काँटा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

काँटा ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ कण्टक , प्रा ॰ कंटय , कंटग ] [वि॰ कँटीला ]

१. किसी किसी पेड़ की डालियों और टहनियों में निकले हुए सुई की तरह के नुकिले अंकुर जो पुष्ट होने पर बहुत कडे़ हो जाते हैं । कंटक । उ॰ — रोयँ रोयँ जन लागहिं चाँटे । सूत सूत बेधे जनु काँटे । — जायसी (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—गड़ना । —चुभना ।— धँसना ।—निकलना ।— लगना । मुहा॰ — काँटा निकालना = (१) बाधा या कष्ट दूर होना । चैन होना । आराम होना । (२) खटका मिटना । काँटा निका- लना = (१) बाधा या कष्ट दूर करना । (२) खटका मिटाना । रास्ते में काँटा बिछाना = अड़चन डालना । विघ्न करना । बाधा डालना । रास्ते का काँटा = विघ्नरूप । बाधास्वरूप । काँटा बखेरना = कठिनाइयाँ पैदा करना । उ॰ — जो सदा हैं बखेरते काँटे । दे सके वे न फूल के दोने । — चुभते॰, पृ॰ ५२ । काँटा बोना = (१) बुराई करना । अनिष्ट करना । उ॰— जो तोको काँटा बुवै ताहि बोउतू फूल । — कबीर ( शब्द॰) । (२) अड़चन डालना । उपद्रव मचाना । अपने लिये काँटा बोना = अपने हित की हानि करना । काँटा सा = कंटक के समान दु:खदायी । खटकनेवाला । काँटा सा खटकना = अच्छा नलगना । दु:खदायी होना । आँखों में काँटा सा खटकना = बुरा लगना । नागवार लगना । असहा होना । काँटा सा होना = बहुत दुबला होना । ठठरी ही ठठरी । रह जाना । काँटा होना = (१) दुबला होना । सूखकर ठठरी ही ठठरी रह जाना । (२) सूखकर कडा़ हो जाना । जैसे, — चाशनी काँटा हो गई । काँटे पर की ओस = क्षणभंगुर वस्तु । थोडे़ दिन रहनेवाली चीज । काँटों में घसीटना = किसी की इतनी अधिक प्रशसा या आदर करना जिसके योग्य वह अपने को न समझे । (जव कोई मित्र या श्रेष्ठ पुरुष किसी की बहुत प्रशंसा या आदर करता है, तब वह नम्रता प्रकट करने के लिये कहता है कि 'आप तो मुझे काँटों में घसीटते हैं ' । ) काँटों पर लोटना = (१) दुःख से तड़पना । बेचैन होना । तिलमिलाना । (२) डाह से जलना । ईर्ष्या से व्याकुल होना । काँटों पर लोटाना = दुःख देना । सताना । ईर्ष्या से व्याकुल होना । करना । (२) डाह से जलाना । काँटों में फूल चुनना = दोषों में गुण ग्रहण करना । दोनो के बीच गुण देखना । उ॰ — लोग काँटों में फूल चुनते हैं । — चुभते॰, पृ ६ ।

२. वह काँटा जो मोर, मुर्गे , तीतर आदि पक्षियों की नर जातियों के पैरो में पंजे के ऊपर निकलता है । ईससे लड़ते समय वे एक दूसरे को मारते हैं । खाँग । क्रि॰ प्र॰—मारना ।

३. काँटा जो मैना आदि पक्षियों के गले में निकलता है । विशेष —यह एक रोग है जिससे पक्षी मर जाते हैं । पालतू मैना का काँटा लोग निकालते हैं । मुहा॰ —काँटा लगना— पक्षी को काँटे का रोग होना ।

४. छोटी छोटी नुकीली और खुरखुरी फुंसियाँ जो जीभ में निकलती हैं । मुहा॰ —जीभ या गले में काँटे पडना = अधिक प्यास से गला सूखना ।

५. [स्त्री॰ अल्पा काँटी ] लोहे की बडी कील चाहे वह झुकी हो या सीधी । क्रि॰ प्र॰— गाड़ना । — जड़ना । — ठोंकना । — बैठाना । — लगाना ।

