अधिक

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हिन्दी[सम्पादन]

विश्लेषण[सम्पादन]

आवश्यकता से उच्च किसी का होना अधिक कहलाता है।

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

अधिक ^१ वि॰ [सं॰] [संज्ञा अधिकाता, अधिकाई. क्रि॰ अधिकाना]

१. बहुत । ज्यादा । विशेष ।

२. अतिरिक्त । सिवा । फालतु । बचा हुआ । शेष । जैसे—जो खाने पीने से आधिक हो उसे अच्छे काम में लगाओ (शब्द॰) ।

अधिक ^२ संज्ञा पुं॰

१. वह अलंकार जिसमैं आधेय को आधार से अधिकवर्णन करते है । जैसे—तुम पुछत कहि मुद्रिके मौन होति यह नाम । कंकन की पदवी दई तुम बिनु या कहँ राम ।—राम चं॰ पृ॰ १०० ।

२. न्याय के अनुसार एक प्रकार का निग्रह स्थान जहाँ आवश्यकता से अधिक हेतु ओर उदाहरण का प्रयोग होता । है ।

अधिक तिथि संज्ञा स्त्री॰ [ सं॰] वह तिथि जो अपने समय के पश्चात् दुसरे दिन भी मानी जाय [को॰] ।

अधिक दिन संज्ञा पुं॰ [सं॰] दे॰ 'अधिक तिथि' [को॰] ।

अधिक दिवस संज्ञा पुं॰ [सं॰] दे॰ अधिक तिर्थि ।

अधिक मास संज्ञा पुं॰ [सं॰] अधिक महीना । मलमास । लौद का महीना । पुरुषोत्तम मास । असंक्रातमाम । शुक्ल प्रतिप़दा से लेकर अमावस्य़ा पर्यत काल जिसमें संक्रांति न पड़े । विशेष—यह प्रति तिसरे वर्ष आता है तथा चांद्र वर्ष ओर सौर वर्ष को बराबर करने के लिये चांद्र बर्ष में जोड़ लिया जाता है ।