आह

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

आह ^१ अव्य़॰ [सं॰ अहह] पीड़ा, शोक, दु:ख,खेद और ग्लानिसूचक अव्यय । उ॰—पीड़ा ।-आह ! । बड़ाभारी काँटा पैर में धँसा । दु:ख शोक-आह ! । अन्न के बिन्ना उसकी क्या दशा हो रही है । थोड़ा क्रोध खेद—आह ! । तुमने तो हमें हैरान कर डाला ।

आह ^२ संज्ञा स्त्री॰ कराहना । दु:ख या क्लेशसुचक शब्द । ठंढी साँस । उसास । उ॰—तुलसी आह गरीब की, हरि सों सही न जाय । मुई खाल की फूँक सों, लोह भसम होइ जाय । —तुलसी (शब्द॰) । मुहा॰— आह करना = हाय करना । कलपना । ठंढी साँस लेना । उ॰—(क) आह करों तो जग जले, जंगल भी जल जाय । पापी जियरा ना जले , जिसमें आह समाय । (शब्द॰) । (ख) भरथरि बिछुरी पिंगला आह करत जिउ दीन्ह । —जायसी ग्रं॰ पृ॰ २७२ । आह खींचना = ठंढ़ी साँस भरना । उसास खींचना । जैसे, उसने तो आह खींचकर कहा कि तेरे जी में जो आवे, सो कर । आह पड़ना = शाप पड़ना । किसी को दु:ख पहुँचाने का फल मिलना । जैसे—तुम पर उसी दु:खिया की आह पड़ी है । आह भरना = ठंढ़ी साँस खींचना । उ॰— चितहिं जो चित्र कीन्ह, धन रों रों अंग समीप । सहा साल दुख आह भर, मुरछ परी कमीप ।—जायसी (शब्द॰) । आह मारना = ठंढ़ी साँस खींचना । उ॰—आह जो भारी बिरह की, आग उठि तेहि लाग । हंस जो रहा शरीर महँ पंख जरे तव भाग । —जायसी (शब्द॰) । आह लेना = सताना । दु:ख देकर कलपना । किसी कौ सताने का फल अपने ऊपर लेना । जैसे,—नाहक किसी की आह क्यों लेते हो ।

आह ^३—पु संज्ञा पुं॰ [राज॰ आहस=बल] साहस । हियाव । बल । उ॰— जड़के निकट प्रवीन की नहीं चलै कछु आह । चतुराई । ढिग अंध के, करै चितेरो चाह । —दीनदयाल (शब्द॰) ।

आह संज्ञा पुं॰ [सं॰ आहव=ललकार, युद्ध , प्रा॰ आह=बुलाना] ललकार । युद्ध के लिये किसी को प्रचारना । उ॰—भाल लाल बेंदी छए छुटे बार छबि देत । गह्वौ राहु अति आहु करि, मनु ससि सूर समेत ।—बिहारी र॰ दो॰ ३५५ ।