उल्लू

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

उल्लू संज्ञा पुं॰ [सं॰उलूक]

१. दिन में न देखनेवाला एक पक्षी । कुचकुचवा । कुम्हार का डिंगरा । खूसट । विशेष—यह प्रायः भूरे रंग का होता है । इसका सिर बिल्ली की तरह गोल और आँखें भी उसी की तरह बडी़ और चमकीली होती हैं । संसार में इसकी सैकडों जातियाँ हैं, पर प्रायः सब की आँखों के किनारे पर भौंरी के समान चारों और ऊपर को फिरे होते हैं । किसी किसी जाति के उल्लू के सिर पर चो़टी होती है और किसी किसी के पैर में अँगुलियों तक पर होते हैं । ५ इंच से लेकर २ फुट तक ऊँचे उल्लू संसार में होते हैं । उल्लू की चोंच कँटिए की तरह टेढी और नुकीली होती है । किसी किसी जाति के कान के पास के पर ऊपर को उठे होते हैं । सब उल्लुओं के पर नरम और पंजे दृढ़ होते हैं । ये दिन को छिपे रहते हैं और सूर्यास्त होते है उड़ते हैं और छोटे बडे़ जानवरों और कीडे़ मकोडों को पकड़कर अपना पेट भरते हैं । इसकी बोली भायवनी होती है और यह प्रायः ऊजड़ स्थानों में रहता है । लोग इसकी बोली बुरा समझते हैं और इसका घर में या गाँव में रहना अच्छा नहीं मानते । तांत्रिक लोग इसके मांस का प्रयोग उच्चाटन आदि प्रयोगों में करत हैं । प्रायः सभी देश और जातिवाले इसे अभक्ष्य मानते हैं । मुहा॰—उल्लू का गोश्त खिलाना= बेवकूफ बनाना । मूर्ख, बनाना । विशेष—लोगों की धारण है कि उल्लू का मांस खाने से लगो मूर्ख हो जाते या गूँगे बहरे हो जाते हैं । उल्लू बनाना= किसी को बेवकूफ साबित करना । उ॰— हम तुम मिल जाय तो पौ बारह है । इनको मिल के उल्लू बनाओ ।— फिसाना॰, पृ॰ १६५ । उल्लू बोलना= उजाड़ होना । उजड़ जाना । उ॰— किसी समय यहाँ उल्लू बोलेंगे (शब्द॰) ।

२. निर्बुद्धि । बेवकूफ । मूर्ख । क्रि॰ प्र॰—करना ।— बनना ।—बनाना । —होना ।