उलटा

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

उलटा ^१ वि॰ [हिं॰ उलटना] [स्त्री॰ उलटी]

१. जो ठीक स्थिति में न हो । जिसके ऊपर का भाग नीचे और नीचे का भाग ऊपर हो । औंधा । जैसे—उलटा घड़ा । (ख) बैताल पेड़ से उलटा जा लटका । मुहा॰—उलटा तवा=अत्यंत काला । काला कलूटा । जैसे, —उसका मुह उलटा तावा है । उलटा लटकना=किसी वस्तु के लिये प्राण देने पर उतारू होगा । जैसे, तुम उलटे लटक जाओ तो भी तुम्हे वह पुस्तक न देंगे । उलटी टाँगें गले पड़ना=(१) अपनी चाल से आप खराब होना । आपत्ति मोल लेना । लेने के देने पड़ना । (२) अपनी बात से आप ही कायल होना । उलटी साँप चलना=साँस का जल्दी जल्दी बाहर निकलना । दम उखड़ना । साँस का पेट में समाना । मरने का लक्षण दिखाई देना । उलट साँस लेना=जल्दी जल्दी साँस खींचना । मरने के निकट होना । उलटे मुँह गिरना=दूसरे की हानि करने कि निकट में स्वयं हानि उठाना । दूसरे की नीचा दिखाने के बदले स्वयं नीचा देखना ।

२. जो ठिकाने से न हो । जिसके आगे का भाग पीछे अथवा दागिनी ओर का भाग बाईं ओर हो । इधर का उधर । क्रम विरुद्ध । जैसे, —उलटी टोपी । उलटा जूता । उलटा मार्ग । उलटा हाथ । उलटा परदा (अँगरेखे का) । उ॰—उलटा नाम जपत जग जाना । बालमीकि भए ब्रह्म समाना । तुलसी (शब्द॰) । मुहा॰—उलटा घड़ा बाँधना=और का और करना । मामले को फेर देना । ऐसी युक्ति रचना कि विरुद्ध चाल चलनेवाले की चाल का बुरा फल घूमकर उसी पर पड़े । उलटा फिरना या लौटना=तुरंत लौट पड़ना । बिना छड़ भर ठहरे पलटना । चलते चलते घूम पड़ना । जैसे, —तुम्हें घर न पाकर वह उलटा फिरा, दम मारने के लिये भी न ठहरा । उलटा हाथ= बाँया हाथ । उलटी गंगा बहना=अनहोनी बात होना । उलटी गंगा बहाना=जो कभी नहीं हुआ हो, उसको करना । विरुद्ध रीति चलाना । उलटी माला फेरना=मारण या उच्चाटन के लिये जप करना । बुरा मानना । अहित चाहना । उलटे काँटे तौलना=कम तैलना । (डाँड़ी मारना) । उलटे छुरे से मूँड़ना= उल्लू बनाकर काम निकालना । बेवकूफ बनाकर लूटना । झँसना । उलटा पाँव फिरना=तुरंत लौट पड़ना । बिना क्षण भर ठहरे पलटना । चलते चलते घूम पड़ना । उलटे हाथ का दाँव=बाएँ हाथ का खेल । बहुत ही सहज काम ।

३. कालक्रम में जो आगे का पीछे और पीछे का आगे हो । जो समय से आगे पीछे हो । जैसे, —उसका नहाना खाना सब उलटा ।

४. अत्यंत असमान । एक ही कोटि में सबसे अधिक भिन्न । विरुद्ध विपरीत । खिलाफ । बरअक्स । जैसे—हमने तुमसे जो कहा था उसका तुमने उल्टा किया ।

५. उचित के विरुद्ध । जो ठीक हो उससे अत्यंत भिन्न । अंडबंड । अयुक्त । और का और । बेठीक । जैसे, —उलटा जमाना । उलटी समझ । उलटी रीति । उ॰—सहित विषाद परस्पर कहहीं, बिधि करतब सब उलटे अहहीं ।—तुलसी (शब्द॰) । मुहा॰—उलटा जमाना=वह समय जब भली बात बुरी समझी जाय और कोई नियत अवस्था न हो । अंधेर का समय । उलटा सीधा=बिना क्रम का । अंडबड । बेसिर पैर का । बिना ठीक ठिकाने का । अव्यवस्थित । भला बुरा । जैसे, —(क) उन्होंने जो उलटा सीधा बतलाया वही तुम जानते हो । (ख) हमसे जैसा उलटा सीधा बनेगा, हम कर लेंगे । उलटी खोपड़ी का=औंधी समझ का । जड़ । मूर्ख । उलटी पट्टी पढ़ाना= टेढ़ी सीधी समझाना । और की और सुझाना । भ्रम में डालना । बहकाना । उलटी सुनना=जैसा न हो वैसा सुनना । विपरीत सुनना । उ॰—आपने जो बात सुनी है उलची ही सुनी है ।—सैर॰, पृ॰ १६ । उलटी सीधी सुनना=भला बुरा सुनना । गाली खाना । जैसे,—तुम बिना दम पाँच उलटी सीधी सुने न मानोगे । उलटी सीधी सुनाना=खटी खोटी सुनाना । भला बुरा कहना । फटकारना ।

उलटा ^२ क्रि॰ वि॰

१. विरुद्ध क्रम से । और तौर से । बेठिकाने । ठीक रीति से नहीं । अंडबंड ।

२. जैसा होना चाहिए उससे और ही प्रकार से । विपरीत व्यवस्था के अनुसार । विरुद्ध न्याय से । जैसे, —(क) उलटा चोर कोतवाल को डाँटै । (ख) तुम्हीं ने काम बिगाड़ा, उलटा मुझे दोष देते हो ।

उलटा ^३ संज्ञा पुं॰

१. एक पकवान । पपरा । पोपरा । विशेष—यह चने या मचर के बेसन से बनाया जाता है । बेसन को पानी में पतला घोलते हैं, फिर उसमें नमक हल्दी, जिरी आदि मिलाते हैं । जब तवा गरम हो जाता है तब उपसपर घी या तेल डालकर घोले हुए बेसन को पतला फैला देते हैं । हैं । जब यह सुखकर रोटी की तरह हो जाता है तब उलटकर उतार लेते हैं ।

२. एक पकवान । गोझा । विशेष—यह आटे और उरद की पीठी से बनता है । आटे का चकवा बनाते हैं फिर उसमें पीठी भरकर दोमड़ देते हैं । इससे पानी की भाप से पकाते हैं ।

३. विपरीत ।

उलटा पलटी संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ उलटा+पलटी=पलटने या फेरने का कार्य]

१. फेर फार करना । अदल बदल । इधर का उधर होना । नीचे ऊपर होना । उ॰—थहरात उऱोजन के उपरा हियाहार करै उलटा पलटी (प्रत्य॰) ।

उलटा पुलटा † वि॰ [हिं॰ उलटा+पुलटा] दे॰ 'उलटा पलटा' ।

उलटा पुलटी् † वि॰ [हिं॰ उलटा+पुलटी] [पलटने या फेरने का कार्य] दे॰ 'उलटा पुलटा' । उ॰—(क) उलटा पुलटी बजै सो तार । काहुहि मारै काहुहि उबार ।—कबीर (शब्द॰) । (ख) सखी तुम बात कही यह साँची । तमुहीं उलटी कहौं, तुमहिं पुलटी कहौं तुमहिं रिस करति मैं कछु न जानौं ।—सूर (शब्द॰) ।