उपस्थित

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

उपस्थित ^१ वि॰ [सं॰]

१. समीप बैठा हुआ । सामने या पास आया हुआ । विद्यमान । मौजूद । हाजिर । क्रि॰ प्र॰—करना=(१) हाजिर करना । सामने लाना । (२) पेश करना । दायर करना, जैसे, — अमियोग अपस्थित करना । होना=(१) आ पड़ना । जैसे,—बड़ा संकट उपस्थित हुआ । (२)ध्यान में लाया हुआ । स्मरण किया हुआ । याद । जैसे —हमें वह सूत्र उपस्थित नहीं है ।

उपस्थित ^२ संज्ञा पुं॰ १ द्बारपाल । दरवान ।

२. सेवा ।

३. प्रार्थना ।

४. आसनविशेष [को॰] ।

उपस्थित होना । प्रसंग में आना । जैसे, बात पड़ना, मौका पड़ना, साथ पड़ना, काम पड़ना, पाला पड़ना, साबिका पड़ना, इत्यादि । जैसे,—जब कभी बात पड़ती है वे तुम्हारी तारीफ ही करते हैं । विशेष—जिन जिन स्थलों में 'होना' क्रीया बोली जाती है उनमें से बहुत से स्थलों में 'पड़ना' का भी प्रयोग हो सकता है । 'पड़ना' के प्रयोग में विशेषता यही होती है कि इससे व्यापार का अधिक संयोगवश होना प्रकट होता है । 'साथ हुआ' और 'साथ पड़ा' में से पिछला क्रियाप्रयोग व्यापार में संयोग का भाव सूचित करता है ।

१६. जाँच या विचार करने पर ठहरना । पाया जाना । जैसे,— (क) दोनों में लाल घोड़ा कुछ मजबूत पड़ता है । (ख) यह धान उससे कुछ बीस पड़ता है ।

१७. (देशांतर या अवस्थांतर) होना । (पहली स्थिति या दशा त्यागकर नई स्थिति या दशा को) प्राप्त होना । (बदलकर) होना । जैसे, नरम पड़ना, ठंढा पड़ना, ढीला पड़ना, इत्यादि । विशेष—'पड़ना' के प्रयोग से जिस दशांतर की प्राप्ति सूचित की जाति है वह प्रायः पूर्वदशा से अपेक्षाकृत हीन या निकृष्ट होती है । जहाँ पहली स्थिति से अच्छी स्थिति में जाने का भाव होता है वहाँ इसका व्यवहार कम स्थलों पर होता है ।

८. मैथुन करना । संभोग करना (पशुओं के लिये) । जैसे,— यह घोड़ा जब जब किसी घोड़ी पर पड़ता है तब तब बीमार हो जाता है ।

१९. अत्यंत इच्छा होना । धुन होना । चिंता होना । जैसे,—तुम्हें तो यही पड़ रही है कि किस प्रकार इस साल बी॰ ए॰ हो जायँ । मुहा॰—कया पड़ी है = क्या प्रयोजन है । क्या मतलब है । जैसे,—तुमको क्या पड़ी है जो तुम उसके लिये इतना कष्ट उठाते हो । उ॰—परी कहा तोहिं प्यारि पाप अपने जरि जाहीं ।—सूर (शब्द॰) । विशेष—यह क्रिया अनेक क्रियाओं विशेषत: अकर्मक क्रियाओं से संयुक्त होती है । यह जब धातुरूप के साथ संयुक्त होती है तब मुख्य किया के व्यापार में आकस्मिकता या संयोग सूचित करती है; जैसे, कह पड़ना, दे पड़ना, आ पड़ना, जा पड़ना आदि । और जब धातुरूप के बदले पूरी क्रिया ही से संयुक्त होती है तब उसके करने में कर्ता की बाध्यता, विवशता या परतंत्रता प्रकट करती है; जैसे, कहना पड़ा, देखना पड़ा, सहना पड़ा, आना पड़ा, जाना पड़ा इत्यादि । इसके अतिरिक्त कभी कभी किसी शब्द के साथ लगकर यह क्रिया कुछ विशेष अर्थ देने लगती है । जैसे,—(क) कुछ रुपया तुम्हारे नाम पड़ा है । (क) कई दिन से तुम उनके पीछे पड़े हो । (ग) सरदी के मारे गले पड़ गए हैं । (घ) अब तो यह किताब हमारे गले पड़ी है, आदि । ऐसी दशा में यह महाविरे का रूप धारण कर लेती है । ऐसे अर्थों के लिये मुख्य शब्द अथवा संज्ञाएँ देखो । जिस प्रकार व्यापार के घटित होने के लगभग या सदृश व्यापार सूचित करने के लिये क्रिया का रूप भूतकालिक करके तब उसके साथ 'जाना' लगाते हैं (जैसे, हाथ जला जाता है पैर कटा जाता था, चीज हाथ से गिरी जाती है) उसी प्रकार 'पड़ना' भी लगाते हैं, जैसे,— छड़ी हाथ से गिरि पड़ती है । उ॰—चुनरि चारु चुई सी परै चटकीली हरी अँगिया ललचावै ।—(शब्द॰) ।