कबूतर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

कबूतर संज्ञा पुं॰ [फा॰ तुलनीय सं॰ कपोत] [स्त्री॰ कबूतरी] एक पक्षी । विशेष—यह कई रंगो का होता है और इसके आकार भी कुछ भिन्न भिन्न होते हैं । पैर में तीन उँगलियाँ आगे और एक पीछे होती हैं । यह अपने स्थान को अच्छी तरह पहचानता है और कभी भूलता नहीं । यह झुंड में चलता है । मादा दो अंडे देती है । केवल हर्ष के समय यह गुटरूगुँ का अस्पष्ट स्वर निकलता है । पीड़ा के तथा और दूसरे अवसरों पर नहीं बोलना । इसे मार भी डालें तो यह मुँह नहीं खोलता । गिरहबाज, गोला, लोटना, लक्का, शीराजी, बुगदादी इत्यादि इसकी बहुत सी जातियाँ होती हैं । शिखावाले कबूतर भी होते हैं । गिरबबाज कबूतरों से लोंग कभी कभी चिट्ठी भेजने का भी काम लेते हैं । क्रि॰ प्र॰—उड़ाना=कबूतरबाजी करना ।