चश्मा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

चश्मा संज्ञा पुं॰ [फा॰ चश्मह्]

१. कमानी में जड़ा हुआ शीशे या पारदर्शी पत्थर के तालों का जोड़ा, जो आँखों पर उनका दोष दूर करने, दृष्टि बढ़ाने अथवा धूप, चमक या गर्द आदि से उनकी रक्षा करने और उन्हें ठढ़ा रखने के अभिप्राय से लगाया जाता है । ऐनक । विशेष—चश्मे के ताल हरे, लाल, नीले, सफेद, और कई रंग के होते हैं । दूर की चीजें देखने के लिये नतोदर और पास की चीजे देखने के लिये उन्नतोदर तालों का चश्मा लगाया जाता है । क्रि॰ प्र॰—चढ़ाना ।—लगाना ।—लगना । मुहा॰—चश्मा लगना = आँखों में चश्मा लगाने की आवश्यकता होना । जैसे, अब तो उनकी आँखें कमजोर हो गई है; चश्मा लगता है ।

२. पानी का सोता । स्त्रोत । यौ॰—चश्म ए-खिज्र, चरम-ए-हैवाँ = अमृत का कुंड या सोता । चश्म-ए-सार = जहाँ पर बहुत से चश्मे हों ।

३. छोटी नदी । छोटा दरिया ।

४. कोई जलशय ।

५. सुई का छेद ।