अद्भुत

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

अद्भुत पु वि॰ [हिं॰] दे॰ 'अद्भुत' । उ॰—अद्भुत सलिल सुनत गुनकारी । आस पिआस मनोमल हारी ।—मानस १ ।४३ ।

अद्भुत ^१ वि॰ [सं॰] [संज्ञा अदभुतना अदभुतत्व] आशचर्यजनक । विस्मयकारक । विलक्षण । विचित्र । अनोखा । अजीब । अपुर्व । अलौकिक ।

अद्भुत ^२ संज्ञा पुं॰

१. आशचर्य । विस्मय (को॰) ।

२. विस्मयपुर्ण घटना, पदार्थ या वस्तु (को॰) ।

३. किसी ऊँचाई की माप के ५ समभागों में से एक, जिसमें ऊँचाई चौड़ाई की अपेक्षा दुनी होती है (को॰) ।

४. काव्य के नौ रसों में से एक । विशेष—इसमें अनिवार्यत: विस्मय की परिपुष्टता दिखलाई जाती है । इसका वर्ण पीत, देवता ब्रह्मा, आलंबन असंभावित वस्तु, उद्दीपन उसके गुणों की महिमा तथा अनुभाव संभ्रमादिंक है ।

५. केशव के अनुसार रुपक के तीन भेदों में एक । विशेष—इसमें किसी वस्तु का अलौकिक रुप से एक रस होना दिखनाया जाता है । जैसे—सोभा सरवर माहिं फल्पोई सखि, राजैं राजहंसिनी समीप सुखदानिऐ । केसोदस आस पास सौरभ के लो । धने, ध्राननि के देव और भ्रक्त बखानिऐ । होति ज्योति दिन दुनी किसी में सहज गुनी, सुरज सुहृद चारु चंद मन मानिऐ । राति को सदन छुइ सके न मदन ऐसी कोमलबदन जग जानकी को जानिऐ ।—केशव ग्रं॰, भा॰ १, पृ॰ १८४ ।