अपना

विक्षनरी से
Jump to navigation Jump to search

हिन्दी

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

अपना ^१ सर्व [सं॰ आत्मन:,प्रा॰ अप्पणी] [स्त्री॰ अपनी] [क्रि॰ अपनाना]

१. निज का ।

३. सबन्हौ बोल सुनाएसी सपना । सीतहि सेई करौ हित अपना ।— मानस, ५ । १० । विशेष—इसका प्रयोग तीनों पुरुषों में होता है । जैस— तुम अपना काम करों । मैं अपना काम करूँ । वह अपना काम करे । मुहा॰—अपना उल्लू सीधा करना=किसी को मूर्ख बनाकर अपना कार्य निकालना । स्वार्थ सिद्ब करना । अपना करके छोड़ना= अपना बना लेना । उ॰—हरिचंद अपनो करि छाँड़ू तब घर जाऊँ रे ।—भारतेंदु ग्र, भा॰

२. पृ॰ ३९८ ।अपना करना= अपना बनाना । अपने अनुकूल कर लेना ।जैसे,—मनुष्य अपने व्यवहार से हर एक को अपना कर सकता है (शब्द॰) । अपना कहा करना= (१) अपनी बात पर दृढ़ रहना । वचन के अनुसार आचरण करना । (२) अपनी जिद पूरी करना । अपना कान देखे बिना कौआ के पीछे दौड़ना=(१) मूल को भूलकर भटकना । (२) गप पर विश्वास करके बैठना । अपना काम करना= प्रयोजन निकालना । अपना किया पाना=किए को भुगतना । कर्म का फल पाना । अपनापन स्थापीत करना= भईचारा । उत्पन्न करना । आत्मीयता बढ़ाना । अपना पराया= शत्रु मित्र । जैसे—तुम्हें अपने पराए की परख नहीं (शब्द॰) । अपना पाँव आग में ड़ालना=अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारना । अपना पूत पराया अधिगड़=एक ही गलती पर अपने पुत्र को प्यार करना और दूसरे के बच्चे को ड़ाँटना । अपना बना लेना= (१) दोस्त बनाना । मित्र बनाना । (२) वश में कर लेना । (३) प्रेमी बनालेना । (४)छोन लेना । अपना वेगाना=दो॰ 'अपना पराय़ा' । अपना रोना रोना= अपना ही दुखड़ा बयान करना, दूसरे की सुनना । अपना या करना= अपने सामर्थ्य वा विचार के अनुसार करना । भरसक प्रयत्न करना । उ॰ —(क) दो बल कहा देति मोहि सजनी तू तौ बड़ा सुजान । अपनी सी मैं बहुतहि कीन्हीं रहति न तेरी आन । —सूर॰ (शब्द॰) । (ख) तुलसीदास मधवा अपनो सो करि गयो गर्व गँवाई । —तुलसी (शब्द॰) । अपना सा पचना= अपनी सी कर चुकना । उ॰—छुटई न सिसु अपनौ सो पची । कनक सों जनु कि नीलमनि खची । —नंद॰ ग्रं॰ पृ॰ २३८ । अपना सा मुँह लेकर रह जाना= किसी बात में अकृतकार्य होने पर लज्जित होना । उ॰—और अपना सा मुँह लेकर अपनी कुर्सी पर आनकर डट गए । —फिसाना॰ भा॰

