विक्षनरी:राजनयिक शब्दावली

विक्षनरी से
(राजनयिक शब्दावली से अनुप्रेषित)
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

Diplomatic Phrases

राजनयिक आचरण में व्यवहार के कारण अनेक मुहावरों तथा विशेष शब्दों का विकास हो गया है। ये अपने प्रयोग के संदर्भ में एक विशेष अर्थ रखते हैं। प्राचीन काल में इन शब्दों का प्रभाव अधिक होता था। आजकल यद्यपि इनका महत्त्व इतना नहीं रहा है किन्तु फिर भी कुछ ऐसे शब्द हैं जिनका प्रयोग आज भी होता है। इनमें से कुछ उल्लेखनीय शब्द निम्नलिखित हैं-

  1. Accession (सहमिलन) — अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों में एक सहमिलन की धारा भी जोड़ दी जाती है ताकि सन्धि वार्ता में शामिल होने वाला राज्य भी आद में उसमें शामिल हो सके। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्याय क्षेत्र विषयक प्रावधान को संघ के सभी सदस्यों ने स्वीकार नहीं किया है किन्तु जो राज्य ठीक समझता है वह अपनी सुविधानुसार उसे कभी भी अंगीकार कर सकता है।
  2. Accord (मतैक्स) — कम महत्व के अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर सन्धि न करके उन्हें मतैक्य द्वारा सुलझा लिया जाता है उदाहरण के लिये जनस्वास्थ्य पर मतैक्य (Accord on public health) आदि।
  3. Acte Final (चरमाधि नियम) — किसी सम्मेलन या कांग्रेस के अन्त में प्रायः उसकी सम्पूर्ण कार्यवाही का सारांश दिया जाता है। इसमें संक्षिप्त लेख, सम्मेलन की सम्मलित, हस्ताक्षर युक्त संधियां आदि शामिल होती हैं।
  4. Ad Referendum (अग्रे-विचार्य) — जब किसी सन्धि वार्ता में राजनयिक प्रतिनिधि प्रस्तावों को स्वीकार कर लेता है किन्तु उन पर अन्तिम स्वीकृति न देकर अपनी सरकार की स्वीकृति के लिये रख लेता है किन्तु उन पर अन्तिम स्वीकृति न देकर अपनी सरकार की स्वीकृति के लिये रख लेता है तो उसे अग्रे-विचार्य कहा जाता है। इस प्रकार सन्धि की अन्तिम स्वीकृति का अधिकार सरकार के हाथ में आ जाता है।
  5. Agreement (समनुमोदन) — जब एक राज्य द्वारा विदेशों में अपना राजदूत नियुक्त किया जाता है तो उसके सम्बन्ध में सम्बन्धित राज्य की राय अनधिकृत रूप से जान ली जाती है। यदि विदेशी शासन को कोई आपत्ति नहीं होती तो सम्बन्धित व्यक्ति को समनुमोदन प्राप्त समझा जाता है।
  6. Asylum (राज प्रश्रय) — जब एक देश में राजनीतिक अपराधी अपने देश से भाग कर अन्य देश अथवा वहां के दूतावास में शरण ग्रहण कर लेते हैं तो उसे राज्य प्रश्रय कहा जाता है।
  7. Attache (सहचारी) — राजदूत के काम में हाथ बंटाने के लिये और सुविधा की दृष्टि से विशेष विषयों पर सलाह एवं सहायता देने के लिये विशेषज्ञ नियुक्त किये जाते हैं। उदाहरण के लिये व्यावसायिक सहचारी (Commercial Attace) जो व्यापारिक कार्यों में सहायता देता है प्रेस सहचारी (Press Attache) जो समाचार पत्रों में प्रकाशित प्रांतों का अध्ययन करने एवं सूचना एकत्रित करने का कार्य करता है। प्रत्येक सहचारी को उसके कार्य के अनुसार नाम से सम्बोधित किया जाता है।
