छाती

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

छाती संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ छादिन् छादी ( = आच्छादन करनेवाला)]

१. हड्डी की ठठरियों का पल्ला जो कलेजे के ऊपर पेट तक फैला होता है । पेट के ऊपर का भाग जो गरदन तक होता हैं । सोना । वक्षास्थल । विशेष—छाती की पसलियाँ पीछे की ओर रीढ़ और आगे की ओर एक मध्यवती अस्यिदंड से लगी रहती हैं । इनके अंदर के कोठे में फुप्फुस और कलेजा रहता है । दुध पिलानेवाले जीवों में यह कोठा पेट के कोठे से, जिसमें अँतड़ी आदि रहती है, परदे कै द्वारा बिलकुल अलग रहता है । पक्षियों और सरीसृपों में यह विभाग उतना स्पष्ट नहीं रहता । जलचरों तथा रेंगनेवाले जोवों में तो यह विभाग होता ही नहीं । मुहा॰—छाती का जम = (१) दु:खदायक वस्तु या व्यक्ति; हर घड़ी कष्ट पहुँचानेवाला आदमी या वस्तु । (२) कष्ट पहुँचाने के लिये सदा घेरे रहनेवाला आदमी । (३) धूष्ट मनुष्य । ढीठ आदमी । छाती पर का पत्थर या पहाड़= (१) ऐसी वस्तु जिसका खटका सदा बना रहता हो । चिंता उत्पन्न करनेवाली वस्तु । जैसे,—कुआँरी लड़की, जिसके विवाह की चिंता सदा बनी रहती है । (२ सदा कष्ट देनेवाली वस्तु । दु:ख से दबाए रहनेवाली वस्तु । छाती कूटना= दे॰ 'छाती पीटना' । उ॰—कूटते हैं तो बदों को कूट दें । कट मरें, क्यों कूटते छाती रहें ।—चुभते॰ पृ॰ ३९ । छाती के किवाड़ = छाती का पंजर । छाती का परदा या विस्तार । छाती का किवाड़ खुलना = (१) छाती फटना । (२) कंठ से चीत्कार निकलना । गहरी चोख निकलना । जैसे,—मैं तो आता ही था; तेरी छाती के किवाड़ क्या खुल गए । (३) हृदय के कपाट खुलना । हिए की आँख खुलना । हृदय में ज्ञान का उदय होना । अंतर्बोध होना । तत्व बोध का होना । (४) बहुत आनंद होना । छाती के किवाड़ खोलना= (१) कलेजा टुकड़े टुकड़े करना ।(२) जी खोलकर बाते करना । हृदय की बात स्पष्ट कहना । मन में कुछ गुप्त न रखना । (३) हृदय का अंधकार दूर करना । अज्ञान मिटाना । अंतर्बेंध करना । छाती खोलना = बातों द्वारा हृदय को बेधना । अपने कथन से किसी की पीड़ा । पहुँचाना । उ॰—आकबाक बकि और भी वृथा न छाती छोल ।—सुंदर॰ ग्रं॰, भा॰ २, पृ॰ ७३६ । छाती तले रखना = (१) पास से अलग न होने देना । सदा अपने समीप या अपनी रक्षा में रखना । (२) अत्यंत प्रिय करके रखना । छाती तले रहना = (१) पास रहना । आँखों के सामने रहना । (२) अत्यंत प्रिय होकर रहना । छाती दरकना = दे॰ 'छाती फटना' । छाती दरना = सताना । क्लेश देना । उ॰— ब्रजवास ते ऊधौ प्रवास करो, अब खूब ही छाती दरी सो दरी ।—नट॰, पृ॰ २३ । छाती निकालकर चलना = तनकर चलना । अकड़कर चलना । ऐंठकर चलना । छाती पत्थर की करना = भारी दु:ख सहने के लिये हृदय कठोर करना । छाती पर मूँग या कोदो दलना (१) किसी को सामने हो ऐसी बात करना जिससे उसका जी दुखे । किसी को दिखा दिखाकर ऐसा काम करना जिससे उसे क्रोध या संताप हो । किसी के आँख के सामने हो उसकी हानि या बुराई करना । जैसे,— यह स्त्री बड़ी कुलटा हैं; अपने पति की छाती पर कोदो दलती है (अर्थात् अन्य पुरुष से बातचीत करती है) । (२) अत्यंत कष्ट पहुँचाना । खूब पीड़ित करना । (स्त्रियाँ प्राय: तेरी छाती पर मूँग दलूँ' कहकर गाली भी देती हैं) । छाती पर चढ़ना = कष्ट पहुँचाने के लिये पास जाना । छाती पर चढ़कर ढाई चुल्लू लहू पीना = कठिन दंड देना । प्राणदंड देना । छाती पर धरकर ले जाना= अपने साथ परलोक में ले जाना । -(धन आदि के विषय में लोग बोलते हैं कि 'क्या छाती पर धरकर ले जाओगे ?') । छाती पर पत्थर रखना = किसी भारी शोक या दु:ख का आघात सहना । दु:ख सहने के लिये हृदय कठोर करना । छाती पर बाल होना = उदारता, न्यायशीलता आदि के लक्षण होना ।—लोगों में प्रवाद है कि सूम या विश्र्वासघातक की छाती पर बाल नहीं होते) । छाती पर साँप लोटना या फिरना = (१) दु: ख से कलेजा दहल जाना । हृदय पर दु ख शोक आदि का आघात पहुँचना । मन मसोसना । मानसिक व्यथा होना । (२) ईर्ष्या से हृदय व्यथित होना । डाह होना । जलन होना । छाती पर होना = छाती पर चढ़जाना । उ॰—अगर एक लफज एक कलमा भी तेरी जबान से निकला तो छाती पर हूँगा ।—फिसाना॰, भा॰

