गाड़ी

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

गाड़ी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ गान्त्री या शकट, प्रा॰ सगड़]

१. घूमनेवाले पहियों के ऊपर ठहरा हुआ लकड़ी, लोहे आदि का ढाँचा । एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल असबाब या आदमियों को पहुंचाने के लिय़े एक यंत्र । यान । शकट । उ॰—(क) गाड़ी के स्वान की नाई काया मोह की बड़ाई छिनाहिं तजि छिन भजत बहोरि हौं ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) लीक—लीक गाड़ी चलै, लीकहिं चलै कपूत ।—(शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—चलाना = हाँकना । विशेष—इसे घोड़े, बैल आदि पशु खींचते पशु खींचते हैं और आदमियों के बैठने या माल असबाब आदि रखने के लिये इसपर स्थान बना रहता है । आदमियों को चढानेवाली गाड़ी की सवारी गाड़ी और माल असबाब लादने की गाड़ी को छकड़ा, सग्गड़, आदि कहते हैं । सवारी गाड़ी कई प्रकार की होती है; जैसे , रथ, बहल, बहली, एक्का, टाँगा, बग्घी, जोड़ी, फिटन, टमटम आदि । मुहा॰—गाड़ी भर = बहुत सा । ढेर का ढेर । गाड़ी जोतना = गाड़ी में घोड़े जोतना । चलने के लिये गाड़ी तैयार करना । गाड़ी छूटना = गाड़ी का रवाना हो जाना । विशेष—ऐसा प्रायः ऐसी गाड़ियों के ही संबंध में बोलते हैं जिनका संबंध सर्वसाधारण से होता है और जिनके आने जाने का समय नियत होता है । रेलगाड़ी छूटना, बस, या मोटर छूटना आदि ।

२. रेलगाड़ी । मुहा॰-गाड़ी काटना = (१) किसी ड़िब्बे का ट्रेन से अलग होना । (२) चलती गाड़ी में से माल चोरी जाना ।