कलेजा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

कलेजा संज्ञा पुं॰ [सं॰ यकृत, (विपर्यय) कृत्य, कृज्ज]

१. प्राणियों का एक भीतरती अवयब । विशेष—यह छाती के भीतर बाई ओर को फैला हुआ होता है और इससे नाड़ियों के सहारे शरीर में रक्त का संचार होता है । यह पान के आकार की मांस की थैली की तरह होता है जिसके भीतर रुधिर बनकर जाता है और फिर उसके ऊपरी परदे की गति या धड़कन से दबकर नाड़ियों में पहुचता और सारे शरीर में फैलता है । मुहा॰—कलेजा उछलना=(१) दिल धड़कना । घबड़ाहट होना । (२) हृदय प्रफुल्लित होना । कलेजा उछल उछल पड़ना=आनंद विभोर होना । उ॰—हैं उमंगें छलाँग सी भरतीं है कलेजा उछल उछल पड़ता ।—चोखे॰, पृ॰ ८ । कलेजा उड़ना= होश जाता रहना । घबड़ाहट होना । कलेजा उलटना= (१) कै करते करते आँतों में बल पड़ना । वमन करते करते जी घबराना । (२) होश का जाता रहना । कलेजा काटना=(१) हीरे की कनी या और किसी विष के खाने से अँतडियों में छेदन होना । (२) मल के साथ रक्त गिरना । खूनी दस्त आना । (३) दिल पर चोट पहुँचना । अत्यंत हार्दिक कष्ट पहुँचना, जैसे—उनकी दशा देख किसका कलेजा नहीं कटता । (४) बुरा लगना । नागवार लगना । जब मालूम होना, जैसे—पैसा खर्च करते उसका कलेजा कटता है । (५) दिल जलना । डाह होना । हसद होना । जैसे—उसे चार पैसा पाते देख तुम्हारा कलेजा क्यों कटता है । कलेजा काँपना=जी दहलना । डर लगना, जैसे—नाव पर चढ़ते हमारा कलेजा काँपता है । कलेजा काढ़कर रखना=दे॰ 'कलेजा निकालकर रखना' । कलेजा काढ़ना=(१) दिल निकालना । अत्यंत वेदना पहुँचाना । उ॰—आँख तो आप काढ़ते ही थे । अब लगे काढ़ने कलेजा क्यों ।—चोखे, पृ॰ ६२ । (२) किसी की अत्यंत प्रिय वस्तु ले लेना । किसी का सर्वस्व हरण करना । कलेजा काढ़ लेना=(१) हृदय में बेदना पहुँचाना । अत्यंत कष्ट देना । (२) मोहित करना । रिझाना । (३) चोटी की चीज निकाल लेना । सबसे अच्छी वस्तु को छाँट लेना । सार वस्तु ले लेना । (४) किसी का सर्वस्व हरण कर लेंना । कलेजा काढ़ के देना=(१) अपनी अत्यंत प्यारी वस्तु देना । (२) सूम का किसी को अपनी वस्तु देना (जिससे उसे बहुत कष्ट हो) । कलेजा खाना=(१) बहुत तंग करना । दिक करना । (२) बार बार तकाजा करना । जैसे—वह चार दिन से कलेजा खा रहा है, उसका रुपया आज दे देंगे । कलेजा खिलना=किसी को अत्यंत प्रिय वस्तु देना । किसी का पोषण या सत्कार करने में कोई बात उठा न रखना, जैसे,—उसने कलेजा खिला खिलाकर उसे पाला है । कलेजा खुरचना=(१) बहुत भूख लगना, जैसे—मारे भूख के कलेजा खुरच रहा है । (२) किसी प्रिय के जाने पर उसके लिये चिंतित और व्याकुल होना, जैसे—जब से वह गया है, तब से उसके लिये कलेजा खुरच रहा है । कलेजा गोदना=दे॰ कलेजा छेदना या बींधना । कलेजा छिदना या बिंधना=कड़ी बातों से जो दुखना । ताने मेहने से हृदय व्यथित होना, जैसे,—अब तो सुनते, सुनते कलेजा छिद गया, कहाँ तक सुनें । कलेजा छेदना या बींधना=कट ु वाक्यों की वर्षा करना । लगती बात कहना । ताने मेहने मारना । कलेजा छलनी होना=दे॰ 'कलेजा छिदना या बिंधना' । कलेजा जलना=(१) अत्यंत दुःख पहुँचाना । कष्ट पहुँचना । (२) बुरा लगना । अरुचिकर होना । कलेजा जलाना=दुःख देना । दुःख पहुँचाना । कलेजा जला देना=दे॰ 'कलेजा जलाना' । उ॰—क्या अजब, कवि जला भुना कोई । है कलेजा जला जला देता ।