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आप

विक्षनरी से

सर्वनाम

आप

  1. तुम, अपने से बड़े आदि के लिए आदर के साथ कहा जाता है।

अनुवाद


प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

आप ^१ सर्व [सं॰ आत्मन्, प्रा॰ अत्त अप्प अप्परा्, पु आपनो]

१. स्वयं । खूद । विशेष—इसका प्रयोग तीनों पुरुषों के लिये होता है । जैसे, उत्तम पुरुष —मैं आप जाता हूँ, तुम्हें जाने की आवश्यकता नहीं । मध्य पुरुष—तुम आप अपना काम क्यों नहीं करते, दूसरों का मुँह क्यों ताका करते हो । अन्य पुरुष —तुम मत हाथ लगाओ, वह आप अपना् काम कर लेगा ।

२. 'तुम' और 'वे' के स्थान पर आदरार्थक प्रयोग । जैसे,—(क) कहिए बहुत दिन पर आप आए है, इतने दिन कहाँ थे? (ख) ईश्वरचंद्र विद्यासागर पुराने ढंग के पंड़ित थे । आपने समाज संशोधन के लिये बहुत कुछ उद्योग किया । (ग) आप बड़ी देर से खड़े है; ले जाकर बैठाते क्यों नहीं?

३. ईश्वर । भगवान् । उ॰—(क) जहाँ दया तहँ धर्म है, जहाँ लोभ पाप । जहाँ क्रोध दया तहँ काल है, जहाँ क्षमा तहँ आप—कबीर (शब्द॰) । यौ॰—आपकाज=अपना काम । जैसे—आपकाज महाकाज (शब्द॰) । उ॰ —नंददास प्रभु बड़ेइ कहि गए हैं आपकाज महाकाज । —नंद॰ ग्रं॰, पृ॰ ३६८ । आपकाजी= स्वार्थी । मतलबी । आपबीती=घटना जो आपने ऊपर बीत चुकी हो । आपरूप=स्वयं । आप । साक्षात् आप । उ॰— चित्र के अनुप बृजभूप के सरूप को जौ क्यों हूँ आपरूप बृजभूप करि मानती ।—भिखारी॰ ग्र॰, भा॰

१. पृ॰ १५६ । आपस्वार्थी= मतलबी । मुहा॰—आप आप करना=खुशामद करना । जैसे,—हमारा तो आप आप करते मुँह सूखता है और आपका मिजाज ही नहीं मिलता । आप आपकी पड़ना= अपने अपने काम में फँसना । अपनी अपनी अवस्था का ध्यान रखना । जैसे,—दिल्ली दरबार के समय सबको आप आपकी पड़ी थी, कोई किसी को सनता नहीँ था । आप आपकी=अलग अलग । न्यारा न्यारा । जैसे,—(क) दो पुरुष आप आपको ठाडे । जब मिलै जब नित कै गाड़े । —पहेली (केवाड़) । (ख) शेर के निकलते ही लोग आप आपको भाग गए । आप आपमें= आपस में परस्पर । जैसे,—यह मिठाई लड़कों को दे दो, वे आप आप में बाँट लेगे । आपको भूलना=(१) अपनी अवस्था का ध्यान न रखना । किसी मनोवेग के कारण बेसुध होना । जैसे,—(क) बाजारू रंड़ियों के हाव भाव में पड़कर लोग आपको भूल जाते हैं । (ख) जब मनुष्य को क्रोध आता है तब वह आपको भूल जाता है । (२) मदांध होना । घमंड़ में चूर होना । जैसे,—थोड़ा सा धन मिलते ही लोग आपको भूल जाते है । आप से= स्वयं । खुद । जैसे,—उसने आपसे ऐसा किया; कोई उससे कहने नहीं गया था । उ॰—खेलति ही सतरंज अलिनि सों तहाँ हरि आए आपु ही तें किधों काहू के बुलाए री । —केशव ग्रं॰ भा॰ १, पृ॰ १८१ । आपसे आप= स्वयं । खुद ब खुद । जैसे,—(क) आप चलकर बैठिए में सब काम आपसे आप कर लूँगा । (ख) घबराओ मत, सब काम आपसे आप हो जायगा । आप ही= स्वयं । आपसे आप । जैसे-हम सब आप ही आप कर लेगे । उ॰—जागहिं दया दृष्टि कै आपी । खोल सो नयन दीन विधि झाँपी ।—जायसी (शब्द॰) । आप ही आप=(१) बिना किसी और की प्रेरणा के । आपसे आप जैसे—उसने आप ही आप यह सब किया है, कोई, कहने नहीं गया था । (२) मन ही मन में । जैसे,—वह आप ही आप कुछ कहता जा रहा था । (३) किसी को संबोधन करके नहीं । (नाटक में उस 'वाक्य' को सूचित करने का संकेत जिसे आभिनयनकर्ता किसी पात्र को संबोधन करके नहीं कहता, बरन इस प्रकार मुँह फेर कर कहता है, मानो अपने मन में कह रहा है । पात्रों पर उसके कहने का कोई प्रभाव नहीं दिखाया जाता । इसे 'स्वगत' भी कहते है ।) ।

आप ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ आपः=जल]

१. जल । पानी ।उ॰—पिंगल जटा कपाल माथे पै पुनीत आप पावक नयना प्रताप भ्रू पर बरत है ।—तुलसी ग्रं॰, पृ॰ २३७ ।