कहीं

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

कहीं क्रि॰ वि॰ [हिं॰ कहाँ] किसी अनिश्चित स्थान में । ऐसे स्थान में जिसका ठीक ठिकाना न हो । जैसे,—वे घर में नहीं हैं, कहीं बाहर गए हैं । मुहा॰—कहीं और = दूसरी जगह । अन्यत्र । जैसे,—कहीं और माँगो । कहीं कहीं = (१) किसी किसी स्थान पर । कुछ जगहों में । जैसे—उस प्रदेश में कहीं कहीं पहाड़ भी हैं । (२) बहुत कम स्थानों में । जैसे,मोती समुद्र में सब जगह नहीं, कहीं कहीं मिलता है । कहीं का = न जाने कहाँ का । ऐसा जो पहले देखने सुनने में न आया हो । बड़ा भारी । जैसे,—उल्लू कहीं का । कहीं का न रहना या होना = दो पक्षों में से किसी पक्ष के योग्य न रहना । दो भिन्न भिन्न मनोरथों में से किसी एक का भी पूरा न होना । किसी काम का न रहना । जैसे,—वे कभी नौकरी करते, कभी रोजगार की धुन में रहते, अंत में कहीं के न हुए । उ॰—बुढ़ा आदमी हूँ, इस बुढ़ौतौ में कलंक का टीका लगे तों कहीं का न रहूँ ।—फिसाना॰, भा॰३, पृ॰ ११६ । कहीं न कहीं = किसी स्थान पर अवश्य । जैसे,—इसी पुस्तक में ढूँढों, कहीं न कहीं वह शब्द मिल जायगा । कहीं का कहीं = (१) एक ओर से दूसरी ओर । दूर । जैसे,—वह जंगल में भटककर कहीं के कहीं जा निकले । (२) (प्रश्न रूप में और निषेधार्थक) नहीं । कभी नहीं । जैसे,—(क) कहीं ओस से भी प्यास बुझती हैं? (ख) कहीं बंध्या को भी पुत्र होता है? (आशंका और इच्छासूचक) (३) कदाचितय़ यदि । अगर । जैसे,—(क) कहीं वह आ गया तो बड़ी मुशकिल होगी । (ख) इस अवसर पर कहीं वे आ जाते तो बड़ा आनंद होता । कहीं .... न = (आशंका और आशा सूचित करने के लिये ऐसा न हो के । जैसे,—(क) देखना, कहीं तुम भी न वही ं रह जाना । (ख) कहीं वह आ न जाय । (ग) देखी कहीं वे ही न आ रहे हों, जिनका आसरा देख रहे हो । (इस मुहावरे में या तो भावरूप में क्रियाएँ आती है अथवा संदिग्ध भूत, संभाव्य भविष्यत् आदि संभावनासूचक क्रियाएँ आती है) कहीं ... तो नहीं=(प्रश्न के रूप में आशंका और आशा सूचित करने के लिये) जैसे,—कहीं वह रास्ता तो नहीं भूल गया? (इस मुहावरे में प्राय: सामान्यभूत, सामान्य भविष्यत् और सामान्य वर्तमान क्रियाएँ आती हैं ।

४. बहुत अधिक । बहुत बढ़कर । जैसे,—यह चीज उससे कहीं अच्छी है ।