गुण

विक्षनरी से
Jump to navigation Jump to search

हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

गुण ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰] [वि॰ गुणी]

१. किसी वस्तु में पाई जानेवाली वह बात जिसके द्वारा वह दूसरी वस्तु से पहचानी जाय । वह भाव जो किसी वस्तु के साथ लगा हुआ हो । धर्म । सिफत । विशेष—सांख्याकार तीन गुण मानते हैं । सत्व, रज और तम; और इन्हीं की साम्यावस्था को प्रकृति कहते हैं जिससे सृष्टि का विकास होता है । सत्वगुण हलका और प्रकाश करनेवाला, रजोगुण चंचल और प्रवृत्त करनेवाला और तमोगुण भारी और रोकनेवाला माना गया है । तीनों गुणों का स्वभाव है कि वे एक दूसरे के आश्रय से रहते तथा एक दूसरे को उत्पन्न करते हैं । इससे सिद्ध होता है कि सांख्य में गुण भी एक प्रकार का द्रव्य ही है जिसके अनेक धर्म हैं और जिससे सब पदार्थ उत्पन्न होते हैं । विज्ञानभिक्षु का मत है कि जिससे आत्मा के बंधन के लिये महत्तत्व आदि रज्जु तैयार होती है उसी को सांख्यकार ने गुण कहा है । वैशेषिक गुण को द्रव्य का आश्रित मानता है और उसने उसकी परिभाषा इस प्रकार की है—जो द्रव्य में रहनेवाला हो, जिसमें कोई गुण न हो, जो संयोग विभाग का कारण न हो वह गुण है । रूप, रस, गंध, स्पर्श, परत्व, अपरत्व, गरुत्व, द्रवत्व, स्नेह और वेग ये मूर्त द्रव्यों के गुण हैं । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और शब्द ये अमूर्त द्रव्यों के गुण हैं । संख्या, परिमाण, पृथकत्व, संयोग, और विभाग ये मूर्त और अमूर्त दोनों के गुण हैं । गुण दो प्रकार के माने गए हैं, विशेष और सामान्य । रूप, रस, गंध, स्पर्श, स्नेह, सांसिद्धिक, द्रवत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और शब्द ये विशेष गुण है, अर्थात् इतने द्रव्यों में भेद जाना जाता है । संख्या, परिमाण, पृथकत्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, नैमित्तिक द्रवत्व और वैग ये सामान्य गुण हैं । द्रव्य स्वयं आश्रय हो सकता है पर गुण स्वयं आश्रय नहीं हो सकता । कर्म संयोग विभाग का कारण होता है, गुण नहीं ।

२. निपुणता । प्रवीणता ।

३. कोई कला या विद्या । हुनर । यौ॰—गुणग्राहक । गुणग्राही । क्रि॰ प्र॰—आना ।—जानाना ।—सिखाना ।—सीखना ।

४. असर । तासीर । प्रभाव । फल । जैसे,—यह दवा अवश्य ही अपना गुण दिखावेगी । क्रि॰ प्र॰—करना ।—दिखाना ।

५. तारीफ की बात । अच़्छा स्वभाव । शील । सदवृत्ति । जैसे,— यही तो उनमें बड़ा भारी गुण है कि वे क्रोध नहीं करते । संज्ञा पुं॰ [हिं॰ गुड़िया]

११. रस्सी या तागा । डोरा । सूत ।

१२. धनुष की प्रत्यंचा ।

१३. वह रस्सी जिससे मल्लाह नाव खींचते हैं ।

१४. लाभ । फायदा (को॰) ।

१५. स्नायु (को॰) ।

१६. ज्ञानेंद्रिय का विषय (को॰) ।

१७. बत्ती (को॰) ।

१८. पाचक (को॰) ।

१९. सूद (को॰) ।

२०. भीम (को॰) ।

२१. परित्याग (को॰) ।

२२. विभाग (को॰) ।

२३. काव्य को सौंदर्य प्रदान करनेवाला तत्व, (ओज, प्रसाद, माधुर्य) (को॰) ।

गुण ^२ प्रत्य॰ एक प्रत्यय जो संख्यावाचक शब्दों के आगे लगता है और उतनी ही बार किसी विशेष संख्या, मात्रा या परिमाण को सूचित करता है । जैसे, द्विगुण, चतुर्गुण ।

गुण पु † संज्ञा पुं॰ [सं॰ गुण] दे॰ 'गुण' ।