ऊन

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ऊन ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ ऊर्ण] भेड़ बकरी आदि का रोयाँ । भेड़ के ऊपर का वह बाल जिससे कंबल और पहनने के गरम कपड़े बनते हैं । विशेष—भारतवर्ष में उत्तराखंड वा हिमालय के तटस्थ देशों की भेड़ों का ऊन होता है । काश्मीर और तिव्वत इसके लिये प्रसिद्ध हैं । पंजाब, हजारा और अफगानिस्तान की कोच वा अरल नाम की भेड़ का भी ऊन अच्छा होता है । गढ़वाल, नैनीताल, पटना, पोयंबटूर और मैसुर आदि की भेड़ों से भी बढ़िया ऊन निकलता है । ऊन और बाल में भेद यह है कि ऊन के तागे यों ही बहुत बारीक होते हैं अर्थात् उनका घेरा एक इंच हजारवें भाग से भी कम होता है । इसके अतिरिक्त उनके ऊपर बहुत सी सूक्ष्म दिउली वा पतं (जो एक इंच में ४००० तक आ सकती हैं) होती हैं । किसी कारण अच्छे ऊन की जो लोई आदि होती है उनके ऊपर थोड़े दिन के बाद महीन महीन गोल रवे से दिखाई पड़ने लगते हैं । प्रायः बहुत सी भेड़ों में ऊन और बाल मिला रहता है । ऊन की उत्तमता इन बातों से देखी जाती है—रोएँ की बारीकी, उसकी गुरुचन, उसका दिउलीदर होना, उसकी लंबाई, मजबूती, मुलायमियत और चमक । भेड़ के चमड़े की तह में से एक प्रकार की चिकनाई निकलती है जिससे ऊन मुलायम रहता है । कश्मीर, तिब्बत और नैपाल आदि ठंडे देशों में एक प्रकार की बकरी होती है जिसके रोएँ के नीचे की तह में पशम या पशमीना होता है । इसी को काश्मीर में 'असली तूस' कहते हैं जो दुशाले आदि में दिया जाता है ।

ऊन ^२ वि॰ [सं॰] १ कम । न्यून । थोडा़ ।

२. तुच्छ । हीन । नाचीज । क्षुद्र ।

ऊन ^३ संज्ञा पुं॰ मन छोटा करना । खेद । दुःख । ग्लानि । रंज । उ॰—(क) अस कस कहहु मानि मन ऊना । सुख सुहाग तुम कहँ दिन दूना । —तुलसी (शब्द॰) । (ख) जनि जननी मानहु मन ऊना । तुमतें प्रेम राम के दूना । —तुलसी (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—मानना=दुख मानना । रंज मानना । उ॰—सुनु कपि जिय मानसि जनि ऊना । तै मम प्रिय लछिमन तें दूना ।—तुलसी (शब्द॰) ।