३. पृ॰ ४७४ । छाती पिलाकर पालना = मनोयोग से पालना । कष्ट सहकर पालन पोषण करना । उ॰—जान को वारकर जिलाती हैं, पालती है पिला पिला छाती ।—चोखे॰, पृ॰ ५ । छाती पीटना = (१) छाती पर जोर जोर से हाथ पटकना । (२) दुःख या शोक से व्याकुल होकर छाती पर हाथ पटकना । शोक के आवेग में हृदय पर आघात करना । (छाती परहाथ पटकना शोक प्रकट करने का चिह्न है) । जैसे छाती पीट पीटकर रोना । छाती फटना = (१) दु ख से हृदय व्यथित होना । दुःख शोक आदि से चित्त व्याकुल होना । अत्यंत मानसिक क्लेश होना । अत्यत संताप होना । (२) ईर्ष्या से हृदय व्यथित होना । चित्त में डाह होना । जी जलना । कुढ़न होना । जैसे,—दूसरे की बढ़ती देखकर तुम्हारी छाती क्यों फटती है । छाती फाटना पु = भय आदि से दहलना । काँपना । उ॰— गरजनि तरजनि अनु अनु भाँती । फूटै कान अरू फाटै छाती ।—नंद॰ ग्र॰, पृ॰ १९१ । छाती फाड़ना = जी तोड़ मेहनत करना । उ॰—अब भी छाती फाड़ती हूँ, तब भी छाती फाडूगी ।—मान॰, भा॰ ५, पृ॰ १६७ । छाती फुलाना = (१) अकड़कर चलना । तनकर चलना । इतराकर चलना । (२) घमड करना । अभिमान दिखलाना । (किसी की) छाती लोन से मीजना पु = कष्ट पर और कष्ट देना । किसी की पीड़ा को और बढ़ाना । उ॰—नाँचै मोर कोलाहल कीजै । इंद्र की छाती लौंन सौं मीजै ।—नंद॰ ग्रं॰, पृ॰ १९२ । छाती से पत्थर टलना = (१) किसी ऐसे भारी काम का हो जाना जिसका भार अपने ऊपर रहा हो । किसी कठिन वा बड़े काम के पूरे होने पर चित्त निश्चित होना । किसी ऐसे कार्य का पूरा हो जाना जिसका खटका सदा बना रहता हो । (२) बेटी का ब्याह हो जाना । छाती से लगना = आलिंगन होना । गले लगना । हृदय से लिपटना । छाती से लगाना = आलिंगन करना । गले लगाना । प्यार करना । प्रेम से दोनों भुजाओं के बीच दबाना । छाती से लगा रखना = (१) अपने पास से जाने न देना । प्रेमपूर्वक सदा अपने समीप रखना ।

