जूँ

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

जूँ ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ यूका] एक छोटा स्वदेज कीड़ा जो दूसरे जीवों के शरीर के आश्रय से रहता है । विशेष—ये कीडे़ बालों में पड़ जाते हैं औऱ काले रंग के होते हैं । आगे की ओर इनके छह पैर होते हैं और इनका पिछला भाग कई गंडो में विभक्त होता है । इनके मुँह में एक सूँड़ी होती है जो नोक पर झुकी होती है । ये कीडे़ उसी सूँड़ी को जानवरों के शरीर में चुभोकर उनके शरीर से रक्त चूसकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं । चीलर भी इसी की जाति का कीड़ा है पर वह सफेद रंग का होता है और कपड़ों में पड़ता है । जूँ बहुत अंढे देती हैं । ये अंडे बालों में चिपके रहते हैं और दो ही तीन दिन में पक जाते और छोटे छोटे कीडे़ निकल पड़ते हैं । ये कीडे़ बहुत सूक्ष्म होते हैं और थोडे़ ही दिनों में रक्त चूसकर बडे़ हो जाते हैं । भिन्न भिन्न आदमियों के शरीर पर की जूँ भिन्न भिन्न आकृति औऱ रंग की होती हैं । लोगों का कथन है कि कोढ़ियों के शरीर पर जूँ नहीं पड़ती । क्रि॰ प्र॰—पड़ना । यौ॰— जूँ मुहाँ । मुहा॰— कानों पर जूँ रेँगना = चेत होना । स्थिति का ज्ञान होना । सतर्कता होना । होश होना । कानों पर जूँ न रेंगना = होश न आना । बात ध्यान में न आना । जूँ की चाल = बहुत धीमी चाल । बहुत सुस्त चाल ।

जूँ पु ^२ अव्य॰ [हिं॰] दे॰ 'ज्यू' । उ॰— मारू सायर लहर जूँ हिवडे़ द्रव काढ़ंत ।—ढोला॰, दू॰ ६१२ ।