छाला

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

छाला संज्ञा पुं॰ [सं॰ छाल]

१. छाल या चमड़ा । वर्म । जिल्द । जैसे, मृगछाला । उ॰—(क) जरहिं मिरिग बनखँड तेहि ज्वाला । आते जरहिं बैठ तेहि छाला ।—जायसी ग्रं॰, पृ॰ ८६ । (ख) सेस नाग जाके कँठ माला । तनु भभूति हस्ती कर छाला ।—जायसी ग्रं॰, पृ॰ ९० ।

२. किसी स्थान पर जलने, रगड़ खाने या और किसी कारण से उत्पन्न चमड़े की ऊपरी झिल्ली का फूलकर उभरा हुआ तल जिसके भीतर एक प्रकार का चेप या पानी भरा रहता है । फफोला । आबला । झलका । उ॰—पाँयन में छाले परे, बाँधिबे को नाले परे, तऊ, लाल, लाले परे रावरे दरस को ।—हरिश्चंद्र (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—पड़ना ।

३. वह उभरा हुआ दाग जो लोहे या शीशे आदि में पड़ जाता है ।