—चोखे॰; पृ॰ १० । कलेजा जली=दुखिया । जिसके दिल पर बहुत चोट पहुँची हो । कलेजा जली तुक्कल=वह तुक्कल जिसके बीच का भाग काला हो । कलेजा टूटना या टुकड़े टुकड़े होना=जी टूटना । उत्साह भंग होना । हौसला न रहना । कलेजा टूक टूक होना=शोक से हृदय विदीर्ण होना । दिल पर कड़ी चोट पहुँचना । कलेजा ठंढा करना= संतोष देना । तुष्ट करना । चित्त की अभिलाषा पूरी करना । जैसे,—उसे देख मैने अपना कलेजा ठंढ़ा किया । कलेजा ठंडा होना=तृप्ति होना । संतोष होना । अभिलाषा पूरी होना । शांति मिलना । चैन पड़ना । कलेजा तर होना= (१) कलेजे में ठंढक पहुँचना । (२) धन से भरे पूरे रहने के कारण निर्द्वंद रहना । कलेजा थामना=दुःख सहने के लिये जी कड़ा करना । शोक के वेग को दबाना । कलेजा थामकर बैठ जाना या रह जाना—(१) शोक के वेग को दबाकर रह जाना । मन मसोसकर रह जाना । जैसे,— जिस समय यह शोकसमाचार मिला, वे कलेजा थामकर रह गए । उ॰—(क) उस समय रवाना अशरते काशाना की तरफ नजर डाली तो महताबी पर उदासी छाई हुई । कलेजा थाम के बैठ गए ।—फिसाना॰, भा॰ ३, पृ॰ ३२४ । (ख) थाम कर रह गए कलेजा हम । कर गया काम आँख का टोना ।—चोखे॰, पृ॰ ४२ । (२) संतोष करना । कलेजा थाम थामकर रोना=(१)मसोस मसोस कर रोना । शोक के वेग को दबाते दबाते रोना । (२) रह रहकर रोना । कलेजा दहलाना=भय से जी काँपना । कलेजा धक धक करना=भय से व्याकुल होना । आशंका से चित्त विचलित होना । केलजा धक्क धक्क करना= दे॰ 'कलेजा धक धक करना' । उ॰—आप जावें, मैं आपको रोक नहीं सकती पर मैं बड़ी अभागिनी हूँ, इसी से मेरा कलेजा धक्क धक्क कर रहा है ।—ठेठ॰, पृ॰ ५२ । कलेजा धक से हो जाना=(१) भय से सहसा स्तब्ध होना । एक- बारगी डर छा जाना । उ॰—हरिमोहन का कलेजा धक से हो गया और उन्होंने लड़खड़ाती जीभ से कहा ।—अयोध्या (शब्द॰) । (२) चकित होना । विस्मित होना । भौंचक्का रहना । उ॰—उसकी बुराई सुनते ही उसका कलेजा धक से हो गया ।—अयोध्या (शब्द॰) । कलेजा घड़कना=(१) डर से जी काँपना । भय से व्याकुलता होंना । (२) चित्त में चिंता होना । जी में खटका होना । कलेजा घड़ घड़ करना= दे॰ 'कलेजा धड़कना' । उ॰—दूसरा अफसर—कलेजा धड़ धड़ कर रहा है ।—फिसाना॰, भाग३, पृ॰ १०५ । कलेजा धड़कना=(१) डरा देना । भयभीत कर देना । (२) खटके में डाल देना । कलेजा धुकड़ पुकड़ होना=दे॰ 'कलेजा धड़कना । कलेजा निकलना । (१) अत्यंत कष्ट होना । आसह्य क्लेश होना । खलना । (२) सार वस्तु का निकल जाना । हीर निकल जाना । कलेजा निकालकर दिखलाना=हृदय की बात प्रकट करना । उ॰—कम नहीं है कमाल कवियों का । हैं कलेजा निकाल दिखलाते—चोखे॰, पृ॰ ८ । कलेजा निकाल घर देना=दे॰ 'कलेजा' निकालकर रखना । उ॰—बेधने के लिये कलेजों को । हैं कलेजा निकाल धर देते ।