कोर

विक्षनरी से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

कोर ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ कोण]

१. किनारा । तट । उपकंठ । उ॰— चारि जना मिलि लेइ चले हैं, जाइ उतारे जमुनवा के कोर ।—धरम॰, पृ॰ ७४ ।

२. किनारा । सिरा । हाशिया । उ॰— केसरी वन्यो है बागो मोतिन की कोर लगो । फूल झरै जब वह मुख बोलै ।—भारतेंदु ग्रं॰, भा॰ २, पृ॰ ४६१ । मुहा॰—कोर निकालना=किनारा बनाना । कोर मारना या छाँटना=बढ़ें हुए या धारदार किनारे का कम या बराबर करना ।—(बढ़ई या संगतराश) ।

३. कोना । गोशा । अंतराल । मुहा॰—कोर दबना=किसी प्रकार के दबाब या वश में होना । कस में होना । जैसे,—(क) अब तो उनकी कोर दबती है, अब वे कहाँ जायँगे? (ख) जबतक उनकी कोर न दबेगी, तब तक वे रुपया न देगे ।

४. द्वेष । बैर । वैमनस्य । उ॰—उतते सूत्र न टारत कतहूँ, मोसों मानत कोर ।—सूर (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—मानना ।—रखना ।

५. द्वेष । ऐब । बुराई ।

६. कमी । कसर । उ॰—सुतौ पूरबला अकरम मोर । बलि जाउँ करौ जिन कोर ।—रै॰, बानी, पृ॰ १७ । क्रि॰ प्र॰—निकालना । यौ॰—कोरकसर ।

७. हथियार की धार । बाढ़ ।

८. पंक्ति । श्रेणी । कतार । उ॰— कोर बाँधि पाँचो भये ठाढ़े । आगे धरे जँजालन गाढ़े ।— सूदन (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—बाँधना ।

कोर ^२ संज्ञा स्त्री॰ [देश॰]

१. चैती फसल की पहली सिंचाई ।

२. वह चबैना या और खाद्य पदार्थ जो मजदूरों या कुलियों को जलपान के लिये दिया जाता है । पनपियाव । छाक । क्रि॰ प्र॰—देना ।—बाँटना ।—पाना ।—लेना आदि ।

कोर ^३ संज्ञा पुं॰ [सं॰] सुश्रुत के अनुसार शरीर की आठ प्रकार की संधियों में से एक प्रकार की संधि । इस संधि पर से अवयव मुड़ सकते हैं । उँगली, कलाई, कुहनी और घुटने की संधियाँ इसी के अंतर्गत है ।

२. कुड्मल । कली (को॰) ।

कोर ^४ संज्ञा पुं॰ [अं॰] पलटन । सैन्यदल । जैसे, —वालंटियर कोर ।

कोर ^५ वि॰ [फा़॰] सूर । अंधा । बिना आँखोवाला [को॰] ।

कोर पु वि॰ [हिं॰] करोड़ । कोटि ।

कोर कसर संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ कोर+ फा॰ कसर]

१. दोष और त्रुटि । ऐब और कमी ।

२. अधिकता या न्यूनता । कमी बेशी । जैसे; —अगर इसके दाम में कुछ कोर कसर हो तो उसे ठीक कर दीजिए । क्रि॰ प्र॰—निकलना ।—निकालना ।