आँत

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

आँत संज्ञा स्त्री [ सं॰ अन्न] प्राणीयो के पेड के भीतर वह लंबी नली जो गुदा मार्ग तक रहती है । विशेष—खाया हुआ पदार्थ पेट में कुछ पचकर फिर इस नली में जाता है जहाँ से रस तो अंग प्रत्यंग में पहुँचाया जाता है और मल या रद्धी पदार्थ बाहर निकला जाता है । मनुष्य की आँत उसके डील से पाँच या छ:गुनी लंबी होती है । मांसभक्षी जीवों की आँत शाकाहारियों से छोटी होती है । इसका कारण शायद यह है की माँस जल्दी पचता है । मुहा॰—आँत उतरना—एक रोग जिसमें आँत ढीला होकर नाभि के नीचे उतर आती है और अँडकोश में पीडा उत्पन्न होती है । आँत का बल खुलना—पेट भरना । भोजन से तृप्त होना । बहुत देर तक भुखे रहने के उपरांत भोजन मिलना । जैसे,— आज कई दिनों के पीछे आँतो का बल खुला है । आँतो का बल खुलवाना-पेट भर खीलाना । आँते अकुलाना, कुल- कुलाना, कुलबुलाना-भुख के मारे बुरी दशा होना । आँते गले में आना—नाको दम होना । जँजाल में फँसना । तंग होना । जैसे,—इस काम को अपने उपर लेते तो हो, पर आँते गले में आँवेंगी । आँते मुँह में आना—दे॰ 'आँते गले में आना' । आँतो में बल पडना—पेट में बल पडना । पेट एंठना । जैसे,—हँसते हँसते आँतो में बल पडने लगा । आँते समेटना- भुख सहना । जैसे,—रात भर आँतें समेटे बैठे रहे । आँते सुखना=भुख के मारे बुरी दशा होना । जैसे,—कल से कुछ खाया पीया नहीं है ;आँतें सुख रही हैं ।