अँचरा

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हिन्दी

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

अँचरा पु † [सं॰ अञ्चल]

१. साड़ी का वह छोर जो छाती पर रहता है । साड़ी या ओढ़नी का वह भाग जो सिर पर होता हुआ सामने छाती पर फैला हो । पल्ला ।

२. दुपट्टे या दुशाले के दोनें छोर । छीर । उ॰—कब मेरौ अँचरा गहि मोहन जोइ सोइ कहि मोसौं झगरे ।—सूर॰, १० । ७६ । यौ॰—अँचरा पकड़ाई=विवाह की एक प्रथा जिसमें वर कन्या की माता तथा उसके कुटुबं की और स्त्रियों का अंचल पकड़ता है और कुछ लेने पर छोड़ता है । इस रीति को तथा उस वस्तु को जो वर को मिलती है, अँचरा पकड़ाई या अँचर धरैया कहते हैं । मुहा॰—अँचरा पसारना=(१) किसी बड़े या देबता से कुछ माँगते समय (स्त्रियों का) अपसे अँचल को आगे फैलाना जिससे दीनता और उद्बेग सूचित होता है । विनती करना । दीनता दिखाना । उ॰—ए विधिना तो सों अँचरा पसारी माँगों जनम जनम दीजो या ही व्रज बासिबो—छीतस्वामी (शब्द्॰) । (२) भीख माँगने की एक मुद्रा । कोई वस्तु लेने के लिये देनेवाले के सामने अंचल रोपना । (3) दीनता और विनय के साथ माँगना ।