०)। ७. अच्छे ढंग से निर्मित किया हुआ (को०)।

सुजात (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. धुतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम। २. भरत के पुत्र का नाम। ३. साँड़। (बोद्ध)।

सुजातक
संज्ञा पुं० [सं०] सौंदर्य। सुंदरता।

सुजातका
संज्ञा स्त्री० [सं०] शालि धान्य। कुंकुमशालि।

सुजातरिपु
संज्ञा पुं० [सं०] युधिष्ठिर।

सुजाता (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गोपीचंदन तुवरी सोरठ की मिट्टी। सौराष्ट्रमृत्तिका। २. उद्दालक ऋषि की पुत्री का नाम। ३. बुद्ध भगवान के समय की एक ग्रामीण कन्या जिसने उन्हें बुद्धत्व प्राप्त करने के उपरांत भोजन कराया था।

सुजाता (२)
वि० स्त्री० १. सुंदर। सौंदर्यशीला। २. सकुलीना (स्त्री)।

सुजाति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] उत्तम जाति। उत्तम कुल।

सुजाति (२)
संज्ञा पुं० वीतिहोत्र का एक पुत्र।

सुजाति (३)
वि० उत्तम जाति का। अच्छे कुल का।

सुजातिया (१)
वि० [सं० सु + जाति + हिं० इया (प्रत्य०)] अच्छे कुल का उत्तम जाति का।

सुजातिया (२)
संज्ञा पुं० [सं० स्व + जाति + इया (प्रत्य०)] अपनी जाति या वर्ग का। स्वजाति का। उ०—लखि बड़वार सुजा- तिया अनख धरै मन नाहि। बड़े नैन लखि अपुन पै नैना सही सिहाहिं।—रतनहजारा (शब्द०)।

सुजातीय
वि० [सं०] उत्तम जाति का।

सुजान
वि० [सं० सज्ञान] १. समझदार। चतुर। सयाना। उ०— (क) करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।—रहीम (शब्द०)। (ख) दोबल कहा देति मोहिं सजनी तू तो बड़ी सुजान। अपनी सी मैं बहुतै कीन्ही रहति न तेरी आन।—सूर (शब्द०)। (ग) ब्याही सो सुजान सील रूप बसुदेव जू को, विदित जहान जाकी अतिहि बड़ाई है।—गिरधर (शब्द०)। २. निपुण। कुशल। प्रवीण। ३. विज्ञ। पंडित। ४. सज्जन।

सुजान (२)
संज्ञा पुं० १. पति या प्रेमी। उ०—अरी नीद आवै चहै जिहि दुग बसत सुजान। देखी सुनी धरी कहूँ दो असि एक मयान।—रतनहजारा (शब्द०)। २. परमात्मा। ईश्वर। उ०—बार बार सेवक सराहना करत राम, तुलसी सराहैं रीति साहिब सुजान की।—तुलसी (शब्द०)।

सुजानता
संज्ञा स्त्री० [हिं० सुजान + ता (प्रत्य०)] सुजान होने का भाव या धर्म। सुजानपन। उ०—(क) केशीदास सकल सुवास की सी सेज किधौं सकल सुजानता की सखी सुखदानी है। किधौं मुखपंकज में शक्ति को तो सेवैं द्विज सविता की छबि ताकी कविता निधानी है।—केशव (शब्द०)। (ख) किधौं केशौदास कलगानता सुजानता निशंकता सों बचन विचित्रता किशोरी की।—केशव (शब्द०)।

सुजानी
वि० [सं० सु + ज्ञान हिं० सुजान] विज्ञ। पंडित। ज्ञानी। उ०—(क) लखि विप्र सुजानी कहि मृदुबानी, अरे पुत्र ! यह काह सिख्यो।—विश्राम (शब्द०)। (ख) मैं ह्याँ ल्याई सुवन सुजानी। सुनि लखि हँसि भाखत नँदरानी।—गिरधर (शब्द०)।

