केतु

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

केतु ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. ज्ञान

२. दीप्ति । प्रकार ।

३. ध्वजा । पताका ।

४. निशान । चिह्न ।

५. पुराणानुसार एक राक्षस का कबंध । विशेष—यह राक्षस समुद्रमंथन के समय देवताओं के साथ बैठकर अमृतपान कर गया था । इसलिये विष्णु भगवान् ने इसका सिर काट डाला । पर अमृत के प्रभाव से यह मरा नहीं और इसका सिर राहु और कबांध केतु हो गया । कहा है इसे सूर्य और चेद्रमा ही ने पहचाना था; इसीलिये यह अबतक ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा को ग्रसता है ।

६. एक प्रकार का तारा जिसके प्रकाश की पुँछ जिखाई देती है । यह पुच्छल तारा कहलाता है । उ॰—कह प्रभु हँसि तनि हृदय डेराहू । लूक न असनि केतु नहि राहू ।—तुलसी (शब्द॰) । विशेष—इस प्रकार के अनेक तांरे हैं, जो कभी कभी रात को झाड़ की तरह भिन्न भिन्न आकार के दिखाई देते हैं । भारतीय ज्योतिषियों में इनकी संख्या के विषय में मतभेद है । कोई हजार, कोई १०१ कोई कुछ, कोई कुछ मानता है । नारदी जी का मत है कि केतु एक ही है और वही भिन्न भिन्न रूप का दिखाई पजता है । फलित में भिन्न भिन्न केतुओं के उदय का भिन्न भिन्न फल माना गया है । ज्योतिषियों का म त है कि केतु अपने उदयकाल ही में या उदय से पंद्रह दिन पीछे शुभ या अशुभ फल दिखाते हैं । आजकल के पाश्चात्य ज्योतिषियों ने दूरबीन द्वारा यह निश्चित किया है कि केतुओं की संख्या अनिश्चित है और वे भिन्न भिन्न पटलों में भिन्न भिन्न दीर्घवृत या परलयवृत्त कक्षाओं में भिन्न भिन्न वोगों सो घूमते हैं । इन कक्षाओं की दो नाभियों में सूर्य एक नाभि होता है । दीर्घवृत्तात्मक कक्षा होने से ये तारे जब रविनीच के या सूर्य के समीपवर्ती कक्षांश में होते हैं, तभी दिखाई पडते हैं । रविनीच के कक्षांश में आते ही ये तारे कुछ दिखाई पड़ने लगते हैं और पहले पहल प्रकाश के धब्बे की तरह दूरबीनों से दिखाई पडते हैं । ज्यो जेयों ये सूर्य के समीप आते जाते हैं इनकी केतुनाभि दिखाई पडने लगती है फिर क्रमशः स्पष्ट होती जाती है । पर कितने ही केतुओं की केतुनाभि नहीं दिखाई पड़ती । उनमें केतुनाभि है या नहीं, यह संदिग्ध है । इन तारों की केतुनाभि उनके आवरण में लिपटी हुई सूर्य से २ अश से ९० अंश तक में दिखाई पडती है । इन तारों के साथ प्रकाश की एक घड़ी लगी होती है जिसे केतुपुच्छ कहते हैं । इस केतुपुच्छ में स्वयं प्रकाश नहीं होता । यह स्वयं स्वच्छ पारदर्शी और वायुमय होता है जिसमें सूर्य के सान्निध्य से प्रकाश आ जाता है । यही कारण है कि पुच्छ की दूसरी ओर का छोटे से छोटा तारा तक दिखाई पड़ता है । सन् १६८२ ई॰ के पूर्व के ज्योतिषियों की यह धारणा ती कि पुच्छल तारे बिना ठीक ठिकाने के मनमाने घूमा करते हैं; न इनकी कोई नियत कक्षा है और न इनके घुमने का कोई नियम है । पर सन् १८६२ ई॰ में हेली साहब ने हिसाब लगाकर एक तारे के विषय में यह अच्छी तरह सिद्ध कर दिया कि वह बहेल्ले की तरह नहीं घूमता, बल्कि लगभग ७६ वर्ष के बाद दिखाई पड़ता है । इस तारे को हेली साहब का पुच्छल तारा या 'हेली केतु' कहते हैं । तब से ज्योतिषियों का ध्यान इन केतुओं की गति की ओर आकर्षित हुआ और अबतक कितने ही तारों की गति और कक्षा आदि का पुरा पता लग चुका है । ऐसे तारों को ज्योतिष में नियत- कालिक केतु कहते हैं । सबसे विलक्षण बात—जिसका पता सन् १८६२ ई॰ में इटली के शेपरले नामक ज्योतिष ने लगाया—यह है कि कितने ही पुच्छल तारों की कक्षा और कितने ही उल्कापुंजो की कक्षा एक ही है । उसने इस बात को सिद्ध कर दिया कि १८६२ के केतु और सिंहगत उल्का, ये एक ही कक्षा में भ्रमण करते हैं । केतु को पुच्छलतारा, बढनी, झाडू आदि भी कहते हैं ।

७. नवग्रहों में से एक ग्रह । यद्यपि फलित में इसे ग्रह माना है तथापि सिद्धात ग्रंथों में चंद्रकक्ष और क्रांतिरेखा के अधःपात के बिंदु को केतु माना है । विशेष—दे॰ 'पात' ।

८. प्रकाशकिरण [को॰] ।

९. प्रधान या विशिष्ट व्यक्ति [को॰] ।

१०. दिन का समय । दिन [को॰] ।

११. आकार । रूप । आकृति (को॰) ।

१२. एक वामन या बौनी जाति (को॰) ।

१३. शत्रृ । वैरी (को॰) ।

१४. एक प्रकार का रोग (को॰) ।

केतु पु ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ केतकी] केवडा ।