—चोखे॰, पृ॰ ७ । कलेजा निकलना=दे॰ 'कलेजा काढ़ना' । कलेजा निकालकर रखना=अत्यंत प्रिय वस्तु समर्पण करना । सर्वस्व दे देना । जैसे,—यदि हम कलेजा निकालकर रख दें तो भी तुम्हें विश्वास न होगा । कलेजा पक जाना=कष्ट से जो ऊब जाना । दुःख सहते सहते तंग आ जाना । जैसे,—नित्य के लड़ाई झगड़े से तो कलेजा पक गया । कलेजा पकड़ना=दे॰ 'कलेजा थामना' । कलेजा पकड़ लेना (१) किसी कष्ट को सहने के लिये जी कड़ा कर लेना (२) कलेजे पर भारी बोझ मालूम होना । जैसे—(क) बलगम ने कलेजा पकड़ लिया । (ख) मैदे की पूरीयों ने तो कलेजा पकड़ लिया । कलेजा पकाना=इतना दुःख देना कि जी जल जाय । नाक में दम करना । हैरान करना । पत्थर का कलेजा=(१) कड़ा जी । दुःख सहने में समर्थ हृदय । (२) कठोर चित्त । कलेजा पत्थर का करना=(१) भारी दुःख झेलने के लिये चित्त को दबाना । जैसे,—जो होना था सो हो गया अब कलेजा पत्थर का करके घर चलो । (२) किसी निष्ठुर कार्य के लिये चित्त को कठोर करना । जैसे,—पत्थर का कलेजा करके मुझे उस निरपराध को मारना पड़ा । कलेजा पत्थर का=होना (१) जी कड़ा होना । जैसे,—उसका दुःख सुनकर पत्थर का कलेजा भी पानी होता था । कलेजा फटना=(१) किसी के दुःख को देखकर मन में अत्यंत कष्ट होना । जैसे,—(क) दुखिया माँ का रोना सुनकर कलेजा फटता था । (ख) किसी को चार पैसे पाते दुःख तुम्हारा कलेजा क्यों फटता है । कलेजा फूलना= आनंदित होना । फूल मुँह से झड़े किसी कवि के, है कलेजा न फूलता किसका ।—चोखो॰, पृ॰ ८ । कलेजा बढ़ जाना=(१) दिल बढ़ना । उत्साह और आनंद होना । हौसला होना । उ॰—चढ़ गए चाव चित्त गया चढ़ बढ़ । बढ़ गए बढ़ गया कलेजा है ।—चोखे॰, पृ॰ २२ । कलेजा बाँसों, बल्लियों या हाथों उछलना=(१) आनंद से चित्त प्रफुल्लित होना । आनंद की उमग में फूलना । उ॰—मेरा कलेजा बल्लियों उछलता है । भरी बरसात के दिन हैं । कहीं फिसल न पड़े तो कहकहा उड़े ।—फिसाना॰, भा१, पृ॰ १ । (१) भय या आशंका से जी धक धक करना । कलेजा बैठा जाना=भय या शिथिलता से चित्त का संज्ञाशून्य और व्याकुल होना । क्षीणता के कारण शरीर और मन की शक्ति का मंद पड़ना । कलेजा भरना=तृप्त होना । अघा जाना । उ॰— प्यार से किसका कलेंजा है भरा ।—चोखे॰, पृ॰ १०— ।

कलेजा मलना=दिल दुखाना । कष्ट पहुँचाना । कलेजा मसोस कर रह जाना=कलेजा थामकर रह जाना । दुःख के वेग को रोककर रह जाना । कलेजा मुहँ को मुँह तक आना= (१) जी घबराना । जी उकताना । व्याकुलता होना । उ॰— क्षुधा के संताप से कलेजा मुँह को आता है ।—अयोध्या (शब्द॰) । (२) संताप होना । दुःख से व्याकुल होना । उ॰—इस दुनिया की इन बातों से बटोही का कलेजा मुँह को आ रहा था ।—अयोध्या (शब्द॰) । कलेजा सुलगना=दिल जलना । अत्यंत दुःख पहुँचाना । संताप होना । उ॰—कवि सिवा कौन लग सका उसके है । कलेजा सुलग रहा जिसका ।—चोखे॰, पृ॰ ११ । कलेजा सुलगना=बहुत सताना । अत्यंत कष्ट देना । दिल जलाना । कलेजा हिलना=कलेजा काँपना । अत्यंत भय होना । कलेजे का टुकड़ा=(१) लड़का । बैटा । संतान । (२) अत्यंत प्रिय व्यक्ति । कलेजे की कोर=(१) संतान । लड़का । लड़की । (२) अत्यंत प्रिय व्यक्ति । कलेजे खाई=डाइन । बच्चों पर टोना करनेवाली । कलेजे पर चोट खाना=दुःख होना । क्लेश होना । उ॰—अब तो जान पर बन गई । कलेजे पर चोट खाई है तबीब बेचारा नब्ज क्या देखेगा?