आकाशभाषित

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

आकाशभाषित संज्ञा पुं॰ [सं॰] नाटक के अभिनय में एक संकेत । बिना किसी प्रश्नकर्ता के आपसे आप वक्ता ऊपर की ओर देखकर किसी प्रश्न को इस तरह करता है, मानो वह उससे किया जा रहा है और फिर वह उसका उत्तर देता है । इस प्रकार के कहे हुए प्रश्न को 'आकाशभाषित' कहते हैं । विशेष—भारतेंदु हरिश्चंद्र के 'विषस्य विषमौषधम्' में इसका प्रयोग बहुत है । उ॰—हरिश्चंद्र—अरे सुनो भाई, सेठ, साहूकार, महाजन, दूकानदारों, हम किसी कारण सेअपने को हजार मोहर पर बेचते हैं । किसी को लेना हो तो लो । (इधर उधर फिरता है । ऊपर देखकर) क्या कहा ? "क्यों तुम ऐसा दुष्कर्म करते हो ?" आर्य, यह मत पूछो, यह सब कर्म की गति है । (ऊपर देखकर) क्या कहा ? "तुम क्या कर सकते हो, क्या समझते हो और किस तरह रहोगे?" इसका क्या पूछना है । स्वामी जो कहेगा वह करेंगे, इत्यादि ।—सत्य हरिश्चंद्र ।