सुजामि
वि० [सं०] अनेक भाई बहनों तथा संवंधियों से समृद्ध [को०]।

सुजाव †
संज्ञा पुं० [सं० सुजात] पुत्र (डि०)।

सुजावा †
संज्ञा पुं० [देश०] बैलगाड़ी में की वह लकड़ी जो पैजनी और फड़ से जड़ी रहती है (गाड़ीवान)।

सुजिह्व (१)
वि० [सं०] १. जिसकी जिह्वा या जीभ सुंदर हो। २. मधुरभाषी। मीठा बोलनेवाला।

सुजिह्व (२)
संज्ञा पुं० अग्नि। पावक। कृशानु।

सुजीर्ण
वि० [सं०] १. अच्छी तरह पका या पचा हुआ अन्न। २. (खाना) जो खूब पच गया हो। ३. जीर्णशीर्ण। जर्जर।

सुजीवंती
संज्ञा स्त्री० [सं० सुजीवन्ती] पीली जीवंती। सुनहरी जीवंती। विशेष—वैद्यक के अनुसार यह बल-वीर्य-वर्धक, नेत्रों को हितकारी तथा वात, रक्त, पित्त, और दाह को दूर करनेवाली है। पर्या०—स्वर्णलता। स्वर्णजीवंती। हेमवल्ली। हेमपुष्पी। हेमा। सौम्या।

सुजीवित (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सुखमय जीवन [को०]।

सुजीवित (२)
वि० १. जिसका जीना सफल हो। २. सुखी जीवन व्यतीत करनेवाला [को०]।

सुजेय
वि० [सं०] जो सरलता से जीता जा सके।

सुजोग पु †
संज्ञा पुं० [सं० सु + योग] १. अच्छा अवसर। उपयुक्त अवसर। सुयोग। २. अच्छा संयोग। अच्छा मेल।

सुजोधन पु
संज्ञा पुं० [सं० सुयोधन] दे० 'सुयोधन'। उ०—चलत सुजोधन कटक हलत किल बिकल सकल महि। कच्छप भारन छपत नाग चिक्करत अहि।—गिरधर (शब्द०)।

सुजोर
वि० [सं० सुया फा़० शह + जोर] १. दृढ़। मजबूत। उ०— सरल बिसाल विराजहि विद्रुम खंग सुजोर। चारु पाटि पाटि पुरट की झरकत मरकत भोर।—तुलसी (शब्द०)। २. शक्तिशाली। शहजोर। बलवान् (को०)।

सुज्ञ
वि० [सं०] १. जो अच्छी तरह जानता हो। भली भाँति जाननेवाला। सुविज्ञ। २. पंडित। विद्वान्।

सुज्ञान (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्तम ज्ञान। अच्छी जानकारी। २. एक प्रकार का साम।

सुज्ञान (२)
वि० [सं०] ज्ञानी। पंडित। जानकार। सुविज्ञ।

सुज्येष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] भागवत के अनुसार शुंगवंशी राजा अग्निमित्र के पुत्र का नाम।

सुझाना (१)
क्रि० स० [हिं० सुझना का प्रेर० रूप] ऐसा उपाय करना जिसमें दूसरे को सुझे। दूसरे के ध्यान या दृष्टि में लाना।दिखाना। बताना। जैसे,—आपको यह तरकीब उसी ने सुझाई है।

सुझाना (२)
क्रि० अ० दिखाई पड़ना। सुझना। समझ में आना उ०—तब तैं अब गाढ़ी परी मोकौं कछु न सुझाइ।—सूर० (राधा०), ५८९।

सुझाव
संज्ञा पुं० [हिं० सूझ + आव (प्रत्य०)] १. किसी को कुछ सुझाने की क्रिया। सुझाने या बताने का भाव। २. किसी नई बात, किसी विशेष पक्ष या अंग की ओर ध्यान दिलाना। ३. सुझाने या ध्यान दिलाने के लिये कही कही हुई बात। सलाह। मशविरा। राय।

सुटंक
वि० [सं० सुटङ्क] तीव्र। कर्कश। कर्णकटु [को०]।