२. अत्यंत प्रिय करके रखना । अपनी देखरेख और रक्षा में रखना । वज्र की छाती = ऐसा कठोर हृदय जो दुःख सह सके । अत्यंत सहिष्णु हृदय ।

२. कलेजा । हृदय । मन । जी । मुहा॰—छाती उड़ी जाना = दुःख या आशंका से चित्त व्याकुल होना । कलेजा दहलना । जो घबराना । छाती उमड़ जाना = प्रेम या करूणा के आवेग से हृदय परिपूर्ण होना । प्रेम या करूणा से गदगद होना । छाती छलनी होना=कष्ट या अपमान सहते सहते हृदय जर्जर हो जाना । बार बार दुःख या कुढ़न से चित्त का अत्यंत व्यथित होना । दुःख झेलते झेलते या कुढ़ते कुढ़ते जी ऊब जाना । जैसे,—तुम्हारी बाते सुनते सुनते तो छाती छलनी हो गई । छाती जलना = (१) कलेजे पर गरमी मालूम होना । अजीर्ण आदि के कारण हृदय में जलन मालूम होना । (२) शोक से हृदय व्यथित होना । हृदय दग्ध होना । मानसिक व्यथा होना । संताप होना । (३) ईर्ष्या या क्रोध से चित्त संतप्त होना । डाहहोना । जलन होना । उ॰— जौ वह भली नेक हू होती तै मिलि सबनि बताती । वह पापिनी दाहि कुल आई देखि जरत मोरि छाती ।—सूर (शब्द॰) । छाती जलाना = (१) हृदय सतप्त करना । संताप देना । मानसिक व्यथा पहुँचाना । जी जलाना । कष्ट पहुँ चाना । (२) कुढ़ाना । चिढ़ाना । † छाती जुडाना = (१) [क्रि॰ अ॰] दे॰ 'छाती ठढ़ी होना' । (२) [क्रि॰ स॰] छाती ठंढी करना । हृदय शीतल करना । चित्तशांत और प्रसन्न करना । हृदय संतुष्ट और प्रफुल्लित करना । इच्छा या हौसला पूरा करना । कामना पूर्ण करना । मन का आवेग संग्रह करना । उ॰— (क) लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती । हृदय लगाय जुड़ावहिं छाती ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) खोजत रहेउँ तोहिं सुत घाती । आजु निपाति जुड़ावहुँ छाती ।—तुलसी (शब्द॰) । छाती ठढी करना = हृदय शीतल करना । वित्त शांत और प्रफुल्लित करना । मनका आवेगशांत करना । मनकी अभि- लाषा पूर्ण करना । होसला पूरा करना । छाती ठढी होना = हृदय शीतल होना । चित्त शांत और प्रफुल्लि होना । मन का आवेग शांत होना । कामना पूर्णा होना । होसला पूरा होना । छाती ठुकना = हिम्मत बँधना । साहसबँधना । चित्त में दृढ़ता होना । जैसे,—मुंशी चुन्नीलाल और बाबू बैजनाथ ने इनको हिम्मत बँधाने में कसर नहीं रखी; परंतु इनका मनकमजोर है, इससे इनकी छाती नहीं ठुकती ।—परीक्षागुरु (शब्द॰) । छाती ठोकना = किसी कठिन कार्य के करने की साहसपूर्वक प्रतिज्ञ । करना । किसी भारी या कठिन कार्य को करने का दृढ़तापूर्वक निश्चय दिलाना । कोई; दुष्कर कार्य करने का साहस प्रकट करना । हिम्मत बाँधना । जैसे,—मैं छाती ठोककर कहता हूँ कि उसे आज पकड़ लाऊँगा । छाती धडकना = भय या आशंका से हृदय कंपित होना । कलेजा धक धक करना । खटके या डर से कलेजा जल्दी जल्दी उछलना । जी दहलना । छाती थामकर रह जाना = ऐसा भारी शोक या दुःख अनुभव करना जो प्रकट न किया जा सके । कोई भारी मानसिक आघात सहकर स्तब्ध हो जाना । शोक से ठक रह जाना । छाती पकड़कर रह जाना या बैठ जाना = दे॰ 'छाती थामकर रह जाना' । छाती पक जाना = दे॰ 'छाती छलनी होना' । छाती पत्थर की करना = अत्यंत शोक या दुःख सहने के लिये जी कड़ा करना । भारी कष्ट या संताप सह लेना या सहने के लिये प्रस्तुत होना । छाती पत्थर पत्थर की होना = अत्यंत शोक या दुः ख सहने के लिये जी कड़ा होता । हृदय इतना कठोर होना कि वह शोक या दुःख का आघात सह ले । छाती पर फिरना = घड़ी घड़ी ध्यान में आना । बार बार स्मरण होना । छाती मर आना = प्रेम या करुणा के आवेग से हृदय परिपुर्ण होना । प्रेम या करुण से गदगद् होना । उ॰—वारि विलोचन बाँचत पाती । पुलकि गात भरि आई छाती ।— तुलसी (शब्द॰) । छाती मसोसना = चुपचाप हृदय मे ं ऐसा घोर दुःख होना जो प्रकट न किया जा सके । मन ही मन संतप्त होना । छाती में छेद होना या पड़ना=कष्ट या अपमान सहते सहते हृदय जर्जर होना । बार बार के दुःख या कुढ़न से चित अत्यंत व्यथित होना । कुढ़ते कुढ़ते या दुःख झेलते झेलते जी ऊब जाना । उ॰—भेदिया सो भेद कहिबो छेद सो छाती परो ।—सूर (शब्द॰) ।

