ओछा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ओछा वि॰ [सं॰ तुच्छ, प्रा॰ उच्छ] [स्त्री॰ ओच्छी]

१. जो गंभीर न हो । जो उच्चाशय न हो । तुच्छ । क्षुद्र । छिछोरा । बुरा । खोटा । उ॰—(क) ये उपजे ओछे नक्षत्र के लंपट भए बजाइ । सूर कहा तिनकी संगति जे रहे पराएँ जाइ ।—सूर॰ १० ।२३९६ । (ख) ओछे बडे़ न ह्वै सकैं लगौं सतर ह्वै गैन । दीरघ होहिं न नैकहूँ फारि निहारे नैन ।—बिहारी र॰, दो॰९० । यौ॰—ओछी कोख=ऐसी कोख या पेट जिससे जनमें लड़के न जिएँ । ओछी नजर=अदूरदर्शिता । हल्की निगाह । निम्न विचार । उ॰—दिल साजना दुमेल, नीचे संग ओछी नजर ।— बाँकी॰ ग्रं॰, भा॰ १, पृ॰ ६१ ।

२. जो गहरा न हो । छिछला । उ॰—देवलि जाँउँ तौ देवी देखौं तीरथ जाउँ त पाँणी । ओछी बुद्धि अगोचर बाँणी नहीं परंम गति जाणी ।—कबीर ग्रं॰ पृ॰ १५४ ।

३. हल्का । जोर का नहीं । जिसमें पूरा जोर न लगा हो । जैसे,—ओछा हाथ पड़ा नहीं तो बचकर न निकल जाता । उ॰—सहसा किसी ने उसके कंधे पर छुरी मारी, पर वह ओछी लगी ।—कंकाल, पृ॰ १७८ ।

४. छोटा । कम । जैसे,—ओछा अँगरखा,ओछी पूँजी । उ॰—या बाई ने बस्तू बडी़ पाई है और पात्र तो ओछो है ।—दो सौ बावन॰, भा॰ १, पृ॰ ३१७ ।