खजूर

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हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

  1. एक प्रकार का फल

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

खजूर संज्ञा पुं॰ [सं॰ खर्जूर]

१. एक प्रकार का पेड़ जो गरम देशों, समुद्र के किनारे या रेतीले मैदानों में होता है । विशेष—इस जाति के पेड़ सीधे खंभे की तरह ऊपर चले जाते हैं औऱ उनके सिरे पर पत्तियाँ बहुत कड़ी, चार अंगुल से छह सात अंगुल तक लंबी, पतली और नुकीली होती हैं और एक सींके या छड़ी के दोनों ओर लगती हैं । पत्ते की यह छड़ी दो तीन हाथ तक लंबी होती है । खजूर कई प्रकार के होते हैं, जिनमें मुख्य दो हैं—एक जंगली, दूसरा देशी । जंगली खजूर को सेंधी, खरक आदि कहते हैं । यह बहुत ऊँचा नहीं होता और हिंदुस्तान में बंगाल, बिहार, गुजरात, करमंडल आदि प्रदेशों में होता है । लगाए हुए खजूर में जड़ के पास अंकुर निकलते हैं, जंगली में नहीं । जंगली के फल भी किसी काम के नहीं होते । ताड़ की तरह इसमें से भी पाछकर एक प्रकार का सफेद रस या दूध निकालते हैं और उसे भी ताड़ी कहते हैं । खजूर की ताजी ताड़ी मीठी होती है और उससे गुड तथा सिरका भी बनाया जाता है । लगाए जानेवाले खजूर को पिंड खजूर कहते हैं । इसका पेड़साठ सत्तर हाथ ऊँचा होता है और जब छह वर्ष के ऊपर का हो जाता है, तब उसके नीचे जड़ के पास बहुत से छोटे छोटे अंकुर निकलते है । इस प्रकार के खजूर सिंध, पंजाब गुजरात और दक्षिण में अधिक होते हैं । वहाँ इनकी खेती की जाती हैं । पौधें बीज से और जड़ के पास के अंकुरों से उत्पन्न किए जाते हैं । पेड़ लगाने के लिये बलुई, दोमट और मटियार सब प्रकार की भूमि काम में लाई जा सकती है? पर पृथिवी में खार का कुछ अंश अवश्य होना चाहिए । तीन तीन से छह वर्ष तक के अंकुर मुख्य पेड़ के पास से खोद लिए जाते हैं और उनकी बड़ी पत्तियाँ काटकर फेंक दी जाती हैं । फिर इन पौधों को तीन फुट गहरे और चौड़े गड्डों में दो ढाई सेर खली मिली हुई खाद के साथ बैठाते हैं । जब पौधा आठ वर्ष से अधिक पुराना होता है, तब वह फलने लगता है । माघ फागुन में बालियाँ निकलती हैं । ये बालियाँ पत्ते के आवरण में लिपटी रहती हैं और पीछे बढ़कर फूल की घौद हो जाती हैं । फल बड़े बड़े घौद में लगते है । जबतक फल पक नहीं जाते, बराबर अधिक पानी देने की आवश्यकता पड़ती है । फल पकने के समय पीले होते हैं । फिर फूल आते है और अंत में लाल हो जाते हैं । इन फलों को छुहारा कहते हैं । सिंधु में पेड़ के पके को खुरमा औऱ पकने के पहले तोड़े हुए फल को छुहारा कहते हैं । इनकी अनेक जातियाँ है, पर नूर आदि अच्छी मानी जाती है । खजुर की लकड़ी बँडेर के काम आती है और इससे पुल भी बनाया जाती है । इसकी पत्तियों के डंठल से घर छाए जाते है और उनकी छड़ी भी बनाई जाती है । इसकी छाल से एक प्रकार की लाल बुकनी निकलती है, जिससे 'चमड़ा रँगा जाता है इसकी छाल चमड़ा सिझाने के भी काम आती है । इससे एक प्रकार का गोंद भी निकलता है, जिसे 'हुकुमचिल' कहते हैं और जो दवा के लिये काम आता है । इसकी नरम पत्तियाँ, जिन्हे गाछी कहते है, सुखाकर रखी जाती है और उनकी तरकारी बनाई जाती है । इसकी छाल के रेशे से रस्सी बटी जाती है । अरब में इसके फूल की बाली आवरण से, जिसे 'तर' कहते हैं, एक प्रकार का गुलाब या केवड़े की तरह का अर्क निकाला जाता है । वैद्यक में इसका फल पुष्टिकारक, वृक्ष वातपित्तनाशक, कफघ्न रूचिकर और अग्निवर्धक माना गया है ।

२. एक प्रकार की मिठाई जो आटे घी और शक्कर मिलाकर गूँथकर बनाई जाती है । यह खाने में खसखसी और स्वादिष्ट होती है ।

खजूर छड़ी संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ खजूर + छड़ी] एक प्रकार का रेशमी कपड़ा जिसपर खजूर की पत्तियों की तरह छाड़ियाँ या धारियाँ होती हैं ।