—फिसाना॰, भा॰ १, पृ॰ ११ । कलेजे पर चोट लगना=सदसा पहुँचना । अत्यंत क्लेश होना । कलेजे पर छुरी चल जाना=दिल पर चोट पहुँचाना । अत्यंत क्लेश पहुँचाना । कलेजे पर साँप लोंटना=चित्त में किसी बात का स्मरण आ जाने से एक बारणी शोक छा जाना । जैसे,—जब वह अपने मरे लड़के की कोई चीज देखता है, सब उसके कलेजे पर साँप लोट जाता है । (ख) जब वह अपने पुराने मकान को दुसरों के अधिकार में देखता है, तब उसके कलेजे पर साँप लोट जाता है । कलेज पर हाथ धरना या रखना= अपने दिल से पूछना । अपनी आत्मा से पूछना । चित्त में जैसा विश्वास हो, ठीक वैसा ही कहना । जैसे,—तुम कहते हो कि तुमने रुपया नहीं लिया, जरा कलेजे पर तो हाथ रखो । विशेष—यदि कोई मनुष्य कोई दोष या अपराध करता है तो उसकी छाती धक धक करती है । इसी से जब कोई मनुष्य झूठ बोलता है या अपना अपराध स्वीकार करता है, तब यह गुहावरा बोला जाता है । कलेजे पर हाथ घरकर रखकर देखना=अपनी आत्मा से पूछ कर देखना । अपने चित्त का जो यथार्थ विश्वास हो, उसपर ध्यान देना । उ॰—देखना हो अगर दहल दिल की । देखिए हाथ रख कलेजे पर ।—चोखें॰, पृ॰ ६१ । कलेजे में आग लगना=(१) अत्यंत दुःख या शोक होना । (२) डाह होना । द्वेष की जलन होना । (३) बहुत प्यास लगना । कलेजे मे गाँठ पड़ना=मन में भेद पैदा होना । उ॰— तब सके गाँठ हम कहाँ मतलब । पड़ गई गाँठ जब कलेजे में ।—चोखे॰, पृ॰ ३६ । कलेज में छेद करना=अत्याधिक क्लेश पहुँचाना । मार्मिक पीड़ा देना । उ॰—बात से छेद छेद करके क्यों । छेद करदे किसी कलेजे में ।—चोखें॰, पृ॰ २२ । कलेजे में डालना=प्यार से सदा अपने बहुत पास रखना । हृदय से लगाकर रखना । जैसे,—जी चाहता है कि उसे कलेजे में डाल लूँ । कलेजे में डाल लेना=दे॰ 'कलेजे में डालना' उ॰—मनचले नौनिहाल हैं जितने । हम उन्हैं डाल लें कलेजे में ।—चोखे॰, पृ॰, १३ । कलेजे में पैठना या घुसना= किसी का भेद लेने या किसी से अपना कोई मतलब निकालने के लिये उससे खूब ऊपरी हेल मेल बढ़ाना । जैसे—वह इस ढब से कलेजे में पैठकर बातें करता है कि सारी भेद ले लेता है । कलेजे में लगना=कलेजे में अटकना । कलेजे पर भारी मालूम होना । कलेजे या पेट में विकार उत्पन्न करना । जैसे,—(क) पानी धीरे धीरे पीओ नहीं तो कलेजे में लगेगा (ख) देखना यह कई दिनों का भूखा है बहुत सा खा जायगा तो अन्न कलेजे में लगेगा । कलेजे में लगाकर रखना=(१) किसी प्रिय वस्तु को अपने अत्यंत निकट रखना या पास से जुदा न होने देना । बहुत प्रिय करके रखना । (२) बहुत यत्न से रखना ।

२. छाती । वक्षस्थल । मुहा॰—कलेजे से लगाना=छाती से लगाना । आलिंगन करना । प्यार करना । गले लगना । उ॰—दुख कलेजा गया जिन्हें देखे । क्यों लगाएँ उन्हें कलेजे से ।—चोखे॰, पृ॰ ६२ ।

२. जीवट । साहस । हिम्मत । क्रि॰ प्र॰—करना ।—बढ़ना ।

कलेजा पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ कालेय, प्रा॰ कालिज्ज] दे॰ 'कलेजा' । उ॰—भेड़ा रहे बाग अली जा । काढ़ि नित खात कालेजा ।—तुलसी॰ सा॰, पृ॰ २४७ ।