चकोर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

चकोर संज्ञा पुं॰ [सं॰] [स्त्री॰ चकोरी]

१. एक प्रकार का बड़ा पहाड़ी तीतर जो नैपाल, नैनीताल आदिस्थानों तथा पंजाब और अफगानिस्तान के पहाड़ी जंगलों में बहुत मिलता है । उ॰—नयन रात निसि मारग जागे । चख चकोर जानहुँ ससि लागे ।—जायसी (शब्द॰) । विशेष—इसके ऊपर का एक रंग काला होता है, जिसपर सफेद सफेद चित्तियाँ होती हैं । पेट का रंग कुछ सफेदी लिए होता है । चोंच और आँखें इसकी बहुत लाल होती हैं । यह पक्षी झुंड़ों में रहता है और बैसाख जेठ में बारह बारह अंडे देता है । भारतवर्ष में बहुत काल से प्रसिद्ध है कि यह चंद्रमा का बड़ा भारी प्रेमी है और उसकी ओर एकटक देखा करता है; यहाँ तक कि यह आग की चिनगारियों को चंद्रमा की किरनें समझकर खा जाता है । कवि लोगों ने इस प्रेम का उल्लेख अपनी उक्तियों में बराबर किया है । लोग इसे पिंजरे में पालते भी हैं ।

२. एक वर्णवृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरण में सात भगण, एक गुरु और एक लघु होता है । यह यथार्थ में एक प्रकार का सवैया है । जैसे,—भासत ग्वाल सखीगन में हरि राजत तारन में जिमि चंद ।