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का

विक्षनरी से

परसर्ग

का

  1. षष्ठी विभक्ति का चिह्न

उदाहरण

  • आम का दाम क्या है?
  • राम की तरफ़ देखो।

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

का नाम जिसे श्रीकृष्णचंद्र ने मारा था । वृषभासुर ।

१६. अनिष्टसूचक उत्पात; जैसे भूकंप आदि ।

१७. बलि का पुत्र, एक दैत्य ।

१८. मट्ठा । तक ।

१९. सौरी । सूतिकागृह । २०, कौटिल्य के अनुसार एक प्रकार का असंहत व्यूह जिसमें रथ बीच में, हाथी कक्ष में और घोड़े पृष्ठ भाग में रहते थे ।

का नाशा करनेवाला है । इसके बीज से दूध जम जाता है । इससे कई प्रसिद्ध आयुर्वेदीक औषध बनते हैं, जैसे-द्मश्वगंधाघृत, अश्वगंधारिष्ट आदि ।

का उपस्थान या प्राप्ति है ।

३. जैनशास्त्रनुसार अदत्तदान का त्याग करना । चोरी न करने का व्रत ।

का ^१ प्रत्य॰ [सं॰ क, जैसे—वासुदेवक, स्थानिक अथवा सं॰, कृते, प्रा॰ केर, केरक, अप॰ पु † अप॰ कर, भोज॰ क, कर आदि अथवा सं॰ * कक्षे या कक्ष, प्रा॰ कच्छ, कक्ख, अप॰, कहु, कह आदि] संबंध था षष्ठी का चिह्यन; जैसे,—राम का घोड़ा । उसका घर । विशेष—इस प्रत्यय का प्रयोग दो शब्दों के बीच अधिकारी अधिकृत (जैसे,—राम की पुस्तक), अधार आधेय (जैसे,—ईख का रस, घर की कोठरी), अंगांगी (जैसे,—हाथ की उँगली), कार्य कारण (जैसे,—मिट्टी का घड़ा), कर्तृ कर्म (जैसे,— बिहारी की सतसई) आदि अनेक भावों को प्रकट करने के लिये होता है । इसके अतिरिक्त सादृश्य (जैसे,—कमल के समान), योग्यता (जैसे, —यह भी किसी से कहने की बात है ?) समस्तता (जैसे,—गाँ के गाँव बह गए) आदि दिखाने के लिये भी लइसका व्यवहार होता है । तद्धित प्रत्यय 'वाला' के अर्थ में भी षष्ठी विभक्ति आती है, जैसे, वह नहीं आने का । षष्ठी विभक्ति का प्रयोग द्वितीया (कर्म) और तृतीया (करण) के स्थान पर भी कहीं कहीं होता है, जैसे, रोटी का खाना, बंदुक की लड़ाई । विभक्तियुक्त शब्द के साथ जिस दूसरे शब्द का संबंध होता है, यदि वह स्त्रीलिंग होता है तो 'का' के स्थान पर 'की' प्रत्यय आता है ।

का ^२ † सर्व॰ [सं॰ क:, या किम् या किमिति]

१. क्या । उ॰—का क्षति लाभ जीर्ण धनु तोरे—तुलसी (शब्द॰) ।

२. ब्रज भाषा में कौन का वह रूप जो उसे विभक्ति लगने के पहले प्राप्त होता है; जैसे,—काको, कासों । उ॰—कहो कौशिक, छोटो सो ढोटो है काको ?—तुलसी (शब्द॰) ।

का ^३पु † संज्ञा पुं॰ [हिं॰ काका का सक्षिप्त रूप] दे॰ 'काका' । उ॰—पंच राइ पंचाल, लिन्न बैराट बद्धवर । जैतसिंह भोंहा भुआल का कन्ह नाह नर ।—पृ॰ रा॰, २१ । ५५ ।

का ^२ क्रि॰ स॰ [सं॰ कृत, प्रा॰, किय] हिं॰ 'करना के भूतकालिक रूप 'किया' का स्त्री॰ । जैसे,—उसने बड़ी सहायता की ।

का समूह । तीन मुख्य प्रकृतियों का समूह । दे॰ 'गुण' । उ॰—त्रिगुण अतीत जैसे, प्रतिबिंब मिटि जात ।—संत- वाणी॰, पृ॰ ११५ ।