चूक

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

चूक ^१ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ चूकना]

१. भूल । गलती । उ॰—इह जानि चूक चिंत्यौ नृपति रहै बत्त सुबिहान कौ ।—पृ॰ रा॰, १० । १० । क्रि॰ प्र॰—करना ।—जाना ।—पड़ना ।—होना ।

२. दरार । दर्ज । शिगाफ ।—(लश॰) ।

३. छल । कपट । फरेब । दगा । धोखा । उ॰—(क) अहौ हरि बलि सों चूक करी ।—परमानंद दास (शब्द॰) । (ख) धरम राज सौ चूक करि दुरजोधन लै लीन्ह । राजपाट अरु बित्त सब बनबास दै दीन्ह ।—लल्लू (शब्द॰) ।

चूक ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ चुक]

१. नीबू, इमली, आम, अनार या आँवले आदि किसी खट्टे फल के रस को गाढ़ा करके बनाया हुआ एक पदार्थ जो अत्यंत खट्टा होता है । वैद्यक में इसे दीपन और पाचन कहा है ।

२. एक प्रकार का खट्टा साग । चूका ।

चूक ^३ वि॰ बहुत अधिक खट्टा । इतना खट्टा जो खाया न जा सके ।