छाप

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

छाप ^१ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ छापना]

१. वह चिह्न जो किसी रंग पुते हुए साँचे को किसी वस्तु पर दबाकर बनाया जाय । खुदे या उभरे हुए ठप्पे का निकान । जैसे, चंदन या गेरू क्री छाप, बूटी की छाप, हथेली की छाप ।

२. असर । प्रभाव । क्रि॰ प्र॰—डालना ।—पड़ना ।—लगना ।—लगना ।

३. मुहर का चिह्न । मुद्रा । उ॰—दान किए बिनु जान न पैहो । माँगत छाप कहा दिखराओ को नहिं हमको जानत । सूर श्याम तब कह्यो ग्वारि सों तुम मोकों क्यों मानत ।—सूर (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—पड़ना ।—लगना ।—लगाना ।

४. शंख, चक्र आदि के चिह्व जिन्हें वैष्णव अपने अंगों पर गरम धातु से अंकित कराते हैं । मुद्रा । उ॰—(क) द्वारका छाप लगे भुज मूल पुरानन गाहिं महातम भौंन हैं ।—(शब्द॰) । (ख) मेटे क्यों हूँ न मिटति छाप परी टटकी । सूरदास प्रभु की छबि हृदय मों अटकी ।—सूर (शब्द॰) ।

५. वह निशान जो साँचे में अन्न की राशि के ऊपर मिट्टी डालकर लगाया जाता है । चाँक ।

६. एक प्रकार की अँगूठी जिसमें नगीने की जगह पर अक्षर आदि खुदा हुआ ठप्पा रहता है । उ॰—विद्रुम अंगुरि पानि चरै रँग सुंदरता सरसानो । झाप छला मूँदरी झलकें, दमकैं पहुँची गजरा मिलि मानो ।—गुमान (शब्द॰) ।

७. कवियों का उपनाम ।

छाप ^२ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ क्षेप( = खेप)]

१. काँटे या लकड़ी का बोझ जिसे लकड़िहारे जंगल से सिर पर उठाकर लाते हैं ।

२. बाँस की बनी हुई टोकरी जिससे सिंचाई के लिये जलाशय से पानी उलीचकर ऊपर चढ़ाते हैं ।