कपूर

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

कपूर संज्ञा पुं॰ [सं॰कर्पूर, पा॰ कप्पूर, जावा कापूर] एक सफेद रंग का जमा हुआ सुगधिंत द्रव्य जो वायु में उड़ जाता है और जलाने से जलता है । विशेष—प्राचिनों से अनुसार कपूर दो प्रकार का होता है । एक पक्व दूसरा अपक्व । राजनिघंटु और निघंटुरत्नाकार में पोतास, भामसेन, हिम इत्यादि इसके बहुत भेद माने गए हैं और इनके गुण भी अलग अलग लिखे हैं । कवियों और साधारण गवाँरो का विश्वास है की केले में स्वाती की बूंद पडने से कपूर उत्पन्न होता है । जायसी ने पद्मावत में लिखा है—'पड़े धरनि पर होय कचूरू । पडे़ कदलि मँह होय कपुरूँ' । आजकल कपूर कई वृक्षों से निकाला जोता है । ये सबके सब वृक्ष प्रायः दारचीनी के जाति के हैं । इनमें प्रधान पेड़ दारचीनी कपूरी मियाने कद का सदाबहार पेड़ है जो चीन, जापान, कोचीन और फारमूसा (ताइवान) में होता है । अब इसके पेड़ हिंदुस्तान में भी देहरादून और निलगिरि पर लगाए गए हैं और कलकत्ते तथा सहारनपुर के कंपनी बागों में भी इनके पेड़ हैं । इससे कपूर निकालने की विधी यह है—इसकी पतली पतली चैलीयों और डालियों तथा जड़ों के टुकडे़ बंद बर्तन में जिससे कुछ दूर तक पानी भरा रहता है, इस ढंग से रखे जाते हैं की उनका लगाव पानी से न रहे । बर्तन के नीचे आग जलाई जाती है । आँच लगने से लकड़ियों में से कपूर उड़कर ऊपर के ढक्कन में जम जाता है । इसकी लकड़ी भी संदूक आदि बनाने के काम में आती है । दालचीनी जीलानी—इसका पेड़ उँचा होता है । यह दक्खिन में कोंकन से दक्खिन पश्चिमी घाट तक और लंका, टनासरम, बर्मा आदि स्थानों में होता है । इसका पत्ता तेजपात और छाल दारचीनी है । इससे भी कपूर निकलता है । बरास—यह बोर्निया और सुमात्रा में होता है और इसका पेड बहुत उँचा होता है । इसके सौ वर्ष से अधीक पुराने पेड़ के बीच से तथा गाँठो में से कपूर का जमा हुआ डला निकलता है और छिलकों के नीचें से भी कपूर निकलता है । इस कपूर को बरास, भीमसेनी आदि कहते हैं और प्राचीनों ने इसी को अपक्व कहा है । पेड़ में कभी कभी छेव लगाकर दूध निकलते हैं जो जमकर कपूर हो जाता है । कभी पुराने की पेड़ की छाल फट जाती है और उससे आप से आप दूध निकलने लगता है जो जमकर कपूर हो जाता है । यह कपूर बाजारों में कम मिलता है और महँगा बिकता है । इसके अतिरिक्त रासायनिक योग से कीतने ही प्रकार के नकली कपूर बनते हैं । जापान में दारनी कपूरी की तेल से (जो लकड़ियां पानी में रखकर खींचकर निकाला जाता है) एक प्रकार कपूर का बनाया जाता है । तेल भूरे रंग का होता है और वार्निश का काम आता है । कपुर स्वाद में कडुआ, सुगंध में तीक्ष्ण और गुण में शीतल होता है । यह कृमिघ्न औऱ वायुशोधक होता है और अधिक मात्रा में खाने से विष का काम करता है । पर्या॰—घनासार । चंद्र । सिताभ । महा॰—कपूर खाना = विष खाना । उ॰—बूडे़ जलजात कूर कदली कपूर खात दाडि़म दरिक अंग उपमा न तौलै री । तेरे स्वास सौरभ को त्रिविध समीर धीर विविध लतान तीर बन बन डोलै री ।—बेनी प्रवीन (शब्द॰) ।