  8. Bag (दूतावास प्रेष) — राजदूत द्वारा अपने देश के लिये लिखित प्रतिवेदन तथा अन्य सन्देश भेजे जाते हैं। इनको विशेष सन्देशवाहक द्वारा विशेष डाक के थैले में ले जाया जाता है। इस डाक थैले को कोई खोल नहीं सकता। जिस दिन यह थैला लाया अथवा ले जाया जाता है उसे प्रणाध्यावास में डाक दिवस (Bag Day) कहा जाता है।
  9. Belligerent Rights (युद्धमान अधिकार) — युद्ध में संलग्न राज्य को अन्तर्राष्ट्रीय कानून के तहत कुछ विशेष अधिकार और कर्त्तव्य सौंपे जाते हैं। इन अधिकारों की एक लम्बी सूची है। उदाहरणार्थ युद्धमान राज्य को यह अधिकार होता है कि वह अपने शत्रु के तटों एवं बंदरगाहों पर घेरा डाल सके। इस प्रकार वह नाकेबन्दी करके शत्रु राज्य के व्यापारिक सम्बन्ध समापत कर देता है।
  10. Capitulations (समर्पण सन्धि) — ये वे सन्धियां हैं जिनके अन्तर्गत समर्पण की शर्तें रहती हैं। प्राचीन काल में अनेक ईसाई धर्मावलम्बी गैर ईसाई राज्यों में जाकर बस गये थे। उनके हितों की रक्षा के लिये शक्ति सम्पन्न ईसाई राज्यों ने गैर ईसाई राज्यें से सन्धियां की। तदनुसार बलपूर्वक ईसाईयों के लिए अधिकार एवं उन्मुक्तियां प्राप्त कर लिये। उदाहरण के लिये ईसाइयों को स्थानीय न्यायालयों की परम्परा से छुटकारा दिलाया गया। उन्हें करों एवं कारागार से मुक्ति दिलाई गई। इस प्रकार की सन्धियों को Capitulation Treaty कहा गया, तदनुसारी शक्तियों का उपभोग करने वालों को Capitulatory Powers कहा गया तथा इस सम्पूर्ण प्रणाली को Capitulatory system कहा गया।
  11. Casus Belli (युद्ध-कारण) — जब कोई राज्य दूसरे राज्य के विरुद्ध उत्तेजनात्मक कार्यवाही करे और उसके आधार पर दूसरे राज्यों को युद्ध की घोषणा करने का न्यायपूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाए तो वह युद्ध-कारण कहलाता है। पामर्सटन ने परिभाषित करते हुए इसको ऐसा मामला कहा है जिसके आधार पर युद्ध करना उचित हो। उदाहरण के लिए पाकिस्तान की सेनाओं द्वारा बंगलादेश से खदेड़े गये शरणार्थियों की बाढ़ से भारत की अर्थव्यवस्था पर जो व्याघात आया उसे युद्ध का उचित कारण कहा जा सकता है।
  12. Chancelleries and Chancery (महामन्त्रालय) — प्रारम्भ में चांसलर या महामात्र के सचिवालय को चासंलरी कहा जाता था। आजकल इसका अर्थ वे मन्त्री तथा कर्मचारी है जो विदेश नीति को नियन्त्रित करते हैं अथवा उस सम्बन्ध में सलाह देते हैं। चांसरी किसी राजनयिक प्रतिनिधि के कार्यालय को कहा जाता है जिसमें प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्तर के सचिव तथा अन्य सहायक लिपिक रहते हैं।
  13. Conference and Congress (सम्मेलन और कांग्रेस) — अन्तर्राष्ट्रीय कानून की दृष्टि से इन दोनों ही शब्दों में कोई अन्तर नहीं है। दोनों का प्रयोग अभेद रूप से किया जाता है। कांग्रेस शब्द का सम्मेलन की अपेक्षा अधिक व्यापकता का प्रतीक है अन्यथा दोनों में विशेष अन्तर नहीं है। दोनों का आयोजन अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श एवं निर्णय के लिये किया जाता है।
