छाया

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

छाया संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]

१. प्रकाश का अभाव जो उसकी किरणों के व्यवधान के कारण किसी स्थान पर होता है । उजाला डालनेवाली वस्तु और किसी स्थान के बीच कोई दूसरी वस्तु पड़ जाने के कारण उत्पन्न कुछ अंधकार या कालिमा । वह थोड़ी थो़ड़ी दूर तक फैला हुआ अँधेरा जिसके आस पास का स्थान प्रकाशित हो । साया । जैसे, पेड़ की छाया, मंडप की छाया ।

२. वह स्थान जहाँ किसी प्रकार की आड़ या व्यवधान के कारण सूर्य, चंद्रमा, दीपक या और किसी आलीकपद वस्तु का उजाला न पड़ना हो ।

३. फैले हुए प्रकाश को कुछ दूर तक रोकनेवाली वस्तु की आकृति जो किसी दूसरी ओर अंधकार के रूप में दिखाई पड़ती है । परछाई । जैसे, खंभे की छाया । वि॰ दे॰ 'छाँह' ।

४. जल, दर्पण आदि में दिखाई पड़नेवाली वस्तुओं की आकृति । अक्स ।

५. तद्रूप वस्तु । प्रतिकृति । अनुहार । सदृश वस्तु । पटतर । उ॰—कहहु सप्रेम प्रगट को करई । केहि छाया कवि मति अनुसरई ।—तुलसी (शब्द॰) ।

६. अनुकरण । नकल । जैसे,—यह पुस्तक एक बँगला उपन्यास की छाया है ।

७. सूर्य की एक पत्नी का नाम । विशेष—इसकी उत्पात्ति की कथा इस प्रकार है । बिवस्वान् सूर्य की पत्नी संज्ञी थी जिसके गर्भ से वैवस्वत, श्राद्ध देव, यम और यमुना का जन्म हुआ । सूर्य का तेज न सह सकने के कारण संज्ञा ने अपनी छाया से अपनी ही ऐसी एक स्त्री उत्पन्न की और उससे यह कहकर कि तुम हमारे स्थान पर इन पुत्रों का पालन करना और यह भेद सूर्य पर न खोलना, वह अपने पिता विश्वकर्मा के घर चली गई । सूर्य ने छाया को ही संज्ञा समझकर उससे सावर्णि और शनैश्चर नामक दो पुत्र उत्पन्न किए । छाया इन दोनों पुत्रों को संज्ञा की संतति की अपेक्षा अधिक चाहने लगी । इसपर यम क्रुद्ध होकर छाया को लात मारने चले । छाया ने शाप दिया कि तुम्हारा पैर कटकर गिर जाय । जब सूर्य ने यह सुना तब उन्होंने छाया से इस भेदभाव का कारण पूछा, पर उसने कुछ न बताया । अंत में सूर्य ने समाधि द्वारा सब बातें जान लीं और छाया ने भी सारी व्यवस्था ठीक ठीक बतला दी । जब सूर्य क्रुद्ध होकर विश्वकर्मा के यहाँ गए, तब उन्होंने कहा—संज्ञा तुम्हारा तेज न सह सकने के कारण ही यहाँ चली आई थी और अब एक घोड़ी का रूप धारण करके तप कर रही है । इसपर सूर्य संज्ञा के पास गए और उसने अपना रूप परिवर्तित किया ।

८. कांति । दीप्ति ।

९. शरण । रक्षा । जैसे—अब तुम्हारी छाया के नीचे आ गए है; जो चाहे सो करो ।

१०. उत्कोच । घूस । रिशवत ।

११. पंक्ति ।

१२. कात्यायनी ।

१३. अंधकार ।

१४. आर्या छंद का भेद जिसमें १७ गुरु और लघु होते हैं ।

१५. एक रागिनी ।