३. पृ॰ २२ । अपनी अकल अपने पास रखना=दूसरे की सलाह की अनाबश्यकता । अपनी अपनी कहना=अपना अपना भिन्न विचार प्रकट करना । उ॰—अपनी अपनी कहत है, का को धरिए ध्यान ।—कबीर सा, सं, पृ॰ ८६ । अपनी अलग खिचड़ी पकाना= सबसे पृथक् कार्य या विचार रखना अपनी अपनी आ पड़ना= अपनी अपनी चिंता में व्यग्र होना । अपना अपना ख्याल होना । उ॰—पद्माकर कछु निज कथा, कासी कहौं बखान ।जाहि लखो, ता है परी अपनी अपनी आन ।—पद्माकर (शब्द॰) । अपनी आद में आप जलना ।=किसी के प्रति ईष्या, द्वेष वा क्रोध से प्रभावित होना । अपनी उँगलियों से अपनी आँखे कुचाला =अपने पाँव आप कुल्हाड़ी मारना । अपने हाथों अपनी हानि कर लेना । —अपनी अँगलियों से अपनी आँखो को कौन कुचालेगा । —चुभते, पृ॰ ८ । अपनी गाना= अपनी ही बात कहना और किसी की न सुनना । अपनी गुड़िया सँबार देना= अपने सामर्थ्य के अनुसार बेटी का ब्याह कर देना । अपना नींद सोना=अपने इच्छानुसार, कार्य करना । अपनी बात का एक =वादे का पक्का । दृढ़प्रतिज्ञ । अपनी बात पर आना= हठ पकड़ना । जिद्द पकड़ना । जैसे— अब वह अपनी बात पर आ गया है, नहीं मानेगा (शब्द॰) । अपनी जाँघ का सहारा होना=हठ पकड़ना । जिद्दु पकड़ना । जैसे—अब वह अपनी बात पर आ गया है, नही मानेगा (शब्द॰) । अपनी जाँध का महार होना= स्वावलंबी होना । अपने बल या पौरुष का भरोसा होना । उ॰— वह कमाई कर कभी हारा नहीं । जाँघ का अपनी सहारा है जिसे । —चुभते॰ पृ॰ ४८ । अपनी जान हरदम सुली पर होना= संकट की सदा आशंका होना । हरदम खतरा होना । अपनी बीती या पर बीती कहना= अपने या दूसरे पर घटित बात कहना । उ॰—अपनी बीती कहूँ कि पर बीती,यह वही मसल हुई ।—सैर कु॰ पृ॰ ३३ । अपनी मुट्टी में करना=अपने कब्जे या वश में करना । उ॰—उसके मन को अरनी मुटठी में कर, मनमानी कर लेना ।—रास॰ क॰ भ॰ पृ॰ ६ । अपनी सी करना= मनमानी करना । उ॰—वह अपनी सी करता ही चला जा रहा है । —प्रेमघम॰ भ॰

२. पृ॰ ३१८ ।अपने घर का रास्ता लेना= चलते बनना । अपने घर जाना । धता होना । अपने तक रखाना= किसी से न कहना । किसी को पता न देना । भेद छिपाना । जैसे, —फकिर लोग दवा अपने तक रखने है । (शब्द॰) । अपने धंधे से लगना=अपने काम में लगना । उ॰—दिन को अपने अपने धधे से लोग लगते है मगर साढे़ पाँच बजे से फिर किसी इंसान की सुरत न देखने में आएगी ।— सैर कु॰ पृ॰ ३४ ।अपनेपन पर आना= अपने दुःस्वभाव के अनुसार कार्य करना । अपने पाँव पर खड़ा होना= स्वावलंबी होना । उ॰—क्यों न हो पाँव पर खड़े अपने । और का पाँव किसलिये पकड़े ।—चुभते॰ पृ॰ १० । अपने भाबँ =अपने अनुसार । अपनी जान में । जैसे,—अपने भावें तो मैंने कोई बात उठा नहीं रखी (शब्द॰) । अपने मन की करना= दूसरों की सलाह न मानकर अपनी सोची बात करना । अपने मुँह मियाँ मिट्ठु बनना= अपनी प्रशंसा आप करना । अपने लिये बला बनाना= अपनी बिपत्ति का स्वयं कारण बनना । जान बुझाकर संकट बुलाना । उ॰—आप अपने लिये बला न बनें । जो न सिर पर पड़ी बला टाले । —चुभते॰ पृ॰ ५५ । अपने रंग में मस्त रहना=दूसरे की चिंता न कर अपने ही कामकाज या आनंद में पड़े रहना । अपने सिर बला मोल लेना=अपने लिये इंझट, बाधा या बखेड़ा खड़ा करना । स्वयं को झगड़े में डालना । अपने सिर पड़ना=अपने पर बीतना । उ॰—जौ पहिले अपुने सिर परई । सो का काहु कै धरिहरि करई ।— जायसी ग्र॰ (गुप्त) पृ॰ २५७ । अपने से बाहर होना=रुष्ट या क्रोधित होना । बेकाबू होना । अपने हलुए माँड़ से काम होना— अपने मतलब से सरोकार रखाना । अपने हाँथ पाग सँवारना= अपने हाथों अपना काम पूरा करना । अपने हिमाब से=अपने विचार से । अपने विवेक से यौ॰—अपने आप=(१)स्वत: । खुद ।उ॰—अब कुछ दिन धक्के खाने से उसकी अकल अपने आप ठिकाने हो जाएगी ।—श्रीनिवास ग्रं॰ पृ॰ २४९ ।(२) आप । निज । जैसे— अपने को । अपने में । अपने पर ।

अपना ^२ संज्ञा पुं॰ आत्मीय । स्वजन । जैसे— आपलोग तो अपने ही है, आपसे छिपाव क्या?—(शब्द॰) । उ॰—जब लौं न सुनौ अपने जन को । आति आरत शब्द हते तन को । रामचं॰ पृ॰ १७ ।