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अः

विक्षनरी से

अ संस्कृत और हिंदी वर्णमाला का पहला अक्षर । इसका उच्चारण कंठ से होता है इससे यह कंठय वर्ण कहलाता है । व्यंजनों का उच्चारण इस अक्षर की सहायता के बिना अलग नहीं हो सकता इसी से वर्णमाला में क, ख, ग आदि वर्ण अकार- संयुक्त लिखे और बोले जाते हैं । कंठय अर्थात गले से निकला स्वर जब मनुष्य का जन्म होता है जन्म उपरांत फिर जैसे जैसे जीवन बढ़ता है मनुष्य वैसे सीखता है अ का जीवन में बहुत महत्व है वैसे तो देखे महत्व के उपरांत (उपसर्ग) लगते ही ये अमहत्व को दरसाता है ।परंतु विनाश के उपरांत आते ही अविनाश को दरसाता जैसे की समाज में प्रत्येक मनुष्य का अपना वर्चस्व है पर जैसा हम जानते है ,अब्राह्मण = ब्राह्मण के समान आचर रखनेवाला अन्य वर्ण का मनुष्य इसका अर्थ उचित है पर आज हम आपस में लड़ रहे है,वजह विरोध; यथा—अधर्म = धर्म के विरुद्ध आचरण धर्म के विरोध आचरण क्यू मनुष्य द्वारा किए गए अन्याय पर स्वय के दृष्टि उपरांत ये जाना की मनुष्य सकारात्मक ना होके जीवन में नकारात्मक होता है इसके जड़ है रूढ़िवाद सोच , अशिक्षित व्यक्ति जो स्वय के लाभ में नए पुराने सोच को नई धारणा बना मनुष्य को विभाजित करते है अर्थार्थ जिस कदर जीवन में जन्म है उसका अंत भी है ,उसी योग्य आज नए धर्म अ का उदय है तो उसका अंत भी है,पर समय का ना तो कोई काल है ना भविष्य सिर्फ वर्तमान है जो विशेषतर निर्भय अंतरशक्ति मानव की पहचान है जो मृत्यु के पश्चात अनुभव होता है ।उपरांत के सभी तीन शब्द विशेषतर,अंत:+शक्ति, नि:+भय, अ के बाद : लग कर बना जो कहता है मानव के सोच का अंत+:=यानी मानव जीवन के भाव का जो हम सभी को अपनाना चाहिए एक नई सूरज का उम्मीद अंतः अस्ति प्रारंभ , यह एक प्रायः उपसर्ग है जो उस समय को उल्लेख करता है जब कोई गतिविधि शुरू होती है या जब कोई नया काम शुरू होता है। और जो जन्म के उपरांत सच है वो मृत्यु,यानी अ:(ये मेरा कर्म है जो भविष्य में हिंदू धर्म को विभाजित हेतु रोकेगा और आखिरी होगा जिसका प्रतीक सिर्फ सफेद झंडा होगा) जो कहता है जो सबसे अत्यधिक बलवान है वही भगवान है सब झुके है सब झुकते है जब समय चोट करता है ,इसलिए समय ही भगवान है। अ अन्त अ: अर्थात जन्म से मृत्यु तक । अ:=अमानव अहित कल्याणम् अ: और घर परिवार से सीखा ॐ मेरा धर्म है ।। नमः+कार=नमस्कार ।।