जगत्

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

जगत् संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वायु ।

२. महादेव ।

३. जंगम ।

४. विश्व । संसार । यौ॰—जगत्कर्ता; जगत्कारण, जगत्तारण, जगत्पति, जगतपिता, जगत्स्रष्टा = परमेश्वर । ईश्वर । जगत्पऱायण = विष्णु । जगत्प्रसिद्ध = विश्वप्रसिद्ध । लोक में ख्यात । पर्या॰—जगती । लोक । भुवन । विश्व ।

५. गोपाचंदन ।

जगत् और सृष्टि के संबंध में वेदांतियों ने नैयायिकों के 'आंरंभवाद' (ईश्वर सृष्टि उत्पन्न करता है) और सांख्य के 'परिणामवाद' (सृष्टि का विकास उत्तरोत्तर विकार या परिणाम द्वारा अव्यक्त प्रकृति से आपसे आप होता है) के स्थान पर 'विवर्तवाद' की स्थापना की है जिसके अनुसार जगत् ब्रह्मा का विवर्त या कल्पित रुप है । रस्सी को यदि हम सर्प समझें तो रस्सी सत्य वस्तु है और सर्प उसका विवर्त या भ्रांतिजन्य प्रताति है । इसी प्रकार ब्रह्मा तो नित्य और वास्तविक सत्ता है और नामरुपात्मक् जगत् उसका विवर्त है । यह विवर्त अध्यास द्वारा होता है । जो नामरुपात्मक दृश्य हम देखते हैं वह न तो ब्रह्मा का वास्तव स्वरुप ही है, न कार्य या परिणाम ही क्योकि ब्रह्म निर्विकार और अपरिणामी है । अध्यास के संबंध में कहा जा सकता है कि सर्प कोई अलग पदार्थ है तब तो उसका आरोप होता है । अतः इस विषय को और स्पष्ट करने के लिये 'दृष्टि'- सृष्टि-वाद' उपस्थित किया जाता है जिसके अनुसार माया या नामरुप मन की वृत्ति है । इनको सृष्टि मन ही करना है और मन ही देखता है । ये नामरुप उसी प्रकार मन या वृत्तियों कें बाहर की कोई वस्तु नही है, जिस प्रकार जड़ चित् के बाहर की कोई वस्तु नहीं है । इन वृत्तियों का शमन है मौक्ष है । इन दोनों वादों में कुछ त्रुटि देखकर कुछ वेदांती 'अवच्छेदवाद' का आश्रय लेते हैं । वे कहते है कि ब्रह्मा के अतिरिक्त जगत् की जो प्रतीति होती है, वह एकरस या अनवच्छिन्न सत्ता के भीतर माया द्वारा अवच्छेद या परिमिति के आरोप के कारण होती है । कुछ अन्य वेदांती इन तीनों वादों के स्थान पर बिंब- प्रतिबिंब-वाद उपस्थित करते हैं और कहते हैं कि ब्रह्मा प्रकृति या माया के बीच अनेक प्रकार से प्रतिबिंबित होता है जिससे नामरुपात्मक दृश्यों की प्रतीति होती है । अंतिम वाद 'अजात वाद' है जिसे 'प्रौढ़िवाद' भी कहते है । यह सब प्रकार की उत्पत्ति को, चाहे वह विवर्त के रुप में कही जाय, चाहे दृष्टी सृष्टी या अवच्छेद या प्रतिबिंब के रुप में—अस्वीकार करता है और कहना है कि जो जैसा है वह वैसा ही है और सब ब्रह्मा है । ब्रह्मा अनिर्वचनीय है, उसका वर्णन शब्दों द्वारा हो ही नहीं सकता क्योंकि हमारे पास जो भाषा है, वह द्वैत हा की है; अर्थात् जो कुछ हम कहते हैं भेद के आधार पर हो । यद्यपि ब्रह्मा का वास्तविक या पारमार्थिक रुप अव्यक्त, निर्गुण और निर्विशेष है, तथापि व्यक्त और सगुण रुप भी उसके बाहर नहीं है । पंचदशी में इन सगुण रुपों का विभेद प्रतिबिंबावद के शब्दों में इसी प्रकार समझाया गया हैः रजोगुण की प्रवृत्ति से प्रकृति दो रुपों में विभक्त होती है—सत्वप्रधान और तमः प्रधान । सत्वप्रधान के भी दो रुप हो जाते है—शुद्ध सत्व (जिसमें सत्व गुण पूर्ण हो) और अशुद्ध सत्व (जिसमे सत्व अँशतः हो) । प्रकृति के इन्हीं भेदों में प्रतिबिंबित होने के कारण ब्रह्मा को 'जीव' कहते हैं । वेदांत या अद्वैतवाद से साधारणतः शंकराचार्य प्रतिपादित अद्वैत- वाद लिया जाता है जिसमें ब्रह्म स्वगत, सजातीय और विजातीय तीनों भेंदों से परे कहा गया है । पर जैसा ऊपर कहा जा चुका है, बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर रामानुजाचार्य और शंकराचार्य के भाष्य भी हैं । रामानुज के अद्वैतवाद को 'विशिष्टद्वैत' कहते हैं; क्योकि उसमें ब्रह्म को चित् और अचित् इन दो पक्षों से युक्त या विशिष्ट कहा है । ब्रह्म के इसी सूक्ष्म चित् और सूक्ष्म अचित् से स्थूल चित् (जीव) और स्थूल अचित् (जड़) उत्पन्न हुए । अतः रामानुज के अनुसार ब्रह्म केवल निर्मित्त कारण है; उपादान हैं जड़ (स्थूल अचित्) और जीव (स्थूल चित्) । इस मत के अनुसार जीव को ब्रह्म का अंश कह सकते हैं । पर शंकर मत से नही; क्यों- कि उसमें ब्रह्म सब प्रकार के भेदों से परे कहा गया है । वल्लभाचार्य जी का अद्वैत 'शुद्वाद्वैत' कहलाता है, क्योकिं उसमें रामानुजकृत दो पक्षों की विशिष्टता हटाकर अद्वैतवाद शुद्ध किया गया है । इस मक के अनुसार सत्, चित् और आनंद- स्वरुप ब्रह्म अपने इच्छानुसार इन तीनों स्वरुपों का आविर्भाव करता रहता है । जड़ जगत् भी ब्रह्म ही है, पर अपने चित् और आनंद स्वरुपों का पूर्ण तिरोभाव किए हुए तथा सत् स्वरुप का कुछ अशंतः आविर्भाव किए हुए है । चेतन जगत् भी ब्रह्म ही है जिसमें सत्, चित् और आनंद इन तीनों स्वरुपों का कुछ आविर्भाव और कुछ तिरोभाव रहता है । माया ब्रह्म ही की शक्ति है जो उसी की इच्छा से विभक्त होती है; अतः मायात्मक जगत् मिथ्या नही है । जाव अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरुप को तभी प्राप्त करता है जब आविर्भाव और तिरा- भाव दोनों मिट जाते है'; और यह बात केवल ईश्वर के अनुग्रह से ही, जिसे 'पुष्टि' कहते हैं, तो सकती है । यहाँ यह भी समझ लेना चाहिए कि रामानुज और वल्लभाचार्य केवल दार्शनिक ही न थे, भक्तिमार्गी भी थे ।