  14. Charge de Affairs (कार्यदूत) — कार्यदूत एक देश के विदेश विभाग द्वारा प्रेषित किया जाता है और दूसरे देश के विदेश विभाग द्वारा परिग्रहित किया जाता है। कार्यदूतों को राजदूतों के समान सम्मान प्राप्त नहीं होता। अन्तःकालीन कार्यभार संभालने के लिये अन्तरिक कालीन कार्यदूत नियुक्त किये जाते हैं। इनके लिये परिग्रहणकर्त्ता राज्य का समनुमोदन प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होती। जब एक राज्य दूसरे राज्य से अपना असन्तोष या रोष प्रकट करता है तो वह लम्बे समय तक अन्तरिम कालीन कार्यदूत को ही नियुक्त रहने देता है।
  15. Compromis D' Arbitrage orCompromis (विवाच-संवित्) — जब दो राज्य अपने किसी विवाद को राजीनामें के लिये सौंप देते हैं तो इस राजीनामे की प्रक्रिया का जो नियम पत्र तैयार किया जाता है उसे विवाचन-संवित् कहते हैं।
  16. Concordat (अविप्रतिपत्ति संधि) — जब पोप द्वारा किसी राज्य के सम्प्रभु से सन्धि की जाती है तो उसे अविप्रतिपत्ति सन्धि कहा जाता है।
  17. Convention (अभिसमय) — यह एक कम महत्व की सन्धि है जिसे राज्यों के सम्प्रभुओं के बीच सम्पन्न नहीं किया जाता वरन् शासनों द्वारा किया जाता है।
  18. Corps Diplomatic (राजनयिक निकाय) — किसी राज्य की राजधानी में रहने वाले विभिन्न देशों के राजदूतावासों के राजनयिक कर्मचारियों के समस्त समूह को राजनयिक निकाय कहते हैं। इसका मुखिया वरिष्ठतम राजदूत होता है और उसे दूत वरिष्ठ (Doyen) की संज्ञा दी जाती है।
  19. En Clair (शब्दों में अथवा स्पष्ट भाषा में) — यदि कोई राजनयिक तार सांकेतिक भाषा में न भेजकर साधारण भाषा में भेजा जाता है तो इसे स्पष्ट भाषा में भेजा गया तार मानते हैं।
  20. Exequatur (कार्यानुमति) -जब एक देश द्वारा नियुक्त वाणिज्य दूत को वहां के सम्बन्धित अधिकारी द्वारा स्वीकृति प्रदान की जाती है तो उसे कार्यानुमति कहते हैं।
  21. Extradition (प्रत्यर्पण) — यह एक देसी सन्धि होती है जिसके अन्तर्गत कई राज्य आपस में यह समझौता करते हैं कि यदि एक राज्य का अपराधी दूसरे राज्य में चला जायेगा तो दूसरा राज्य उसे पहले राज्य को लौटा देगा। यह सन्धियां राजनीतिक अपराधियों पर लागू नहीं होती।
  22. Full powers (पूर्ण शक्ति या पूर्णाधिकार) — जब कोई राजनयिक प्रतिनिधि या अन्य अभिकर्ता किसी सम्मेलन या कांग्रेस में प्रतिनिधित्व करने के लिये भेजा जाता है तो उसकी सरकार उसे पूर्ण शक्ति प्रदान करती है जिसके तहत वह किसी सन्धि या अभिसमय विशेष पर अपनी सरकार की ओर से हस्ताक्षर करने का अधिकारी बन जाता है। इस पूर्ण शक्ति का कोई निश्चित स्वरूप नहीं है।
  23. Good offices (सुसम्बन्ध-प्रयोग) — दो विरोधी राज्यों के मध्य समझौता कराने के लिए जब तीसरा राज्य दोनों पक्षों क साथ अपने अच्छे साधनों से लाभ उठाकर दोनों के बीच संदेशवाहक का कार्य करता है तो उसके इस कार्य को सुसम्बन्ध-प्रयोग कहा जाता है। इसमें और मध्यस्थता में यह अन्तर है कि मध्यस्थता में मध्यस्थ व्यक्ति या शासन को स्वयं सन्धिवार्ता में भाग लेना पड़ता है किन्तु सुसम्बन्ध प्रयोग में ऐसा नहीं किया जाता।
  24. Laissez Passer (निर्वाध गमन) — जब एक राज्य के कर्मचारी राजकीय कार्य से दूसरे देश जाते हैं तो उक्त देश के राजदूतावास से उनकी सुविधा हेतु अपने देश के चुंगी अधिकारियों के नाम एक सिफारिशी पत्र लिखा जाता है ताकि सीमा प्रवेश के समय उसकी तलाशी नहीं ली जाये। इस पत्र को निर्बाधगमन पत्र कहा जाता है।
