जौ

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

जौ ^२पु अव्य॰ [सं॰ यद्]

१. यदि । अगर । उ॰—(क) जो करनी समुझे प्रभु मोरी । नहिं निस्तार कल्प शत कोरौ ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) जो बालक कछु अनुचित करहीं । गुरु, पिंतु मातु मोद मन भरहीं ।—तुलसी (शब्द॰) ।

जौ ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ यव]

१. चार पाँच महीने रहनेवाला एक पौधा जिसके बीज या दाने की गिनती अनाजों में है । विशेष—यह पौधा पृथ्वी के प्राय: समस्त उष्ण तथा समप्रकृतिस्थ स्थानों में होता है । भारत का यह एक प्राचीन धान्य और हविष्यान्न है । भारतवर्ष में यह मैदानों के अतिरिक्त प्राय: पहाड़ों पर भी १४००० फुट की उँचाई तक होता है । इसकी बोआई कार्तिक अगहन में होती है और कटाई फागुन चैत में होती है । इसका पौधा बहुत कुछ गेहूँ का सा होता है । अंतर इतना होता है कि इसमें जड़ के पास से बहुत से डंठल निकलते है जिन्हें कभी कभी छाँटकर अलग करना पड़ता है । इसमें टूँड़दार वाल लगती है जिसमें कोश के साथ बिलकुल चिपके हुए दाने पंक्तियों में गुछे रहते हैं । दानों के ऊपर का नुकीला कोश कठिनाई से अलग होता है, इसी से यह अनाज कोश सहित बिकता है, पर काशमीर में एक प्रकार का जौ ग्रिम नाम का होता है जिसके दाने गेहूँ की तरह कोश से अलग रहते हैं । गेहूँ के समान जो के या जौ की गूरी के भी आटे का व्यवहार होता हैं । भूसी रहित जौ या उसके मैदा का प्रयोग रोगियों के लिये पथ्य के काम आता है । सूखे हुए पौधे का भूसा होता है जो चौपायों को प्रिय, लाभकर है और उनके के खाने के काम में आता है । यूरोप में और अब भारतवर्ष के भी कई स्थानों में जौ से एक प्रकार की शराब बनाई जाती है । जौ कई प्रकार के होते है । इस अन्न को मनु्ष्य जाति अत्यंत प्राचीन काल से जानती है । वेदों में इसका उल्लेख बराबर है । अब भी हवन आदि में इस अन्न का व्यवहार होता है । ईसा से २७०० वर्ष पहले चीन के बादशाह शिनंद ने जिन पाँच अन्नों को बोआया था उनमें एक जौ भी था । ईसा से १०१५ वर्ष पहले सुलेमान बादशाह के समय में भी जौ का प्रचार खूब था । मध्य एशिया के करडँग नामक स्थान के खँडहर के नीचे दबे हुए जौ स्टीन साहब को मिले थे । इस खँड़हर के स्थान पर सातवीं शताब्दी में एक अच्छा नगर था जो बालु में दब गया । वैद्यक में जो तीन प्रकार के माने गए हैं—शूक, निःशूक और हरित वर्ण । शूक को अव, नि:शूक को अतियव और हरे रंग के यव को स्तोक्य कहते हैं । जो शीतल, रूखा, वीर्यवर्धक, मलरोधक तथा पित्त और कफ को दूर करनेवाला माना जाता है । यव से अतियव और अतियव से स्तोक्य (घोड़जई भी) हीन गुणवाला माना जाता है । पर्या॰—यव । मेध्य । सितशूल । दिव्य । अक्षत । कंचुकि । धान्यराज । तीक्ष्णशूक । तुरयप्रिय । शक्तु । हयेष्ट । पवित्र धान्य । मुहा॰—जौ जौ बढ़ना = धीरे धीरे बिना लक्षित हुए बढ़ना या विकसित होना । तिल तिल बढ़ना । क्रमशः बढ़ना । जौ बराबर = जौ के दाने के बराबर लंबा । जौ भर = जौ के दाने के परिमाण का । खाए पिए सौ सौ हिसाब करे जौ जौ, या दे ले सौ सौ हिसाब करे जौ जौ = अधिक से अधिक सामुहिक व्यय करे पर हिसाब पाई पाई या पैसे पैसे का रखे ।

२. एक पौधा जिसकी लचीली टहनियों से पंजाब में टोकरे झाड़ु आदि बनते हैं । मध्य एशिया के प्राचीन खँड़हरों में मकान के परदों के रूप में इसकी टट्टियाँ पाई गई हैं ।

३. एक तौल जो ६ राई (खरदल) के बराबर मानी जाती है ।

जौ ^२ † अव्य॰ [सं॰ यद्] यदि । अगर । उ॰—जौ लरिका कछ ु अनुचित करहीं । गुरु पितु मातु मोद मन भरहीं ।—तुलसी (शब्द॰) ।

जौ ^३ क्रि॰ वि॰ [हिं॰] जब । यौ॰—जौ लौं, जौ लगि, जौ लहि = जब तक ।