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चुकना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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चुकना ^१ क्रि॰ अ॰ [सं॰ च्युत्कृ, प्रा॰ चुविक्]

१. समाप्त होना । खतम होना । नि:शेष होना । न रह जाना । बाकी न रहना । उ॰—(क) सारी किताब छपने को पडी है, कागज अभी से चुक गया । (ख) प्रान पियारे की गुन गाथा साधु कहाँ तक मैं गाऊँ । गाते गाते चकै नहीं वह चाहे मैं ही चुक जाऊँ ।— श्रीधर (शब्द॰) ।

२. बेबाक होना । अदा होना । चुकता होना जैसे,—उनका सब ऋण चुकता हो गया ।

३. तै होना । निबटना । जैसे,—झगडा चुकना । पु

४. चूकना । भूल करना । त्रुटि करना । कसर करना । अवसर के अनुसार कार्य न करना । उ॰—(क) काल सुभाउ करम बरिआई । भलेइ प्रकृति बस चुकइँ भलाई—मानस, १ । ७ (ख) तेउ न पाइ अस समय चुकाहीं । देखु विचारि मातु मन माहीं ।—तुलसी (शब्द॰) । पु

५. खाली जाना । निष्फल होना । व्यर्थ होना । लक्ष्य पर न पहुँचना । उ॰—चित्रकूट जनु अचल अहेरी । चुकइ न घात मार मुठ भेरी ।—मानस, २ । १३३ । विशेष—यह क्रिया और क्रियाओं के साथ समाप्ति का अर्थ देने के लिये संयुक्त रूप में भी आती है । जैसे,—तुम यह काम कर चुके ? तुम कब तक खा चुकोगे ? वह अब चल चुके होंगे । व्यंग्य के रूप में भी इस क्रिया का प्रयोग बहुत होता है । जैसे, तुम अब आ चुके, अर्थात तुम अब नहीं आओगे । 'वह दे चुका' अर्थात् वह न देगा ।