काँच

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

काँच ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ कक्ष, प्रा॰ कच्छ]

१. धोती का वह छोर जिसे दोनों जाँघों के बिच से ले जाकर पीछे खोंसते हैं । लाँग । क्रि॰ प्र॰ — बाँधना । — खोलना । मुहा॰ — काँच खोलना = (१) प्रसंग करना । उ॰ कामी से कुता भला रितु सर खोले काँच । राम नास जाना नहिं भावी जाय न बाँच । — कबिर (शब्द॰) । (२) हिम्मत छोड़ना । साहस छोड़ना । बिरोध करने में असमर्थ होना ।

३. गुदेंद्रिय के भीतर का भाग । गुदाचक्र । गुदावर्त । क्रि॰ प्र॰—निकलना = काँच का बाहर आना । विशेष — एक रोग जिसमें कमजोरी आदि के कारण पाखाना फिरते समय काँच बाहर निकल आती है । यह रोग प्राय: दस्त की बीमारीवाले को हो जाता है । मुहा॰ — काँच निकलना = (१) किसि श्रम या चोट के सहने में असमर्थ होना । किसि आघात या परिश्रम से बुरी दशा होना । जैसे — (क)मारेंगे काँच निकल आवेगी । ( ख) इस पत्थर को उठाऔ तो काँच निकल आवे । काँच निकलना = (१) अत्यंत चोट या कष्ट पहुँचाना । बेदम करना । (२) बहुत अधिक परिश्रम लेना ।

काँच ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ काच] एक मिश्र पदार्थ जो बालू और रेह या खारी मिट्टी को आग में गलाने से बनती है और पारदर्शक होती है । उ॰ काँच किरच बदले सठ लेहीं । कर तें डारि परसमणिं देहीं । — तुलसी (शब्द ॰) । विशेष — इसकी चूडी, बोतल, दर्पण आदी बहुत सी चीजें बनती हैं । यह कडा़ और बहुत कड़कीला होता है , इससे थोडी चोट से भी टूट जाता है । इसे बोलचाल में शीशा बी कहते हैं ।