३. स्तन । कुच । उ॰—छाइ रहे छद छाती कपोलनि आनन ऊपर ओप चड़ाई ।—कविराज (शब्द॰) । मुहा॰—छाती उमरना = युवावस्था आरंभ होने पर स्त्रियों के स्तन का उठना या बढ़ना । छाती देना = बच्चे के मुँह में पीने के लिये स्तन डालना । दूध पिलाना । छाती पकना = स्तनों पर क्षत होना । स्तनों पर घाव होना । छाती भर आना = (१) छाती में दूध भर आना । दूध उतरना । (२) दे॰ 'छाती उभड़ना' । (३) अत्यंत दुःख होना । आँखों में आँसू भर आना । छाती में दूध छलकना = प्यार से छाती उछलती ही रही, दूध छाती में छलकता ही मिला ।—चोखे॰, पृ॰ ७ । छाती मसलना = छाती मलना । स्तन दबाना या मरोड़ना (संभोग का एक अंग) ।

४. हिम्मत । साहस । दृढ़ता । जैसे,—किसी की छाती है जो उसका सामना करे ।

५. एक प्रकार की कसरत जो दुबगली के ढंग की होती है । उ॰—एक पेंच जो उस समय किया जाता है जब विपक्षी दोनों ओर से हाथ कमर पर ले जाकर कमर बाँधकर झोंका देना चाहता है । इसमें विपक्षी के हाथ को ऊपर से लपेटते हुए खेलाड़ी अपने हाथ मजबूत बाँधकर बाहरी या बगली टाँग मारता हैं ।