६. मछली पकड़ने की झुकी हुई नोकदार अँकुडी़ या कटिया । मुहा॰ — काँटा डालना या लगाना = मछली फँसाने के लिये काँटे को पानी में डालना ।

७. लोहे की झुकी हुई अँकुडियों का गुचछा जिसे कुएँ में डालकर गिरे हुए लोटे या गगरे आदि को निकालते हैं । क्रि प्र॰—डालना ।

८. सुई या कील की तरह की कोई नुकीली वस्तु । जैसे, साही की पीठ का काँटा, जूते की एँजी का काँटा ( जिससे घोडे को एँड लगाते हैं ) ।

९. एक झुका हुआ लोहे का काँटा जिसमें तागे का फँसाकर पटहार या पटवा गुहने का काम करते है ।

१०. वह सुई जो लोहे की तराजू की डाँडी की पीठ पर होती है और जिससे दोनों पलडों के बराबर होने की सूचना मिलती है । विशेष — यदि काँटा ठीक सीधा खडा़ होगा तो समझा जायगा कि पलडे़ बराबर हैं । यदि कुछ झुका हुआ या तिरछा होगा, तो समझा जायगा कि कि बराबर नहीं हैं ।

११. वह लोहै का तराजू जिसकी डाँडी़ पर काँटा होता है । विशेष — इससे तौल ठीक ठीक मालूम होती है । मुहा॰— काँटे की तौल होना = न कम न वेश होना । ठीक ठीक होना । काँटे में तुलना = महँगा होना । गिराँ होना ।

१२. नाक में पहनने का एक आभूषण । कील । लौंग ।

१३. पंजे के आकार का धातु का बना हुआ एक औजार जिससे अंग्रेज लोग खाना खाते है ।

१४. लकडी का एक ढाँचा जिससे किसान घास भूसा उठाते हैं । बैशाखी । अखानी ।

१५. सूआ । सूजा ।

१६. घडी़ की सूई ।

१६. गणित में गुणन के फल के शुद्धाशुद्ध की जाँच की एक क्रिया जिसमें एक दूसरे को काटती हुई तो लकीरें बनाई जाती हैं । विशेष — गुण्य के अकों को जोड़कर ९ से भाग देते हैं अथवा एक एक अंक लेकर जोड़ते और उसमें से ९ घटाते जाते हैं । फिर जो बचता है, उसे काटनेवाली लकीरों के एक सिरे पर रखते हें । पिर इसी प्रकार गुणक के अंकों को लोकर करते हैं , जो फल होता है, उसे लकीर के दूसरे सिरे पर रखते है, फिर ईन दोनों आमने सामने के सिरों के अंकों को गुणते हैं और इसी प्रकार ९ से भाग देकर शेष को दूसरी लकीर के एक सिरे पर रखते हैं । अब यदि गुणन फल के अंकों को लेकर यही क्रिया करने से दूसरी लकीर के दूसरे सिरे पर रखने के लिये वही अंक आ जाय, तो गुणनफल ठीक समझना चाहिए । जैसे, — /?/२८४ ? १२ = ३४०८ परीक्ष्य । २ + ८ +४ = १४ ? ९ = शेष ५ लकीर के एक सिरे पर । १+ २ = ३ (९ का भाग नहीं लगता ) दूसरे सिरे पर । ५?३ = १५ ? ९ शेष ६, दूसरी लकीर के एक सिरे पर । ३ +४ + ८ = १५ ? ९ शेष ६ दूसरे सिरे पर । १८ । वह क्रिया जो किसी गणित की शुद्धि की परीक्षा के लिये की जाय ।

१९. वह कुश्ती जिसमें दोनों पक्ष मिलकर न लडें , बल्कि प्रतिद्वंद्विता के भाव से लडें ।

२०. दरी की बीनावट में उसके बेल बूटे का एक भेद जिसमें नोक निकली होती हैं ।

२१. एक प्रकार की आतशबाजी ।

२२. झाड़ या फानूस टाँगने या लटकाने की बंसी की तरह बडी कँटिया ।

२३. मछली की हड्डी ।

काँटा ^२ † संज्ञा पुं॰ [सं॰ कण्ठ , या उपकण्ठ हिं॰ काँठा ] जमुना के किनारे की वह निकम्मी भूमि जिसमें कुछ उपजता नहीं ।