जायफल

विक्षनरी से
जायफल का पौधा

हिन्दी[सम्पादन]

उच्चारण[सम्पादन]

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प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

जायफल संज्ञा पुं॰ [सं॰ जातीफल, प्रा॰ जाइफल] अखरोट की तरह का पर उससे छोटा, प्रायः जामुन के बराबर, एक प्रकार का सुगंधित फल जिसका व्यवहार औषध और मसाले आदि में होता है जातीफल । पर्या॰—कोषक । सुमनफल । कोश । जातिशस्य । शालूक । मालती- फल । मज्जसार । जातिसार । पुट । विशेष—जायफल का पेड़ प्रायः ३०, ३५ हाथ ऊँचा और सदा- बहार होता है, तथा मलाका, जावा और बटेविया आदि द्वीपों में पाया जाता है । दक्षिण भारत के नीलगिरि पर्वत के कुछ भागों में भी इसके पेड़ उत्पन्न किए जाते हैं । ताजे बीज बोकर इसके पेड़ उत्पन्न किए जाते हैं । इसके छोटे पौधों की तेज धूप आदि से रक्षा की जाती है और गरमी के दिनों में उन्हें नित्य सींचने की आवश्यकता होती है । जब पौधे डेढ़ दो हाथ ऊँचे हो जाती हैं । तब उन्हें १५—२० हाथ की दूरी पर अलग अलग रोप देते हैं । यदि उनकी जड़ों के पास पानी ठहरने दिया जाय अथवा व्यर्थ धासपात उगने दिया जाय तो ये पौधे बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं । इसके नर और मादा पेड़ अलग अलग होते हैं । जब पेड़ फलने लगते हैं तब दोनों जातियों के पेड़ों को अलग अलग कर देते हैं और प्रति आठ दस मादा पेड़ों के पास उस और एक नर पेड़ लगा देते हैं जिधर से हवा अधिक आती है । इस प्रकार नर पौधों का पुंपराग उड़कर मादा पेड़ों के स्त्री रज तक पहुँचता है और पेड़ फलने लगते हैं । प्रायः सातवें वर्ष पेड़ फलने लगते हैं और पंद्रहवें वर्ष तक उनका फलना बराबर बढ़ता जाता है । एक अच्छे पेड़ में प्रतिवर्ष प्रायः डेढ़ दो हजार फल लगते हैं । फल बहुधा रात के समय स्वयं पेड़ों से गिर पड़ते हैं और सबेरे चुन लिए जाते हैं । फल के ऊपर एक प्रकार का छिलका होता है जो उतारकर अलग सुखा लिया जाता है । इसी सूखे हुए ऊपरी छिलके को जावित्री कहते हैं । छिलका उतारने के बाद उसके अंदर एक और बहुत कडा़ छिलका निकलता है । इस छिलके को तोड़ने पर अंदर से जायफल निकलता है जो छाँह में सुखा लिया जाता है । सूखने पर फल उस रूप में हो जाते हैं जिस रूप में वे बाजार में बिकने जाते हैं । जायफल में से एक प्रकार का सुंगधित तेल और अरक भी निकाला जाता है जिसका व्यवहार दूसरी चीजों की सुंगध बढा़ने अथवा औषधों में मिलाने के लिये होता है । जायफल की बुकनी या छोटे छोटे टुकडे़ पान के साथ भी खाए जाते है । भारतवर्ष में जायफल और जावित्री का व्यवहार बहुत प्रचीन काल से होता आया है । वैद्यक में इसे कडुआ, तीक्ष्ण गरम रेचक, हलका, चरपरा । अग्निदीपक, मलरोधक, बलवधंक तथा त्रिदोष, मुख की विरसंता, खाँसी, वमन, पीनस और हृदरोग आदि को दूर करनेवाला माना है ।