जीभ

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

जीभ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ जिह्वा, प्रा॰ जिब्भ]

१. मुँह के भीतर रहनेवाले लंबे चिपटे मासपिंड के आकार की वह इंद्रिय जिससे कटु, अम्ल, तिक्त इत्यादि रसों का अनुभव और शब्दों का उच्चारण होता है । जबान । जिह्वा । रसना । विशेष—जीभ मांसपेशियों और स्नायुओं से निर्मित है । पीछे की ओर यह नाल के आकार की एक नरम हड्डी से जुड़ी है जिसे जिह्वास्थि कहते हैं । नीचे की ओर यह दाढ़ के मांस से संयुक्त है और ऊपर के भाग अपेक्षा अधिक पतली झिल्ली से ढकी है जिसमें से बराबर लार छूटती रहती है । नीचे के भाग की अपेक्षा ऊपर का भाग अधिक छिद्रयुक्त या कोशमय होता है और उसी पर वे उभार होते हैं जा काँटे कहलाते हैं । ये उभार या काँटे कई आकार के होते हैं, कोई अर्धचंद्राकार कोई चिपटे और कोई नोक या शिखा के रूप के होते हैं । जिन माँसपेशियों और स्नायुओं के द्वारा यह दाढ़ के माँस तथा शरीर के और भागों से जुड़ी है उन्हीं के बल से यह इधर उधर हिल डोल सकती है । स्नायुओं में जो महीन महीन शाखा स्नायु होती है उनके द्वारा स्पर्श तथा शीत, उष्ण आदि का अनुभव होता़ है । इस प्रकार के सूक्ष्म स्नायुओं का जाल जिह्वा के अग्र भाग पर अधिक है इसी से वहाँ स्पर्श या रस आदि का अनुभव अधिक तीव्र होता है । इन स्नायुओं के उत्तेजित होने से ही स्वाद का बोध होता है । इसी से कोई अधिक मीठी या सुस्वादु वस्तु मुँह में लेकर कभी लोग जीभ चटकारते या दबाते हैं । द्रव्यों की संयोग से उत्पन्न एक प्रकार की रासायनिक क्रिया से इन स्नायुओं में उत्तेजना उत्पन्न होती है । १२८ अंश गरम जल में एक मिनट तक जीभ डुबोकर यदि उसपर कोई वस्तु रखी जाय तो खट्टे मीठे आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं होता । कई वृक्ष ऐसे हैं जिनकी पत्तियाँ चवा लेने से भी यह ज्ञान थोड़ी देर के लिये नष्ट हो जाता है । वस्तुओं का कुछ अंश काटों में लगकर और घुलकर छिद्रों के मार्ग से जब सूक्ष्म स्नायुओं में पहुँचता है तभी स्वाद का बोध होता है । अतः यदि कोई वस्तु सूखी, कड़ी है तो उसका स्वाद हमें जल्दी नहीं जान पडे़गा । दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि घ्राण का रसना का स्वाद से घनिष्ठ संबंध है । कोई वस्तु खाते समय हम उसकी गंध का भी अनुभव करते हैं । जिस स्थान पर जीभ लारयुक्त मांस आदि से जुड़ी रहती है वहाँ कई सूत्र या बंधन होते हैं जो जीभ की गति नियत या स्थिर रखते हैं । इन्हीं बंधनो के कारण जीभ की नोक पीछे की ओर बहुत दूर तक नहीं पहुँच सकती । बहुत से बच्चों की जीभ में यह बंधन आगे तक बढ़ा रहता है जिससे वे बोल नहीं सकते । बंधनो को हटा देने से बच्चे बोलने लगते हें । रसास्वादन के अतिरिक्त मनुष्य की जीभ का बड़ा भारी कार्य कंठ से निकले हुए स्वर में अनेक प्रकार के भेद डालना है । इन्हीं विभेदों से वर्णों की उत्पत्ति होती है जिनसे भाषा की विकास होता है । इसी से जीभ को वाणी भी कहते है । पर्या॰—जिह्वा । रसना । रसज्ञा । रसाल । रसिका । साधुस्रवा । रसला । रसांक । ललना ।