  25. Notes (टिप्पण) — राजनयिक दूत द्वारा किसी शासन को लिखे गए औपचारिक संदेश को टिप्पण कहा जाता है। ये टिप्पण तीन प्रकार के होते हैं -
    1. सामूहिक टिप्पण (Collective Note) — जब किसी विषय पर अनेक राज्यों के राजनयिक प्रतिनिधि संयुक्त रूप से हस्ताक्षर करते हैं तो सामूहिक टिप्पण कहलाता है। प्रत्येक प्रतिनिधि पृथक प्रतिलिपि पर अपने हस्ताक्षर करता है। इन सभी प्रतिलिपियों को मिलाकर सम्बन्धित शासन के समक्ष प्रस्तुत कर दिया जाता है।
    2. एकसम टिप्पण (Identic Note) — ऐसे टिप्पणों को सभी प्रतिलिपियों का एक सा होना आवश्यक नहीं है किन्तु उनका सारांश एक जैसा होता है। इन्हें पृथक पृथक समय पर भी प्रस्तुत किया जा सकता है।
    3. मौखिक टिप्पण (Note Verble) — इस टिप्पण पर हस्ताक्षर नहीं किये जाते किन्तु इसके अन्त में सौजन्य व्यक्त किया जाता है।
  26. Protocal (विदेशाधिकरण) — प्रारम्भ में किसी समझौते के रिकार्ड को विदेशाधिकरण कहा जाता था। यह सन्धि अथवा अभिसमय से कम औपचारिक था। आजकल अनेक महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदाएं इसी रूप में तैयार की जाती हैं।
  27. Rapporteur (प्रतिवेदक) — जब किसी सम्मेलन की समितियां अथवा उपसमितियां किसी प्रतिनिधि को मूल सम्मेलन में उनका प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के लिए चुनती हैं तो उसे प्रतिवेदन कहा जाता है। यह अपने नाम के अनुसार मूल सम्मेलन में समिति का प्रतिनिधित्व करता है।
  28. Safe Conduct (क्षेम गमन) — एक व्यक्ति को उसके देश के शत्रु राज्य में होकर बिना किसी रोक-टोक के निकलने की सुविधा को क्षेम-गमन कहा जाता है।
  29. Unfriendly Act (अमैत्रीपूर्ण कार्य) — जब एक राज्य दूसरे राज्य के कार्य को युद्ध का कारण मानता है तो उस राज्य से अपना विरोध प्रकट करते हुए स्पष्ट कर देता है कि अमुक कार्य अमैत्रीपूर्ण है।
  30. Unilateral Declaration (एकपक्षीय घोषणा) — कभी-कभी कुछ राज्य एक सैद्धान्तिक घोषणा द्वारा अपने अधिकारों या नीति की स्थापना करते हैं। इसकी सूचना बाद में अन्य राज्यों को भेजी जाती है। ऐसी घोषणा एक पक्षीय घोषणा कही जाती है।
  31. Vocux (अभिलाषायें) — जब किसी सम्मेलन द्वारा अपनी सन्धि के साथ भावी सुपथ प्रदर्शन के लिए कुछ सिफारिशें जोड़ दी जाती हैं तो उन्हें ऐसी अभिलाषा कहा जाता है। सन् 1899 में हेग शान्ति सम्मेलन ने ऐसी 6 अभिलाषाएं प्रकट की थीं। सन्धि पर हस्ताक्षर करने वाले राज्य इनसे बाध्य नहीं होते क्योंकि आखिर ये अभिलाषाएं ही होती हैं।
  32. Diplomatic Illness (राजनयिक अस्वस्थता) — जब कोई राजदूत अथवा सन्धिवार्ता करने वाला किसी सभा अथवा उत्सव में जाना भी नही चाहता तो वह बीमार होने का बहाना बना लेता है।
  33. Memorandum (स्मरण-पत्र) — यह टिप्पण जैसा ही तथ्यों और उन पर आधारित तर्कों का योग होता है। यह टिप्पण से विशेष भिन्न नहीं है। दोनों में अन्तर यह है कि इसके प्रारम्भ और अन्त में सौजन्यता पूर्ण शब्दों की आवश्यकता नहीं होती और न ही इस पर हस्ताक्षरों की आवश्यकता होती है।