ऊजर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ऊजर ^१ पु वि॰ [सं॰ उज्ज्वल, प्रा॰ उज्जल] दे॰ 'उजला' । उ॰— कबिरा पाँच बलधिया ऊजर जाहिं । बलिहारी वा दास की, पकरि जो राखै बाहिं । —कबीर सा॰ सं॰, भा॰ १, पृ॰ २२ ।

ऊजर ^२पु वि॰ [हिं॰ उजड़ना] उजाड़ । उजड़ा हुआ । बिना बस्ती का । उ॰—(क) ऊधौ कैसे जीवै कमलनयन बिनु । तब तौ पलक लगन दुख पावत अब जो निरषि भरि जात अंग छिनु । जो ऊजर खेरे के देवन को पूजै को मानै । तो हम बिनु गोपाल भए ऊधो क प्रीति को जानै । —सूर (शब्द॰) ।