छत

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

छत ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ छत्त, प्रा॰ छत्त]

१. एक घर की दिवारों के ऊपर का पटिया, चूना, कंकड़ आदि डालकर बनाया हुआ फर्श । पाटन । उ॰—छिति पर, छान पर, छाजत छतान पर, ललित लतान पर, लाड़िली की लट पै ।—पद्माकर (शब्द॰) । विशेष—कच्चे मकान की छत कड़ियों पर पतले बाँस या उनकी खपचियाँ बिछाकर उसके ऊपर लसदार मिट्टी की तह बैठाने से तैयार होती है । ऐसी छत भीतरी होती है । जिसके ऊपर खपरैल आदि का छाजन रहता है । मुहा॰—छत पटना या पड़ना = दीवार के ऊपर बैठाई हुई कड़ियों पर कंकड़, सुरखी, चुना आदि पीटा जाना । छत बनाना ।

२. घर के ऊपर की खुली हुई पाटन । ऊपर का खुला हुआ कोठा । जैसे,—गरमी में लोग छत पर सोते हैं ।

३. ऊपर तानने की चादर । चाँदनी । छतगीर । मुहा॰—छत बाँधना = बादलों का घेरकर छाना ।

४. छत्र । उ॰—जिन घर उदैसिंह छत जैहो । अबर न को जोड़ धर ऐहो ।—रा॰ रू॰, पृ॰ १५ ।

छत पु ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ क्षत] घाव । जख्म । उ॰—सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू । पाकें छत जसु लाग अंगारू ।—मानस १ । १६१ ।

छत ^३ क्रि॰ वि॰ [सं॰ सत्] होते हुए । रहते हुए । आछत । उ॰— (क) गनती गनिबे ते रहे छतहू अछत समान । अलि अब ये तिथि औम लौं परे रहौ तन प्रान ।—बिहारी र॰, दो॰ २७५ । (ख) प्रान पिंड़ को तजि चलै मुवा कहै सब कोय । जीव छतै जामें मरै सूछम लखै न सोय ।—कबीर (शब्द॰) । (ग)