खरहा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

खरहा संज्ञा पुं॰ [हिं॰ खर + हा (प्रत्य॰)] [स्त्री॰ खरही] चूहे की जाति का, पर उससे कुछ बड़े आकार का एक जंतु । खरगोश । उ॰—बीली नाचे मुस मिरदंगी खरहा ताल बनावै ।—सत॰ दरिया, पृ॰ १२६ । विशेष—इसके कान लंबे, मुंह और सिर गोल, चमड़ा नरम और रोएँदार, पूँछछोटी और पिछली टाँगें अपेक्षाकृत बड़ी होती है । यह संसार के प्रायः सभी उत्तरी भागों में भिन्न भिन्न आकार और वर्ण का पाया जाता है । यह जगलों और देहातों में जमीन के अंदर बिल खोदकर झुंड में रहता है और रात के समय आस पास के खेतों, विशेषतः ऊख के खेतों को बहुत हाँनि पहुँ चाता है । यह बहुत अधिक डरपोक और अत्यंत कोमल होता है और जरा से आघात से मर जाता है । यह छलाँगें मारते हुए बहुत तेज दौड़ता है । इसके दाँत बड़े तेज होते हैं । खरही छह मास के होने पर गर्भवती हो जाती है और एक मास पीछे सात आठ बच्चे देती है । दस पंद्रह दिन पीछे वह फिर गर्भवती हो जाती है और इसी प्रकार बराबर बच्चे दिया करती है । किसी किसी देश के खरहे जाड़े के दिनों में सफेद हो जाते हैं । इनका मांस बहुत स्वादिष्ट होता है । शास्त्रों के अनुसार यह भक्ष्य है और वैद्यक में इसका मांस ठंढा, लघु, शोथ, अतीसार पित्त और रक्त का नाशक और मलबद्ध कारक माना गया है । इसे चौगुड़ा, लमहा और खरगोश भी कहते हैं । इसका संस्कृत नाम 'शश' है ।