घाट

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

घाट ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ घट्ट]

१. नदी, सरोवर या और किसी जलाशय का वह स्थान जहाँ लोग पानी भरते या नहाते धोते हैं । नदी, झील आदि का वह किनारा जिसपर पानी तक उतरने के लिये सीढ़ियाँ आदि बनी हों । मुहा॰—घाट घाट का पानी पीना = (१) चारों ओर देश— देशांतर में घूमकर अनुभव प्राप्त करना । अनेक स्थानों में या अनेक प्रकार के व्यापारों में रहकर जानकर होना । (२) इधर उदर मारे मारे फिरना ।

२. नदी या जलाशय के किनारे का वह स्थान जहाँ धोबी कपड़े धोते हैं । जैसे,—धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का ।

३. नदी या जलाशय के किनारे का वह स्थान जहाँ नाव पर चढ़कर या पानी में हलकर लोग पार उतरते हैं । मुहा॰—घाट धरना = राह छेंकना । जबरदस्ती करने के लिये रास्ते में खड़े होना । उ॰—घाट धरयो तुम यहै जानि कै करत ठगन के छंद ।—सूर (शब्द॰) । घाट मारना = नदी की उतराई न देना । नाव या पुल का महसूल बिना दिए चले जाना । घाट लगना = नदी के किनारे बहुत से आदमियों का पार उतरने के लिये इकट्ठा होना । नाव का घाट लगना = नाव का किनारे पर पहुँचना । (किसी का) किसी घाट लगना = कहीं ठिकाना पाना । कहीं आश्रय पाना । घाट नहाना = किसी के मरने पर उदकक्रिया करना ।

४. तंग पहाड़ी रास्ता । चढ़ाव उतार का पहाड़ी मार्ग । उ॰— (क) घाट छोड़ि कस औघट रेंगहू कैसे लगिहहु पारा हो ।— कबीर (शब्द॰) । (ख) है आगे परबत की बाटैं । विषम पहार अगम सुठि घाटैं ।—जायस (शब्द॰) ।

५. पहाड़ । पर्वत ।

६. ओर । तरफ । दिशा ।

७. रंगढंग । चालढाल । डौल । ढब । चौर तरीका । भेद । मर्म । उ॰—जो करनी अंतर बसै, निकसै मुँह की बाट । बोलत ही पहिचानिए, चोर साहु को घाट ।—कबीर (शब्द॰) ।

८. तलवार की धार जिसमें उतार चढ़ाव होता है । तलवार की बाढ़ का ऊपरी भाग ।

९. अँगिया का गला ।

१०. जौ की गिरी ।

११. मोठ और बाजरे की खिचड़ी । उ॰—उस जाट की स्त्री ने गरम घाट उसके सामने रख दी ।—राज॰, इति॰ पृ॰ ६०२ ।

१२. दुलहिन का लहँगा ।

१३. ठाट बाट । उ॰—प्राण गए तें रहै न कोऊ सकल देखतें घाट बिलाबै ।—सुदंर ग्रं॰, भा॰२, पृ॰ ६०१ ।

१४. गठन । आकृति । रूपरेखा । उ॰—मृगनयणी मृगपति मुखी मृगमद तिलक निलाट । मृगरिपु कटि सुंदर वणी मारू अइहइ घाट ।— ढोला॰, दू॰ ४६६ ।

घाट ^२ † संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ घात या हिं॰ घट (= कम)]

१. धोखा । छल । कपट । उ॰—जान बंधु विरोध कीन्हों । घाट भ ई अब मोहि सों ।—कबीर सा॰, पृ॰ ५१ ।

२. खोटपन । बुराई । कुकर्म ।

घाट ^३ † वि॰ [हिं॰ घट] कम । थो़ड़ा । उ॰—निसदिन तोलै पूर घाट अब सुपनेहु नाहीं ।—पलटू॰ पृ॰ ३९ ।

घाट ^४ संज्ञा पुं॰ [सं॰] [स्त्री॰ घाटी, घटिका]

१. गरदन का पिछला भाग ।

२. नाव आदि पर चढ़ने या उतरने का स्थान ।

३. कलश । घट (को॰) ।